Reading Comprehension-Prose or Drama (CTET Paper-I Hindi): Questions 116 - 122 of 161

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Passage

पत्र-पत्रिकाएँ मानव समाज की दिशा-निर्देशिका मानी जाती हैं। समाज के भीतर घटती घटनाओं से लेकर परिवेश की समझ उत्पन्न करने का कार्य पत्रकारिता का प्रथम व महत्वपूर्ण कर्तव्य है। राजनीतिक-सामाजिक चिन्तन की समझ पैदा करने के साथ विचार की सामर्थ्य पत्रकारिता के माध्यम से ही उत्पन्न होती है। पत्रकारिता ने युगों से अपने इस दायित्व का निर्वाह किया तथा दायित्व निर्वहन की समस्त कसौटियों को पूर्ण करते हुए समय-समय पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज की। यह अध्ययन करना अपने-आपमें अत्यन्त रोचक है कि पत्रकारिता की यह यात्रा कब और कैसे आरम्भ हुई और किन पड़ावों से गुजरकर राष्ट्रीयता के मिशन से व्यावसायिकता तक की यात्रा को उसने सम्पन्न किया। आजादी से पूर्व का युग राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय चेतना की अनुभूति के विकास का युग था। इस युग का मिशन और जीवन का उद्देश्य एक ही था - स्वाधीनता की चाह और प्राप्ति का प्रयास। इस प्रयास के तहत ही हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं का आरम्भ हुआ। इस संदर्भ में इस तथ्य को भी ध्यान में रखना होगा कि हिन्दी क्षेत्रों के बाहर भी विशेषकर हिन्दीतर भाषी क्षेत्रों को राष्ट्रीय अस्मिता का वाहक मानकर सभी पत्रकारों ने हिन्दी को ही अपनी ‘भाषा’ के रूप में चुना और हिन्दी भाषा के पत्र-पत्रिकाओं के संवर्द्धन में अपना योगदान दिया।

Question number: 116 (8 of 9 Based on Passage) Show Passage

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Question

पत्रकारिता का प्रथम कर्तव्य क्या है?

Choices

Choice (4) Response

a.

समाज की घटनाओं से अवगत कराना

b.

समाज में अपना वर्चस्व स्थापित करना

c.

अपने व्यवसाय को आगे बढ़ाना

d.

निर्धन लोगों की सहायता करना

Passage

भारतीय साहित्य भारतीय संस्कृति के आधार पर विकसित हुआ है। इस संस्कृति में भारतीयता के बीच समाहित है। जब कभी भी भारतीय अपनी पहचान का व्याख्यान करने को उत्सुक होता है, उसे अपने जोड़ से जोड़कर देखना चाहता है। यह केवल भारत व भारतीय के लिए ही आवश्यक नहीं है, बल्कि किसी भी देश के प्रान्त से जुड़ा हुआ मसला है। अपने को अन्य से जोड़कर तर्क दिए जाते हैं। उसे अपनी जड़ से जोड़कर ही देखते हैं। वर्तमान में भारतीय संस्कृति व सभ्यता के बीच उपजे हुए विषय वस्तु को ही आधार बनाकर अपनी पहचान को जोड़ते हैं, जिसके कारण दक्षिण भारतीय या उत्तर सभी भारतीय संस्कृति के टूटी कडियों से जोड़क अपने आपको अलग स्थापित करते हैं। इसका परिणाम भारतीय स्तर पर विखण्डन के रूप में भी देखने को मिलता है। इस परिणाम के तहत भाषा व संस्कृति के आधार पर विभिन्न प्रान्तों का निर्माण भी सम्भव हो गया। यदि यही विखण्डित समाज भारतीय संस्कृति के मूल से जोड़कर अपने को देखता होता तो भाषायी एकता भी बनती और क्षेत्रवाद का काला धुंआ, जो भारतीय आकाश पर मण्डरा रहा है, उसके उत्पत्ति ही सम्भव नहीं हो पाती। इस संदर्भ में भारतीयता व उसके समीप उपजे साहित्य को सीमाओं में जांचना जरूरी है। इसकी प्रकृति की खोज और इसके परिणामों की व्याख्या भारतीय साहित्य व भारतीयता के संदर्भ में खोजने होंगे।

