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प्रसादोत्तर नाटक

प्रसादोत्तर काल से लेकर स्वतंत्रतापूर्व के काल तक हिन्दी नाटक कई धाराओं में विभक्त रहा। इस काल में एक ओर प्रसाद की नाट्‌य-परंपरा का ही अनुसरण होता रहा। दूसरी ओर यथार्थवादी और सामाजिक समस्यामूलक नाट्‌य-प्रवृत्तियों का भी उन्मेष हुआ। प्रसाद की नाट्‌य-परंपरा की वास्तविक पुनरावृत्ति कभी संभव नहीं हुई क्योंकि प्रसाद का अपना व्यक्तित्व और प्रतिभा थी, किन्तु उनकी नाट्‌य प्रवृत्तियों को किंचित परिवर्तन के साथ कई नाटककारों ने जीवित रखा।

उनके बाद हरिकृष्ण प्रेमी, चंद्रगुप्त विद्यालंकार उग्र, गोविन्द वल्लभ पंत, सेठ गोविन्ददास, वृन्दावनलाल वर्मा, उदयशंकर भट्‌ट, उपेंन्द्रनाथ अश्क, जगदीश चंद्र माथुर आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। आदि ने ऐतिहासिक… (235 more words) …

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नाटक

  • भरतमुनि ने नाटक को पंचम वेद कहा है। डॉ. दशरथ ओझा के अनुसार नाटक का आरंभ 13वीं शताब्दी में हुआ। उनकी मान्यता है कि ’गाय सुकमार रास’ हिन्दी का पहला नाटक है जो संवत्‌ 1289 में लिखा गया। किन्तु आलोचक उसमें नाटकीय तत्वों का अभाव देखकर उसे हिन्दी का प्रथम नाटक मानने को तैयार नहीं। कुछ विदव्ान मिथिला भाषा के नाटकों को हिन्दी के प्रारंभिक नाटक मानते हैं। विद्यापति दव्ारा रचित ’गोरख विजय’ आदि कई नाटक हैं किन्तु इनका गद्य भाग संस्कृत में और पद्य भाग मैथिली में है। अत: इनकी गणना हिन्दी नाटकों में करना उचित नहीं है। ब्रज… (21 more words) …

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