Reading Comprehension-Prose or Drama (CTET Paper-II Hindi): Questions 367 - 375 of 413

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Passage

मानव जीवन में स्वावलम्बन की महत्ता सर्वोपरि है। जो व्यक्ति अपनी शक्ति पर भरोसा रखता है, दूसरों की सहायता पर निर्भर नहीं रहता, वही सच्चा आत्मनिर्भर अथवा स्वावलम्बी है। आत्मनिर्भरता सभी सुखों का स्त्रोत है। स्वावलम्बी व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों पर सरलता से विजय प्राप्त कर लेता है। उसमें विघ्नों से जूझने की असीम शक्ति और प्रेरणा होती है। आत्मनिर्भरता आत्मविश्वास को बढ़ाती है। यह आत्मविश्वास ही सब प्रकार की उन्नति का द्वार है। यह मनुष्य को आशावादी और आस्तिक बनाता है। परमात्मा भी उन्हीं की सहायता करता है, जो स्वयं अपनी सहायता करते हैं। स्वावलम्बी व्यक्ति बने-बनाये मार्गों पर नहीं चलते, वरन् अपने साहस और संघर्ष से नये पथों का निर्मामा करते हैं और लोक कल्याण के क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण योग देते हैं।

स्वावलम्बन की महत्ता को ध्यान में रखकर ही हमारे प्राचीन ग्रन्थों में ‘स्वाध्याय’ पर विशेष बल दिया गया है। स्वाध्याय का अर्थ है किसी अन्य व्यक्ति की सहायता के बिना, स्वयं अपनी समझ के भरोसे पर पुस्तकों का अध्ययन करना और उनसे ज्ञान अर्जित करना। मनुष्य जो ज्ञान अपने प्रयत्नों से प्राप्त करता है, वह उसके व्यक्तित्व का अभिन्न अंग बन जाता है। वह उसे कभी भूल नहीं सकता। जो ज्ञान हमारे अन्दर दूसरों के द्वारा बाहर से ठूँसा जाता है, उस पर हमारा कभी पूरा अधिकार नहीं हो पाता। इसके विपरीत जो ज्ञान हम अपने प्रयत्नों से स्वयं अर्जित करते है, वह हमारी अपनी गाढ़ी कमाई है, हमारी निजी स्थायी सम्पत्ति हैं। स्वाध्यायशील व्यक्ति ही महान् मौलिक चिन्तक बन कर ज्ञान-विज्ञान के नये क्षेत्रों का विकास करते हैं।

Question number: 367 (9 of 9 Based on Passage) Show Passage

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Question

प्राचीन ग्रन्थों में किस पर विशेष बल दिया गया है

Choices

Choice (4) Response
a.

आज्ञा पालन

b.

आज्ञा पाल

c.

स्वाध्याय

d.

मोक्ष प्राप्ति

Passage

वर्तमान हिन्दी कविता की भूमि में आज एक कोलाहल सा छा रहा है। लोग कहते है कि इस कविता के माध्यम से राजनीति साहित्य पर चढ़ी आ रही है आर जिस कला पक्ष में फूल और फलों की सजावट होनी चाहिए थी, उसमें मजदूरों के गन्दे चिथड़े चिमनियों का धुआँ और खेतों की धूल भरती जा रही है। शुद्ध कला के उपासकों को यह चिन्ता हो रही है कि साहित्य राजनीति के हाथ का रणवाद्य बनता जा रहा है और उसके प्राणों की कलामयी दीप्ति दिनोदिन क्षीण होती जा रही है।

दूसरी ओर एक दल है जो शुद्ध कला की कृतियों को आनन्द और पलायन का प्रयास कहकर उसकी हँसी उड़ाता है। उसका विश्वास है कि जब जीवन में संघर्ष की आँधी चल रही हो, पराधीन राष्ट्र स्वतंत्र होने के लिए आन्दोलन कर रहे हों। ऐसे समय में कवि का अपनी वैयक्तिक अनुभूति के मायाबन्ध में बँधे रहना जीवन के प्रति साहित्य को दायित्वहीनता का प्रमाण है। यह दल चाहता है कि साहित्य अपने कल्पना लोक से उतरकर पृथ्वी पर आए और निष्क्रियता त्याग कर प्रगति के मार्ग पर आरूढ़ रहे।

Question number: 368 (1 of 8 Based on Passage) Show Passage

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Question

शुद्ध कला के उपासकों की दृष्टि में कला का स्वरूप क्या है?

Choices

Choice (4) Response
a.

जीवन से पलायन

b.