भारतीयता के संदर्भ में साहित्य और समाज के संबंधों को समझना आवश्यक है। साहित्य का जन्म समाज में ही सम्भव हो सकता है, इसलिए मानवीय संवेदनाओं को हम उनकी अभिव्यक्ति के माध्यम से समझ सकते हैं। यह अभिव्यक्ति समाज और काल में अलग-अलग रूपों में प्रकट हुई है। यदि हम पाषाण काल के खण्डों और उसके वन में ही रहने वालों की स्थिति को देखें, तो उनके विचार शब्दों में नहीं बल्कि रेखाचित्रों में देखने को मिलते हैं। कई गुफाओं में इन समाजों की अभिव्यक्ति को पत्थर पर खुदे निशानों में देख सकते हैं। इन रूपों में उनके जन-जीवन में घटने वाली घटनाओं को प्रदर्शित करते नजर आते हैं। उनमें शिकार करते आदिमानव को देख सकते हैं जो जीवन यापन के साधन हों। उन चित्रों में हल चलाने वाले किसानों की अभिव्यक्ति नहीं मिलती। इससे इस बात की पुष्टि होती है कि वह समाज वनाचरण व्यवस्था में ही सिमटी या उनका जीवन यापन शिकार पर ही केन्द्रित या सभ्यता के विकास की गाथा उसके जीवन में नहीं गाई जा रही थी। लेकिन समय की पहली धारा में जो प्रभाव देखे जाते है, वह सभ्यता के रूप में गिरे पड़े टूटे-फूटे प्राप्त ऐतिहासिक खोज में देख सकते हैं।

Question number: 117 (6 of 9 Based on Passage) Show Passage

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Question

भारतीय अपनी पहचान के व्याख्यान के लिए क्या करता है?

Choices

Choice (4) Response

a.

अपनी संस्कृति की अवहेलना करता है

b.

अपने समाज की अवहेलना करता है

c.

साहित्य को स्वयं से जोड़कर देखता है

d.

Question does not provide sufficient data or is vague

Question number: 118 (7 of 9 Based on Passage) Show Passage

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Question

भारतीयता को समझने के लिए निम्नलिखित में से किसे समझना आवश्यक है?

Choices

Choice (4) Response

a.

भारतीय साहित्य को

b.

भारतीय साहित्य और समाज के संबंधों को

c.

भारतीय समाज को

d.

None of the above

Question number: 119 (8 of 9 Based on Passage) Show Passage

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Question

यदि उत्तर भारतीय एवं दक्षिण भारतीय संस्कृति को अलग कर नहीं देखा जाता, तो इसका क्या लाभ होता?

Choices

Choice (4) Response

a.

न क्षेत्रवाद पनपता और न ही भाषावाद

b.

भारतीय साहित्य का विकास नहीं होता

c.

दक्षिण भारतीय साहित्य का विकास होता

d.

