CTET Paper-I Hindi: Questions 440 - 448 of 497

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Passage

भारतीय साहित्य भारतीय संस्कृति के आधार पर विकसित हुआ है। इस संस्कृति में भारतीयता के बीच समाहित है। जब कभी भी भारतीय अपनी पहचान का व्याख्यान करने को उत्सुक होता है, उसे अपने जोड़ से जोड़कर देखना चाहता है। यह केवल भारत व भारतीय के लिए ही आवश्यक नहीं है, बल्कि किसी भी देश के प्रान्त से जुड़ा हुआ मसला है। अपने को अन्य से जोड़कर तर्क दिए जाते हैं। उसे अपनी जड़ से जोड़कर ही देखते हैं। वर्तमान में भारतीय संस्कृति व सभ्यता के बीच उपजे हुए विषय वस्तु को ही आधार बनाकर अपनी पहचान को जोड़ते हैं, जिसके कारण दक्षिण भारतीय या उत्तर सभी भारतीय संस्कृति के टूटी कडियों से जोड़क अपने आपको अलग स्थापित करते हैं। इसका परिणाम भारतीय स्तर पर विखण्डन के रूप में भी देखने को मिलता है। इस परिणाम के तहत भाषा व संस्कृति के आधार पर विभिन्न प्रान्तों का निर्माण भी सम्भव हो गया। यदि यही विखण्डित समाज भारतीय संस्कृति के मूल से जोड़कर अपने को देखता होता तो भाषायी एकता भी बनती और क्षेत्रवाद का काला धुंआ, जो भारतीय आकाश पर मण्डरा रहा है, उसके उत्पत्ति ही सम्भव नहीं हो पाती। इस संदर्भ में भारतीयता व उसके समीप उपजे साहित्य को सीमाओं में जांचना जरूरी है। इसकी प्रकृति की खोज और इसके परिणामों की व्याख्या भारतीय साहित्य व भारतीयता के संदर्भ में खोजने होंगे।

भारतीयता के संदर्भ में साहित्य और समाज के संबंधों को समझना आवश्यक है। साहित्य का जन्म समाज में ही सम्भव हो सकता है, इसलिए मानवीय संवेदनाओं को हम उनकी अभिव्यक्ति के माध्यम से समझ सकते हैं। यह अभिव्यक्ति समाज और काल में अलग-अलग रूपों में प्रकट हुई है। यदि हम पाषाण काल के खण्डों और उसके वन में ही रहने वालों की स्थिति को देखें, तो उनके विचार शब्दों में नहीं बल्कि रेखाचित्रों में देखने को मिलते हैं। कई गुफाओं में इन समाजों की अभिव्यक्ति को पत्थर पर खुदे निशानों में देख सकते हैं। इन रूपों में उनके जन-जीवन में घटने वाली घटनाओं को प्रदर्शित करते नजर आते हैं। उनमें शिकार करते आदिमानव को देख सकते हैं जो जीवन यापन के साधन हों। उन चित्रों में हल चलाने वाले किसानों की अभिव्यक्ति नहीं मिलती। इससे इस बात की पुष्टि होती है कि वह समाज वनाचरण व्यवस्था में ही सिमटी या उनका जीवन यापन शिकार पर ही केन्द्रित या सभ्यता के विकास की गाथा उसके जीवन में नहीं गाई जा रही थी। लेकिन समय की पहली धारा में जो प्रभाव देखे जाते है, वह सभ्यता के रूप में गिरे पड़े टूटे-फूटे प्राप्त ऐतिहासिक खोज में देख सकते हैं।

Question number: 440 (8 of 9 Based on Passage) Show Passage

» Reading Comprehension » Prose or Drama

MCQ▾

Question

‘रेखाचित्र’ में कौनसा समास है?

Choices

Choice (4) Response

a.

अव्ययीभाव

b.

तत्पुरूष

c.

दव्न्दव्

d.

