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च्चारण शिक्षा की आवश्यकताएँ (Importance of Pronunciation Education)

  • अशुद्ध उच्चारण से भाषा का स्वरूप बिगड़ता है।
  • बिना उच्चारण ज्ञान के भाषा का ज्ञान नहीं हो सकता है। उच्चारण ध्वनियों के आधार पर किया जाता है। ध्वनियों के अभाव में न भाषा ठीक ढंग से समझी जा सकती है, न ही उसका सम्यक् ज्ञान ही हो पाता है।
  • उच्चारण बाल्यावस्था से ही बनता-बिगड़ता है। इस कारण बालकों के उच्चारण पर विशेष बल देना चाहिए। बचपन से ही भ्रष्ट उच्चारण से बचाया जाना चाहिए।
  • हिन्दी भाषा-भाषी क्षेत्रों के अनेक बोलियाँ, उप-बोलियाँ प्रचलित हैं, यथा ब्रज, अवधी, भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी, बांगरी, मालवी, बुन्देली आदि। इन बोलियों का प्रभाव खडत्री बोली पर पड़ा… (93 more words) …

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ध्वनियों का वर्गीकरण (Classification of Sounds)

ध्वनियों का वर्गीकरण चार प्रकार से किया गया है

1. बाह्य प्रयत्न के आधार पर इस आधार पर सभी वर्ण, श्वास तथा नाद तथा अल्पप्राण एवं महाप्राण में विभक्त हैं।

2. आन्तरिक प्रयन्त के आधार पर इस आधार पर संवृत, अर्द्ध संवृत, विवृत एवं अर्द्ध विवृत के रूप में ध्वनियाँ विभक्त हैं।

3. उच्चारण की प्रकृति के आधार पर उच्चारण की प्रकृति के आधार पर स्वर, हृस्व, दीर्घ में तथा अन्य वर्ण, स्पर्श, पार्श्विक, अनुनासिक, ऊष्म, अन्तस्थ लुण्ठित एवं उत्क्षिप्त स्वरूप में विभक्त हैं।

4. उच्चारण स्थल के आधार पर इस आधार पर वर्ण कण्ठ्य, तालव्य, मूर्द्धन्य, दन्त्य, ओष्ठय, इन्तोष्ठ्य… (7 more words) …

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