Reading Comprehension-Prose or Drama (CTET Paper-II Hindi): Questions 398 - 405 of 413

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Passage

अनुकूल भावना सुख है और प्रतिकूल भावना दु: ख। इसलिए मनु ने स्ववशता (स्वाधीनता, स्वतंत्रता) को सुख का लक्षण माना है और परवशता (पराधीनता, परतंत्रता) को दु: ख का। ‘पराधीन सपनेहूँ सुख नाही’ कहकर तुलसीदास ने भी इसी लक्षण का समर्थन किया है। कुछ लोग कामनाओं की पूर्ति को सुख और अपूर्ति को दु: ख मानते हैं। इस प्रकार से मानने पर भी सुख और दु: ख का भाव ना होना ही सिद्ध होता है। नैयायिकों ने सुख-दु: ख को आत्मा का गुण माना है, तो सांख्य मतावलम्बियों ने चित्त का और अन्य लोगों ने इन्हें बुद्धि का परिणाम या विकार कहा। नीतिज्ञों ने सुख और दु: ख का सम्बन्ध क्रमश: धर्म और अधर्म से स्थापित किया। कुछ ने धर्म-अधर्म को कारण और सुख-दु: ख को कार्य माना। धर्म सुख में और अधर्म दु: ख में कारण कार्य (हेतु-फल) का सम्बन्ध बैठाया गया। इस मत के विपरीत कुछ अन्य नीतिज्ञों ने सुख-दु: ख को ही क्रमश: धर्म-अधर्म का कारण माना। उन्होंने पहले मत को उलट दिया। इसी दूसरे मत को सुखवाद कहा जाता है। इस मत के अनुसार धर्म और अधर्म का मूल गुण नहीं है। जो सुखद है वही धर्म है, जो दुखद है वही अधर्म है। धर्म और अधर्म को मौलिक, स्वतंत्र और वास्तविक न मानने से यह मत नीति की सार्वभौमिकता पर प्रहार करताहै। इसके विपरीत धर्मवाद है, जिसमें धर्म स्वतंत्र, मौलिक और वास्तविक माना जाता है और सुख उसके फल समझे जाते हैं। जीवन में सुख-दु: ख घुले-मिले हैं। दोनों की सम मात्रा मान लेना संतुलित दृष्टिकोण है। पर सुखवादी जीवन में सुख अधिक मानते हैं और दु: खवादी दु: ख। एक-दूसरे के वाद का खण्डन करता है। सब सुख है (सुखवाद), ऐसा मानने पर दु: ख की अनुभूति की व्याख्या करना सम्भव नहीं है। सब दु: ख है (दु: खवाद), ऐसा मानने पर सुख की अनुभूति की व्याख्या करना कठिन हो जाता है। सुख को दु: ख का अभाव कहना दु: ख को सुख का अभाव कहना इस कारण न्यायसंगत नहीं है। कभी-कभी चिर दु: ख ही सुख हो जाता है और चिर सुख ही दु: ख। अत: दोनों एक-दूसरे के अन्योन्याश्रित है।

Question number: 398 (4 of 9 Based on Passage) Show Passage

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Question

सुखवाद किसे धर्म मानता है?

Choices

Choice (4) Response

a.

जो सुखद है वही धर्म है

b.

जो दु: खद है वही धर्म है

c.

चिर दु: ख ही सुख है अत: धर्म है

d.

स्वाधीनता ही धर्म है

Question number: 399 (5 of 9 Based on Passage) Show Passage

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Question

सुख और दु: ख के बारे में सन्तुलित दृष्टिकोण क्या है?

Choices

Choice (4) Response

a.

दु: ख है ही नहीं, वह तो केवल बुद्धि का विकार है

b.

जीवन में सुख और दु: ख दानों सम मात्रा में है

c.

हमें हर समय सुखी रहना चाहिए

d.

धर्म-कर्म से ही सुख की प्राप्ति होती है

Question number: 400 (6 of 9 Based on Passage) Show Passage

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Question

परवशता शब्द का आशय है

Choices

Choice (4) Response

a.

विवश

b.

पराधीनता

c.

परिवेश

d.

