Reading Comprehension-Prose or Drama (CTET Paper-II Hindi): Questions 353 - 359 of 413

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Passage

संस्कृति किसी दो मंजिला मकान की तरह होती है। पहली मंजिल पर एकदम मूलभूत मगर चिरन्तन जीवन मूल्य होते हैं। इसमें परस्पर सहकार्य, न्याय, सौन्दर्य जैसे मूलभूत तत्व आते है। ये मूल्य समय से परे होते हैं। पहली मंजिल पर दूसरी मंजिल का निर्माण किसी समाज की विशिष्ट आवश्यका के अनुरूप होता है। धार्मिक ऐतिहासिक परम्परा, आर्थिक लेनदेन, स्त्री-पुरूष सम्बन्ध और परिस्थितिजन्य अन्य मूल्यों का निर्माण में योगदान होता है। इससे पहली मंजिल के मूलभूत मूल्यों की उपेक्षा होने लगती है। समाज को भ्रम होने लगता है कि दूसरे मंजिल की मूल व्यवस्था ही अपनी सच्ची संस्कृति है। भ्रम से कई तरह की विकृति उत्पन्न होती है, जो सामाजिक परिवर्तन से संघर्ष करने लगती है। वस्तुत: आज इन्हीं परिस्थितियों को मात देकर नई संस्कृति का निर्माण करना देश के सामने सबसे बड़ा कार्य है। इसमें शिक्षा पद्धति और प्रसार माध्यम महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। शिक्षा के भावी पीढ़ी पर सांस्कृतिक निष्ठा के संस्कार डाले जाते हैं। हमारी शिक्षा इस कसौटी पर खरी नहीं उतरी है। समाज में विषमता की खाई चौड़ी करने में ही इसका योगदान रहा है। यह अमीरों की दोस्त और गरीबों की दुश्मन हो गई है। एकाध ठीकठााक पाठशाला में बच्चों को प्रवेश दिलाने में बीस हजार रूपए एक ‘हफ्ता’ देना पड़ता है।

Question number: 353 (4 of 8 Based on Passage) Show Passage

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Question

‘अनुरूप’ शब्द का विपरीतार्थी शब्द है

Choices

Choice (4) Response

a.

प्रतिरूप

b.

कुरूप

c.

स्वरूप

d.

रूप

Question number: 354 (5 of 8 Based on Passage) Show Passage

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Question

संस्कृति को दो मंजिला मकान की तरह क्यों बताया गया है?

Choices

Choice (4) Response

a.

उसके निर्माण में श्रम व समय दोनों लगते हैं

b.

उसके दो अलग-अलग घटक हैं

c.

उसका सम्बन्ध उच्च व निम्न वर्ग दोनों से है

d.

वह किसी भी राष्ट्र की दो स्थितियों को स्पष्ट करती है

Question number: 355 (6 of 8 Based on Passage) Show Passage

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Question

संस्कृति के मूल तत्वों की उपेक्षा क्यों होने लगती है?

Choices

Choice (4) Response

a.

संस्कृति के मूल्य तत्व इतने दु: साध्य हैं कि उन्हें हर समय बनाए रखना कठिन है

b.

पुरानी रूढ़ियों और परम्पराएँ हम पर हावी हो जाती है। इसलिए हम ठीक प्रकार से नहीं सोच पाते

c.

उसका निर्माण अलग-अलग लोग करते हैं इसलिए कोई अपना उत्तरदायित्व नहीं मानता

d.

संस्कृति अदृश्य है अत: सामान्य जनता उसके महत्व को नहीं जानती

Question number: 356 (7 of 8 Based on Passage) Show Passage

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Question

एकाध से पर्याय है

Choices

Choice (4) Response

a.

एक या दो

b.

कुछ

c.

सौ से अधिक

d.

All of the above

Question number: 357 (8 of 8 Based on Passage) Show Passage

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Question

परस्पर सहकार्य, न्याय तथा सौन्दर्य को संस्कृति के मूल तत्व क्यों कहा गया है?