कर्मधारय

Passage

भारत प्राचीन काल से ही विविध धर्मों का प्रांगण रहा है। प्राचीन भारत में हिन्दू, जैन, बौद्ध, धर्मों का उदय हुआ है परन्तु इन सभी धर्मों में सांस्कृतिक पारस्परिक समिश्र इस प्रकार हुआ कि लोग भले ही विभिन्न भाषाएँ बोलते हैं, विभिन्न धर्मों को मानते हैं फिर भी भिन्न सामाजिक रीतियों पर समूचे देश में सभी की एक समान जीवन पद्धति है। हमारे देश में विविधताओं के बावजूद भीतर से गहरी एकता, हिमालय से कन्याकुमारी पूर्व में ब्रह्मपुत्र की घाटी से पश्चिम में सिन्धु पार तक झलकती है। देश में भाषात्मक एवं सांस्कृतिक एकता स्थापित करने के लिए निरन्तर प्रयास होते हैं। ईसा पूर्व तीसरी सदी में प्राकृत देश भर की सम्पर्क भाषा (लिंगवाँ का) का काम करती थी। सारे देश के प्रमुख कार्यों में अशोक के शिलालेख प्राकृत व ब्रह्मी लिपि में लिखे गये थे। बाद में वह स्थान संस्कृत ने ले लिया और देश के कोने-कोने में राजभाषा के रूप में प्रचलित रही। यह सिलसिला ईसा की चौथी शताब्दी में आकर मजबूत हुआ। यद्यपि इसके बाद देश छोटे-छोटे राज्यों में बंट गया। फिर भी राजकीय दस्तावेज की भाषा संस्कृत ही रहीं। प्राचीन भारत के लोगों की लिपि का ज्ञान 2500 ई. पूर्व तक ही था जिसको हड़प्पा व मोहनजोदड़ों के सभ्यता में सिक्कों पर अंकित पाते हैं। यद्यपि अभी तक इस लिपि को पढ़ना सम्भव नहीं हो पाया है। हस्तलिपियों के मामले में उपलब्ध हस्तलिपियाँ ईसा की चौथी सदी से पहले की नहीं है। भारत में हस्तलिपियाँ भोज पत्र एवं ताम्र पत्रों पर लिखी मिलती है। परन्तु मध्य एशिया में जहाँ भारत से प्राकृत भाषा फैल गई थी। ये हस्तलिपियाँ मेष चर्म, कष्ठि पत्रों में लिखी गई हैं, संस्कृत में पुराणों, हस्तलिपियाँ लिखित दक्षिण-भारत तथा नेपाल से प्राप्त हुई हैं।

Question number: 441 (9 of 9 Based on Passage) Show Passage

» Reading Comprehension » Prose or Drama

MCQ▾

Question

ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में भारत की सम्पूर्क भाषा निम्नलिखित में से कौनसी थी?

Choices

Choice (4) Response

a.

हिन्दी

b.

अवधी

c.

ब्रज

d.

प्राकृत

Passage

न जाने किस अदृश्य पड़ोस से

निकल कर आता था वह

खेलने हमारे साथ

रतन, जो बोल नहीं सकता था

खेलता था हमारे साथ

एक टूटे खिलौने की तरह

देखने में हम बच्चों की ही तरह

था वह भी एक बच्चा।

लेकिन हमन बच्चों के लिए अजूबा था

क्योंकि हमने भिन्न था।

Question number: 442 (6 of 6 Based on Passage) Show Passage

» Reading Comprehension » Poetry

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Question

कवि ने रतन को टूटे खिलौने की तरह क्यों कहा?

Choices

Choice (4) Response

a.

वह गूंगा था

b.

वह बहरा था

c.

वह दौड़ नहीं सकता था

d.

वह किसी के साथ खेलता नहीं था

Passage

बौद्ध शिक्षण पद्धति का आरम्भ स्वयं बुद्ध ने सरल तथा जनमानस की भाषा में तीवन के तत्वों के उपदेश तथा जगह-जगह चर्चा करके की। लोगों को शिक्षित करने के लिए महात्मा बुद्ध ने व्याख्यान, प्रश्नोत्तर प्रासंगिक उपमा, दृष्टान्त एवं कथा को माध्यम बनाया। बुद्ध के बाद से बौद्ध शिक्षा पद्धति भी एक निश्चित स्वरूप, संगठन के साथ हिन्दू शिक्षा पद्धति से अलग स्वतंत्र शिक्षा प; ति के रूप में विकसित हुई। प्रारम्भ में हिन्दू तथा बौद्ध शिक्षा पद्धति के मूल में कोई विशेष अन्तर नहीं था किन्तु बाद में आकर दोनों शिक्षा प्रणालियों के आदर्श एवं पद्धति में विशेष रूप से उस पाठ्यक्रम में जो विशेष रूप से आम उपासक की बजाय बौद्ध भिक्षु-भिक्षुणियों के लिए था, बहुत कम समानता रह गई थी।