None of the above

Passage

भारत प्राचीन काल से ही विविध धर्मों का प्रांगण रहा है। प्राचीन भारत में हिन्दू, जैन, बौद्ध, धर्मों का उदय हुआ है परन्तु इन सभी धर्मों में सांस्कृतिक पारस्परिक समिश्र इस प्रकार हुआ कि लोग भले ही विभिन्न भाषाएँ बोलते हैं, विभिन्न धर्मों को मानते हैं फिर भी भिन्न सामाजिक रीतियों पर समूचे देश में सभी की एक समान जीवन पद्धति है। हमारे देश में विविधताओं के बावजूद भीतर से गहरी एकता, हिमालय से कन्याकुमारी पूर्व में ब्रह्मपुत्र की घाटी से पश्चिम में सिन्धु पार तक झलकती है। देश में भाषात्मक एवं सांस्कृतिक एकता स्थापित करने के लिए निरन्तर प्रयास होते हैं। ईसा पूर्व तीसरी सदी में प्राकृत देश भर की सम्पर्क भाषा (लिंगवाँ का) का काम करती थी। सारे देश के प्रमुख कार्यों में अशोक के शिलालेख प्राकृत व ब्रह्मी लिपि में लिखे गये थे। बाद में वह स्थान संस्कृत ने ले लिया और देश के कोने-कोने में राजभाषा के रूप में प्रचलित रही। यह सिलसिला ईसा की चौथी शताब्दी में आकर मजबूत हुआ। यद्यपि इसके बाद देश छोटे-छोटे राज्यों में बंट गया। फिर भी राजकीय दस्तावेज की भाषा संस्कृत ही रहीं। प्राचीन भारत के लोगों की लिपि का ज्ञान 2500 ई. पूर्व तक ही था जिसको हड़प्पा व मोहनजोदड़ों के सभ्यता में सिक्कों पर अंकित पाते हैं। यद्यपि अभी तक इस लिपि को पढ़ना सम्भव नहीं हो पाया है। हस्तलिपियों के मामले में उपलब्ध हस्तलिपियाँ ईसा की चौथी सदी से पहले की नहीं है। भारत में हस्तलिपियाँ भोज पत्र एवं ताम्र पत्रों पर लिखी मिलती है। परन्तु मध्य एशिया में जहाँ भारत से प्राकृत भाषा फैल गई थी। ये हस्तलिपियाँ मेष चर्म, कष्ठि पत्रों में लिखी गई हैं, संस्कृत में पुराणों, हस्तलिपियाँ लिखित दक्षिण-भारत तथा नेपाल से प्राप्त हुई हैं।

Question number: 120 (9 of 9 Based on Passage) Show Passage

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MCQ▾

Question

भारत में हस्तलिपियाँ किन पर लिखीि मिलती है?

Choices

Choice (4) Response

a.

मेषचर्म

b.

कष्ठि पत्र

c.

भोज पत्र

d.

All of the above

Passage

बौद्ध शिक्षण पद्धति का आरम्भ स्वयं बुद्ध ने सरल तथा जनमानस की भाषा में तीवन के तत्वों के उपदेश तथा जगह-जगह चर्चा करके की। लोगों को शिक्षित करने के लिए महात्मा बुद्ध ने व्याख्यान, प्रश्नोत्तर प्रासंगिक उपमा, दृष्टान्त एवं कथा को माध्यम बनाया। बुद्ध के बाद से बौद्ध शिक्षा पद्धति भी एक निश्चित स्वरूप, संगठन के साथ हिन्दू शिक्षा पद्धति से अलग स्वतंत्र शिक्षा प; ति के रूप में विकसित हुई। प्रारम्भ में हिन्दू तथा बौद्ध शिक्षा पद्धति के मूल में कोई विशेष अन्तर नहीं था किन्तु बाद में आकर दोनों शिक्षा प्रणालियों के आदर्श एवं पद्धति में विशेष रूप से उस पाठ्यक्रम में जो विशेष रूप से आम उपासक की बजाय बौद्ध भिक्षु-भिक्षुणियों के लिए था, बहुत कम समानता रह गई थी।

बौद्ध धर्म में शिक्षा प्रारम्भ संस्कार ब्राह्मणों के उपनयन संस्कार की भाँति होता था। बौद्ध संघ में सम्मिलित होने के लिए दो संस्कार आवश्यक थे प्रथम था ‘पब्बज्जा’ तथा दूसरा ‘उपसम्पदा’। पब्बज्जा से उपासकत्व का प्रारम्भ होता था। उपनयन की भाँति इसे भी आध्यात्मिक जन्म कहा गया है। यह 8 वर्ष से अधिक आयु के किसी भी व्यक्ति को दी जा सकती थी। संरक्षक की अनुज्ञा इसके लिए आवश्यक थी। व्यक्ति को तीन प्रकार की शरण की शपथ एवं दस धर्मादेश दिए जाते थे। ये शरण बुद्ध धर्म एवं संघ की होती थी।

