CTET Paper-I Hindi: Questions 449 - 456 of 497

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Passage

भारतीय साहित्य भारतीय संस्कृति के आधार पर विकसित हुआ है। इस संस्कृति में भारतीयता के बीच समाहित है। जब कभी भी भारतीय अपनी पहचान का व्याख्यान करने को उत्सुक होता है, उसे अपने जोड़ से जोड़कर देखना चाहता है। यह केवल भारत व भारतीय के लिए ही आवश्यक नहीं है, बल्कि किसी भी देश के प्रान्त से जुड़ा हुआ मसला है। अपने को अन्य से जोड़कर तर्क दिए जाते हैं। उसे अपनी जड़ से जोड़कर ही देखते हैं। वर्तमान में भारतीय संस्कृति व सभ्यता के बीच उपजे हुए विषय वस्तु को ही आधार बनाकर अपनी पहचान को जोड़ते हैं, जिसके कारण दक्षिण भारतीय या उत्तर सभी भारतीय संस्कृति के टूटी कडियों से जोड़क अपने आपको अलग स्थापित करते हैं। इसका परिणाम भारतीय स्तर पर विखण्डन के रूप में भी देखने को मिलता है। इस परिणाम के तहत भाषा व संस्कृति के आधार पर विभिन्न प्रान्तों का निर्माण भी सम्भव हो गया। यदि यही विखण्डित समाज भारतीय संस्कृति के मूल से जोड़कर अपने को देखता होता तो भाषायी एकता भी बनती और क्षेत्रवाद का काला धुंआ, जो भारतीय आकाश पर मण्डरा रहा है, उसके उत्पत्ति ही सम्भव नहीं हो पाती। इस संदर्भ में भारतीयता व उसके समीप उपजे साहित्य को सीमाओं में जांचना जरूरी है। इसकी प्रकृति की खोज और इसके परिणामों की व्याख्या भारतीय साहित्य व भारतीयता के संदर्भ में खोजने होंगे।

भारतीयता के संदर्भ में साहित्य और समाज के संबंधों को समझना आवश्यक है। साहित्य का जन्म समाज में ही सम्भव हो सकता है, इसलिए मानवीय संवेदनाओं को हम उनकी अभिव्यक्ति के माध्यम से समझ सकते हैं। यह अभिव्यक्ति समाज और काल में अलग-अलग रूपों में प्रकट हुई है। यदि हम पाषाण काल के खण्डों और उसके वन में ही रहने वालों की स्थिति को देखें, तो उनके विचार शब्दों में नहीं बल्कि रेखाचित्रों में देखने को मिलते हैं। कई गुफाओं में इन समाजों की अभिव्यक्ति को पत्थर पर खुदे निशानों में देख सकते हैं। इन रूपों में उनके जन-जीवन में घटने वाली घटनाओं को प्रदर्शित करते नजर आते हैं। उनमें शिकार करते आदिमानव को देख सकते हैं जो जीवन यापन के साधन हों। उन चित्रों में हल चलाने वाले किसानों की अभिव्यक्ति नहीं मिलती। इससे इस बात की पुष्टि होती है कि वह समाज वनाचरण व्यवस्था में ही सिमटी या उनका जीवन यापन शिकार पर ही केन्द्रित या सभ्यता के विकास की गाथा उसके जीवन में नहीं गाई जा रही थी। लेकिन समय की पहली धारा में जो प्रभाव देखे जाते है, वह सभ्यता के रूप में गिरे पड़े टूटे-फूटे प्राप्त ऐतिहासिक खोज में देख सकते हैं।

Question number: 449 (9 of 9 Based on Passage) Show Passage

» Reading Comprehension » Prose or Drama

MCQ▾

Question

भारतीयता को समझने के लिए निम्नलिखित में से किसे समझना आवश्यक है?

Choices

Choice (4) Response

a.

भारतीय साहित्य को

b.

भारतीय साहित्य और समाज के संबंधों को

c.

भारतीय समाज को

d.

