IAS Mains Compulsory-Hindi: Questions 108 - 113 of 199

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Passage

पाठकों की बहुसंख्या या तो क्षणिक मनोरंजन के लिए पढ़ती है या फिर उस विधान्ति के लिए जो पुस्तक उन्हें प्रदान करती है। दूसरे शब्दों में वे सामान्यत: वक्तकटी के लिए पुस्तक पढ़ते है। समय, जैसा कि अक्सर आंका जाता है, एक विरल बेशकीमती खजाना है। इस केशकीमती खजाने को पाठकगण व्यर्थ ही गंवा देते हैं। अविश्वनीय-सा लगता है कि समय या वक्त पाठकों के ऊपर बहुत भारीपन से लदा होता है और फिर वे खोज पाते हैं कि समय के उस अतिरिक्त बोझ से छुटकारा, जिसकी उन्हें जरूरत है, किताबें ही दिला सकती है। इतना तो पर्याप्त स्पष्ट है कि वे किसी दूसरे प्रयोजन के लिए नहीं पढ़ सकते। अगर वे ऐसा करें तब उसे पढ़ने से उन्हें कुछ अपने लिए हासिल हो सकता है, किन्तु ऐसे कोई संकेत नहीं है कि पढ़ने का कोई अन्य प्रयोजन हो। पढ़ने से उन पर कुछ प्रभाव जरूर पड़ते होंगे, परन्तु उन प्रभावों के बारे में वे अनजान हैं। प्रभाव लाभप्रद हो सकते हैं, निर्णायक हो सकते हैं - यह निष्कर्ष हम नहीं निकाल सकते। इसका प्रमाण यही है कि पढ़ने के कारण वे अपने साथ कोई ऐसी चीज नहीं ले जाते कि बाद में कह सकें कि उन्होंने अमुक चीज पढ़ी है।

Question number: 108 (4 of 6 Based on Passage) Show Passage

» Reading Comprehension

Appeared in Year: 2012

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इस तथ्य को संकेतक क्या है कि पाठकों के समय का सही इस्तेमाल नहीं हुआ?

Question number: 109 (5 of 6 Based on Passage) Show Passage

» Reading Comprehension

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Write in Short

लेखक ऐसा क्यों महसूस करता है कि पाठक अपने समय की कीमत नहीं आँकते?

Question number: 110 (6 of 6 Based on Passage) Show Passage

» Reading Comprehension

Appeared in Year: 2012

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असजग पढ़ने के प्रति लेखक का प्रतिकूल दृष्टिकोण क्यों है?

Question number: 111

» Common Saying

Appeared in Year: 2012

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Write in Short

निम्नलिखित मुहावरों और लोकोक्तियों में से अर्थ स्पष्ट करते हुए उनका वाक्यों में प्रयोग कीजिए-

सूरत को दिया दिखाना

Question number: 112

» Writing Essay

Appeared in Year: 2008

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Describe in Detail

राष्ट्रीय सुरक्षा पर आप्रवासन का प्रभाव

Explanation

प्रस्तावना - किसी भी देश को बाह्य आक्रमणों से सुरक्षा के लिए अपनी सामरिक शक्ति को सुदृढ़ करने की आवश्यकता होती है। भारत के पड़ौसी देश नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार, भूटान, चीन एवं पाकिस्तान है। पाकिस्तान एवं चीन को छोड़कर इसके सभी पड़ौसी देशों से अच्छे संबंध है। चीन दक्षिण… (484 more words) …

Question number: 113

» Precis Writing

Appeared in Year: 2008

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Describe in Detail

निम्नलिखित गद्यांश का संक्षेपण मूल गद्यांश की शब्द संख्या की एक-तिहाई में प्रस्तुत करें। शीर्षक सुझाना अनिवार्य नहीं है। शब्द सीमा के अन्तर्गत संक्षेपण न करने पर अंक काट लिए जायेंगे। संक्षेपण अलग से निर्धारित कागजों पर ही लिखें व उन्हें अच्छी तरह से उत्तर पुस्तिका के साथ बाँध लें:

यद्यपि आधुनिक शैक्षणिक पद्धति उन्नीसवीं शताब्दी के प्रथम चरण में मुख्य रूप से पश्चिमी समाजों में पहले रूपायित हुई थी, तथापित उसे एक समग्र राष्ट्रीय पद्धति के रूप में स्वीकार करने में बर्तानिया अनुिच्छक ही रहा। 1800 के दशक के मध्य तक हालैण्ड, स्विट्जरलैण्ड और जर्मन राज्यों ने प्रारम्भिक विद्यालयों में कमोबेश सर्वव्यापी प्रवेश का लक्ष्य प्रापत कर लिया था, किन्तु इंग्लैण्ड और वेल्स इस लक्ष्य को पाने में बहुत पीछे रहे। हाँ, स्काटलैण्ड में शिक्षा कुछ अधिक विकसित थी।

1870 (जब बर्तानिया में अनिवार्य शिक्षा को पहली बार लागू किया गया) और दव्तीय विश्व युद्ध के बीच यथाक्रम सभी सरकारों ने शिक्षा पर किए जाने वाले खर्चे को बढ़ाया। स्कूल छोड़ने की उम्र दस से चौदह वर्ष तक बढ़ा दी गई ओर अधिक से अधिक स्कूल भी खोले गए किन्तु शिक्षा को राजकीय प्रश्रय का विषय स्वीकार नहीं किया गया। ज्यादातर स्कूल निजी या चर्च के अधिकारियों द्वारा स्थानीय सरकारी मण्डलों की निगरानी में चलाये जाते रहे। दूसरे विश्व युद्ध ने इस प्रवृत्ति को बदल डाला। सशस्त्र सेनाओं में भर्ती के लिए प्रवेशकों की योग्यता और अधिगम के परीक्षण दिए गए। परीक्षा परिणामों में प्राधिकारियों को प्रवेशकों के निम्न स्तरीय शैक्षणिक कौशलों ने हैरानी में डाल दिया। युद्धोत्तर वर्षों में पुनरूत्थान के बारे में चिन्तित सरकार ने विद्यमान शैक्षणिक पद्धति पर पुनर्विचार करना आरम्भ किया।

