क्षितिज(Kshitij-Textbook)-Textbook Questions (CBSE Class-10 Hindi): Questions 38 - 47 of 156

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Passage

पाठ 12

यशपाल

”यशपाल हिन्दी साहित्य के सर्वश्रेष्ठ कहानीकारों

में से एक हैं। अब तक इनके अनेकानेक कहानी

संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। जो कि भाव पक्ष व

शिल्प पक्ष की दृष्टिकोण से काफ़ी उच्चकाटि

के हैं। यशपाल मार्क्सवादी दर्शन से प्रभावित

कहानीकार हैं। इनकी कहानियों में यथार्थवादी

परम्परा का अनुकरण किया गया हैं। उन्होंने

समाज में व्याप्त कुरीतियों पर जमकर प्रहार

किया है, जो कि सराहनीय है।”

जीवन-परिचय- हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध साहित्यकार यशपाल का जन्म 3 दिसम्बर, 1903 को पंजाब के फिरोज़पुर छावनी में हुआ। उनके पूर्वज हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के निवासी थे। उनके पिता का नाम हीरालाल और माता का नाम प्रेम देवी था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा कांगड़ा के गुरुकुल में हुई। उन्होंने सन्‌ 1921 में फिरोज़पुर से मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। उन्होंने लाहौर के नेशनल कॉलेज से बी. ए. तक शिक्षा ग्रहण की। कॉलेज में ही उनकी भेंट सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी भगत सिंह और सुखदेव से हुई। उन्होंने अपने सहपाठी लाला लाजपत राय के साथ स्वदेशी आंंदोलन में जमकर भाग लिया। उनका झुकाव मार्क्सवाद की और बढ़ता गया। उन्हें दिल्ली में बम बनाते हुए गिरफ्तार कर लिया गया तथा 7 अगस्त, 1936 को बरेली जेल में ही उनका विवाह प्रकाशवती कपूर से हुआ। वे कई बार विदेश यात्रा पर गए। उन्होंने साहित्यकार और प्रकाशक दोनों रूपों में हिन्दी साहित्य की सेवा की। 26 दिसम्बर, 1976 को उनका स्वर्गवास हो गया।

प्रमुख रचनाएँ-यशपाल की प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं-

उपन्यास-दादा कामरेड, देशद्रोही, पार्टी कामरेड, दिव्या, मनुष्य के रूप, अमिता, क्यों फँसे, मेरी तेरी उसकी बात, बारह घण्टे, अप्सरा का श्राप, झूठा-सच।

कहानी-संग्रह-पिंजरे की उड़ान, तर्क का तूफान, ज्ञानदान, वो दुनिया, अभिशप्त, फूलों का कुर्ता, धर्मयुद्ध, चित्र का शीर्षक, उत्तराधिकारी, उत्तमी की माँ, सच बोलने की भूल।

नाटक-नशे नशे की बात, रूप की परख, गुडबाई दर्देदिल।

व्यंग्य लेख-चक्कर क्लब।

संस्मरण-सिंहावलोकन।

विचारात्मक निबंध-न्याय का संघर्ष, मार्क्सवाद, रामराज्य की कथा।

साहित्यिक विशेषताएँ- यशपाल जी की रचनाओं पर मार्क्सवाद का प्रभाव स्पष्ट झलकता है। उनकी रचनाओं में सामाजिक, ऐतिहासिक और पौराणिक तथ्यों के दर्शन होते हैं। उन्होंने जीवन की वास्तविकता को महसुस कर यथार्थ का वर्णन किया है। उनकी अधिकांश कहानियाँ चिन्तन प्रधान हैं।

भाषा-शैली-यशपाल की भाषा शैली में स्वाभाविकता एवं व्यवहारिकता का गुण विद्यमान है। उनकी भाषा अत्यंत सहज, सरल और पात्रानुकूल है। उन्होंने वर्णनात्मक, संवाद प्रधान प्रभावशाली शैली को अपनाया है। उन्होंने विषयानुसार उर्दू और अंग्रेजी के शब्दों का भी प्रयोग किया है। आम आदमी की भाषा का प्रयोग करने के कारण यशपाल का साहित्य जनसाधारण में अत्यंत लोकप्रिय है।

