Reading Comprehension-Prose or Drama (CTET Paper-I Hindi): Questions 32 - 40 of 161

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Passage

प्राचीन भारत में शिक्षा ज्ञान प्राप्ति का सबसे बड़ा स्रोत माना जाता था। व्यक्ति के जीवन को संतुलित और श्रेष्ठ बनाने तथा एक नई दिशा प्रदान करने में शिक्षा का महत्वपूर्ण योगदान था। सामाजिक बुराइयों को उसकी जड़ों से निर्मूल करने और त्रुटिपूर्ण जीवन में सुधार करने के लिए शिक्षा की नितान्त आवश्यकता थी। यह एक ऐसी व्यवस्था थी, जिसके द्वारा सम्पूर्ण जीवन ही परिवर्तित किया जा सकता था। व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व का विकास करने, वास्तविक ज्ञान को प्राप्त करने और समस्याओं को दूर करने के लिए शिक्षा पर निर्भर होना पड़ता था। आधुनिक युग की भाँति प्राचीन भारत में भी मनुष्य के चरित्र का उत्थान शिक्षा से ही सम्भव था। सामाजिक उत्तरदायित्वों को निष्ठापूर्वक वहन करना प्रत्येक मानव का उल्लेखनीय योगदान रहता है। भारतीय मनीषियों ने इस ओर अपना ध्यान केन्द्रित करके शिक्षा को समाज की आधारशिला के रूप में स्वीकार किया। विद्या का स्थान किसी भी वस्तु से बहुत ऊँचा बताया गया। प्रखर बुद्धि एवं सही विवेक के लिए शिक्षा की उपयोगिता को स्वीकार किया गया। यह माना गया कि शिक्षा ही मनुष्य को व्यावहारिक कर्तव्यों का पाठ पढ़ाने और सफल नागरिक बनाने में सक्षम है। इसके माध्यम से व्यक्ति का शारीरिक, मानसिक और आत्मिक अर्थात् सर्वांगीण विकास सम्भव है। शिक्षा ने ही प्राचीन संस्कृति को संरक्षण दिया और इसके प्रसार में मदद की।

विद्याल का आरम्भ उपनयन संस्कार द्वारा होता था। उपनयन संस्कार के महत्व पर प्रकाश डालते हुए मनुस्मृति में उल्लेख मिलता है कि गर्भाधान संस्कार द्वारा तो व्यक्ति का शरीर उत्पन्न होता है पर उपनयन संस्कार द्वारा उसका आध्यात्मिक जन्म होता है। प्राचीन काल में बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए आचार्य के पास भेजा जाताथा। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार, जो ब्रह्मचर्य ग्रहण करता है। वह लम्बी अवधि की यज्ञावधि ग्रहण करता है। छान्दोग्योपनिषद् में उल्लेख मिलता है कि आरूणि ने अपने पुत्र श्वेतकेतु को ब्रह्मचारी रूप में वेदाध्ययन के लिए गुरू के पास जाने को प्रेरित किया था। आचार्य के पास रहते हुए ब्रह्मचारी को तप और साधना का जीवन बिताते हुए विद्याध्ययन में तल्लीन रहना पड़ता था। इस अवस्था में बालक जो ज्ञानार्जन करता था उसका लाभ उसको जीवन भर मिलता था। गुरू गृह में निवास करते हुए विद्यार्थी समाज के निकट सम्पर्क में आता था। गुरू के लिए समिधा, जल का ालना तथा गृह कार्य करना उसका कर्तव्य माना जाता था। गृहस्थ धर्म की शिक्षा केसाथ-साथ वह श्रम और सेवा का पाठ पढ़ता था। शिक्षा केवल सैद्धान्तिक और पुस्तकीय न होकर जीवन की वास्तविकताओं के निकट होती थी।

Question number: 32 (8 of 9 Based on Passage) Show Passage

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Question

प्रस्तुत गद्यांश में निम्नलिखित में से किस ग्रन्थ का उल्लेख नहीं है?

Choices

Choice (4) Response

a.

शतपथ ब्राह्मण

b.

मनुस्मृति

c.

छान्दोग्योपनिषद्

d.

कठोपनिषद्

Question number: 33 (9 of 9 Based on Passage) Show Passage

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Question

‘आध्यात्मिक’ का सन्धि-विच्छेद है

Choices

Choice (4) Response

a.

आध्य + आत्मिक

b.

अधि + आत्मिक

c.

आध + यात्मिक

d.

