Reading Comprehension-Prose or Drama (CTET (Central Teacher Eligibility Test) Paper-II Hindi): Questions 160 - 164 of 413

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Passage

अभी भी इस बारे में बहुत कम जानकारी है कि आधुनिक कही जाने वाली आज की दुनिया आखिर कैसे संचालित हो रही है। हालांकि हरेक देश के पास इसकी कोई न कोई आधिकारिक व्याख्या जरूर है कि वे कैसे और किन सन्दर्भों में आधुनिक हो रहे हैं। लेकिन इस बारे में मेरा कहना है कि आधुनिकता को समझने के लिए जरूरी है कि आप अपने अन्दर झाँक सकें। इससे आपको पता चलेगा कि आधुनिकता की राह पर बढ़ने के लिए समाज को किन चीजों की जरूरी होती है। बेशक, आज हर कोई मॉडर्न होना चाहता है, लेकिन आधुनिकता की राह उतनी स्पष्ट नहीं है, जितनी वह मानी जाती है। इसीलिए मैं यह बात बार-बार कहता हूँ कि पश्चिमी समाज कभी-कभी आधुनिक नहीं रहे। पश्चिम के समय एकमात्र उल्लेखनीय चीज है साइन्स, जिसमें उसने तरक्की की लेकिन जिन साइंटिस्टों के बलबूते वहाँ आधुनिकता का परचम लहराया जाता है, खुद वे साइंटिस्ट अपने कल्चर में उलझे रहते हैं। उनका यह कल्चर आधुनिकता का झण्डाबरदार है। यह भी नहीं कहा जा सकता है कि उनके कल्चर पर दूसरी संस्कृतियों और लोकाचारों का असर नहीं हुआ होगा। अगर यह असर हुआ है तो सिर्फ वही आधुनिक क्यों कहा जाए? (ब्रूनो लातूर - फ्रेन्च सोशल साइंटिस्ट)

Question number: 160 (5 of 6 Based on Passage) Show Passage

» Reading Comprehension » Prose or Drama

Appeared in Year: 2011

MCQ▾

Question

लेखक इस गद्यांश में क्या कहना चाहता है?

Choices

Choice (4) Response

a.

पश्चिमी समाज आधुनिक है

b.

वैज्ञानिकों को केवल अपने संस्कृति का ज्ञान है

c.

विज्ञान में उन्नति करना ही आधुनिक होने का मानदण्ड नहीं है

d.

आधुनिक होने के लिए विज्ञान में तरक्की करना जरूरी है

Question number: 161 (6 of 6 Based on Passage) Show Passage

» Reading Comprehension » Prose or Drama

Appeared in Year: 2011

MCQ▾

Question

लेखक के अनुसार आधुनिक होने के लिए क्या जरूरी है?

Choices

Choice (4) Response

a.

आधुनिकता की निश्चित परिभाषा

b.

स्वयं का विश्लेषण

c.

साइन्स में तरक्की करना

d.

अपनी संस्कृति का संरक्षण

Passage

संस्कृति के निर्माण में एक सीमा तक देश और जाति का योगदान रहता है। संस्कृति के मूल उपादान तो प्राय: सभी सुसंस्कृत और सभ्य देशों के एक सीता तक समान रहते हैं, किन्तु बाह्य उपादानों में अन्तर अवश्य आता है। राष्ट्रीय संस्कृति का सबसे बड़ा योगदान यही है कि वह हमें अपने राष्ट्र की परम्परा से सम्पृक्त बनाती है, अपनी रीति-नीति की सम्पदा से विच्छिन्न नहीं होने देती। आज के युग में राष्ट्रीय एवं जातीय संस्कृतियों के मिलन के अवसर अति सुलभ हो गए हैं। संस्कृतियों का पारस्परिक संघर्ष भी शुरू हो गया है। कुछ नए विदेशी प्रभाव हमारे देश पर पड़ रहे है, जिनके आतंक ने हमें स्वयं अपनी संस्कृति के प्रति संशयालु बना दिया है। हमारी आस्था डगमगाने लगी है। यह हमारी वैचारिक दुर्बलता का फल है। अपनी संस्कृति को छोड़ विदेशी संस्कृति के विवेकहीन अनुकरण से हमारे राष्ट्रीय गौरव को जो ठेस पहुँच रही है, वह किसी राष्ट्र प्रेमी जागरूक व्यक्ति से छिपी नहीं है। भारतीय संस्कृति में त्याग और ग्रहण की अद्भुत क्षमता रही है। अत: आज के वैज्ञानिक युग में हम किसी भी विदेशी संस्कृति के जीवन्त तत्वों को ग्रहण करने में पीछे नहीं रहना चाहेंगे किन्तु अपनी सांस्कृतिक निधि की उपेक्षा करके नहीं। यह परावलम्बन राष्ट्र की गरिमा के अनुरूप नहीं है। यह स्मरण रखना चाहिए कि सूर्य की आलोप्रदायिनी किरणों से पौधे को चाहे जितनी जीवनशक्ति मिले किन्तु अपनी जमीन और अपनी जड़ों के बिना कोई पौधा जीवित नहीं रह सकता। अविवेकी अनुकरण, अज्ञान का ही पर्याय है।

Question number: 162 (1 of 7 Based on Passage) Show Passage

» Reading Comprehension » Prose or Drama

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Question

‘परमाश्वयक’ में प्रयुक्त सन्धि है

Choices

Choice (4) Response

a.

दीर्घ

b.

विसर्ग

c.

यण

d.

व्यंजन

Question number: 163 (2 of 7 Based on Passage) Show Passage

» Reading Comprehension » Prose or Drama

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Question

हम अपनी संस्कृति के प्रति संशयालु इसलिए हो गए हैं, क्योंकि

Choices

Choice (4) Response

a.

हम तीव्रता से बढ़ते विदेशी कुप्रभाव का प्रभावी रूप से सामना नहीं कर पा रहे हैं

b.

हम चिन्तन के स्तर पर पूर्ण परिपक्वता की स्थिति पर नहीं पहुँच पाए हैं

c.

नई पीढ़ी ने विदेशी संस्कृति के कुछ तत्वों को स्वीकार करना प्रारम्भ कर दिया है

d.

अपनी संस्कृति के प्रति हमारी आस्था कमजोर हो गई है

Question number: 164 (3 of 7 Based on Passage) Show Passage

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Question

हम अपनी सांस्कृतिक सम्पदा की अपेक्षा इसलिए नहीं कर सकते, क्योंकि

Choices

Choice (4) Response

a.

ऐसा करना हमारे राष्ट्रीय हितों के अनुरूप नहीं है

b.

अपने राष्ट्र को अपमानिक करने के समान है

c.

ऐसा करने से हम जड़-विहीन पौधे के सदृश हो जायेंगे

d.

अविवेकी अनुकरण, अज्ञान का ही दूसरा नाम है और हम अज्ञानी नहीं है

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