दस धर्मादेशों में निम्न की मनाही थी

1. पारिवारिक जीवन

2. ऐसी वस्तु ग्रहण करना जो दी ना हो

3. अशुद्ध आचरण

4. झूठ बोलना

5. मादक द्रव्यों का सेवन

6. असमय भोजन

7. नृत्य गायन

8. पुष्प माला, ईत्र गहने आदि का प्रयोग

9. उच्च आसन का प्रयोग

10. सोना एवं चांदी की प्राप्ति।

Question number: 121 (7 of 8 Based on Passage) Show Passage

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Question

बौद्ध शिक्षा पद्धति में किसे आध्यात्मिक जन्म माना जाता था?

Choices

Choice (4) Response

a.

पब्बज्जा

b.

उपसम्पदा

c.

ब्रह्मचर्य

d.

Question does not provide sufficient data or is vague

Passage

विद्यालय समाज की एक ऐसी संस्था है, जिसके कुछ सुनिश्चित एवं सुनिर्धारित लक्ष्य होते हैं जबकि समुदाय का तात्पर्य ऐसे समूह से है जिसमें एक प्रकार के लोग होते हैं। एह एकत्व आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक या नागरिक गुणों में हो सकता है। कई समुदाय अपने लिए अलग विद्यालय की स्थापना भी कर लेते है। अपनी औपचारिक भूमिकाओं के अलावा अन्य भूमिकाओं के निर्वहन में भी विद्यालय समुदाय की सहायता करता है। इसके लिए आवश्यकता पड़ने पर समुदाय के क्रिया-कलापों वह हस्तक्षेप भी करता है। उदाहरण स्वरूप प्रौढ़ शिक्षा, स्त्री शिक्षा, स्वास्थ्य संबंधी जानकारियों को अभिभावकों तक पहुंचाने में भी विद्यालय यथासम्भव समुदाय की सहायता करता है एवं आवश्यकता पड़ने पर हस्तक्षेप भी करता है।

अभिभावक एवं विद्यालय एक-दूसरे के सम्पर्क में रहते हैं। अभिभावक समुदाय की आवश्यकताओं से परिचित होते हैं तथा विद्यालय को भ्ज्ञी इनसे अवगत कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाकर बीच की व्यवहार्य कड़ी का काम करते हैं। उदाहरण स्वरूप समुदाय की आवश्यकताओं के अनुरूप अभिभावकगण प्रौढ़ शिक्षा, स्त्री शिक्षा इत्यादि में सहायता के लिए विद्यालय से अनुरोध करते है। इस तरह वे विद्यालय एवं समुदाय के बीच ही व्यवहार्य कड़ी हैं। समुदाय के साथ निकट से जुड़कर कार्य करने की स्थिति में विद्यालय अधिक प्रभावशाली हो जाता है।

समुदाय और विद्यालय को जोड़ने में समाज के लोगों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। समुदाय के क्रिया-कलापों में विद्यालय की भागीदारी होती है। यही कारण है कि विद्यालय के लिए पाठ्यवस्तु इतना लचीला बनाया जाता है कि उसमें समाज के विभिन्न समुदायों की विशेषताएँ स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है। पर्यावरण को स्वच्छ रखने की शिक्षा देने के लिए आवश्यक है कि विद्यालय परिसर को स्वच्छ रखा जाए। जल संरक्षण की शिक्षा देने के लिए आवश्यक है कि विद्यालय परिसर में भी इनके संरक्षण के नियमों का पालन होता हो। इस तरह समुदाय की वास्तविकताओं को प्रायोगिक रूप से विद्यालय परिसर में प्रयोग कर उसे अधिगम अनुभवों में रूपान्तरित किया जा सकता है।

Question number: 122 (7 of 9 Based on Passage) Show Passage

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Question

रूपान्तरित का सन्धि विच्छेद है

Choices

Choice (4) Response

a.

रूप + अन्तरित

b.

रूप + आन्तरित

c.

रूपा + अन्तरित

d.

रूपा + आन्तरित

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