Solved PYQs 391-397 of 886: Solutions to Past Papers | ICSE (Indian Certificate of Secondary Education Board Exam) Class-10 Hindi | Chapter-wise

886 PYQs with Explanations (2026-2027 Exam)

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Question 391
250 words | 8 marks

निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर हिन्दी में लगभग 120 शब्दों में पत्र लिखिए

2011 में दिये जाने वाले ‘बच्चों के वीरता पुरस्कार’ के लिए आपको चुना गया है, अपने मित्र को पत्र दव्ारा प्रसन्नता तथा उत्तेजना की भावनाओं से अवगत कराते हुए, उस घटना का संक्षिप्त वर्णन कीजिए जिसके कारण आपको इस पुरस्कार के लिए चयनित किया गया।

Answer

मित्र को पत्र

एफ-24, कमला नगर,

आगरा।

दिनांक: 20 - 03 - 2011

प्रिय मित्र आकाश,

वन्दे।

आशा है तुम सकुशल होगे। मैं भी यहाँ अच्छी तरह हूँ। घर पर सभी लोग भी ईश्वर की कृपा से कुशल मंगल होंगे।

आकाश आज मैं बहुत प्रसन्न हूँ कि तुम्हारे दव्ारा भेजा गया मेरा नाम इस बार बच्चों को प्रदान किये जाने वाले ‘वीरता पुरस्कार’ के लिए चुन लिय…

… (1 more equations) …

Solutions to Past Papers2011

Question 392
250 words | 8 marks

निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर हिन्दी में लगभग 120 शब्दों में पत्र लिखिए

आपने नया कम्प्यूटर (परिकलक) खरीदा है, किन्तु खरीदने के एक महीने बाद ही उसमें खराबी आ गयी। आपकी शिकायत पर दुकानदार ने कोई ध्यान नहीं दिया। कंपनी (संघ) के मुख्य मैनेजर (प्रबंधक) को पत्र लिखकर घटना की जानकारी देते हुए उनसे अनुरोध कीजिए कि वे आपके साथ न्याय करें।

Answer

प्रबंधक को पत्र

सेवा में

प्रबंधक महोदय

एच. सी. एल. कंप्यूटर,

गुड़गाँव, दिल्ली।

विषय: कंप्यूटर की खराबी की सूचना हेतु शिकायती पत्र।

महोदय,

मैं राजीव शर्मा आगरा शहर का निवासी हूँ। मैंने यह पत्र आपको इसलिए लिखा है कि मैंने आगरा शहर में एक कंप्यूटर आपकी एच. सी. एल. कंपनी का खरीदा था।

महोदय कंप्यूटर लाने के दूसरे महीने ही उसके …

Solutions to Past Papers2011

Question 393 (1 of 5 Based on Passage)
150 words | 5 marks

Passage

निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िये तथा उसके नीचे लिखे प्रश्नों के उत्तर हिन्दी में लिखिए। उत्तर- यथासंभव आपके अपने शब्दों में होने चाहिए-

राणा संग्राम सिंह वीरगति प्राप्त कर चुके थे। चित्तौड़ के सिंहासन पर उनके बड़े पुत्र विक्रमादित्य बैठे; किन्तु उनकी अयोग्यता के कारण राजपूत सरदारों ने उन्हें गद्दी से हटा दिया। राणा साँगा के छोटे पुत्र उदयसिंह राज्य के उत्तराधिकारी घोषित किए गये, किन्तु वे अभी छ: वर्ष के बालक थे। अतएव दासी-पुत्र बनबीर को उनका संरक्षक और उनकी ओर से राज्य का संचालकर्ता बनाया गया क्योंकि महारानी करुणावती का भी स्वर्गवास हो चुका था।

राज्य का लोभ मनुष्य को मनुष्य नहीं रहने देता। बनबीर भी राज्य के लोभ से पिशाच बन गया। उसने सोचा कि यदि राणा साँगा के दोनों पुत्रों को मार दिया जाए तो चित्तौड़ का सिंहासन उसके लिए निष्कंटक हो जाएगा। इसी विचार से एक रात नंगी तलवार लिए वह अपने भवन से निकला। उसने लालच में अंधे होकर विक्रमादित्य की हत्या कर दी।