लखनवी अंदाज

प्रस्तुत कहानी के माध्यम से लेखक यशपाल ने यह सिद्ध करना चाहा है कि बिना विचार, कथ्य और पात्रों के भी कहानी लिखी जा सकती है। यहाँ उन्होंने एक लखनवी नवाब के माध्यम से उस सामन्ती वर्ग पर कटाक्ष किया है जो वास्तविकता से अनभिज्ञ रहते हुए बनावटी जीवन शैली का आदी है। वर्तमान में भी परजीवी संस्कृति को देखा जा सकता है।

मुफ़स्सिल की पैसेंजर ट्रेन चल पड़ने की उतावली में फूँकार रही थी। आराम से सेंकड क्लास में जाने के लिए दाम अधिक लगते हैं। दूर तो जाना नहीं था। भीड़ से बचकर, एकांत में नई कहानी के सबंध में सोच सकने और खिड़की से प्राकृतिक दृश्य देख सकने के लिए टिकट सेकंड क्लास का ही ले लिया।

गाड़ी छूट रही थी। सेकंड क्लास के एक छोटे डिब्बे को खाली समझकर, जरा दौड़कर उसमें चढ़ गए। अनुमान के प्रतिकूल डिब्बा निर्जन नहीं था। एक बर्थ पर लखनऊ की नवाबी नस्ल के एक सफ़ेदपोश सज्जन बहुत सुविधा से पालथी मारे बैठे थे। सामने दो ताज़े-चिकने खीरे तौलिए पर रखे थे। डिब्बे में हमारे सहसा कूद जाने से सज्जन की आँखों में एकांत चिंतन में विघ्न का असंतोष दिखाई दिया। सोचा, हो सकता है, यह भी कहानी के लिए सुझा की चिंता में हो या खीरे-जैसी अपदार्थ वस्तु का शौक करते देखे जाने के संकोच में हो।

नवाब साहब ने संगति के लिए उत्साह नहीं दिखाया। हमने भी उनके सामने की बर्थ पर बैठकर आत्म-सम्मान में आँखे चुरा लीं।

ठाली बैठे, कल्पना करते रहने की पुरानी आदत है। नवाब साहब की असुविधा और संकोच के कारण का अनुमान करने लगे। संभव है, नवाब साहब ने बिलकुल अकेले यात्रा कर सकने के अनुमान में किफ़ायत के विचार से सेंकड क्लास का टिकट खरीद लिया हो और अब गवारा न हो कि शहर को कोई सफ़ेदपोश उन्हें मँझले दर्जे में सफ़र करता देखे।……. . अकेले सफ़र का वक्त काटने के लिए ही खीरे खरीदे होंगे और अब किसी सफ़ेदपोश के सामने खीरा कैसे खाएँ?

लेखक बताता है कि वह भीड़ से बचने के लिए दूसरे दर्जे की टिकट लेकर रेलगाड़ी के एक डिब्बे में सवार हुआ। डिब्बे में उन्होंने देखा कि एक लखनऊ के नवाबों जैसा भद्र व्यक्ति पहले से ही बैठा था और उसने अपने पास दो खीरे रखे हुए थे। उस भद्र पुरुष के चेहरे पर लेखक को चिंता और संकोच का भाव दिखाई देता है। नवाब साहब में सहयात्री मिलने की उत्सुकता ने देख लेखक सामने की बर्थ पर बैठ गया। खाली समय में वे कल्पना करने का काम करते हैं इसलिए नवाब साहब के संकोच और असुविधा के विषय में सोचने लगे। उन्होंने अनुमान लगाया कि नवाब साहब ने अकेले ही यात्रा करने के उद्देश्य से दूसरे दूर्जे का टिकट खरीदा होगा और सफ़र काटने के लिए खीरे खरीदे होगें। लेकिन लेखक को देखकर शायद वह संकोच में पड़ गया।

हम कनखियों से नवाब साहब की ओर देख रहे थे। नवाब साहब कुछ देर गाड़ी की खिड़की से बाहर देखकर स्थिति पर गौर करते रहे।

’ओह’ नवाब साहब ने सहसा हमें संबोधन किया, ’आदाब-अर्ज’, जनाब, खीरे का शौक फ़रमाएँगे?