बौद्ध धर्म में शिक्षा प्रारम्भ संस्कार ब्राह्मणों के उपनयन संस्कार की भाँति होता था। बौद्ध संघ में सम्मिलित होने के लिए दो संस्कार आवश्यक थे प्रथम था ‘पब्बज्जा’ तथा दूसरा ‘उपसम्पदा’। पब्बज्जा से उपासकत्व का प्रारम्भ होता था। उपनयन की भाँति इसे भी आध्यात्मिक जन्म कहा गया है। यह 8 वर्ष से अधिक आयु के किसी भी व्यक्ति को दी जा सकती थी। संरक्षक की अनुज्ञा इसके लिए आवश्यक थी। व्यक्ति को तीन प्रकार की शरण की शपथ एवं दस धर्मादेश दिए जाते थे। ये शरण बुद्ध धर्म एवं संघ की होती थी।

दस धर्मादेशों में निम्न की मनाही थी

1. पारिवारिक जीवन

2. ऐसी वस्तु ग्रहण करना जो दी ना हो

3. अशुद्ध आचरण

4. झूठ बोलना

5. मादक द्रव्यों का सेवन

6. असमय भोजन

7. नृत्य गायन

8. पुष्प माला, ईत्र गहने आदि का प्रयोग

9. उच्च आसन का प्रयोग

10. सोना एवं चांदी की प्राप्ति।

Question number: 443 (7 of 8 Based on Passage) Show Passage

» Reading Comprehension » Prose or Drama

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Question

बौद्ध शिक्षा पद्धति में शिक्षा देने हेतु निम्नलिखित में से किसे माध्यम बनाया जाता था?

Choices

Choice (4) Response

a.

प्रश्नोत्तर

b.

व्याख्यान

c.

कथा

d.

All a. , b. and c. are correct

Question number: 444 (8 of 8 Based on Passage) Show Passage

» Reading Comprehension » Prose or Drama

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Question

‘धर्मादेश’ शब्द है?

Choices

Choice (4) Response

a.

संज्ञा

b.

विशेषण

c.

क्रिया

d.

सर्वनाम

Passage

वह आता

दो टूक कलेजे के करता पछताता

पथ पर आता।

पेट पीट दोनों मिलकर हैं एक

चल रहा लकुटिया टेक

मुट्ठी भर दाने को भूख मिटाने को

मुँह फटी पुरानी झोली का फैलाता

दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता।

साथ दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाए

बाएँ से वे मलते हुए पेट को चलते

और दाहिना दया-दृष्टि पाने की ओर बढ़ाए।

भूख से सूख ओंठ जब जाते

दाता-भाग्य विधाता से क्या पाते?

घूँट आँसुओं के पीकर रह जाते?

चाट रहे जूठी पत्तल वे सभी सड़क पर खड़े हुए

और झपट लेने को उनके कुत्ते भी अड़े हुए

Question number: 445 (6 of 6 Based on Passage) Show Passage

» Reading Comprehension » Poetry

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Question

भिखारी की इच्छा है

Choices

Choice (4) Response

a.

सोना पाने की

b.

पैसा पाने की

c.

अनाज पाने की

d.

कपड़ा पाने की

Passage

विद्यालय समाज की एक ऐसी संस्था है, जिसके कुछ सुनिश्चित एवं सुनिर्धारित लक्ष्य होते हैं जबकि समुदाय का तात्पर्य ऐसे समूह से है जिसमें एक प्रकार के लोग होते हैं। एह एकत्व आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक या नागरिक गुणों में हो सकता है। कई समुदाय अपने लिए अलग विद्यालय की स्थापना भी कर लेते है। अपनी औपचारिक भूमिकाओं के अलावा अन्य भूमिकाओं के निर्वहन में भी विद्यालय समुदाय की सहायता करता है। इसके लिए आवश्यकता पड़ने पर समुदाय के क्रिया-कलापों वह हस्तक्षेप भी करता है। उदाहरण स्वरूप प्रौढ़ शिक्षा, स्त्री शिक्षा, स्वास्थ्य संबंधी जानकारियों को अभिभावकों तक पहुंचाने में भी विद्यालय यथासम्भव समुदाय की सहायता करता है एवं आवश्यकता पड़ने पर हस्तक्षेप भी करता है।

