IAS (Admin.) IAS Mains GS Paper 1 in Hindi (Geography, Art & Culture, and History) Indian Heritage and Culture-Art Forms Study Material (Page 39 of 51)

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संगीत: भारतीय संगीत के प्रमुख वाद्यों का परिचय (Part-1) (Music: Introduction of Indian Major Musical Instruments Part-1)

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गायन को और अधिक कर्णप्रिय बनाने के लिए वाद्य यंत्रों का प्रयोग किया जाता है इसलिए वाद्य यंत्रों का इतिहास भी गायन जितना ही पुराना है।

सिंधु घाटी सभ्यता में इतिहासकारों को करतालों का एक जोड़ा मिला है। इसके अलावा एक ऐसी मृणमूर्ति मिली है जिसके गले में ढोल लटका हुआ है। हड़प्पाकालीन लिपि के कुछ चिन्ह सारंगी और वीणा की भाँति प्रतीत होते हैं। वैदिक और उत्तर वैदिक काल में गायन और वादन दोनों विधाएँ पर्याप्त रूप में प्रचलित थीं। आर्य, वीणा और बांसुरी के साथ ढोल, झांझ और बीन भी बजाते थे। इस काल में सात सुरों के प्रयोग होने के संकेत मिलते है। संगम काल में भी संगीत और नृत्य से मनोरंजन करने के प्रमाण मिले हैं। घुमंतु प्रकार के नर्तकों के दल अपने साथ याल (वीणा) , पदलाई (इकहरा ढोल) तथा तारों से बने…

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संगीत: भारतीय संगीत के प्रमुख वाद्यों का परिचय (Part-2) (Music: Introduction of Indian Major Musical Instruments Part-2)

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रुद्रवीणा-इसे हिन्दुस्तानी संगीत में बजाया जाता है। इसमें एक लंबी नली के आकार की लकड़ी के दोनों सिरों के नीचे सूखे हुए सीताफल के खोखले तूंबा होते हैं। इसमें मुख्य चार तार होते हैं जो खूटियों से कसे जाते हैं। इसके अलावा दो और तार होते हैं और लकड़ी के बने 24 पर्दे होते हैं। बजाते समय एक तूंबा वादक के कंधे पर और दूसरा गोद में होता है।

विचित्र वीणा- यह उत्तर भारतीय शैली का वाद्य है। इसमें पाँच तार होते हैं। इसके अलावा तीन तार चिकारी के और तरब के 11 तार होते हैं।

इसराज-यह हिन्दुस्तानी शैली का वाद्य है। इसराज एक तरह से सितार और सारंगी का मेल है। इसका ऊपरी भाग सितार से और नीचे का भाग सारंगी की तरह होता है। इसमें 4 मुख्य, तरब के 15 और 19 पर्दे होते हैं। इसे भी गज से बजाया जाता है। इसका प्रयोग रवीन्द…

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