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सिद्ध साहित्य

  • भगवान बुद्ध के जन्म काल (लगभग 500 ई. पू. ) के आसपास संस्कृत पूर्ण विकास की अवस्था में थी। इस समय उत्तर-पश्चिम में गांधार प्रदेश से लेकर पूर्व में मगध पर्यन्त (बिहार राज्य) संस्कृत प्रतिष्ठित हो चुकी थी। किन्तु यह शिक्षित और शिष्ट वर्ग तक ही सीमित रही। संयुक्त वर्णो की बहुलता के कारण उच्चारण की असुविधा होने से सामान्य जन बोलते समय अनेक ध्वनियों का लोप कर देते थे। इस प्रकार सरलीकरण की यह प्रक्रिया पहले-पहल मगध प्रदेश में परिलक्षित हुई।
  • महात्मा बुद्ध ने इसी भाषा-पालि के माध्यम से अपना संदेश जनता तक पहुंचाया है। कदाचित इसी कारण बौद्ध… (914 more words) …

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पृथ्वीराज रासो

यह निर्विवाद सत्य है कि रासो-काव्य-परम्परा में पृथ्वीराज रासो का स्थान सर्वोपरि है। जिस प्रकार कृष्ण भक्तिधारा में जो स्थान सूरदास के सूरसागर का है, राम भक्तिधारा में जो महत्व तुलसी के रामचरितमानस को प्राप्त है, वही महत्व रासो-काव्य-परम्परा में पृथ्वीराज रासो को प्राप्त है। विदव्ानों ने इस कृति को हिन्दी के प्रथम महाकाव्य के रूप में स्वीकार किया है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इसे हिन्दी का प्रथम महाकाव्य माना है, तो वही स्वर्गीय गुलाब राय ने इसे स्वाभाविक विकासशील महाकाव्य माना है वहीं मोतीलाल मेनारिया ने इसमें महाकाव्य की भव्यता और दृष्यकाव्य की संजीवता देखी है। डॉ. विपिन बिहारी… (333 more words) …

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