Reading Comprehension (CTET (Central Teacher Eligibility Test) Paper-II Hindi): Questions 67 - 73 of 592

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Passage

संस्कृति के निर्माण में एक सीमा तक देश और जाति का योगदान रहता है। संस्कृति के मूल उपादान तो प्राय: सभी सुसंस्कृत और सभ्य देशों में एक सीमा एक समान रहते हैं किन्तु बाह्य उपादानों में अन्तर अवश्य आता है। राष्ट्रीय या जातीय संस्कृति का सबसे बड़ा योगदान यही है कि वह हमें अपने राष्ट्र की परम्परा से संयुक्त बनाती है, अपनी रीति-नीति की सम्पदा से विच्छिन्न नहीं होने देती। आज के युग में राष्ट्रीय एवं जातीय संस्कृतियों के मिलने के अवसर अति सुलभ हो गए हैं। संस्कृतियों का पारस्परिक संघर्ष भी शुरू हो गया है। कुछ ऐसे विदेशी प्रभाव हमारे देश पर पड़ रहे हैं, जिनके आन्तक ने हमें स्वयं अपनी संस्कृति के प्रति शंकालु बना दिया है। हमारी आस्था डिगने लगी है। यह हमारी वैचारिक दुर्बलता का फल है। अपनी संस्कृति को छोड़ विदेशी संस्कृति के विवेकहीन अनुकरण से हमारे राष्ट्रीय गौरव को जो ठेस पहुँच रही है, वह किसी राष्ट्रप्रेमी जागरूक व्यक्ति से छिपी नहीं है। भारतीय संस्कृति में त्याग और ग्रहण की अद्भुत क्षमता रही है। अत: आज के वैज्ञानिक युग में हम किसी भी विदेशी संस्कृति के जीवन्त तत्वों को ग्रहण करने में पीछे नहीं रहना चाहेंगे, किन्तु अपनी सांस्कृतिक निधि की उपेक्षा करके नहीं। यह परावलम्बन राष्ट्र की गरिमा के अनुरूप नहीं है। यह स्मरण रखना चाहिए कि सूर्य की आलोक प्रदायिनी किरणों से पौधे को चाहे जितनी जीवनी शक्ति मिले, किन्तु अपनी जमीन और अपनी जड़ों के बिना कोई पौधा जीवित नहीं रह सकता। अविवेकी अनुकरण अज्ञान का ही पर्याय है।

Question number: 67 (4 of 6 Based on Passage) Show Passage

» Reading Comprehension » Prose or Drama

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Question

‘अविवेकीकरण’ अनुकरण का पर्याय है

Choices

Choice (4) Response

a.

अज्ञान

b.

ज्ञान

c.

विवेक

d.

संस्कृति

Question number: 68 (5 of 6 Based on Passage) Show Passage

» Reading Comprehension » Prose or Drama

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Question

आधुनिक युग में संस्कृतियों में परस्पर संघर्ष प्रारम्भ होने का प्रमुख कारण यह है कि

Choices

Choice (4) Response

a.

विरोधी संस्कृतियाँ एक-दूसरे के निकट आई है

b.

भिन्न संस्कृतियों के निकट आने के कारण अतिक्रमण एवं विरोध स्वाभाविक है

c.

विरोधी संस्कृतियों ने अपनी सीमाओं का अतिक्रमण आरम्भ कर दिया है

d.

None of the above

Question number: 69 (6 of 6 Based on Passage) Show Passage

» Reading Comprehension » Prose or Drama

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Question

हम अपनी संस्कृति के प्रति शंकालु इसलिए हो गए है, क्योंकि

Choices

Choice (4) Response

a.

हम तीव्रता से बढ़ते विदेशी कुप्रभाव का प्रभावी रूप से सामना नहीं कर पा रहे है

b.

हम चिन्तन के स्तर पर पूर्ण परिपक्वता की स्थिति पर नहीं पहुँच पाए हैं

c.

नई पीढ़ी ने विदेशी संस्कृति के कुछ तत्वों को स्वीकार करना प्रारम्भ कर दिया है

d.

अपनी संस्कृति के प्रति हमारी आस्था कमजोर हो गई है

Passage

सुना है दधिची का वह त्याग, हमारी जातीयता विकास।

पुरन्दर ने पंखि से है लिखा, अस्थियुग का मेरे इतिहास।

सिन्धु सा विस्तृत और अथाह एक निर्वासित का उत्साह।

दे रहा आभा दिखाई भग्न, मग्न रत्नाकर में वह राह।

धर्म का ले-लेकर जो नाम, हुआ करती बलि, कर दी बन्द।

हमी ने दिया शान्ति संदेह, सुखी होते देकर सानन्द।

विजय केवल लोहे की नहीं, धर्म की रही धरा पर धूम।

भिक्षु होकर रहते सम्राट, दया दिखलाई घर-घर घूम।

Question number: 70 (1 of 6 Based on Passage) Show Passage

» Reading Comprehension » Poetry

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Question

निर्वासित किसे कहा गया है?

Choices

Choice (4) Response

a.

श्रीकृष्ण को

b.

श्रीराम को

c.

भगवान बुद्ध को

d.

शिवजी को

Question number: 71 (2 of 6 Based on Passage) Show Passage

» Reading Comprehension » Poetry

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Question

‘लोहे की विजय’ से क्या तात्पर्य है?

Choices

Choice (4) Response

a.

मशीनों की जीत

b.

हथियारों के बल पर जीत

c.

लोहे का कारोबार

d.

लोहा मनवाना

Question number: 72 (3 of 6 Based on Passage) Show Passage

» Reading Comprehension » Poetry

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Question

‘धर्म के नाम पर बलि’ से क्या आशय है?

Choices

Choice (4) Response

a.

पशुबलि

b.

नरबलि

c.

राजा बलि

d.

बलशाली

Question number: 73 (4 of 6 Based on Passage) Show Passage

» Reading Comprehension » Poetry

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Question

‘रत्नाकर’ शब्द का पर्यायवाची है

Choices

Choice (4) Response

a.

सिन्धु

b.

समीर

c.

धराधर

d.

सूर

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