Reading Comprehension-Prose or Drama (CTET Paper-I Hindi): Questions 16 - 24 of 161

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Passage

भाषा के उद्योग को लेकर यह कहना उचित है कि जब तक उसे बोलने व लिखने में सुविधा नहीं होती, तब तक उसने विकास की सम्भावना अवरूद्ध होती है। संस्कृत में इस तरह के अवरोधक हटाने का कार्य पाणिनी ने किया खासकर दर्शन में इस तरह से पुट पाए हैं जो इस बात की पुष्टि करता है। संगीत पर भी यह बात लागू होती है, लेकिन फिर भी ध्यान देने योग्य बात यह है कि शास्त्रीय संगीत कभी जनता द्वारा बड़े पैमाने पर स्वीकृत नहीं होता था। उस समय के व्यक्ति संस्कृत भाषा के अध्ययन करते थे और बोलते भी थे, सम्भवत: बहुत कुछ निम्न वर्ग के व्यक्ति भी इसे समझ लेते होंगे। सम्पूर्ण भारत के लिए संस्कृत राष्ट्र भाषा के रूप में समझी जाती थी और आज भी समानता का परिचय देती नजर आती है। प्राचीन भारत के साहित्य और इतिहास में अनेकों मानव जातियों का संगम हुआ है। प्राक, आर्य, भारतीय आय, यूनानी, शक, हुण और तुर्क आदि अनेक जातियों ने भारत को अपना घर बनाया। प्रत्येक जातियों ने सामाजिक व्यवस्था, शिल्पकला, वास्तुकला और साहित्य के विकास में यथासत्य अपना व्योम दान दिया। ये सभी समुदाय इस तरह भारतीय सम्भावना एवं संस्कृति के आत्मसात् कर लिया कि आज इसे मूल रूप में साथ-साथ भारतीय संस्कृति की विशेषता इसमें उत्तर-दक्षिण तथा पूर्व-पश्चिम के सांस्कृतिक उपादान रूप में समाहित हो गए हैं।

आर्य आतीय उपादान, उत्तर भारत के वैदिक और सांस्कृतिक मूलक, संस्कृति के अंग हैं, जो प्राक, आर्य जातीय उपादान दक्षिण के द्रविड़ व तमिल संस्कृति के इन सभी संस्कृति में उन शब्दों का भी आदान-प्रदान जो मौजूद स्थिति में भिन्न भाषा रूप संस्कृति के रूप में मौजूद है। इसी प्रकार पाली और संस्कृत में बहुत से शब्द जो गंगा के मैदानों में विकसित भावनाओं और समस्याओं के द्योतक हैं, लगभग 300 ई. पूर्व से 600 ई. पूर्व के संगम से प्रसिद्ध प्राचीनतम, तमिल ग्रन्थों से मिलते हैं। इसमें भारत के पूर्वांचल ने भी जहाँ प्राक, आर्य जातियाँ बसी हुई हैं, अपना योगदान दिया है। यहाँ के लोग मुण्डा या कोल भाषा बोलते हैं। यह सभी भी झारखण्ड, बिहार, पश्चिम बंग, ओडिशा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ के आदिवासियों की मुख्य भाषा हैं। भाषा वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध किया है कि आर्य भाषा में फाहा, नौका, सन्ती आदि सूचक शब्द मिलते हैं, जो मुण्डा भाषाओं से लिया है। ब्राह्मण संस्कृति, मुण्डा संस्कृति के साथ घुल-मिल गई। ऐसा माना जाता है कि वैदिक भाषा में जो ध्वन्यात्मक व शब्दात्मक परिवर्तन मिलते हैं उसकी व्याख्या मुण्डा प्रसंग के आधार पर जितनी की जाती है उतनी द्रविड़ प्रभाव के आधार पर नहीं।

Question number: 16 (2 of 9 Based on Passage) Show Passage

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Question

प्रस्तुत गद्यांश में निम्नलिखित में से किसका उल्लेख नहीं है?

Choices

Choice (4) Response

a.

तुर्क

b.

शक

c.

मंगोल

d.

हुण

Question number: 17 (3 of 9 Based on Passage) Show Passage

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Question

‘यथासत्य’ में कौनसा समास है?

Choices

Choice (4) Response

a.

अव्ययीभाव

b.

तत्पुरूष

c.

दव्न्दव्

d.

कर्मधारय

Question number: 18 (4 of 9 Based on Passage) Show Passage

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Question

निम्नलिखित में से कौनसा शब्द आर्य भाषा के साथ-साथ मुख्य भाषाओं में भी है?

Choices

Choice (4) Response

a.

फाहा

b.

नौका

c.

सन्ती

d.

All a. , b. and c. are correct

Question number: 19 (5 of 9 Based on Passage) Show Passage

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Question

भाषा के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौनसा कथन सत्य है?

Choices

Choice (4) Response

a.

बोलने व लिखने में सुविधाजनक भाषा के विकास की सम्भावना अधिक होती है।

b.

संस्कृत भाषा के विकास में पाणिनी का अहम् योगदान रहा है।

c.

प्राचीन काल में भारत में संस्कृत भाषा बोली व समझी जाती थी।

d.

All a. , b. and c. are correct

Question number: 20 (6 of 9 Based on Passage) Show Passage

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Question

प्रस्तुत गद्यांश में निम्नलिखित में से किस राज्य का उल्लेख नहीं है?

Choices

Choice (4) Response

a.

मध्य प्रदेश

b.

छत्तीसगढ़

c.

तमिलनाडु

d.

ओडिशा

Question number: 21 (7 of 9 Based on Passage) Show Passage

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Question

निम्नलिखित में से कौनसी आर्य भाषा है?

