ICSE (Indian Certificate of Secondary Education Board Exam) Class-10 Hindi: Questions 1 of 890

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निम्नलिखित विषयों में से किसी एक विषय पर लगभग 400 शब्दों में हिन्दी में निबंध लिखिये:-

“प्रकृति का संदेश-जिओ और जीने दो।”

Explanation

  • प्रकृति मनुष्य की धात्री हैं। वही सभी प्राणियों का लालन-पालन करती है। प्रकृति की गोद में ही मानव का जन्म होता है। उसकी ही छत्र छाया में वह बड़ा होता है। वही उसकी भोजन और अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति करती है। प्रकृति के बिना तो मनुष्य का जीवन ही असम्भव है। प्रकृति के बिना तो मनुष्य का जीवन ही असंभव है। प्रकृति से उत्पन्न वायु, जल और अन्न उसके जीवन को गति प्रदान करते हैं। वायु के बिना तो उसका जीवन एक दो मिनट में ही समाप्त हो सकता है। प्रकृति हमें आनन्दानुभूति कराकर एक दूसरे से प्रेम करने का संदेश देती है।
  • ईश्वर ने संसार बनाकर मनुष्य को प्रकृति का मनोरम वातावरण दिया, ताकि वह प्रेमपूर्वक अन्य जीवों का सम्मान करे और जीओ और जीने दो के सिद्धांत का पालन करे। प्रकृति से प्रेम करना और उसके नियमों का पालन करना मनुष्य को स्वास्थ्य एवं शतायु होने का वरदान मात्र हैं। जैसे-जैसे हम अपने स्वार्थ वश प्रकृति का दोहन करते हैं और उसके नियमों के विपरीत चलते हैं, वैसे-वैसे ही हम प्रकृति से अलग होकर अपना भयंकर नुकसान करते हैं। जब तक मनुष्य प्रकृति के जिओ और जीने दो के संदेश को नहीं समझेगा तब तक वह प्रकृति के दंड का भागी बनता रहेगा। वसन्त ऋतु का वर्णन करते हुए कवि ने लिखा है-

    ″ बदल गई है प्रकृति, समय ने

    भी अब पलटा खाया है।

    फिर से सभी वनस्पतियों में,

    नवजीवन सा आया है।

    फूलों के मिस लतिकाएँ सब,

    मंद-मंद मुसकाती हैं।

    पल्लव रूपी पाणि हिलाकर,

    मन के भाव बताती हैं। ″

  • प्रकृति की मनोहारी गोद में कवियों के हृदय में विभिन्न प्रकार की कल्पनाएँ तथा भावनाएँ प्रस्फुटित होती है। कोयल की मधुर कूक मानव के मन को हरने वाली और प्रसन्न करने वाली होती है। भ्रमरों का गुंजन हमें अपनी ओर आकर्षित करता है। पर्वतों से गिरते हुए झरने हमें शांति एवं प्रसन्नता का संदेश देते हैं। प्रकृति से भरा सारा संसार नवजीवन की ओर अग्रसर होता हुआ प्रकृति के उपादानों से प्रेम का मूक संदेश प्राप्त करता है। चन्द्रमा की शीतल किरणें अमृत की ऐसी वर्षा करती हैं कि समस्त वातावरण मनोरम हो जाता है।
  • ऐसे वातावरण में सांसारिक चिंताओं तथा समस्याओं से तनावग्रस्त मानव कुछ क्षण के लिए विश्राम तथा शांति का अनुभव करता है। चिरकाल से ही प्रकृति मानव के सुख-दु: ख की सहचरी रही है। प्रकृति की गोद में पल रहे सभी प्राणी प्रेम और सुरक्षा की कामना करते हैं। प्रकृति के नियमों के विरुद्ध किसी प्राणी की हत्या करना प्रकृति का दंडनीय अपराध है। वन के प्राणी भी अपना जीवन जीने का अधिकार रखते हैं। उन्हें मारना नहीं चाहिए।
  • शीतल पवन का स्पर्श पाकर वृक्ष झूम-झूमकर अपनी प्रसन्नता का परिचय देते हैं। धरा पर उगे हुए वृक्ष हमें जीवनदायनी ऑक्सीजन प्रदान करते हैं और मनुष्य के लिए हानिकारक कार्बन डाई ऑक्साइड को स्वयं ग्रहण कर लेते हैं, जिससे कि पृथ्वी पर संतुलन बना रहें। मनुष्य पृथ्वी पर बदलती हुई या एक सी रहने वाली ऋतुओं का अभ्यस्त हो जाता है। प्रकृति मानव-जाति में प्रेम तथा उल्लास का संचार करती है। प्रेम जैसे मनुष्य को प्रिय हैं, वैसे ही हर प्राणी को प्रेम प्रिय है।
  • कवि सुमित्रानन्दन पन्त प्रकृति के सुकुमार कवि हैं। प्रकृति के विभन्न उपादानों एवं क्रियाकलापों के माध्यम से कवि को किसी अज्ञात संदेश एवं आमंत्रण सुनाई देता है तथा उन्हें प्रकृति के माध्यम से एक विराट चेतना की अनुभूति होती है, जो पुकार-पुकार कर एक दूसरे को प्रेम करने का संदेश देती है। कवि कहता है-

    ″ न जाने नक्षत्रों से कौन,

    निमन्त्रण देता मुझको मौन

    प्रखर भरती जब पावस-धार,

    न जाने, तपक तड़ित में कौन

    मुझे इंगित करता जब मौन! ″

  • चारों तरफ से प्रकृति मानव को प्रेम का संदेश देती है। जब-जब प्रकृति के नियमों का खंडन होता है, तब-तब प्रकृति मनृष्य को दंड देती है। प्रकृति का उद्देश्य प्रेम करना है, दंड देना नहीं। प्रकृति के सभी उपादान अपने-अपने नियमों का पालन करते हुए मनुष्य के जीवन को सुखद बनाते हैं और उसको प्रेम का संदेश देते हुए यह पाठ पढ़ाते हैं कि प्रकृति से संदेश है- ‘जीओ और जीने दो’ ।

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