नवाब साहब का सहसा भाव-परिवर्तन अच्छा नहीं लगा। भाँप लिया, आप शराफ़त का गुमान बनाए रखने के लिए हमें भी मामूली लोगों की हरकत में लथेड़ लेना चाहते हैं। जवाब दिया, ’शुक्रिया, किबला शौक फरमाएँ।’

नवाब साहब ने फिर एक पल खिड़की से बाहर देखकर गौर किया और दृढ़ निश्चय से खीरों के नीचे रखा तौलिया झाढ़कर सामने बिछा लिया। सीट के नीचे से लोटा उठाकर दोनों खीरों को खिड़की से बाहर धोया और तौलिए से पोंछ लिया। जेब से चाकू निकाला। दोनों खीरों के सिर काटे और उन्हें गोदकर झाग निकाला। फिर खीरों को बहुत एहतियात से छीलकर फाँकों को करीने से तौलिए पर सजाते गए।

लखनऊ स्टेशन पर खीरा बेचने वाले खीरे के इस्तेमाल का तरीका जानते हैं। ग्राहक के लिए जीरा-मिला नमक और मिर्ची पिसी हुई लाल मिर्च की पुड़िया भी हाज़िर कर देते हैं।

नवाब साहब ने बहुत करीने से खीरे की फाको पर जीरा-मिला नमक और लाल मिर्च की सुखी बुरक दी। प्रत्येक भाव-भंगिमा और जबड़ों के स्फुरण से स्पष्ट था कि उस प्रक्रिया में उनका मुख खीरे के रसास्वादन की कल्पना से प्लावित हो रहा था।

नवाब साहब ने स्थिति को भाँपते हुए लेखक से नमस्कार करके खीरे खाने के विषय में पूछा। नवाब के बदले हुए स्वभाव को देखकर लेखक ने समझ लिया कि वह उन्हें सामान्य लोगों की तरह समझ रहा है और उसे मना कर दिया। नवाब साहब ने खीरों को धोया और ऊपरी हिस्सा काटकर उनको रगड़ा। फिर चाकू से छीलकर उन्हें फांकों में काट लिया। उन पर जीरा-मिला नमक और लाल मिर्च डाली। खीरों के रसास्वादन की कल्पना से नवाब साहब के मुँह में पानी आ रहा था।

हम कनखियों से देखकर सोच रहे थे, मियाँ रईस बनते हैं, लेकिन लोगों की नज़रों से बच सकने के खयाल में अपनी असलियत पर उतर आए हैं।

नवाब साहब ने फिर एक बार हमारी ओर देख लिया, ’ वल्लाह, शौक कीजिए, लखनऊ का बालम खीरा है! ’

नमक-मिर्च छिड़क दिये जाने से ताज़े खीरे की पनियाती फाँके देखकर पानी मुँह में जरूर आ रहा था, लेकिन इंकार कर चूके थे। आत्म-सम्मान निबाहना ही उचित समझा, उत्तर दिया, ’ शुक्रिया, इस वक्त तलब महसूस नहीं हो रही, मेदा भी ज़रा कमजोर है, किबला शौक फरमाएँ।’

नवाब साहब ने सतृष्ण आँखों से नमक-मिर्च के संयोग से चमकती खीरे की फाँकों की ओर देखा। खिड़की के बाहर देखकर दीर्घ निश्वास लिया। खीरे की एक फाँक उठाकर होंठो तक ले गए। फाँक को सूँघा। स्वाद के आनंद में पलकें मुँद गईं। मुँह में भर आए पानी का घूँट गले उतर गया। तब नवाब साहब ने फाँक को खिड़की से बाहर छोड़ दिया। नवाब साहब खीरे की फाँकों को नाक के पास ले जाकर, वासना से रसास्वादन कर खिड़की के बाहर फेंकते गए।

