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साहित्यिक हिन्दी के रूप में खड़ी बोली का विकास

  • हिन्दी का संकुचित, मानक या परितिष्ठित अर्थ ग्रहण करने पर हिन्दी का मूल आधार खड़ी बोली है। खड़ी बोली पर आधारित यह हिन्दी ही हमारी राजभाषा है। यही शिक्षा का माध्यम है तथा हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं की भाषा है। वस्तुत: मानक हिन्दी का अभिप्राय इसी खड़ी बोली हिन्दी से लिया जाता है।
  • मुसलमान शासकों के प्रभाव से खड़ी बोली ही हिन्दी के नाम से प्रयुक्त हुई है। 14 वीं सदी में अमीर खुसरों ने सर्वप्रथम हिन्दी भाषा में काव्य-रचना की खुसरों दव्ारा रचित मुकरियां तथा पहेलियां खड़ी बोली में हैं, परन्तु उस काल में ब्रजभाषा और अवधी भाषा काव्य भाषाएं होने… (176 more words) …

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काव्यभाषा के रूप में खड़ी बोली

छायावादी युग (1920 - 1936)

  • साहित्यिक खड़ी बोली हिन्दी विकास में छायावादी युग का योगदान महत्वपूर्ण है। प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी और रामकुमार वर्मा आदि की साधना फलती हैं। इस युग की रचनाएं, सुख-दुख आशा-निराशा, प्रेम की विविध दशाओं विचारों के अन्तदव्र्दव्, प्रकृति की चेतनाशक्ति, नारी के स्वरूप आदि अनेक विषयों से संबधित भावों को अभिव्यक्त करने में हिन्दी सामर्थ्यवान्‌ हुई। अब कोई नहीं कह सका कि खड़ी बोली सूक्ष्म भावों को अभिव्यक्त करने में ब्रजभाषा से कम पड़ती है। हिन्दी में अनेक भाषायी गुणों का समावेश हुआ। अभिव्यंजना की विविधता, बिम्बों की लाक्षणिकता, ब्रजभाषा का रसात्मक लालित्य छायावादी युग… (602 more words) …

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