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ब्रह्यधर्म

आर्यसमाज के पहले ही नवीनचंद्र राय पंजाब में हिन्दी के माध्यम से ब्रह्यधर्म का प्रचार कर रहे थे। उन्होंने फारसी-अरबी मिश्रित उर्दू का घोर विरोध किया है। उर्दू पर उस समय तक मजहबी रंग हद तक चढ़ चुका था कि राय को कहना पड़ा-उर्दू के प्रचलित होने से देशवासियों को कोई लाभ न होगा क्योंकि वह भाषा खास मुसलमानों की है। सन्‌ 1867 में उन्होंने हिन्दी में ’ज्ञान प्रकाशिनी पत्रिका’ भी निकाली। इन्हीं दिनों श्रद्धाराम फिल्लौरी अपने प्रवचनों से सनातन धर्म के प्रचार के साथ ही हिन्दी का प्रसार कर रहे थे। बाद में चलकर उन्होंने आर्यसमाज का विरोध किया।… (126 more words) …

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धर्म प्रचार

  • ईसाई मिशनरियां ईसाई डफ धर्म -प्रचार में लगे हुए थे, अपने धर्म के प्राचारार्थ उन्होंने हिन्दुओं और मुसलमानों के धर्मो पर निस्संकोच आक्रमण किया, उनकी निंदा की। मिशन विद्यालय में ईसाई धर्म की शिक्षा अनिवार्य थी। उनका विश्वास था कि प्रत्येक अव्यापक विज्ञान और गणित पढ़ाते हुए प्रकारांतर से भारतीय धर्मो को तोड़ने में मदद करता हैं। पर आँकड़ों से जाहिर है कि बहुत कम लोग ईसाईधर्म की श्रेष्ठता से प्रभावित होकर उसमें दीक्षित हुए। जिन लोगों ने धर्म स्वीकार किया उनको प्रेरणा देने वाली वस्तु धर्म की श्रेष्ठता नहीं, अर्थ की श्रेष्ठता थी।
  • फिर मिशनरियों के काम में भारतीय… (118 more words) …

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