लेखक सोच रहा था कि वैसे तो रईस बनने का ढ़ोंग कर रहा है और लोगों से नज़रे बचाकर खीरे खा रहा है। नवाब साहब ने फिर लेखक से खीरे खाने के विषय में पूछा। नमक मिर्च लगे ताजे खीरें देखकर लेखक के मुँह में पानी तो आ रहा था किंतु स्वाभीमान को बचाए रखने के लिए यह कहते हुए मना कर दिया कि इच्छा नहीं है और मेरा अमाशय भी कमज़ोर है। फिर नवाब साहब ने प्यासी आँखों से खीरें की फाँकों को देखा और एक लंबी साँस लेकर खीरे की एक फाँक को नाक तक ले जाकर सूँघा। स्वाद का आनंद लेकर और मुँह में आए पानी को पी कर फाँक को खिड़की से बाहर फेंक दिया। इस तरह उन्होंने सभी फाँके सूँघकर बाहर फेंक दी।

नवाब साहब ने खीरे की सब फाँकों को खिड़की के बाहर फेंककर तौलिए से हाथ और होंठ पोंछ लिए और गर्व से गुलाबी आँखों से हमारी ओर देख लिया, मानो कह रहे हों- यह है खानदानी रईसो का तरीका!

नवाब साहब खीरे की तैयारी और इस्तेमाल से थककर लेट गए। हमें तसलीम में सिर खम कर लेना पड़ा-यह है खानदानी तहज़ीब, नफ़ासत और नज़ाकत!

खीरे की सारी फाँके सूँघकर बाहर फेंकने के बाद नवाब साहब ने तौलिए से हाथ-मुँह पोंछते हुए गर्व के साथ लेखक की ओर ऐसे देखा जैसे वह स्वयं को खानदानी रईस बता रहा हो। नवाब साहब लेट गए और लेखक ने, यह सोचते हुए कि यही है खानदानी शिष्टता, स्वच्छता और कोमलता, अपना सिर उसके सम्मान में झुका लिया।

हम गौर कर रहे थे, खीरा इस्तेमाल करने के इस तरीके को खीरे की सुगंध और स्वाद की कल्पना से संतुष्ट होने का सूक्ष्म, नफ़ीस या एब्स्ट्रैक्ट तरीका ज़रूर कहा जा सकता है परंतु क्या ऐसे तरीके से उदर की तृप्ति भी हो सकती है?

नवाब साहब की ओर से भरे पेट के ऊँचे डकार का शब्द सुनाई दिया और नवाब साहब ने हमारी ओर देखकर कह दिया, ’खीरा लज़ीज होता है लेकिन होता है सकील, नामुराद मेदे पर बोझ डाल देता है।’

ज्ञान-चक्षु खुल गए! पहचाना -ये हैं नई कहानी के लेखक!

खीरे की सुगंध और स्वाद की कल्पना से पेट भर जाने का डकार आ सकता है तो बिना विचार, घटना और पात्रों के, लेखक की इच्छा मात्र से ’नई कहानी’ क्यों नहीं बन सकती?

लेखक यह सोच रहा था के क्या इस सुगंध और स्वाद के सूक्ष्म, बढ़िया और अमूर्त तरीके से पेट की तृप्ति हो सकती है? तभी नवाब साहब ने भरे पेट जैसी डकार ली और लेखक से कहा कि खीरा स्वादिष्ट तो होता है किंतु अमाशय के लिए भारी होता है। लेखक की सोचने की शक्ति जागृत हो गई, उसे नवाब साहब एक नई कहानी का लेखक प्रतीत हुआ। उन्होंने सोचा कि खीरे खाए बिना ही पेट भर सकता है और डकार आ सकती है तो फिर बिना विचार, घटना और पात्रों के एक नई तरह की कहानी भी लिखी जा सकती है।