वंश

Question number: 401 (7 of 9 Based on Passage) Show Passage

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Question

स्वाधीनता शब्द का समानार्थी है

Choices

Choice (4) Response

a.

परवशता

b.

राज्यतंत्र

c.

स्वराज्य

d.

स्ववशता

Question number: 402 (8 of 9 Based on Passage) Show Passage

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Question

निम्न गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक हो सकता है

Choices

Choice (4) Response

a.

सुखवाद

b.

सुख और दु: ख

c.

दु: खवाद

d.

स्वाधीनता एवं पराधीनता

Question number: 403 (9 of 9 Based on Passage) Show Passage

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Question

यह परिच्छेद मूलत: किस मत की व्याख्या करता है?

Choices

Choice (4) Response

a.

न्याय दर्शन की

b.

सांख्य दर्शन की

c.

सुखवाद की

d.

बौद्ध दर्शन की

Passage

तत्त्ववेत्ता शिक्षाविदों के अनुसार विद्या दो प्रकार की होती है। प्रथम वह जो हमें जीवनयापन के लिए अर्जन करना सिखाती है और दव्तीय वह, जो हमें जीना सिखलाती है। इनमें से एक का अभाव भी जीवन को निरर्थक बना देता है। बिना कमाए जीवन निर्वाह सम्भव नहीं। कोई भी नहीं चाहेगा कि वह परावलम्बी हो, माता-पिता, परिवार के किसी सदस्य, जाति या समाज पर आश्रित रहे। ऐसी विद्या से विहीन व्यक्ति का जीवन दूभर हो जाता है। वह दूसरों के लिए भार बन जाता है। साथ ही दूसरी विद्या के बिना सार्थक जीवन नहीं जिया जा सकता। बहुत अर्जित कर लेने वाले व्यक्ति का जीवन यदि सुचारू रूप से नहीं चल रहा, उसमें यदि वह जीवन शक्ति नहीं है, जो उसके अपने जीवन को तो सत्पथ पर अग्रसर करती ही है, साथ ही वह अपने समाज, जाति एवं राष्ट्र के लिए भी मार्गदर्शन करती है, तो उसका जीवन भी मानव जीवन का अभियान नहीं पा सकता। वह भारवाही गर्दभ बन जाता है या पूँछ- सींग विहीन पशु कहा जाता है। वर्तमान भारत में पहली विद्या का प्राय: अभाव दिखाई देता है, परन्तु दूसरी विद्या का रूप भी विकृत ही है, क्योंकि न तो स्कूलों-कॉलेजों में शिक्षा प्राप्त करके निकला छात्र जीविकोपार्जन के योग्य बन पाता है और न ही वह उन संस्कारों से युक्त हो पाता है, जिन्हें ‘जीने की कला’ की संज्ञा दी जाती है, जिनसे व्यक्ति ‘कु’ से ‘सु’ बनता है, सुशिक्षित और सुसंस्कृत कहलाने का अधिकारी होता है।

वर्तमान शिक्षा पद्धति के अन्तर्गत हम जो विद्या प्राप्त कर रहे है, उनकी विशेषताओं को सर्वथा नकारा भी नहीं जा सकता है। यह शिक्षा कुछ सीता तक हमारे दृष्टिकोण को विकसित भी करती है, हमारी मनीषा को प्रबद्ध बनाती है तथा भावनाओं को चेतन करती है किन्तु कला, शिल्प, प्रौद्योगिकी आदि की शिक्षा नाम मात्र ही होने के फलस्वरूप इस देश के स्नातक के लिए जीविकोपार्जन टेढ़ी खीर बन जाता है।

Question number: 404 (1 of 9 Based on Passage) Show Passage

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Question

शब्द गर्दभ से तात्पर्य है

Choices

Choice (4) Response

a.

एक पेड़

b.

ज्ञान

c.

एक जानवर

d.

एक पक्षी

Question number: 405 (2 of 9 Based on Passage) Show Passage

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Question

‘कोई भी नहीं चाहेगा कि वह परावलम्बी हो’ वाक्य में परावलम्बी का अर्थ है

Choices

Choice (4) Response

a.

दूसरे पर भरोसा करें

b.

दूसरे पर आश्रित हो

c.

दूसरे की निन्दा करें

d.

दूसरे की प्रशंसा करें

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