CBSE-NET (Based on NTA-UGC) Hindi Literature (Paper-II) हिन्दी साहित्य का इतिहास (History of Hindi Literature)-आदिकाल (Beginning Era) Revision (Page 1 of 15)

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रासो साहित्य

साहित्य का निर्माण परम्पराओं से होता है। कोई भी कवि किसी न किसी परम्परा का सहारा लेकर काव्य रचना की ओर प्रवृत्त होता है। हिन्दी साहित्य में प्रत्येक युग किसी न किसी परम्परा का सहारा लेकर ही निर्मित हुआ है। रासो काव्य -परम्परा इसका अपवाद नहीं हैं। रासो काव्य की परम्परायें हिन्दी साहित्य के प्रारम्भिक काल से शुरू होकर और निरन्तर निर्बाध रूप से विकसित होती रही है। इस परम्परा के बीच-बीच में कतिपय परिवर्तन भी हुए किन्तु वे परिवर्तन ऐसे नहीं थे, जिन्हें मौलिक और विशिष्ट परिवर्तन कहा जा सके

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हास्य मिश्रित रासो ग्रंथ

रासो काव्यपरम्परा में हास्य मिश्रित रासो ग्रंथों को भी नहीं भुलाया जा सकता हे। इस वर्ग में आने वाले ग्रंथों में मकाड़ रासों, ऊँदर रासो, खीचड़ रासो और गोधा रासो आदि है। ये सभी रासों ग्रंथ डिंगल भाषा में रचित हैं।

पिंगल या बृजभाषा के रासो ग्रंथ

डिंगल के रासो ग्रंथों की जो परम्परा मिलती है, वैसी ही परम्परा पिंगल के ग्रंथों में भी मिलती है।

पिंगल या ब्रजभाषा में लिखे गए रासो ग्रथों की नामावली इस प्रकार है

Raso Compositions in Pingal or Braj

Raso Compositions written in Pingal or Braj

गिनती

ग्रंथ

रचनाकार

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