Reading Comprehension (CTET (Central Teacher Eligibility Test) Paper-II Hindi): Questions 60 - 66 of 592

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Passage

एक समय था जब पानी सब जगह मिल जाता था। अत: इसे कोई महत्व नहीं देता था। लेकिन तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या और जीवन शैली में आए परिवर्तन के कारण पानी अब दुर्लभ हो गया है। इसी दुर्लभता के कारण जल का आर्थिक मूल्य बहुत बढ़ गया है। अब केवल सिंचाई के लिए ही नहीं बल्कि उद्योगों और घरेलू उपयोग के लिए भी जल की बहुत आवश्यकता है। इसीलिए जल अब एक बहुमूल्य संसाधन बन गया है। नगरों में जल की भारी मात्रा में आवश्यकता है क्योंकि जल का पीने के साथ-साथ सभी घरेलू कामों में उपयोग होता है। नगरामें में सीवर की सफाई तथा उद्योगों के लिए भी जल की भारी मात्रा में आवश्यकता होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की आपूर्ति में कई दोष पाए जाते हैं। पानी को स्वच्छ करके मानवीय उपयोग के लायक बनाने की व्यवस्था होनी चाहिए।

Question number: 60 (5 of 8 Based on Passage) Show Passage

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Question

पानी का उपयोग कैसे करना चाहिए?

Choices

Choice (4) Response

a.

क्लोरीन से

b.

संग्रहित करके

c.

स्वच्छ करके

d.

घड़े में भरकर

Question number: 61 (6 of 8 Based on Passage) Show Passage

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Question

फसलों को पानी की आवश्यका किस रूप में होती है?

Choices

Choice (4) Response

a.

धुलाई

b.

ढुलाई

c.

खिंचाई

d.

सिंचाई

Question number: 62 (7 of 8 Based on Passage) Show Passage

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Question

संसाधन का सही सन्धि विच्छेद है

Choices

Choice (4) Response

a.

सम् + साधन

b.

सन् + साधन

c.

सं + साधन

d.

संसा + धन

Question number: 63 (8 of 8 Based on Passage) Show Passage

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Question

जल का कौनसा मूल्य बढ़ गया है?

Choices

Choice (4) Response

a.

आर्थिक

b.

सामाजिक

c.

दैनिक

d.

औद्योगिक

Passage

संस्कृति के निर्माण में एक सीमा तक देश और जाति का योगदान रहता है। संस्कृति के मूल उपादान तो प्राय: सभी सुसंस्कृत और सभ्य देशों में एक सीमा एक समान रहते हैं किन्तु बाह्य उपादानों में अन्तर अवश्य आता है। राष्ट्रीय या जातीय संस्कृति का सबसे बड़ा योगदान यही है कि वह हमें अपने राष्ट्र की परम्परा से संयुक्त बनाती है, अपनी रीति-नीति की सम्पदा से विच्छिन्न नहीं होने देती। आज के युग में राष्ट्रीय एवं जातीय संस्कृतियों के मिलने के अवसर अति सुलभ हो गए हैं। संस्कृतियों का पारस्परिक संघर्ष भी शुरू हो गया है। कुछ ऐसे विदेशी प्रभाव हमारे देश पर पड़ रहे हैं, जिनके आन्तक ने हमें स्वयं अपनी संस्कृति के प्रति शंकालु बना दिया है। हमारी आस्था डिगने लगी है। यह हमारी वैचारिक दुर्बलता का फल है। अपनी संस्कृति को छोड़ विदेशी संस्कृति के विवेकहीन अनुकरण से हमारे राष्ट्रीय गौरव को जो ठेस पहुँच रही है, वह किसी राष्ट्रप्रेमी जागरूक व्यक्ति से छिपी नहीं है। भारतीय संस्कृति में त्याग और ग्रहण की अद्भुत क्षमता रही है। अत: आज के वैज्ञानिक युग में हम किसी भी विदेशी संस्कृति के जीवन्त तत्वों को ग्रहण करने में पीछे नहीं रहना चाहेंगे, किन्तु अपनी सांस्कृतिक निधि की उपेक्षा करके नहीं। यह परावलम्बन राष्ट्र की गरिमा के अनुरूप नहीं है। यह स्मरण रखना चाहिए कि सूर्य की आलोक प्रदायिनी किरणों से पौधे को चाहे जितनी जीवनी शक्ति मिले, किन्तु अपनी जमीन और अपनी जड़ों के बिना कोई पौधा जीवित नहीं रह सकता। अविवेकी अनुकरण अज्ञान का ही पर्याय है।

Question number: 64 (1 of 6 Based on Passage) Show Passage

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Question

हम अपनी सांस्कृतिक परम्परा की उपेक्षा इसलिए नहीं कर सकते क्योंकि

Choices

Choice (4) Response

a.

ऐसा करना हमारे राष्ट्रीय हितों के अनुरूप नहीं है

b.

अपने राष्ट्र को अपमानित करने के समान है

c.

ऐसा करने से हम जड़-विहीन पौधे के सदृश हो जायेंगे

d.

अविवेकी अनुकरण अज्ञान का ही दूसरा नाम है और हम अज्ञानी नहीं है

Question number: 65 (2 of 6 Based on Passage) Show Passage

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Question

हम अपनी संस्कृति के प्रति शंकालु इसलिए हो गए है, क्योंकि

Choices

Choice (4) Response

a.

हम तीव्रता से बढ़ते विदेशी कुप्रभाव का प्रभावी रूप से सामना नहीं कर पा रहे है

b.

हम चिन्तन के स्तर पर पूर्ण परिपक्वता की स्थिति पर नहीं पहुँच पाए हैं

c.

नई पीढ़ी ने विदेशी संस्कृति के कुछ तत्वों को स्वीकार करना प्रारम्भ कर दिया है

d.

अपनी संस्कृति के प्रति हमारी आस्था कमजोर हो गई है

Question number: 66 (3 of 6 Based on Passage) Show Passage

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Question

‘अविवेकीकरण’ अनुकरण का पर्याय है

Choices

Choice (4) Response

a.

अज्ञान

b.

ज्ञान

c.

विवेक

d.

संस्कृति

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