None of the above

Passage

नन्हीं-सी नदी हमारी टेढ़ी-मेढ़ी धार,

गर्मियों में घुटने भर भिगो कर जाते पार।

पार जाते ढोर-डँगर बैलगाड़ी चालू,

ऊँचे है किनारे इसके, पाट इसका ढालू।

पेटे में झकाझक बालू कीचड़ का न नाम,

काँस फूले एक पार उजले जैसे घाम।

दिन भर किचपिच-किचपिच करती मैना डार-डार,

रातों को हुआँ-हुआँ कर उठते सियार।

रविन्द्रनाथ ठाकुर

Question number: 450 (6 of 6 Based on Passage) Show Passage

» Reading Comprehension » Poetry

MCQ▾

Question

कवि ने ‘काँस’ की तुलना किससे की है?

Choices

Choice (4) Response

a.

पानी

b.

नदी

c.

धूप

d.

रेत

Passage

विद्यालय समाज की एक ऐसी संस्था है, जिसके कुछ सुनिश्चित एवं सुनिर्धारित लक्ष्य होते हैं जबकि समुदाय का तात्पर्य ऐसे समूह से है जिसमें एक प्रकार के लोग होते हैं। एह एकत्व आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक या नागरिक गुणों में हो सकता है। कई समुदाय अपने लिए अलग विद्यालय की स्थापना भी कर लेते है। अपनी औपचारिक भूमिकाओं के अलावा अन्य भूमिकाओं के निर्वहन में भी विद्यालय समुदाय की सहायता करता है। इसके लिए आवश्यकता पड़ने पर समुदाय के क्रिया-कलापों वह हस्तक्षेप भी करता है। उदाहरण स्वरूप प्रौढ़ शिक्षा, स्त्री शिक्षा, स्वास्थ्य संबंधी जानकारियों को अभिभावकों तक पहुंचाने में भी विद्यालय यथासम्भव समुदाय की सहायता करता है एवं आवश्यकता पड़ने पर हस्तक्षेप भी करता है।

अभिभावक एवं विद्यालय एक-दूसरे के सम्पर्क में रहते हैं। अभिभावक समुदाय की आवश्यकताओं से परिचित होते हैं तथा विद्यालय को भ्ज्ञी इनसे अवगत कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाकर बीच की व्यवहार्य कड़ी का काम करते हैं। उदाहरण स्वरूप समुदाय की आवश्यकताओं के अनुरूप अभिभावकगण प्रौढ़ शिक्षा, स्त्री शिक्षा इत्यादि में सहायता के लिए विद्यालय से अनुरोध करते है। इस तरह वे विद्यालय एवं समुदाय के बीच ही व्यवहार्य कड़ी हैं। समुदाय के साथ निकट से जुड़कर कार्य करने की स्थिति में विद्यालय अधिक प्रभावशाली हो जाता है।

समुदाय और विद्यालय को जोड़ने में समाज के लोगों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। समुदाय के क्रिया-कलापों में विद्यालय की भागीदारी होती है। यही कारण है कि विद्यालय के लिए पाठ्यवस्तु इतना लचीला बनाया जाता है कि उसमें समाज के विभिन्न समुदायों की विशेषताएँ स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है। पर्यावरण को स्वच्छ रखने की शिक्षा देने के लिए आवश्यक है कि विद्यालय परिसर को स्वच्छ रखा जाए। जल संरक्षण की शिक्षा देने के लिए आवश्यक है कि विद्यालय परिसर में भी इनके संरक्षण के नियमों का पालन होता हो। इस तरह समुदाय की वास्तविकताओं को प्रायोगिक रूप से विद्यालय परिसर में प्रयोग कर उसे अधिगम अनुभवों में रूपान्तरित किया जा सकता है।

Question number: 451 (8 of 9 Based on Passage) Show Passage

» Reading Comprehension » Prose or Drama

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Question

विद्यालय को समुदाय की आवश्यकता से कौन अवगत कराता है?

Choices

Choice (4) Response

a.

विद्यार्थी

b.

शिक्षक

c.

समुदाय

d.

