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गीति नाट्‌य

इसी समय हिन्दी गीति नाट्‌य की ओर अभिरूचि बढ़ी। यह आज के युग के अनुरूप है। गीति नाट्‌य वास्तव में काव्य और नाटक का मिला-जुला रूप हैं। इसमें बौद्धिकता प्रधान गद्य नाटकों की नीरसता और शुष्कता का अभाव है। वास्तव में गद्य के माध्यम से मानव की रागात्मक प्रवृत्ति की अभिव्यक्ति संभव नहीं। जीवन के गंभीर सत्य को व्यक्त करने के लिए नाटक के साथ काव्य का समावेश अपेक्षित है। संगीत और नृत्य गीति नाट्‌य को लोकप्रियता की सीमा तक पहुँचाने में सहायक हुआ। भारत में आरंभ से ही नाटकों में काव्य और संगीत की प्रधानता रही। इस प्रकार हिन्दी… (174 more words) …

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भारतेन्दु काल

  • नव जागरण का युग हैं जबकि जनसमान्य में राष्ट्रीय चेतना का विकास और समाज में नई जागरूकता दिखाई दी। भारतेन्दु और उनके समकालीन नाटककारों ने अपने नाटकों में जनता की आशाओं को चित्रित किया। भारतेन्दु ही हिन्दी के प्रथम नाटककार कहे जाने के अधिकारी हैं। उन्हें हिन्दी रंगमंच का उत्कृष्ट जनक माना जाता है।

  • अन्य विधाओं की भांति ही नाटक साहित्य का भी भारतेन्दु युग में विकास हुआ। संस्कृत नाटकों की परंपरा के हास के बाद नाटक के क्षेत्र में एक बहुत बड़ा अभाव सामने आया। हिन्दी के आदिकाल और मध्यकाल में नाटक को विशेष प्रश्रय नहीं मिला। यह ठीक… (781 more words) …

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