Choices

Choice (4) Response

a.

मुण्डा

b.

कोल

c.

तमिल

d.

संस्कृत

Question number: 22 (8 of 9 Based on Passage) Show Passage

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Question

‘प्राचीन’ का विपरीतार्थक शब्द है?

Choices

Choice (4) Response

a.

आधुनिक

b.

स्थिर

c.

नया

d.

बेहतर

Passage

एक दिन तने ने भी कहा था, जड़?

जड़ तो जड़ ही है; जीवन से सदा डरी रही है

और यही है उसका सारा इतिहास

कि जमीन में मुँह गड़ा पड़ी रही है

लेकिन मैं जमीन से ऊपर उठा

बाहर निकला, बढ़ा हूँ, मजबूत बना हूँ, इसी से तो तना हूँ

एक दिन डालों ने भी कहा था, तना?

किस बात पर है तनात्र

जहाँ बिठाल दिया था वहीं पर है बना

प्रगतिशील जगती में तिल भर नहीं डोला है

खाना है, मोटापा है, सहलाया चोला है

लेकिन हम तने से फूटीं, दिशा-दिशा में गई

ऊपर उठीं, नीचे आईं, हर हवा के लिए दोल बनी, लहराई

इसी से तो डाल कहलाई।

Question number: 23 (1 of 1 Based on Passage) Show Passage

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Question

प्रगतिशील में प्रयुक्त प्रत्यय है

Choices

Choice (4) Response

a.

ईल

b.

c.

प्र

d.

शील

Passage

प्राचीन भारत में शिक्षा ज्ञान प्राप्ति का सबसे बड़ा स्रोत माना जाता था। व्यक्ति के जीवन को संतुलित और श्रेष्ठ बनाने तथा एक नई दिशा प्रदान करने में शिक्षा का महत्वपूर्ण योगदान था। सामाजिक बुराइयों को उसकी जड़ों से निर्मूल करने और त्रुटिपूर्ण जीवन में सुधार करने के लिए शिक्षा की नितान्त आवश्यकता थी। यह एक ऐसी व्यवस्था थी, जिसके द्वारा सम्पूर्ण जीवन ही परिवर्तित किया जा सकता था। व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व का विकास करने, वास्तविक ज्ञान को प्राप्त करने और समस्याओं को दूर करने के लिए शिक्षा पर निर्भर होना पड़ता था। आधुनिक युग की भाँति प्राचीन भारत में भी मनुष्य के चरित्र का उत्थान शिक्षा से ही सम्भव था। सामाजिक उत्तरदायित्वों को निष्ठापूर्वक वहन करना प्रत्येक मानव का उल्लेखनीय योगदान रहता है। भारतीय मनीषियों ने इस ओर अपना ध्यान केन्द्रित करके शिक्षा को समाज की आधारशिला के रूप में स्वीकार किया। विद्या का स्थान किसी भी वस्तु से बहुत ऊँचा बताया गया। प्रखर बुद्धि एवं सही विवेक के लिए शिक्षा की उपयोगिता को स्वीकार किया गया। यह माना गया कि शिक्षा ही मनुष्य को व्यावहारिक कर्तव्यों का पाठ पढ़ाने और सफल नागरिक बनाने में सक्षम है। इसके माध्यम से व्यक्ति का शारीरिक, मानसिक और आत्मिक अर्थात् सर्वांगीण विकास सम्भव है। शिक्षा ने ही प्राचीन संस्कृति को संरक्षण दिया और इसके प्रसार में मदद की।

विद्याल का आरम्भ उपनयन संस्कार द्वारा होता था। उपनयन संस्कार के महत्व पर प्रकाश डालते हुए मनुस्मृति में उल्लेख मिलता है कि गर्भाधान संस्कार द्वारा तो व्यक्ति का शरीर उत्पन्न होता है पर उपनयन संस्कार द्वारा उसका आध्यात्मिक जन्म होता है। प्राचीन काल में बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए आचार्य के पास भेजा जाताथा। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार, जो ब्रह्मचर्य ग्रहण करता है। वह लम्बी अवधि की यज्ञावधि ग्रहण करता है। छान्दोग्योपनिषद् में उल्लेख मिलता है कि आरूणि ने अपने पुत्र श्वेतकेतु को ब्रह्मचारी रूप में वेदाध्ययन के लिए गुरू के पास जाने को प्रेरित किया था। आचार्य के पास रहते हुए ब्रह्मचारी को तप और साधना का जीवन बिताते हुए विद्याध्ययन में तल्लीन रहना पड़ता था। इस अवस्था में बालक जो ज्ञानार्जन करता था उसका लाभ उसको जीवन भर मिलता था। गुरू गृह में निवास करते हुए विद्यार्थी समाज के निकट सम्पर्क में आता था। गुरू के लिए समिधा, जल का ालना तथा गृह कार्य करना उसका कर्तव्य माना जाता था। गृहस्थ धर्म की शिक्षा केसाथ-साथ वह श्रम और सेवा का पाठ पढ़ता था। शिक्षा केवल सैद्धान्तिक और पुस्तकीय न होकर जीवन की वास्तविकताओं के निकट होती थी।

Question number: 24 (1 of 9 Based on Passage) Show Passage

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Question

प्राचीन काल में विद्यार्थियों के कर्तव्य निम्नलिखित में से कौनसे थे?

A. ब्रह्मचर्य

B. गुरू के साथ रहना

C. गुरू की सेवा करना

D. गृहस्थ जीवन व्यतीत करना

Choices

Choice (4) Response

a.

A एवं B

b.

A, B एवं C

c.

C एवं D

d.

B, C एवं D

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