Question does not provide sufficient data or is vague

Passage

प्रगतिवाद का संबंध जीवन और जगत के प्रति नये दृष्टिकोण से है। इस भौतिक जगत को सम्पूर्ण सत्य मानकर, उसमें रहने वाले मानव समुदाय के मंगल की कामना से प्रेरित होकर प्रगतिवादी साहित्य की रचना की गई है। जीवन के प्रति लौकिक दृष्टि इस साहित्य का आधार है और सामाजिक यथार्थ से उत्पन्न होता है, लेकिन उसे बदलने और बेहतर बनाने की कामना के साथ प्रगतिवादी कवि न तो इतिहास की उपेक्षा करता है, न वर्तमान का अनादर, न ही वह भविष्य के रंगीन सपने बुनता है। इतिहास को वैज्ञानिक दृष्टि से जाँचते-परखते हुए, वह वर्तमान मो समझने की कोशिश करताहै और उसी के आधार पर भविष्य के लिए अपना मार्ग चुनता है। यही कारण है कि प्रगतिवादी काव्य में ऐतिहासिक चेतना अनिवार्यत: विद्यमान रहती है। प्रगतिवादी कवि की दृर्ष्टि सामाजिक यथार्थ पर केन्द्रित रहती है, वह अपने परिवेश और प्रकृति के प्रति गहरे लगाव से प्रेरित होता है तथा जीवन के प्रति उसका दृष्टिकोण सकारात्मक होता है। मानव को वह सर्वोपरि मानता है।

प्रगतिवादी कवि के पास सामाजिक यथार्थ को देखने की दृष्टि होती है। एक वर्ग चेतना प्रधान दृष्टि। नागार्जुन यदि दुखरन झा जैसे प्राइमरी स्कूल के अल्पवेतन भोगी मास्टर का यथार्थ चित्रण करते हैं, जो सामाजिक विषमता के यथार्थ को ध्यान में रखते हुए इस सरल यथार्थ को कविता में व्यक्त करने के लिये यथार्थ रूपों की समझ जरूरी है। कवि का वास्तव बोध और वस्तुपरक निरीक्षण दोनों पर ध्यान जाना चाहिए।

प्रगतिशील चेतना के कवि की दृष्टि सामाजिक यथार्थ के अनेक रूपों की ओर जाती है। कवि सामाजिक विषमता को उजागर करता हुआ कभी अपना विक्षोभ व्यक्त करता है, तो कभी अपना सात्विक क्रोध। कभी वह अन्याय और अत्याचार के विरूद्ध सिंह गर्जना करता है, तो कभी शोषण और दमन के दृश्य देखकर अपना दु: ख व्यक्त करता है।

प्रगतिवादी चेतना के कवि को प्रकृति और परिवेश के प्रति कवि का लगाव भी ध्यान आकृष्ट करता है। प्रगतिवादी कवि प्रकृति में जिस जीवन सक्रियता का आभास पाता है, उसके लिए एक प्रकार का स्थानिक लगाव जरूरी है।

Question number: 452 (8 of 8 Based on Passage) Show Passage

» Reading Comprehension » Prose or Drama

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Question

लेखक क्या कहना चाहता है?

Choices

Choice (4) Response

a.

प्रगतिवादी कवि महान होते हैं|

b.

मनुष्य की प्रगति के लिए प्रगतिशीलता अनिवार्य है|

c.

प्रगतिवादी चेतना के द्वारा सृष्टि का भला कैसे किया जा सकता है|

d.

प्रगतिवाद क्या है और प्रगतिवादी कवि के दृष्टिकोण क्या होते हैं|

Passage

उपयुक्त उस खल को न यद्यपि मृत्यु का भी दण्ड है,

पर मृत्यु से बढ़कर न जग में दण्ड और प्रचण्ड है।

अतएव कल उस नीच को रण-मध्य जो मारूँ न मैं,

तो सत्य कहता हूँ कभी शस्त्रास्त्र फिर धारूँ न मैं।

अथवा अधिक कहना वृधा हैं, पार्थ का प्रण है यही,

साक्षी रहे सुन ये बचन रवि, शशि, अनल, अम्बर, मही।

सूर्यास्त से पहले न जो मैं कल जयद्रथ-वधकरूँ,

तो शपथ करता हूँ स्वयं मैं ही अनल में जल मरूँ।

Question number: 453 (6 of 6 Based on Passage) Show Passage

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Question

पार्थ की क्या प्रतिज्ञा है?

Choices

Choice (4) Response

a.

दुष्ट को मारने की

b.

जयद्रथ वध करने की

c.

अस्त्र-शस्त्र धारण न करने की

d.

