CTET (Central Teacher Eligibility Test) Paper-I Hindi Pedagogy of Language Development-Remedial Teaching Revision (Page 3 of 6)

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भाषा दोष (Language Defect)

  • यदि बालक अपने स्वर यंत्रों पर नियंत्रण नहीं रख पाता, तो उसमें भाषा दोष उत्पन्न हो जाता है।
  • भाषा दोष से ग्रसित बालक समाज से कतराने लगते हैं। उनमें हीनता की भावना का विकास हो जाता है और वे सामान्यत: अन्तर्मुखी स्वभाव के हो जाते हैं।
  • भाषा दोष शैक्षिक विकास को भी प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता है।

मुख्यत: भाषा दोष निम्नलिखित प्रकार के होते हैं

  1. ध्वनि परिवर्तन
  2. अस्पष्ट उच्चारण
  3. हकलाना
  4. तुतलाना
  5. तीव्र अस्पष्ट वाणी

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च्चारण शिक्षा की आवश्यकताएँ (Importance of Pronunciation Education)

  • अशुद्ध उच्चारण से भाषा का स्वरूप बिगड़ता है।
  • बिना उच्चारण ज्ञान के भाषा का ज्ञान नहीं हो सकता है। उच्चारण ध्वनियों के आधार पर किया जाता है। ध्वनियों के अभाव में न भाषा ठीक ढंग से समझी जा सकती है, न ही उसका सम्यक् ज्ञान ही हो पाता है।
  • उच्चारण बाल्यावस्था से ही बनता-बिगड़ता है। इस कारण बालकों के उच्चारण पर विशेष बल देना चाहिए। बचपन से ही भ्रष्ट उच्चारण से बचाया जाना चाहिए।
  • हिन्दी भाषा-भाषी क्षेत्रों के अनेक बोलियाँ, उप-बोलियाँ प्रचलित हैं, यथा ब्रज, अवधी, भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी, बांगरी, माल

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