शब्दार्थ

मुफ़स्सिल-केंद्रस्थ नगर के इर्द-गिर्द के स्थान। सफ़ेदपोश-भद्र व्यक्ति। किफायत-मितव्यता, समझदारी से उपयोग करना। आदाब अर्ज- अभिवादन का एक ढंग। गुमान-भ्रम। एहतियात- सावधानी। बुरक देना- छिड़क देना। स्फुरण- फड़कना, हिलना। प्लावित-पानी भर जाना। पनियाती-रसीली। मेदा-अमाशय। तसलीम-सम्मान में। तहज़ीब-शिष्टता। नफासत- स्वच्छता। नज़ाकत- कोमलता। नफीस- बढ़िया। एब्स्ट्रैक्ट-सूक्ष्म, जिसका भौतिक अस्तित्व न हो, अमूर्त।

सकील- आसानी से न पचने वाला।

इस पाठ को कंठस्थ कर निम्न प्रशनो के उत्तर दीजिए

Question number: 38 (3 of 5 Based on Passage) Show Passage

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लेखक को नवाब साहब के किन हाव-भावों से महसूस हुआ कि वे उनसे बातचीत करने के लिए तनिक भी उत्सुक नहीं हैं?

Question number: 39 (4 of 5 Based on Passage) Show Passage

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बिना विचार, घटना और पात्रों के भी कहानी लिखी जा सकती है। यशपाल के इस विचार से आप कहाँ तक सहमत हैं?

Question number: 40 (5 of 5 Based on Passage) Show Passage

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Textbook Questions » यशपाल लखनवी अंदाज

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नवाब साहब दव्ारा खीरा खाने की तैयारी करने का एक चित्र प्रस्तुत किया गया है। इस पूरी प्रक्रिया को अपने शब्दों में प्रयुक्त करें।

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छाया मत छूना

मन, होगा दुख दुना।

जीवन में हैं सुरंग सुधियां सुहावनी

छवियों को चित्र-गंध फैली मनभावनी:

तन-सुगंध शेष रही, बीत गई यामिनी,

कुंतल के फूलों की याद बनी चाँंदनी।

भूल-सी एक छुअन बनता हर जीवित क्षण-

छाया मत छूना

मन, होगा दुख दूना।

(2)

यश है या न वैभव है, मान है न सरमाया;

जितना ही दौड़ा तू उतना ही भरमाया।

प्रभुता का शरण-बिंब केवल मृगतृष्णा है,

हर चंद्रिका में छिपी एक रात कृष्णा है।

जो है यथार्थ कठिन उस का तू कर पूजन-

छाया मत छूना

मन, होगा दुख दूना।

(3)

दुविधा-हत साहस है, दिखता है पंथ नहीं,

देह सुखी हो पर मन के दुख का अंत नहीं।

दुख है न चांद खिला शरद-रात आने पर,

क्या हुआ जो खिला फूल रस-बसंत जाने पर?

जो न मिला भूल उसे कर तू भविष्य वरण,

छाया मत छूना

मन, होगा दुख दूना।

Question number: 41 (1 of 5 Based on Passage) Show Passage

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’क्या हुआ जो खिला फूल रस बसंत जाने पर? ’ कवि का मानना है कि समय बीत जाने पर भी उपलब्धि मनुष्य को आनंद देती हैं। क्या आप ऐसी मानते हैं? तर्क सहित लिखिए।

Question number: 42 (2 of 5 Based on Passage) Show Passage

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’मृगतृष्णा’ किसे कहते हैं, कविता में इसका प्रयोग किस अर्थ में हुआ है?

Question number: 43 (3 of 5 Based on Passage) Show Passage

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कविता में व्यक्त दुख के कारणों को स्पष्ट कीजिए।

Question number: 44 (4 of 5 Based on Passage) Show Passage

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’छाया’ शब्द यहाँ किस संदर्भ में प्रयुक्त हुआ है? कवि ने उसे छूने के लिए मना क्यों किया है?

Question number: 45 (5 of 5 Based on Passage) Show Passage

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कवि ने कठिन यथार्थ के पूजन की बात क्यों कही है?

