IAS Mains Compulsory-Hindi: Questions 66 - 69 of 199

Get 1 year subscription: Access detailed explanations (illustrated with images and videos) to 199 questions. Access all new questions we will add tracking exam-pattern and syllabus changes. View Sample Explanation or View Features.

Rs. 400.00 or

Question number: 66

» Meaning of Words

Appeared in Year: 2013

Short Answer Question▾

Write in Short

निम्नलिखित युग्मों में से इस तरह प्रयुक्त कीजिए कि उनका अर्थ स्पष्ट हो जाए और उनके बीच का अन्तर भी समझ में आ जाए-

प्रतिज्ञा - प्रतीक्षा

Question number: 67

» Writing Essay

Essay Question▾

Describe in Detail

कोई समाज बिना समयबद्ध न्याय के नहीं चल सकता

Explanation

प्रस्तावना - मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज में रहते हुए उसे समाज द्वारा बनाए गए नियमों का पालन अनिवार्य रूप से करना होता है। यदि वह ऐसा नहीं करता है तो इससे सामाजिक मूल्यों का हास तो होता ही है, साथ ही बहुत-सी सामाजिक समस्याओं को पनपने का मौका… (364 more words) …

Question number: 68

» Writing Essay

Appeared in Year: 2012

Essay Question▾

Describe in Detail

हमारे महानगर महिलाओं के लिए कितने सुरक्षित है?

Explanation

प्रस्तावना - हमारे समाज में महिलाएँ आज भी सुरक्षित नहीं है। महानगर क्या छोटे शहरों, कस्बों, गाँव तक में महिलाएँ सुरक्षित नहीं है। आज भी बड़े-बड़े महानगर जैसे दिल्ली, बम्बई, मद्रास (चैन्नई), कलकत्ता है, जिसमें महिलाएँ अपने को सुरक्षित नहीं समझती है। संविधान में महिलाओं की सुरक्षा के इन्तजाम के… (447 more words) …

Question number: 69

» Precis Writing

Appeared in Year: 2011

Essay Question▾

Describe in Detail

निम्नलिखित गद्यांश का संक्षेपण (Precis) लगभग 190 - 210 शब्दों में लिखिए। इसके लिए दिए गए विशेष पन्नों का प्रयोग कीजिए। यदि शब्द सीमा का उल्लंघन स्वीकार्य सीमा से अधिक है तो उसी अनुपात में अंक काटे जायेंगे। यदि संक्षेपिका 150 शब्दों से कम या 250 शब्दों से अधिक लम्बी हुई तो उसके लिए अंक बिल्कुल नहीं दिए जा सकते हैं।

मैं उस समय लगभग सात वर्ष का रहा होऊँगा जब मेरे पिता राजस्थानिक न्यायालय का सदस्य बनने के लिए पोरबन्दर से राजकोट चले आए। वहाँ मुझे एक प्राथमिक विद्यालय में भर्ती करा दिया गया और मुझे उन दिनों की अच्छी तरह याद है, मुझे पढ़ाने वाले शिक्षकों के नाम तथा अन्य विशेषताएँ भी याद हैं। जैसा पोरबन्दर में था, उसी प्रकार यहाँ भी मेरी पढ़ाई के विषय में कोई विशेष उल्लेखनीय बात नहीं। मैं तो केवल एक औसत दर्जे का विद्यार्थी था। इस विद्यालय से मैं एक उपनगरीय विद्यालय में गया और वहाँ से हाई-स्कूल। तब तक मैं बारह वर्ष का हो चुका था। मुझे याद नहीं कि इस थोड़े से समय में मैंने अपने अध्यापकों अथवा सहपाठियों से कभी भी झूठ बोला हो। मैं बहुत शर्मीला था और सभी प्रकार के लोगों के साथ से बचा करता था। मेरी पुस्तकें तथा मेरे पाठ ही मेरे एकमात्र साथी होते थे। ठीक समय पर स्कूल में होना और स्कूल बन्द होते ही घर भाग आना - यही मेरी प्रतिदिन की आदत थी। मैं वस्तुत: वापस भागा ही करता था, क्योंकि मैं किसी से बातचीत नहीं कर सकता था। मुझे यह बात का भी डर था कि कहीं कोई मेरा मजाक न बनाए।

