Reading Comprehension (CTET (Central Teacher Eligibility Test) Paper-I Hindi): Questions 56 - 63 of 255

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Passage

अन्धकार की गुहा सरीखी उन आँखों से डरता है मन

भरा दूर तक उनमें दारूण दैन्य दु: ख का नीरव रोदन।

वह स्वाधीन किसान रहा, अभिमान भरा आँखों में इसका

छोड़ उसे मँझधार आज संसार कगार सदृश वह खिसका।

लहराते वे खेत दृगों में हुआ बेदखल वह अब जिन से

हँसती भी उसके जीवन की हरियाली जिनके तृन-तृन से।

आँखों ही में घूमा करता वह उसकी आँखों का तारा

कारकुनों की लाठी से जो गया जवानी ही में मारा।

बिना दावादर्पन के घरनी स्वरग चली - आँखे आती भर

देख-रेख के बिना दुधमुँही बिटिया दो दिन बाद गई मर।

Question number: 56 (5 of 6 Based on Passage) Show Passage

» Reading Comprehension » Poetry

MCQ▾

Question

इस पद्यांश के लिए उपयुक्त शीर्षक लिखिए

Choices

Choice (4) Response

a.

किसान की पीड़ा

b.

दारूण दु: ख

c.

जीवन का अन्धकार

d.

वे आँखें

Passage

साहित्य को समाज का प्रतिबिम्ब माना गया है अर्थात् समाज का पूर्ण रूप साहित्य में प्रतिबिम्बित होता रहता है। अनादि काल से साहित्य अपने इसी धर्म का पूर्ण निर्वाह करता चला आ रहा है। वह समाज के विभिन्न रूपों का चित्रण कर एक तरफ तो हमारे सामने समाज का यथार्थ चित्र प्रस्तुत करता है और दूसरी ओर अपनी प्रखर मेधा और स्वस्थ कल्पना द्वारा समाज के विभिन्न पहलुओं का विवेचन करता हुआ यह भी बताता है कि मानव समाज की सुख समृद्धि, सुरक्षा और विकास के लिए कौनसा मार्ग उपादेय है। एक आलोचक के शब्दों में - “कवि वास्तव में समाज की व्यवस्था, वातावरण, धर्म-कर्म, रीति-नीति तथा सामाजिक शिष्टाचार या लोक व्यवहार से ही अपने काव्य के उपकरण चुनता है और उनका प्रतिपादन अपने आदर्शों के अनुरूप करता है। साहित्यकार उसी समाज का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें वह जन्म लेता है। वह अपनी समस्याओं का सुलझाव, अपने आदर्श की स्थापना अपने समाज के आदर्शों के अनुरूप ही करता है। अत: यह कहना सर्वथा असम्भव और अविवेकपूर्ण है कि साहित्यकार समाज से पूर्णत: निरपेक्ष या तटस्थ रहकर साहित्य सृजन करता है। वाल्मीकि, तुलसी, सूर, भारतेन्दु, प्रेमचन्द आदि का साहित्य इस बात का सर्वाधिक सशक्त प्रमाण है कि साहित्यकार समाज से घनिष्ट रूप से सम्बद्ध रखता हुआ ही साहित्य सृजन करता है। समाज की अवहेलना करने वाला साहित्य क्षणजीवी होता है।”

मानव का कला या साहित्य सृजन के प्रति उन्मुख होना उसके इन्द्रिय बोध का परिणाम रहा है। रूप, रस, ग्रन्थ, स्पर्श आदि के इन्द्रियबोध मानव और पशु दोनों में ही विद्यमान हैं, परन्तु मानव में पशु की अपेक्षा अधिक मात्रा में। मानव में एक विशिष्ट गुण और विवेक है। विवेक द्वारा उसने सामाजिक जीवन का विकास और अपने इन्द्रियबोध का परिष्कार किया है। समाज व्यवस्था बदलने के साथ मनुष्य का इन्द्रियबोध विचार और भावों की अपेक्षा स्थायी रहता है। भाव और विचार दोनों ही साहित्य के मूलाधार है और इनका उद्गम और परिष्कार सामाजिक परिवेश में ही सम्भव होता है, समाज से कटकर निरपेक्ष रहने पर नहीं।

Question number: 57 (1 of 9 Based on Passage) Show Passage

» Reading Comprehension » Prose or Drama

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Question

कवि अपने काव्य के उपकरण कहाँ से चुनता है?

