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अपभ्रंश की विशेषताएं

अपभ्रंश की विशेषताएं निम्न हैं-

  • ’अ’ का पूर्वी तथ पश्चिमी अपभ्रंशों में संवृत-विवृत का भेद था।
  • ऋ का लिखने में प्रयोग था, किन्तु उसका उच्चारण ’रि’ होता था।
  • श्‌ का प्रचार मात्र मागधी (सम्भवत: पूर्वी मागधी) से था।
  • ल माहाराष्ट्री में तो था ही, साथ ही उड़ीसा में बोली जाने वाली शौरसेनी में भी था। वह भी कहीं-कहीं था।
  • स्वरों का अनुनासिक रूप (ऋ का नहीं) प्रयुक्त होने लगा
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अप्रभंश (अवहट्ट सहित) और पुरानी हिन्दी का संबंध

  • ज्यों-ज्यों काव्य भाषा देश भाषा की ओर अधिक प्रवृत्त होती गई, त्यों-त्यों तत्सम्‌ संस्कृत शब्द रखने में संकोच छटता गया। शारंगधर के पद्यों और विद्यापति के ग्रंथ कीर्तिलता में इसका प्रमाण मिलता है।
  • अपभ्रंश भाषाओं से हिन्दी भारतीय भाषाओं का उदय हुआ। अपभ्रंश और आधुनिक भारतीय भाषाओं के उदय के बीच एक ऐसी भाषा का प्रयोग हो रहा था जब अपभ्रंश क्रमश: आधुनिक भाषाओं का रूप ग्रहण करने लगी थी।
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