एक घटना ऐसी है जो मेरे हाई-स्कूल के पहले वर्ष की परीक्षा के दौरान घटी ओर जो उल्लेखनीय है। शिक्षा निरीक्षक मिस्टर जाइल्स निरीक्षण के लिए दौरे पर आए हुए थे। वर्तनी अभ्यास (Spelling exercise) के लिए उन्होंने हमें पाँच शब्द लिखने को दिए। इनमें से एक शब्द था ‘Kettle’ । मैंने उसकी वर्तनी गलत लिखी हुई थी। मेरे अध्यापक ने अपने जूते के द्वारा मुझे उसे ठीक करने के लिए संकेत देने का प्रयास किया, लेकिन मुझे वह सहायता नहीं लेनी थी। यह बात मेरी समझ से परे थी कि वे यह चाहते थे कि मैं अपने पास वाले विद्यार्थी की स्लेपर पर से स्पेलिंग की नकल कर लूं, क्योंकि मैं तो यह सोचता था कि अध्यापक वहाँ इसलिए हैं कि हमें नकल करने से रोकने के लिए हमारा निरीक्षण करते रहें। परिणाम यह हुआ कि मेरे अतिरिक्त अन्य सभी लड़कों के द्वारा लिखे गए प्रत्येक शब्द की स्पेलिंग सही पाई गई। केवल मैं ही बेवकूफ रहा। बाद में शिक्षक महोदय ने इस बेवकूफी की बात मुझे समझाने का प्रयन्त किया, किन्तु उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। मैं ‘नकल’ करने की कला कभी सीख नहीं पाया।

फिर भी इस घटना से मेरा अपने अध्यापक के प्रति सम्मान बिल्कुल कम नहीं हुआ। मैं स्वभाव से ही दूसरों के दोष नहीं देखता था। बाद में मुझे इन अध्यापक महोदय की कई अन्य दुर्बलताओं का पता चला, किन्तु उनके प्रति मेरा सम्मान वहीं बना रहा। इसका कारण यह था कि मैंने बड़ों की आज्ञा का पालन करना सीखा था। उनके कार्यों का विश्लेषण करना नहीं। इसी कालावधि से जुड़ी दो अन्य घटनाएँ मेरी स्मृति में हमेशा बनी रही हैं। विद्यालय के लिए निर्धारित पुस्तकों के अतिरिक्त और कुछ भी पढ़ने से मुझे नियमित रूप से अरूचि थी। प्रतिदिन का निर्धारित अध्ययन तो करना ही था क्योंकि मुझे अध्यापक द्वारा दण्डित किया जाना उतना ही नापसन्द था जितना कि उन्हें धोखा देना। इसलिए मैं प्राय: बिना उनमें मन लगाए हुए अपने पाठ पूरे कर लेता था। इस प्रकार जब मेरे पाठ ही पूरे सम्यक् रूप से नहीं तैयार होते थे तो अतिरिक्त अध्ययन का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता था। लेकिन मेरे पिताजी द्वारा खरीदी गई एक पुस्तक पर मेरी दृष्टि किसी प्रकार पड़ गई। वह पुस्तक थी ‘श्रवण पितृभक्ति नाटक’ (श्रवण का उनके माता-पिता के प्रति भक्तिभाव के विषय में नाटक) मैंने उसे गहरे मनोयोग के साथ पढ़ा। उसी समय हमारे यहाँ घुमंतू कलाकार आए। मुझे दिखाए जाने वाले चित्रों में से एक श्रवण का था जो अपने कन्धों पर पड़ी हुई झोली की सहायता से अपने अन्धे माता-पिता को तीर्थ यात्रा पर ले रहे थे। इस पुस्तक तथा चित्र ने मेरे मन पर एक अमिट छाप छोड़ी। मैंने अपने आप से कहा, ”यह ऐसा उदाहरण है जिसकी तुम्हें नकल करनी चाहिए।“ श्रवण की मृत्यु पर उनके माता-पिता का करूण रूदन आज भी मेरी स्मृति में ताजा है। उसकी द्रवित कर देने वाली धुन ने मुझे गहराई तक प्रभावित किया और इस धुन को मैंने पिताजी के द्वारा मेरे लिए खरीदे गए बाजे पर बजाया।)

Explanation

मैं उस समय लगभग गत वर्ष का रहा होउंगा, जब मेरे पिता राज-स्थानिक न्यायालय के सदस्य बनने के लिए पोरबन्दर से राजकोट चले आए। वहाँ मुझे एक प्राथमिक विद्यालय में भर्ती करा दिया गया। इस विद्यालय से मैं एक उपनगरीय विद्यालय में गया और वहाँ से हाई स्कूल। तब तक… (290 more words) …

f Page
Sign In