राजकुमार उदयसिंह सायंकाल का भोजन करके सो चुके थे। उनका पालन-पोषण करने वाली पन्न धाय को बनबीर के बुरे अभ्रिपाय का कुछ पता न था। रात में जूठे पत्तल हटाने बारिन आयी, उसने पन्ना को बनबीर दव्ारा विक्रमादित्य की हत्या का समाचार दिया। बारिन उस समय वहीं थी और बनबीर का यह कुृत्य देखकर किसी प्रकार भागी हुई पन्ना के पास आयी थी। उसने कहा-‘वह यहाँ आता ही होगा’।

पन्ना चौंकी और उसे अपना कर्त्तव्य स्थिर करने में क्षणभर भी न लगा। उसके बालक उदयसिंह को उठाकर बारिन को दे दिया और कहा-‘ इन्हें लेकर चुपचाप निकल जाओ। में तुम्हें वीरा नदी के तट पर मिलूँगी।’

उदयसिंह सो रहे थे। उन्हें टोकरे में लिटाकर, ऊपर से पत्तलें ढककर बारिन राजभवन से निकल गयी। इधर पन्ना ने अपने पुत्र चन्दन को कपड़ा उढ़ाकर उदयसिंह के पलंग पर सुला दिया। दोनों बालक लगभग एक ही अवस्था के थे। अपने स्वामी के बालक और राज्य के उत्तराधिकारी की रक्षा के लिए उस धर्मनिष्ठ धाय ने अपने कलेजे के टुकड़े का बलिदान करने का निश्चय कर लिया था।

नंगी रक्त सनी तलवार लिए बनबीर कुछ क्षणों के बाद ही आ धमका। उसने कड़क कर पूछा-‘उदय कहाँ है? ’

पन्ना धाय ने अगुँली से अपने सोते पुत्र की ओर संकेत कर दिया। तलवार उठी और उस अबोध बालक का सिर धड़ से अलग हो गया। बनबीर चला गया। कर्त्तव्यनिष्ठ पन्ना धाय के मुख से न चीख निकली, न नेत्रों से आँसू गिरे। उसे तो अभी अपना धर्म निभाना था। उसका हृदय फटा जाता था। पुत्र का शव लेकर वह राजभवन से निकली।

वीरा नदी के तट पर उसने पुत्र का अंतिम संस्कार किया और मेवाड़ के नन्हें निद्रित अधीश्वर को लेकर रात्रि में ही मेवाड़ से बाहर निकल गयी। बेचारी धाय! कोई उसे आश्रय देकर बनबीर से शत्रुता मोल लेना नहीं चाहता था। अत: वह एक से दूसरे ठिकानों पर भटकती फिरी। अंत में देयरा के आशशाह ने उसे आश्रय दिया।

बनबीर को उसके कर्म का दंड मिलना था, मिला। राणा उदयसिंह जब गद्दी पर बैठे, पन्ना धाय की चरण-धूलि अपने मस्तक पर लगाकर उन्होंने अपने को धन्य माना। पन्ना चित्तौड़ की सच्ची धात्री सिद्ध हुई और सेवक धर्म के आदर्श का पाठ दुनिया को सिखा गयी। पन्ना धाय की उज्जवल कीर्ति अमर है।

बनबीर कौन था? लोभ में पड़कर उसने क्या सोचा?

Solutions to Past Papers2011

Question 394 (2 of 5 Based on Passage)
150 words | 5 marks

पन्ना धाय को बनबीर के बुरे अभ्रिपाय का कब व किस प्रकार पता चला?

Solutions to Past Papers2011

Question 395 (3 of 5 Based on Passage)
150 words | 5 marks

पन्ना धय ने क्या निर्णय लिया और क्यों?

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Question 396 (4 of 5 Based on Passage)
150 words | 5 marks

पन्ना धाय वीरा नदी के तट पर क्यों पहुँची? उसे अनेक ठिकानों पर क्यों भटकना पड़ा?

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Question 397 (5 of 5 Based on Passage)
150 words | 5 marks

प्रस्तुत गद्यांश से आपको क्या शिक्षा मिली?

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