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पाठ 11

रामवृक्ष बेनीपुरी

”रामवृक्ष बेनीपुरी एक कुशल साहित्यकार के

साथ-साथ भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी भी

रहे थे। इसीलिए इनके साहित्य में क्रान्ति

के भाव स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है।

प्रस्तुत पुस्तक में संग्रहित इनका निबंध बाल

गोबिन भगत भी सामाजिक क्रान्ति की भाव

भूमि पर आधारित निबंध है। जिसकी भाषा

काफ़ी ओजपूर्ण है”

जीवन-परिचय- आधुनिक युग के प्रसिद्ध निबंधकार श्री रामवृक्ष बेनीपुरी का जन्म बिहार के मुजफ्ऱपुर जिले के अन्तर्गत बेनीपुर नामक गाँव में सन्‌ 1902 में हुआ। बचपन में माता-पिता का देहान्त हो जाने के कारण उनकी मौसी ने उनका पालन-पाषण किया। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा गाँव में हुई। अनेक अभावों और कठिनाइयों को सहकर उन्होंने दसवीं कक्षा तक शिक्षा प्राप्त की। सन्‌ 1920 में महात्मा गाँधी के असंहयोग आंदोलन के दौरान उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। छोटी आयु में ही उन्होंने लेखन-कार्य आरम्भ कर दिया था। 15 वर्ष की आयु में ही उनकी रचनाएँ पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगीं। उन्होंने तरुण भारत, किसान मित्र, बालक, युवक, कर्मवीर, हिमालय, नई धारा, योगी, जनता, जनवाणी आदि अनेक साप्ताहिक व मात्रिक पत्र-पत्रिकाओं का सफलतापूर्वक संपादन करके एक लोकप्रिय संपादक के रूप में यश प्राप्त किया। सन्‌ 1968 ई. में उनका स्वर्गवास हो गया।

प्रमुख रचनाएँ-श्री रामवृक्ष बेनीपुरी ने अनेक विधाओं में लेखनी चलाई। उनकी नाटक उपन्यास कहानी संस्मरण, निबंध, यात्रा-विवरण आदि अनेक विधाओं में कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। अंबपाली (नाटक), पतितों के देश में (उपन्यास), चिता के फूल (कहानी), माटी के मूरतें, नेत्रदान, मन और विजेता (रेखाचित्र), गेहूँ और गुलाब (निबंध व रेखाचित्र), जंजीरे, दीवारें (संस्मरण), पैरों में पंख बाँधकर (यात्रा-विवरण) उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं। उनकी कुछ रचनाएँ बेनीपुरी ग्रंथावली के रूप में दो भागों में प्रकाशित हो चुकी हैं।

साहित्यिक विशेषताएँ- बेनीपुरी जी के जीवन में राजनीति, साहित्य और संस्कृति की तीनों धाराएँ प्रवाहित हैं। उनकी रचनाएँ समाज-सुधार और राष्ट्र-उत्थान की प्रेरणा देती हैं। स्वंतत्रता सेनानी होने के नाते उन्होंने जो कुछ भी सीखा, उसे साहित्य में व्यक्त कर दिया। उनकी रचनाओं में बाल-सुलभ जिज्ञासा के दर्शन होते हैं।

भाषा-शैली- बेनीपुरी जी ने अपनी रचनाओं में भावों के अनुरूप भाषा का प्रयोग किया। उनकी भाषा सरल-स्वाभाविक खड़ी बोली है। उन्होंने तत्सम, तद्भव व उर्दू के साथ सामान्य बोलचाल के आँचलिक शब्दों का भी प्रयोग किया है। उनकी अधिकतर रचनाओं में विचारात्मक, चित्रात्मक एवं व्याख्यात्मक शैली देखने को मिलती है। उन्होंने एक-एक वाक्य को सूक्ति के समान प्रभावशाली बनाकर प्रयुक्त किया। प्रतीकों का प्रयोग भी उनकी भाषा-शैली की एक अन्य विशेषता है।