अभिभावक एवं विद्यालय एक-दूसरे के सम्पर्क में रहते हैं। अभिभावक समुदाय की आवश्यकताओं से परिचित होते हैं तथा विद्यालय को भ्ज्ञी इनसे अवगत कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाकर बीच की व्यवहार्य कड़ी का काम करते हैं। उदाहरण स्वरूप समुदाय की आवश्यकताओं के अनुरूप अभिभावकगण प्रौढ़ शिक्षा, स्त्री शिक्षा इत्यादि में सहायता के लिए विद्यालय से अनुरोध करते है। इस तरह वे विद्यालय एवं समुदाय के बीच ही व्यवहार्य कड़ी हैं। समुदाय के साथ निकट से जुड़कर कार्य करने की स्थिति में विद्यालय अधिक प्रभावशाली हो जाता है।

समुदाय और विद्यालय को जोड़ने में समाज के लोगों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। समुदाय के क्रिया-कलापों में विद्यालय की भागीदारी होती है। यही कारण है कि विद्यालय के लिए पाठ्यवस्तु इतना लचीला बनाया जाता है कि उसमें समाज के विभिन्न समुदायों की विशेषताएँ स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है। पर्यावरण को स्वच्छ रखने की शिक्षा देने के लिए आवश्यक है कि विद्यालय परिसर को स्वच्छ रखा जाए। जल संरक्षण की शिक्षा देने के लिए आवश्यक है कि विद्यालय परिसर में भी इनके संरक्षण के नियमों का पालन होता हो। इस तरह समुदाय की वास्तविकताओं को प्रायोगिक रूप से विद्यालय परिसर में प्रयोग कर उसे अधिगम अनुभवों में रूपान्तरित किया जा सकता है।

Question number: 446 (7 of 9 Based on Passage) Show Passage

» Reading Comprehension » Prose or Drama

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Question

प्रस्तुत गद्यांश में किसके द्वारा हस्तक्षेप की चर्चा की गई है?

Choices

Choice (4) Response

a.

समुदाय

b.

विद्यालय

c.

व्यक्ति

d.

प्रशासक

Passage

साहित्य को समाज का प्रतिबिम्ब माना गया है अर्थात् समाज का पूर्ण रूप साहित्य में प्रतिबिम्बित होता रहता है। अनादि काल से साहित्य अपने इसी धर्म का पूर्ण निर्वाह करता चला आ रहा है। वह समाज के विभिन्न रूपों का चित्रण कर एक तरफ तो हमारे सामने समाज का यथार्थ चित्र प्रस्तुत करता है और दूसरी ओर अपनी प्रखर मेधा और स्वस्थ कल्पना द्वारा समाज के विभिन्न पहलुओं का विवेचन करता हुआ यह भी बताता है कि मानव समाज की सुख समृद्धि, सुरक्षा और विकास के लिए कौनसा मार्ग उपादेय है। एक आलोचक के शब्दों में - ”कवि वास्तव में समाज की व्यवस्था, वातावरण, धर्म-कर्म, रीति-नीति तथा सामाजिक शिष्टाचार या लोक व्यवहार से ही अपने काव्य के उपकरण चुनता है और उनका प्रतिपादन अपने आदर्शों के अनुरूप करता है। साहित्यकार उसी समाज का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें वह जन्म लेता है। वह अपनी समस्याओं का सुलझाव, अपने आदर्श की स्थापना अपने समाज के आदर्शों के अनुरूप ही करता है। अत: यह कहना सर्वथा असम्भव और अविवेकपूर्ण है कि साहित्यकार समाज से पूर्णत: निरपेक्ष या तटस्थ रहकर साहित्य सृजन करता है। वाल्मीकि, तुलसी, सूर, भारतेन्दु, प्रेमचन्द आदि का साहित्य इस बात का सर्वाधिक सशक्त प्रमाण है कि साहित्यकार समाज से घनिष्ट रूप से सम्बद्ध रखता हुआ ही साहित्य सृजन करता है। समाज की अवहेलना करने वाला साहित्य क्षणजीवी होता है।“

