CTET (Central Teacher Eligibility Test) Paper-II Hindi: Questions 451 - 458 of 827

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Passage

अहिंसा वीरता का श्रेष्ठ रूप है और गाँधीजी से बड़ा वीर इस युग में कोई उत्पन्न नहीं हुआ। मेरी धारणा है कि अपना जीवन सिद्धान्त अनाने से पूर्व गाँधीजी ने अहिंसा को निश्चय ही नीति के रूप में ग्रहण किया होगा। अंग्रेजों से देश को मुक्ति दिलाने के संघर्ष में कोई अन्य रूप समीचीन नहीं था। सर्वथा नि: शस्त्र देश के लिए हिंसात्मक क्रान्ति किसी प्रकार की श्रेयस्कर नहीं हो सकती थी। भौतिक के अभाव में क्रान्तिदर्शी नेता ने देश को आत्मिक संयम की प्रेरणा दी। यह उसकी नीति और आदर्शवादिता दोनों थी। भौतिक बल से आत्मिक बल का प्रभाव कहीं अधिक है, यह समझने में भारत जैसे देश कोदेर नहीं लगी और वह मारकर नहीं, मरकर विजय प्राप्त करने के लिए उत्साहित होने लगा। इसके उत्साह का एक रचनात्मक रूप भी था जो भारत के उत्कर्ष की भावना में अभिव्यक्त होता था।

Question number: 451 (5 of 9 Based on Passage) Show Passage

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Question

इस अवतरण का सर्वाधिक उपयुक्त शीर्षक है

Choices

Choice (4) Response

a.

महात्मा गाँधी का त्याग

b.

भारत का आत्मिक बल

c.

अहिंसा और आत्मिक बल

d.

हिंसा और अहिंसा

Question number: 452 (6 of 9 Based on Passage) Show Passage

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Question

आत्मिक बल का प्रभाव भौतिक बल से अधिक है

Choices

Choice (4) Response

a.

वीर पुरूष के लिए

b.

धार्मिक व्यक्तियों के लिए

c.

अहिंसावादियों के लिए

d.

भारत जैसे देश के लिए

Question number: 453 (7 of 9 Based on Passage) Show Passage

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Question

हिंसात्मक क्रान्ति श्रेयस्कर नहीं है

Choices

Choice (4) Response

a.

धार्मिक लोगों के लिए

b.

दुर्बल जनता के लिए

c.

नि: शस्त्र देश के लिए

d.

शक्तिशाली समाज के लिए

Question number: 454 (8 of 9 Based on Passage) Show Passage

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Question

महात्मा शब्द में प्रयुक्त समास है

Choices

Choice (4) Response

a.

कर्मधारय

b.

दव्गु

c.

तत्पुरूष

d.

दव्न्दव्

Question number: 455 (9 of 9 Based on Passage) Show Passage

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Question

‘भौतिक’ का विलोम शब्द है

Choices

Choice (4) Response

a.

सामाजिक

b.

वैचारिक

c.

आध्यात्म

d.

Question does not provide sufficient data or is vague

Passage

गाँधी मानते थे कि सामाजिक जीवन की ओर बढ़ने से पहले कौटुम्बिक जीवन का अनुभव प्राप्त करना आवश्यक है। इसलिए वे आश्रम जीवन बिताते थे। इससे समय और धन तो बचता ही था, सामूहिक जीवन का अभ्यास भी होता था। लेकिन यह सब होना चाहिए, समय-पालन, सुव्यवस्था और शुचिका के साथ।

इस ओर लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए गाँधीजी स्वयं भी सामूहिक रसोईघर में भोजन करते थे। भोजन के समय दो बार घण्टी बजती थी। जो दूसरे घण्टी बजने तक भोजनालय में नहीं पहुँच पाता था, उसे दूसरी पंक्ति के लिए बरामदे में इन्तजार करना पड़ता था। दूसरी घण्टी बजते ही रसोईघर का द्वार बन्द कर दिया जाता था, जिसके बाद आने वाले व्यक्ति अन्दर न आने पाएँ।

एक दिन गाँधीजी पिछड़ गए। संयोग से उस दिन आश्रमवासी श्री हरिभाऊ उपाध्याय भी पिछड़ गए। जब वे वहाँ पहुँचे तो देखा कि बापू बरामदे में खड़े हुए बैठने के लिए ने बैंच है, न कुर्सी। हरिभाऊ ने विनोद करते हुए कहा, ”बापूजी आज तो आप भी गुनहगारों के कठघरे में आ गए हैं।“

गाँधीजी खिलखिलाकर हंस पड़े, बोले ‘कानूनी के सामने तो सब बराबर होते हैं न’

हरिभाऊ जी ने कहा, ‘बैठने के लिए कुर्सी लाऊँ, बापू? ’ गाँधीजी बोले, ‘नहीं, उसकी जरूरत नहीं है। सजा पूरी भुगतनी चाहिए। उसी में सच्चा आनन्द है।’

Question number: 456 (1 of 9 Based on Passage) Show Passage

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Question

‘रसोई’ शब्द है

Choices

Choice (4) Response

a.

तत्सम

b.

रूढ़

c.

योगरूढ़

d.

यौगिक

Question number: 457 (2 of 9 Based on Passage) Show Passage

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Question

इनमें कौनसा ‘इक’ प्रत्यय का उदाहरण है?

Choices

Choice (4) Response

a.

कौटुम्बिक

b.

आधिक्य

c.

माणिक्य

d.

अत्यधिक

Question number: 458 (3 of 9 Based on Passage) Show Passage

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Question

‘कानून के सामने तो सब बराबर होते हैं न’ गाँधीजी का यह कथन इस ओर संकेत करता है कि

Choices

Choice (4) Response

a.

गाँधीजी झेंप गए थे

b.

कानून किसी तरह का भेदभाव नहीं करता

c.

गाँधीजी पूरी ईमानदारी से नियमों का पालन करने में विश्वास रखते थे

d.

कानून के हाथ लम्बे होते हैं

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