फूल और फलों की सजावट

c.

अनुभूति का बन्धन

d.

दायित्वहीनता का बोध

Question number: 369 (2 of 8 Based on Passage) Show Passage

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Question

दूसरा दल चाहता है कि साहित्यकार

Choices

Choice (4) Response
a.

आदर्श की उपेक्षा कर यथार्थ की बात करें

b.

सक्रिय होकर प्रगति पथ पर आरूढ़ हो

c.

जीवन में समृद्धि लाने की प्रेरणा दे

d.

स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करे

Question number: 370 (3 of 8 Based on Passage) Show Passage

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Question

लेखब कहता है

Choices

Choice (4) Response
a.

राजनीति ने साहित्य को भ्रष्ट कर दिया

b.

राजनीति ने साहित्य को खरीद लिया

c.

साहित्य और राजनीतिक परस्पर विरोधी है

d.

राजनीति, साहित्य पर हावी हो रही है

Question number: 371 (4 of 8 Based on Passage) Show Passage

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Question

वर्तमान का विपरीतार्थक शब्द है

Choices

Choice (4) Response
a.

अकस्मात

b.

पिछला वर्ष

c.

आज

d.

भविष्य

Question number: 372 (5 of 8 Based on Passage) Show Passage

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Question

निम्न में से कौनसा शब्द फूल का पर्यायवाही नहीं है?

Choices

Choice (4) Response
a.

पवमान

b.

सारंग

c.

प्रसून

d.

सुमन

Question number: 373 (6 of 8 Based on Passage) Show Passage

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Question

माया बन्ध में प्रयुक्त समास है

Choices

Choice (4) Response
a.

तत्पुरूष

b.

अव्ययीभाव

c.

दव्गु

d.

कर्मधारय

Question number: 374 (7 of 8 Based on Passage) Show Passage

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Question

पराधीन में प्रयुक्त सन्धि है

Choices

Choice (4) Response
a.

दीर्घ

b.

गुण

c.

यण

d.

वृद्धि

Passage

गोस्वामी तुलसीदास के युग में भारत पर मुगल बादशाहों का शासन था। पूरा देश पराधीनता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था। तुलसीदार ने पराधीनता की पीड़ा को अनुभव करते हुए उदास और हताश जनता को राम-भक्ति के रूप में शक्ति और स्वतंत्रता का संदेश दिया। उन्होंने अपने युग के शासकों की दमनकारी नीतियों को रावण के दुराचारों के माध्यम से दर्शाया। रावण ने अपनी तानाशाही नीतियों से सभी को अपना दास बना लिया था तथा किसी को स्वतंत्र नहीं छोड़ा था - ”राखेउ कोउ न सुतन्त्र।“ यही नहीं, उस दुष्ट ने हमारी राष्ट्रीश् प्रतिष्ठा की प्रतीक सीता जी का भी अपहरण कर लिया था। ऐसे युग में तुलसी ने भक्ति और भगवान सभी को स्वतंत्र बताया। शील, शक्ति और स्वतंत्रता के प्रतीक भगवान् राम एक जनतांत्रिक नेता के रूप में दक्षिण भारत की जनजातियों के वीर योद्धाओं की सेना संगठित करके रावण के विरूद्ध एक स्वतंत्रता आन्दोलन का संचालन करते हैं और राष्ट्र की अस्मिता सीता को मुक्त कराने में सफल होते हैं। तुलसी ने अपने महान् ग्रन्थ ‘रामचरित मानस’ के लंका काण्ड में राम की इस समर-विजय का वर्णन किया है। उन्होंने लंका काण्ड के अंत में लिखा है कि जो व्यक्ति भगवान् राम की इस ‘समर-विजय’ को ध्यान में पढ़ेगा या सुनेगा, उसे भगवान् राम विजय, विवेक और वैभव प्रदान करेंगे - ”विजय, विवेक, विभूति नित, तिनहिं देहि भगवान्।“ ऐसा प्रेरक प्रबोधक और प्रभावी है तुलसी की भक्ति का स्वरूप।

Question number: 375 (1 of 9 Based on Passage) Show Passage

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Question

कौनसा कथन सही नहीं है?

Choices

Choice (4) Response
a.

तुलसी की भक्ति शक्ति, संघर्ष विजय और स्वतंत्रता का संदेश देती है

b.

रावण, अन्यायी, अत्याचारी, निरंकुश शासक था

c.

तुलसी का युग पराधीनता का युग था

d.

तुलसी की भक्ति में दासता, दीनता, हीनता आदि की प्रमुखता है

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