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आकलैण्ड

प्रस्तुत स्थिति आकलैण्ड को स्वीकार नहीं थी। उसने संस्कृत और अरबी-फारसी पुस्तकों का छपना जारी कर दिया। पर बेन्टिक की पाश्चात्य शिक्षा की संस्तुति उसे ज्यों की त्यों मान्य थी। इस समय दो प्रश्न प्रमुख रूप से सामने आए- शिक्षा का माध्यम और जनता में शिक्षा का प्रचार-प्रसार। ये दोनों प्रश्न देश की संस्कृति, राजनीति और समाज के साथ व्यापक रूप से जुड़े हुए थे। शिक्षा के माध्यम के सबंध में तीन विकल्प थे-

o पहला यह कि माध्यमिक और विश्वविद्याालय की शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी हो,

o दूसरा यह कि संस्कृत और अरबी-फारसी हो ।

o तीसरा यह कि… (372 more words) …

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बाबू शिवप्रसाद सितारे

  • सन्‌ 1836 के बाद प्रभुवर्ग अधिक चतुर हो गया और नई अदालती भाषा के आधार पर हमारी एकता पर गहरा प्रहार किया। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के शब्दों में तासी ने भी फ्रांस में बैठे-बैठे इस आंदोलन में योगदान दिया। बाबू शिवप्रसाद सितारे हिन्द ने इस कूटनीतिक कार्यवाही को समझा और उन्होंने स्पष्ट कहा कि ”दिल्ली के मुसलमान बादशाहों ने भाषा के संबंध में जो कुछ सोचा भी नहीं था, वह अंग्रेजी के साथ-साथ फारसी लिपि में उर्दू को, जो एक दूसरी विदेशी भाषा है, लाद रही है। हिन्दी को अन्य भाषाओं बांगला, मराठी, गुजराती -से अलग करके उसके विकास को… (278 more words) …

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