कहावतों और मुहावरों के समुचित प्रयोग से उनकी भाषा सप्राण हो उठी है। प्रतीकात्मकता, व्यंग्यात्मकता, लाक्षणिकता, ध्वन्यात्मक सौष्ठव और आलंकारिता के कारण उनकी भाषा में अद्भुत प्रभाव उत्पन्न हुआ है। छोटे-छोटे वाक्य गहरी अर्थ-व्यंजना के कारण पाठक के हृदय पर तीखी चोट करते हैं। कुल मिलाकर रामवृक्ष बेनीपुरी जी को हिन्दी भाषा का बादशाह कहना किसी प्रकार से अनुचित नहीं होगा।

बालगोबिन भगत

प्रस्तुत रेखाचित्र के माध्यम से लेखक रामव़ृक्ष बेनीपुरी ने मानवता, लोक संस्कृति, सामूहिक चेतना का प्रतीक एक विलक्षण चरित्र बालगोबिन भगत का उद्घाटन किया है। लेखक ने बताया है कि मनुष्य मानवीय गुणों के आधार पर ही संन्यासी हो सकता है, वेश-भूषा या बाहरी अनुष्ठान आदि करने से नहीं होता। लेखक ने बालगोबिन भगत को इन्हीं के आधार पर संन्यासी कहा है साथ ही समाज में व्याप्त जाति-वर्ग भेद जैसी सामाजिक विसंगतियों और रूढ़ियों पर भी प्रहार किया है।

बालगोबिन भगत मँझोले कद के गोर-चिट्‌टे आदमी थे। साठ से ऊपर के ही होंगे। बाल पक गए थे। लंबी दाढ़ी या जटाजूट तो नहीं रखते थे, किंतु, हमेशा उनका चेहरा सफ़ेद बालों से ही जगमग किए रहता। कपड़े बिलकुल कम पहनते। कमर में एक लंगोटी-मात्र और सिर में कबीरपंथियों की-सी कनफटी टोपी। जब जाड़ा आता, एक काली कमली ऊपर से ओढ़े रहते। मस्तक पर हमेशा चमकता हुआ रामानंदी चंदन, जो नाक के एक छोर से ही, औरतों के टीका की तरह, शुरू होता। गले में तुलसी की जड़ों की एक बेडौल माला बाँधे रहते।

ऊपर की तस्वीर से यह नहीं माना जाए कि बाालगोबिन भगत साधु थे। नहीं, बिलकुल गृहस्थ! उनकी गृहिणी की तो मुझे याद नहीं, उनके बेटे और पतोहू को तो मैंने देखा था। थोड़ी खेतीबारी भी थी, एक साफ़-सुथरा मकान भी था।

किंतु, खेतीबारी करते, परिवार रखते भी, बालगोबिन भगत साधु थे-साधु की सब परिभाषाओं में खरे उतरनेवाले। कबीर को ’साहब’ मानते थे, उन्हीं के गीतों को गाते, उन्हीं के आदेशों पर चलते। कभी झूठ नहीं बोलते, खरा व्यवहार रखते। किसी से भी दो-टूक बात करने में संकोच नहीं करते, न किसी से खामखाह झगड़ा मोल लेते। किसी की चीज़ नहीं छूते, न बिना पूछे व्यवहार में लाते। इस नियम को कभी-कभी इतनी बारीकी तक ले जाते कि लोगों को कुतूहल होता! -कभी वह दूसरे के खेत में शौच के लिए भी नहीं बैठते! वह गृहस्थ थे; लेकिन, उनकी सब चीज़ साहब की थी। जो कुछ खेत में पैदा होता, सिर पर लादकर पहले उसे साहब के दरबार में ले जाते- जो उनके घर से चार कोस दूर पर था-एक कबीरपंथी मठ से मतलब! वह दरबार में भेंट रूप रख लिया जाकर प्रसाद रूप में जो उन्हें मिलता, उसे घर लाते और उसी से गुज़र चलाते!

