CTET (Central Teacher Eligibility Test) Paper-I Hindi Pedagogy of Language Development-Remedial Teaching Revision (Page 4 of 6)

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उच्चारण दोष के कारण (Reasons of Pronunciation Defect)

  • शारीरिक कारण
  • वर्णों के उच्चारण का अज्ञान हिन्दी भाषा की एक विशेषता यह भी है कि उसका जैसा अक्षर विन्यास है, ठीक वैसे ही उच्चारित भी की जाती है। इसके बावजूद अज्ञानवश वर्णों व शब्दों के सही रूप कुछ लोग उच्चारित नहीं कर पाते हैं जैसे आमदनी को आम्दनी कहना, खींचने को खेंचना कहना, प्रताप को परताप कहना, वृक्ष को व्रक्ष कहना, वीरेन्द्र को वीरेन्दर कहना आदि।
  • क्षेत्रीय बोलियों का प्रभाव कहावत है कि ‘कोस-कोस पर पानी बदले, दर कोस पर बानी।’ अर्थात् प्रत्येक दस कोस (बीस मील) पर बानी अर्थात् वाणी

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उच्चारण संबंधी दोषों के विभिन्न प्रकार (Types of Pronunciation Related Defects)

स्वर-लोप यथा ‘क्षत्रिय’ का ‘छत्री’, ‘परमात्मा’, का ‘प्रमात्मा’, ‘ईश्वर’ का ‘इस्सर’।

स्वर-भक्ति यथा ‘बृजेन्द्र’ को बढ़ाकर ‘बरजेन्दर’, ‘श्री’ को ‘सिरी’, ‘शक्ति’ को ‘सकती’।

स्वरागम यथा ‘स्नान’ में ‘अ’ का आगम होकर ‘अस्नान’, ‘स्कूल’ में ‘इ’ ‘इस्कूल’।

ऋ का अशुद्ध उच्चारण यथा ‘अमृत’ का ‘अम्रित’, पंजाब में ‘अम्रत’, मराठी में ‘अम्रत’।

इ, उ का ई, ऊ के साथ भ्रम यथा ‘कवि’ का ‘कवी’, ‘हिन्दू’ का ‘हिन्दु’, ‘ईश्वर’ का ‘ईसवर’, ‘किन्तु’ का ‘किन्तू’।

न और ण का भ्रम यथा ‘रणभूमि’ का ‘रनभूमि

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