वर्ष 1944 से पहले अधिकतर बर्तानवी बच्चे चौदह वर्षों तक एक ही नि: शुल्क स्कूल, जिसे प्राथमिक स्कूल कहा जाता था, में विद्याध्ययन करते थे। प्राथमिक विद्यालयों के साथ-साथ माध्यमिक विद्यालय भी चलते थे परन्तु उनमें अभिभावकों को फीस देनी पड़ती थी। इस पद्धति ने स्पष्टतया बच्चों को दो सामाजिक वर्गों में बांट दिया था तथा गरीब पृष्ठभूमियों से आने वाले लगभग सभी बच्चे प्राथमिक विद्यालयों तक ही सीमित रह जाते थे। जनसंख्या का दो प्रतिशत से भी कम विश्वविद्यालया में प्रवेश करता था। 1944 के शिक्षा अधिनियम ने अनेक नए परिवर्तनों की पहल की। सबके लिए नि: शुल्क माध्यमिक शिक्षा, स्कूल छोड़ने की उम्र का पन्द्रह वर्ष तक बढ़ाना तथा शिक्षा में समान अवसरों की प्रतिबद्धता। शिक्षा चुनी गई स्थानीय सरकारों के लिए एक मुख्य जिम्मेदारी बन गई।

वर्ष 1944 के शिक्षा अधिनियम के फलस्वरूप अधिकांश स्थानीय शिक्षा अधिकारियों ने बच्चों के शैक्षिक चयन को उनकी माध्यमिक शिक्षा की आवश्यकताओं को पूरा करने का आधार अपनाया। ग्यारह वर्ष की आयु में चयन की यह प्रक्रिया, जब बच्चा प्राथमिक स्कूल से माध्यमिक स्कूल की ओर जाने के लिए उन्मुख होता है, एक तरह से योग्य बच्चों को उनकी सामाजिक शिक्षार्थाेिं के लिए ‘ग्यारह जमा’ परीक्षा प्रणाली यह निर्धारित करने में सक्षम थी कि क्या वे ग्रामर स्कूल (जो उच्च स्तरीय पाठ्यक्रम पर आधारित थे) पहुँचेंगे या कि माध्यमिक आधुनिक स्कूलों में (जिनमें सामान्य और रोजगारोन्मुख शिक्षा का मिश्रण उपलब्ध था) पहुँचेंगे। थोड़ी संख्या में कुछ विद्यार्थी तकनीकी स्कूलों या विशेष स्कूलों की ओर भी उन्मुख हुए। जो योग्य थे या जो अपनी शिक्षा आगे जारी रखना चाहते थे, ऐसे बच्चों के पास अपने स्कूलों में सत्रह वर्ष की आयु तक ठहरने का विकल्प भी दिया गया।

वर्ष 1960 तक आंशिक रूप से समाजशास्त्रीय अनुसंधानों से यह स्पष्ट हो गया था कि ग्यारह जमा की शिक्षण पद्धति के परिणाम आशानुरूप सिद्ध नहीं हुए है। वर्ष 1959 की क्राउथर रिपोर्ट में यह दर्शाया गया था कि केवल 12 प्रतिशत शिक्षार्थियों ने सत्रह वर्ष तक शिक्षा जारी रखी और जल्दी स्कूल छोड़ने का कारण अकादमिक निष्पादन के बजाय मुख्यतया वर्ग पृष्ठभूमि से जुड़ा हुआ था। लेबर पार्टी की सरकार, जो वर्ष 1964 में सत्ता में पुन: आई, सर्वसमावेशी स्कूलों की स्थापना और ग्रामर तथा माध्यमिक स्कूलों से उपजने वाले भेदों के उन्मूलन तथा ग्यारह जमा परीक्षाओं के खात्मे के लिए प्रतिबद्ध रही, ताकि ऐसे विद्यालय अनेक वर्गों की पृष्ठभूमि वाले शिक्षार्थियों को एक साथ शिक्षा दे सकें। यद्यपि यह भ्रम बराबर बना रहा कि इन नए सर्वमावेशी स्कूलों को किस तरह की शिक्षा देनी नए ढ़ंग की शिक्षा? इस समस्या का कोई नि दान नहीं ढूंढा जा सका और भिन्न-भिन्न स्कूलों और क्षेत्रों ने अपने-अपने ढ़ंग की शिक्षण पद्धतियों का विकास किया। कुछ स्थानीय निकायों ने इस परिवर्तन का प्रतिरोध भी किया और कुछ क्षेत्रों में अभी भी ग्रामर स्कूल अस्तित्व में है।

Explanation

संक्षेपण - यद्यपि आधुनिक शैक्षणिक पद्धति उन्नीसवीं शताब्दी के प्रथम चरण में मुख्य रूप से पश्चिमी समाजों में पहले रूपान्तरित हुई थी, लेकिन उसे एक समग्र राष्ट्रीय पद्धति के रूप में स्वीकार करने बर्तानिया अनिच्छुक ही रहा। वर्ष 1870 में बर्तानिया ने अनिवार्य शिक्षा को पहली बार लागू किया गया।… (230 more words) …

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