आधि + यात्मिक

Passage

साहित्य को समाज का प्रतिबिम्ब माना गया है अर्थात् समाज का पूर्ण रूप साहित्य में प्रतिबिम्बित होता रहता है। अनादि काल से साहित्य अपने इसी धर्म का पूर्ण निर्वाह करता चला आ रहा है। वह समाज के विभिन्न रूपों का चित्रण कर एक तरफ तो हमारे सामने समाज का यथार्थ चित्र प्रस्तुत करता है और दूसरी ओर अपनी प्रखर मेधा और स्वस्थ कल्पना द्वारा समाज के विभिन्न पहलुओं का विवेचन करता हुआ यह भी बताता है कि मानव समाज की सुख समृद्धि, सुरक्षा और विकास के लिए कौनसा मार्ग उपादेय है। एक आलोचक के शब्दों में - ”कवि वास्तव में समाज की व्यवस्था, वातावरण, धर्म-कर्म, रीति-नीति तथा सामाजिक शिष्टाचार या लोक व्यवहार से ही अपने काव्य के उपकरण चुनता है और उनका प्रतिपादन अपने आदर्शों के अनुरूप करता है। साहित्यकार उसी समाज का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें वह जन्म लेता है। वह अपनी समस्याओं का सुलझाव, अपने आदर्श की स्थापना अपने समाज के आदर्शों के अनुरूप ही करता है। अत: यह कहना सर्वथा असम्भव और अविवेकपूर्ण है कि साहित्यकार समाज से पूर्णत: निरपेक्ष या तटस्थ रहकर साहित्य सृजन करता है। वाल्मीकि, तुलसी, सूर, भारतेन्दु, प्रेमचन्द आदि का साहित्य इस बात का सर्वाधिक सशक्त प्रमाण है कि साहित्यकार समाज से घनिष्ट रूप से सम्बद्ध रखता हुआ ही साहित्य सृजन करता है। समाज की अवहेलना करने वाला साहित्य क्षणजीवी होता है।“

मानव का कला या साहित्य सृजन के प्रति उन्मुख होना उसके इन्द्रिय बोध का परिणाम रहा है। रूप, रस, ग्रन्थ, स्पर्श आदि के इन्द्रियबोध मानव और पशु दोनों में ही विद्यमान हैं, परन्तु मानव में पशु की अपेक्षा अधिक मात्रा में। मानव में एक विशिष्ट गुण और विवेक है। विवेक द्वारा उसने सामाजिक जीवन का विकास और अपने इन्द्रियबोध का परिष्कार किया है। समाज व्यवस्था बदलने के साथ मनुष्य का इन्द्रियबोध विचार और भावों की अपेक्षा स्थायी रहता है। भाव और विचार दोनों ही साहित्य के मूलाधार है और इनका उद्गम और परिष्कार सामाजिक परिवेश में ही सम्भव होता है, समाज से कटकर निरपेक्ष रहने पर नहीं।

Question number: 34 (1 of 8 Based on Passage) Show Passage

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Question

कवि अपने काव्य के उपकरण कहाँ से चुनता है?

Choices

Choice (4) Response

a.

धर्म-कर्म

b.

रीति-नीति

c.

लोक व्यवहार

d.

All a. , b. and c. are correct

Question number: 35 (2 of 8 Based on Passage) Show Passage

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Question

‘इन्द्रियबोध’ में कौनसा समास है?

Choices

Choice (4) Response

a.

अव्ययीभाव

b.

तत्पुरूष

c.

दव्न्दव्

d.

कर्मधारय

Question number: 36 (3 of 8 Based on Passage) Show Passage

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Question

‘उपादेय’ का तात्पर्य हाता है

Choices

Choice (4) Response

a.

ग्रहण करने योग्य

b.

श्रेष्ठ

c.

उत्तम

d.

All a. , b. and c. are correct

Question number: 37 (4 of 8 Based on Passage) Show Passage

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Question

कवि का आदर्श होता है

Choices

Choice (4) Response

a.

उसके समाज के आदर्श के अनुरूप

b.

उसके स्वयं के आदर्श के अनुरूप

c.

उसके परिवार के आदर्श के अनुरूप

d.

All of the above

Passage

‘बिस्मिल्ला खॉ हिन्दू और मुसलमानों की मिली-जुली संस्कृति के प्रतिक थे। एक ओर जहाँ वे सच्चे मुसलमान थे। पाँचों समय की नमाज श्रद्धा के साथ अदा करते थे। दूसरी ओर वे काशी, विश्वनाथ और बाजाली के मंदिर में शहनाई बजाते थे। गंगा के प्रति सच्ची श्रद्धा रखते थे। काशी से बाहर रहते हुए भी बालाजी के मंदिर की ओर मुँह करके प्रणाम किया करते थे। इसलिए वे मिली-जुली संस्कृति के प्रतिक थे।

उन्होंने खुदा से हमेशा ही सुर मांगा। यद्यपि वे जीवन में फटेहाल रहे, लेकिन उन्होंने खुदा से अपने लिए धन नहीं मांगा। ऊँचे-ऊँचे पुरस्कार पाकर भी वे अपने जीवन में सरल ही बने रहे।

Question number: 38 (1 of 3 Based on Passage) Show Passage

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Question

बिस्मिल्ला खॉ कौनसे मंदिर में शहनाई बजाते थे?

Choices

Choice (4) Response

a.

शिव मंदिर

b.

जैन मंदिर

c.

काशी, विश्वनाथ और बालाजी मंदिर

d.

गुरूद्वार में

Question number: 39 (2 of 3 Based on Passage) Show Passage

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Question

बिस्मिल्ला खॉ नमाज के उपरान्त (बाद) सजदे (प्रार्थना) में खुदा से क्या मांगते थे?

Choices

Choice (4) Response

a.

स्वर, सुर

b.

धन

c.

मोती

d.

कपड़े

Question number: 40 (3 of 3 Based on Passage) Show Passage

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Question

बिस्मिल्ला खॉ कौनसी मिली-जुली संस्कृति के प्रतीक थे?

Choices

Choice (4) Response

a.

हिन्दू-मुसलमान

b.

सिख-ईसाई

c.

मुसलमान-सिख

d.

ईसाई-हिन्दू

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