Choices

Choice (4) Response

a.

रीति-नीति

b.

लोक व्यवहार

c.

धर्म-कर्म

d.

All a. , b. and c. are correct

Question number: 58 (2 of 9 Based on Passage) Show Passage

» Reading Comprehension » Prose or Drama

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Question

मानव में इन्द्रियबोध का परिणाम है

Choices

Choice (4) Response

a.

साहित्य सृजन

b.

कला सृजन

c.

Both a. and b. are correct

d.

Question does not provide sufficient data or is vague

Question number: 59 (3 of 9 Based on Passage) Show Passage

» Reading Comprehension » Prose or Drama

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Question

‘उपादेय’ का तात्पर्य हाता है

Choices

Choice (4) Response

a.

उत्तम

b.

श्रेष्ठ

c.

ग्रहण करने योग्य

d.

All a. , b. and c. are correct

Question number: 60 (4 of 9 Based on Passage) Show Passage

» Reading Comprehension » Prose or Drama

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Question

अनादिकाल से साहित्य अपने किस धर्म का निर्वहन करता आ रहा है?

Choices

Choice (4) Response

a.

अपने प्रभुत्व बनाए रखने का

b.

यूएनडीपी से सहयोग लेना

c.

निर्धन लोगों की सहायता करना

d.

समाज के पूर्ण रूप को प्रतिबिम्बित करने का

Question number: 61 (5 of 9 Based on Passage) Show Passage

» Reading Comprehension » Prose or Drama

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Question

साहित्य हमें क्या बताता है?

Choices

Choice (4) Response

a.

सामाजिक वर्चस्व करने के लिए क्या करना चाहिए

b.

मानव समाज की सुख समृद्धि, सुरक्षा और विकास के लिए कौनसा मार्ग उपादेय है

c.

समाज व्यवस्था को बदलते रहना चाहिए

d.

Question does not provide sufficient data or is vague

Passage

उपयुक्त उस खल को न यद्यपि मृत्यु का भी दण्ड है,

पर मृत्यु से बढ़कर न जग में दण्ड और प्रचण्ड है।

अतएव कल उस नीच को रण-मध्य जो मारूँ न मैं,

तो सत्य कहता हूँ कभी शस्त्रास्त्र फिर धारूँ न मैं।

अथवा अधिक कहना वृधा हैं, पार्थ का प्रण है यही,

साक्षी रहे सुन ये बचन रवि, शशि, अनल, अम्बर, मही।

सूर्यास्त से पहले न जो मैं कल जयद्रथ-वधकरूँ,

तो शपथ करता हूँ स्वयं मैं ही अनल में जल मरूँ।

Question number: 62 (1 of 6 Based on Passage) Show Passage

» Reading Comprehension » Poetry

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Question

संसार में सबसे बड़ा दण्ड है

Choices

Choice (4) Response

a.

मृत्युदण्ड

b.

अग्निदण्ड

c.

अर्थदण्ड

d.

All of the above

Question number: 63 (2 of 6 Based on Passage) Show Passage

» Reading Comprehension » Poetry

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Question

पार्थ की क्या प्रतिज्ञा है?

Choices

Choice (4) Response

a.

आग में जलकर मरने की

b.

दुष्ट को मारने की

c.

अस्त्र-शस्त्र धारण न करने की

d.

जयद्रथ वध करने की

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