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आर्यसमाज

सन्‌ 1867 में दयानंद सरस्वती ने बम्बई में आर्यसमाज की स्थापना की थी। दयानंद असाधारण व्यक्ति थे। वे संस्कृत के चोटी के विदव्ान और अत्यंत मेधावी थे। उनका व्यक्तित्व अतिशय दृढ़ और असमझौतावादी था। उनके विचारों में कहीं भी अस्पष्टता और रहस्यवादिता नहीं मिलेगी। विवेकानंद को छोड़कर इतना अटूट आत्म-विश्वास अन्यत्र नहीं दिया होगा।

गुजरात, उत्तर प्रदेश और पंजाब में आर्यसमाज का व्यापक प्रभाव था। इन प्रदेशों का मिजाज बंगाल से भिन्न है। बंगाल की भावुकता के स्थान पर इन्हें पौरुष और अक्खड़ता अधिक प्रिय है। बंगाल और महाराष्ट्र के पुनर्जागरण में मध्यकालीन संतों की वाणी का भी योगदान है।… (539 more words) …

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भाषा के विकास के सरकारी प्रयास

  • अंग्रेजी पर जोर होने के बावजूद सरकारी स्तर पर भारतीय भाषाओं को स्थान देने की मांग को अनसुना नहीं किया जा सका। अंग्रेजी शासन काल में भी भाषा के विकास के इतने कार्य मिलते हैं, जो हिन्दी विकास में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। कलकत्ते का फोर्ट विलियम महाविद्यालय 1801 ई. में मुख्य रूप से अंग्रेजी की शिक्षा देने के लिए खोला गया था, लेकिन इससे पहले 1791 ई. में ही बनारस संस्कृत महाविद्यालय की नींव रखनी पड़ी। खासतौर पर युवा वर्ग अंग्रेजी की तरफ आकृष्ठ था, लेकिन मातृभाषा में शिक्षा ग्रहण करने वालों की भी कमी नहीं थी। किन्तु यहाँ… (224 more words) …

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