CBSE-NET (Based on NTA-UGC) Hindi Literature (Paper-II) हिन्दी भाषा और उसका विकास और साहित्य (Hindi & Its Development)-खड़ी बोली (Local Language) Revision (Page 4 of 5)

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बीसवीं सदी में साहित्यिक खड़ी बोली

  • खड़ी बोली और हिन्दी साहित्य के सौभाग्य से 1903 ई. में अचार्य महावीर प्रसाद दव्वेदी ने ’सरस्वती’ पत्रिका के संपादकत्व का भार संभाला। किसी विवाद में न पड़कर वे साहित्य-रचना में लीन हुए थे वे सरल और शुद्ध भाषा के प्रयोग पर बल देते थे साथ ही तद्भव शब्दों के पक्षपाती थे, परन्तु विषय और भाव के अनुसार संस्कृत या उर्दू के शब्दों का व्यवहार भी चाहते थे। वे लेखकों की वर्तनी अथवा व्याकरण संबंधी त्रुटियों का संशोधन स्वयं करते थे। मैथिलीशरण गुप्त, रामचरित उपध्याय, लोचनप्रसाद पाण्डेय आदि उनके दव्ारा

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काव्यभाषा के रूप में खड़ी बोली

छायावादी युग (1920 - 1936)

  • साहित्यिक खड़ी बोली हिन्दी विकास में छायावादी युग का योगदान महत्वपूर्ण है। प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी और रामकुमार वर्मा आदि की साधना फलती हैं। इस युग की रचनाएं, सुख-दुख आशा-निराशा, प्रेम की विविध दशाओं विचारों के अन्तदव्र्दव्, प्रकृति की चेतनाशक्ति, नारी के स्वरूप आदि अनेक विषयों से संबधित भावों को अभिव्यक्त करने में हिन्दी सामर्थ्यवान्‌ हुई। अब कोई नहीं कह सका कि खड़ी बोली सूक्ष्म भावों को अभिव्यक्त करने में ब्रजभाषा से कम पड़ती है। हिन्दी में अनेक भाषायी

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