Choices

Choice (4) Response

a.

ये समय के साथ नहीं बदलते

b.

इन्हें प्राप्त करने में बहुत कठिनाई होती है

c.

इनकी जड़े बहुत गहरी हैं

d.

इसमें समाज की अधिक आस्थ होती है

Passage

ऋषि-मुनियों, साधु-सन्तों को

नमन, उन्हें मेरा अभिनन्दन।

जिनके उपदेशों को सुनकर

सँवर जाए जन-जन का जीवन।

सत्य-अंहिसा जिनके भूषण

करूणामय है जिनकी वाणी

जिनके चरणों में है पावन

भारत की यह अमिट कहानी

Question number: 358 (1 of 1 Based on Passage) Show Passage

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Question

उपदेश शब्द का समानार्थी शब्द है

Choices

Choice (4) Response

a.

भाषण

b.

पूजा-पाठ

c.

भविष्यवाणी

d.

शिक्षाप्रद ज्ञान

Passage

मानव जीवन में स्वावलम्बन की महत्ता सर्वोपरि है। जो व्यक्ति अपनी शक्ति पर भरोसा रखता है, दूसरों की सहायता पर निर्भर नहीं रहता, वही सच्चा आत्मनिर्भर अथवा स्वावलम्बी है। आत्मनिर्भरता सभी सुखों का स्त्रोत है। स्वावलम्बी व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों पर सरलता से विजय प्राप्त कर लेता है। उसमें विघ्नों से जूझने की असीम शक्ति और प्रेरणा होती है। आत्मनिर्भरता आत्मविश्वास को बढ़ाती है। यह आत्मविश्वास ही सब प्रकार की उन्नति का द्वार है। यह मनुष्य को आशावादी और आस्तिक बनाता है। परमात्मा भी उन्हीं की सहायता करता है, जो स्वयं अपनी सहायता करते हैं। स्वावलम्बी व्यक्ति बने-बनाये मार्गों पर नहीं चलते, वरन् अपने साहस और संघर्ष से नये पथों का निर्मामा करते हैं और लोक कल्याण के क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण योग देते हैं।

स्वावलम्बन की महत्ता को ध्यान में रखकर ही हमारे प्राचीन ग्रन्थों में ‘स्वाध्याय’ पर विशेष बल दिया गया है। स्वाध्याय का अर्थ है किसी अन्य व्यक्ति की सहायता के बिना, स्वयं अपनी समझ के भरोसे पर पुस्तकों का अध्ययन करना और उनसे ज्ञान अर्जित करना। मनुष्य जो ज्ञान अपने प्रयत्नों से प्राप्त करता है, वह उसके व्यक्तित्व का अभिन्न अंग बन जाता है। वह उसे कभी भूल नहीं सकता। जो ज्ञान हमारे अन्दर दूसरों के द्वारा बाहर से ठूँसा जाता है, उस पर हमारा कभी पूरा अधिकार नहीं हो पाता। इसके विपरीत जो ज्ञान हम अपने प्रयत्नों से स्वयं अर्जित करते है, वह हमारी अपनी गाढ़ी कमाई है, हमारी निजी स्थायी सम्पत्ति हैं। स्वाध्यायशील व्यक्ति ही महान् मौलिक चिन्तक बन कर ज्ञान-विज्ञान के नये क्षेत्रों का विकास करते हैं।

Question number: 359 (1 of 9 Based on Passage) Show Passage

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Question

कौनसा कथन सही नहीं है

Choices

Choice (4) Response

a.

स्वावलम्बी व्यक्ति विघ्नों पर विजयी पाता है

b.

स्वावलम्बी व्यक्ति दम्भी और उद्देण्य हो जाता है

c.

स्वाध्याय से व्यक्ति मौलिक चिन्तक बन जाता है

d.

स्वावलम्बन से व्यक्ति मौलिक चिन्तक बन जाता है

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