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अभिप्रेरणा एवं रूचि का सिद्धान्त (Theory of Motivation and Interest) - भाषा शिक्षण के सिद्धान्त (Theories of Language Teaching)

हिन्दी पाठ्य सामग्री और उसकी शिक्षण प्रणालियों का चुनाव बच्चों की रूचि एवं आवश्यकताओं के अनुरूप किया जाना चाहिए, उन्हें भाषा सीखने हेतु अभिप्रेरित करने के लिए यह आवश्यक है।

भाषा शिक्षण की विधियाँ (Methods of Language Teaching)

भाषा और सीखने (भाषिक और अधिगम) से संबंधित अनेक विधियाँ हैं। इनमें से अधिकतर विधियों का विकास दव्तीय भाषा को सीखने के संदर्भ में हुआ है। जो विधियाँ विकसित हुई हैं उनमें से प्रमुख हैं - पारम्परिक व्याकरण अनुवाद विधि, प्रत्यक्ष तरीका, ऑडियो-लिंगुअल एप्रोच, कम्युनिकेटिव एप्रोच (बातचीत-आधारित सम्प्रेषणात्मक विधि), कम्प्यूटर एडेड लैंग्वेज टीचिंग (सी. ए. एल. टी. ), कम्युनिटी लैंग्वेज लर्निंग (सी. एल. एल. ), साइलेंट वे, सजेस्टोपेडिया और टोटल फीजिकल रिस्पान्स (टी. पी. आर. ) और दव्तीय भाषा सीखने के लिए निर्धारित वषेन का मॉनिटर व शूमैन एकल्वरेशन मॉडलों से विकसित हुए तरीके।

अनुबन्धन का सिद्धान्त (Theory of Conditioning) - भाषा शिक्षण के सिद्धान्त (Theories of Language Teaching)

भाषा विकास में अनुबन्धन या साहचर्य का बहुत योगदान है। शैशावस्था में जब बच्चे शब्द सीखते हैं, तो सीखना अमूर्त नहीं होता है, बल्कि किसी मूर्त वस्तु से जोड़कर उन्हें शब्दों की जानकारी दी जाती है। उदाहरण के लिए कलम कहने के साथ उन्हें कलम दिया जाता है, पानी या दूध कहने पर उन्हें पानी या दूध दिखाया जाता है। इसी तरह बच्चे विशिष्ट वस्तु या व्यक्ति से साहचर्य स्थापित करते हैं और अभ्यास हो जाने पर संबंध वस्तु या व्यक्ति की उपस्थिति पर संबंधित शब्द से सम्बोधित करते हैं।

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