आग में जलकर मरने की

Passage

विद्यालय समाज की एक ऐसी संस्था है, जिसके कुछ सुनिश्चित एवं सुनिर्धारित लक्ष्य होते हैं जबकि समुदाय का तात्पर्य ऐसे समूह से है जिसमें एक प्रकार के लोग होते हैं। एह एकत्व आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक या नागरिक गुणों में हो सकता है। कई समुदाय अपने लिए अलग विद्यालय की स्थापना भी कर लेते है। अपनी औपचारिक भूमिकाओं के अलावा अन्य भूमिकाओं के निर्वहन में भी विद्यालय समुदाय की सहायता करता है। इसके लिए आवश्यकता पड़ने पर समुदाय के क्रिया-कलापों वह हस्तक्षेप भी करता है। उदाहरण स्वरूप प्रौढ़ शिक्षा, स्त्री शिक्षा, स्वास्थ्य संबंधी जानकारियों को अभिभावकों तक पहुंचाने में भी विद्यालय यथासम्भव समुदाय की सहायता करता है एवं आवश्यकता पड़ने पर हस्तक्षेप भी करता है।

अभिभावक एवं विद्यालय एक-दूसरे के सम्पर्क में रहते हैं। अभिभावक समुदाय की आवश्यकताओं से परिचित होते हैं तथा विद्यालय को भ्ज्ञी इनसे अवगत कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाकर बीच की व्यवहार्य कड़ी का काम करते हैं। उदाहरण स्वरूप समुदाय की आवश्यकताओं के अनुरूप अभिभावकगण प्रौढ़ शिक्षा, स्त्री शिक्षा इत्यादि में सहायता के लिए विद्यालय से अनुरोध करते है। इस तरह वे विद्यालय एवं समुदाय के बीच ही व्यवहार्य कड़ी हैं। समुदाय के साथ निकट से जुड़कर कार्य करने की स्थिति में विद्यालय अधिक प्रभावशाली हो जाता है।

समुदाय और विद्यालय को जोड़ने में समाज के लोगों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। समुदाय के क्रिया-कलापों में विद्यालय की भागीदारी होती है। यही कारण है कि विद्यालय के लिए पाठ्यवस्तु इतना लचीला बनाया जाता है कि उसमें समाज के विभिन्न समुदायों की विशेषताएँ स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है। पर्यावरण को स्वच्छ रखने की शिक्षा देने के लिए आवश्यक है कि विद्यालय परिसर को स्वच्छ रखा जाए। जल संरक्षण की शिक्षा देने के लिए आवश्यक है कि विद्यालय परिसर में भी इनके संरक्षण के नियमों का पालन होता हो। इस तरह समुदाय की वास्तविकताओं को प्रायोगिक रूप से विद्यालय परिसर में प्रयोग कर उसे अधिगम अनुभवों में रूपान्तरित किया जा सकता है।

Question number: 454 (9 of 9 Based on Passage) Show Passage

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Question

विद्यालय अधिक प्रभावशाली कैसे हो सकता है?

Choices

Choice (4) Response

a.

अपने विद्यार्थियों से जुड़कर

b.

सामाजिक वर्चस्व प्राप्त कर

c.

समुदाय से जुड़कर

d.