मानव का कला या साहित्य सृजन के प्रति उन्मुख होना उसके इन्द्रिय बोध का परिणाम रहा है। रूप, रस, ग्रन्थ, स्पर्श आदि के इन्द्रियबोध मानव और पशु दोनों में ही विद्यमान हैं, परन्तु मानव में पशु की अपेक्षा अधिक मात्रा में। मानव में एक विशिष्ट गुण और विवेक है। विवेक द्वारा उसने सामाजिक जीवन का विकास और अपने इन्द्रियबोध का परिष्कार किया है। समाज व्यवस्था बदलने के साथ मनुष्य का इन्द्रियबोध विचार और भावों की अपेक्षा स्थायी रहता है। भाव और विचार दोनों ही साहित्य के मूलाधार है और इनका उद्गम और परिष्कार सामाजिक परिवेश में ही सम्भव होता है, समाज से कटकर निरपेक्ष रहने पर नहीं।

Question number: 447 (8 of 8 Based on Passage) Show Passage

» Reading Comprehension » Prose or Drama

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Question

साहित्य हमें क्या बताता है?

Choices

Choice (4) Response

a.

सामाजिक वर्चस्व करने के लिए क्या करना चाहिए

b.

समाज व्यवस्था को बदलते रहना चाहिए

c.

मानव समाज की सुख समृद्धि, सुरक्षा और विकास के लिए कौनसा मार्ग उपादेय है

d.

All of the above

Passage

सभ्यता के पुराने दस्तावेज के रूप में खण्डहरों व भूमिगम सामग्रियों को देखा जाता है। जब व्यक्ति अपने आपको सामाजिक जीवन में ढालने लगा, तब से वह समग्र एकता में प्रदर्शित होता है। इस प्रदर्शन की सीमा को हड़प्पा व मोहनजोदड़ों से प्राप्त वस्तुओं से कर सकते हैं उनकी अभिव्यक्ति रहन-सहन, मोहरों, सिक्कों एवं बने बनाए पक्के व अधपक्के खिलौनों से जान सकते हैं। उनकी धार्मिक भावना के रूप में कुण्ड की प्राप्ति हुई है, जिससे उनके धार्मिक संवेदनाओं को जाने सकते हैं। लेकिन प्राकृतिक आपदाओं में ढहती सभ्यताओं की कहानी, जमीन में धंसे समय के काल को खोद कर देख सकते हैं। इससे इतिहास की टूटी कड़ियों का पता चलता है। इससे यह भी पता चलता है कि कैसे नगरीय सभ्यता के स्थान पर ग्रामीण सभ्यता का विकास होता है। यह वैदिक युग में हुआ और इसी सभ्यता में भाषा की उपलब्धि हासिल हुई जिसको संस्कृत के रूप में जाना जाताहै।

वैदिक युग में मानव ने जंगल से निकल ग्रामीण संस्कृति का निर्माण किया तथा समाज ने प्राकृतिक रूपों को ही अपने ईष्ट के रूप में स्वीकारा, जिसकी अभिव्यक्ति ऋग्वेद के रूप में मिलती है। भाषा की यह वृत्ति केवल भारतभूमि पर ही सम्भव नहीं हुई बल्कि विश्व के अन्य हिस्सों में भी देखने को मिलती है। संस्कृत भाषा के प्राथमिक जीवित रचना के रूप में ऋग्वेद का शास्त्रीय संस्कृत भाषा का संबंध है। संस्कृत भाषा अपनी समस्त स्थितियों में प्रयुक्त बहुल भाषा है परन्तु वेदों में जो रूप प्रयुक्त हुए हैं, उनमें बाद के दिनों से अन्तर है। यही कारण है कि वैदिक भाषा का प्रभाव बाद के दिनों में अन्य भाषाओं में देखने को मिलता है क्योंकि संस्कृत ही इन भाषाओं की जननी है। वर्तमान में भारतीय संविधान में संग्रहीत सभी भाषाओं का प्रभाव देखा जाता है।

Question number: 448 (9 of 9 Based on Passage) Show Passage

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Question

सभ्यता के पुराने दस्तावेज के तौर पर किसे देखा जाता है?

Choices

Choice (4) Response

a.

पुराने खण्डहर

b.

भूमिगत सामग्री

c.

पुराने खण्डहर व भूमिगत सामग्री

d.

All of the above

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