राजनीतिक वर्चस्व प्राप्त कर

Passage

‘गोदान’ प्रेमचन्द जी की उन अमर कृतियों में से एक है, जिसमें ग्रामीण भारत की आत्मा का करूण चित्र साकार हो उठा है। इसी कारण कई मनीषी आलोचक इसे ग्रामीण भारतीय परिवेशगत समस्याओं का महाकाव्य मानते हैं तो कई विद्वान इसे ग्रामीण जीवन और कृषि संस्कृति का शोक गीत स्वीकारते हैं। कुछ विद्वान तो ऐसे भी है कि जो इन उपन्यास को ग्रामीण भारण की आधुनिक ‘गीता’ तक स्वीकार करते हैं जो कुछ भी हो, ‘गोदान’ वास्तव में मुंशी प्रेमचन्द का एक ऐसा उपन्यास है, जिसमें आचार-विचार, संस्कार और प्राकृतिक परिवेश, जो गहन करूणा से युक्त है, प्रतिबिम्बित हो उठाा है। डॉ. गोपाल राय का कहना है कि गोदान ग्राम जीवन और ग्राम संस्कृति को उसकी सम्पूर्णता में प्रस्तुत करने वाला अदव्तीय उपन्यास है, न केवल हिन्दी के वरन किसी भी भारतीय भाषा के किसी भी उपन्यास में ग्रामीण समाज का ऐसा व्यापक यथार्थ और सहानुभूतिपूर्ण चित्रण नहीं हुआ है। ग्रामीण जीवन और संस्कृति के अंकन की दृष्टि से इस उपन्यास का वही महत्व है जो आधुनिक युग में युग जीवन की अभिव्यक्ति की दृष्टि से महाकाव्यों का हुआ करता था। इस प्रकार डॉ. राय गोदान को आधुनिक युग का महाकाव्य ही नहीं स्वीकारते वरन् सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य भी स्वीकारते है। उनके इस कथन का यही आशय है कि प्रेमचन्द जी ने ग्राम जीवन से संबंध सभी पक्षों का न केवल अत्यन्त विशदता से चित्रण किया है, वरन् उनकी गहराइयों में जाकर उनके सच्चे चित्र प्रस्तुत कर दिए हैं। प्रेमचन्द जी ने जिस ग्राम जीवन का चित्र गोदान में प्रस्तुत किया है, उसका संबंध आज ग्राम परिवेश से न होकर तत्कालीन ग्राम जीवन से है। ग्रामीण जीवन को वास्तविक आधार प्रदान करने के लिए प्रेमचन्द जी ने चित्र के अनुरूप ही कुछ ऐसे खांचे अथवा चित्रफलक निर्मित किए हैं जो चित्र को यथार्थ बनाने में सहयोगी सिद्ध हुए हैं। ग्रामीण किसानों के घर द्वार, खेत-खलिहान और प्राकृतिक दृश्यों का ऐसा वास्तविक चित्रण अत्यन्त दुर्लभ है।

Question number: 455 (8 of 8 Based on Passage) Show Passage

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Question

‘महाकाव्य’ में कौनसा समास है?

Choices

Choice (4) Response

a.

अव्ययीभाव

b.

तत्पुरूष

c.

दव्न्दव्

d.

कर्मधारय

Passage

पत्र-पत्रिकाएँ मानव समाज की दिशा-निर्देशिका मानी जाती हैं। समाज के भीतर घटती घटनाओं से लेकर परिवेश की समझ उत्पन्न करने का कार्य पत्रकारिता का प्रथम व महत्वपूर्ण कर्तव्य है। राजनीतिक-सामाजिक चिन्तन की समझ पैदा करने के साथ विचार की सामर्थ्य पत्रकारिता के माध्यम से ही उत्पन्न होती है। पत्रकारिता ने युगों से अपने इस दायित्व का निर्वाह किया तथा दायित्व निर्वहन की समस्त कसौटियों को पूर्ण करते हुए समय-समय पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज की। यह अध्ययन करना अपने-आपमें अत्यन्त रोचक है कि पत्रकारिता की यह यात्रा कब और कैसे आरम्भ हुई और किन पड़ावों से गुजरकर राष्ट्रीयता के मिशन से व्यावसायिकता तक की यात्रा को उसने सम्पन्न किया। आजादी से पूर्व का युग राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय चेतना की अनुभूति के विकास का युग था। इस युग का मिशन और जीवन का उद्देश्य एक ही था - स्वाधीनता की चाह और प्राप्ति का प्रयास। इस प्रयास के तहत ही हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं का आरम्भ हुआ। इस संदर्भ में इस तथ्य को भी ध्यान में रखना होगा कि हिन्दी क्षेत्रों के बाहर भी विशेषकर हिन्दीतर भाषी क्षेत्रों को राष्ट्रीय अस्मिता का वाहक मानकर सभी पत्रकारों ने हिन्दी को ही अपनी ‘भाषा’ के रूप में चुना और हिन्दी भाषा के पत्र-पत्रिकाओं के संवर्द्धन में अपना योगदान दिया।

Question number: 456 (9 of 9 Based on Passage) Show Passage

» Reading Comprehension » Prose or Drama

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Question

‘योगदान’ में कौनसा समास है?

Choices

Choice (4) Response

a.

अव्ययीभाव

b.

तत्पुरूष

c.

दव्न्दव्

d.

कर्मधारय

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