इन सबके ऊपर, मैं तो मुग्ध था उनके मधुर गान पर- जो सदा-सर्वदा ही सुनने को मिलते। कबीर के वे सीधे-सादे पद, जो उनके कंठ से निकलकर सजीव हो उठते।

यहाँ बालगोबिन भगत का चित्रण किया गया है। शारीरिक विशेषताओं के साथ उसके पहनावे का भी वर्णन किया गया है। उनके पहनावे और वेश-भूषा से उन्हें साधु नहीं कहा जा सकता। वे गृहस्थ थे, उनका एक बेटा और बहू थी। परिवार और खेतीबारी के होते हुए भी बालगोबिन संन्यासी की तरह थे। वे कबीर को साहब मानते थे, तथा उनके गीत से निकले हुए केंद्रीय भावों व आदेशों का अक्षरश: पालन करते थे। सीधा और सच्चा व्यवहार रखते थे। किसी से लड़ाई-झगड़ा नहीं करते थे। किसी की चीज़ का अपने लिए उपयोग नहीं करते थे, न ही दूसरे के खेत में शौच आदि करते थे। खेत में पैदा हुए अनाज को सिर पर लादकर कबीर के दरबार में ले जाते, वहाँ से प्रसाद के रूप में जो भी मिलता था उसी से गुजारा करते थे। लेखक उनके द्वारा गाए गए कबीर के पद को सुनकर आनन्दित हो उठता था।

आसाढ़ की रिमझिम बारिस हो रही है। समूचा गाँव खेतों में उतर पड़ा है। कहीं हल चल रहे हैं; कहीं रोपनी हो रही है। धान के पानी -भरे खेतों में बच्चे उछल रहे हैं। औरतें कलेवा लेकर मेंड़ पर बैठी हैं। आसमान बादल से घिरा; धूप का नाम नहीं। ठंडी पुरवाई चल रही। ऐस ही समय आपके कानों में एक स्वर-तरंग झंकार-सी कर उठी। यह क्या है- यह कौन है। यह पूछना न पड़ेगा। बालगोबिन भगत समूचा शरीर कीचड़ में लिथड़े, अपने खेते में रोपनी कर रहे हैं। उनकी अँगुली एक-एक धान के पौधे को, पंक्तिबद्ध, खेत में बिठा रही है। उनका कंठ एक-एक शब्द को संगीत के जीने पर चढ़ाकर कुछ को ऊपर, स्वर्ग की ओर भेज रहा है और कुछ को इस पृथ्वी की मिट्‌टी पर खड़े लोगों के कानों की ओर! बच्चे खेलते हुए झूम उठते हैं; मेंड़ पर खड़ी औरतों के होंठ काँप उठते हैं, वे गुनगुनाने लगती हैं; हलवाहों के पैर ताल से उठने लगते हैं; रोंनी करनेवालों की अँगुलियाँ एक अजीब क्रम से चलने लगती हैं! बालगोबिन भगत का यह संगीत है या जादू!

यहाँ लेखक ने आषाढ़ के महीने में प्रकृति और खेतों में होने वाली चहल-पहल का उल्लेख किया है। आषाढ़ के महीनें में बरसात होने के बाद गाँव के सभी लोग खेतों में आकर धान की रोपाई आरम्भ कर देते हैं। औरतें खाना लेकर आती हैं। बालगोबिन भगत भी अपने खेत में धान की रोपाई करता हुआ अपनी संगीतमय आवाज में जब गाता है तो सभी स्त्री, पुरुष बच्चे झूमने व गुनगनाने लगते हैं, हलवाहों और रोपाई करने वालों में जोश और उमंग की लहर व्याप्त हो जाती है।

भादों की वह अँधेरी अधरतिया। अभी, थोड़ी ही देर पहले मूसलाधार वर्षा खत्म हुई है। बादलों की गरज, बिजली की तड़प में आपने कुछ नहीं सुना हो, किंतु अब झिल्ली की झंकार या दादुरों की टर्र-टर्र बालगोबिन भगत के संगीत को अपने कोलाहल में डुबों नहीं सकतीं। उनकी खँजड़ी डिमक-डिमक बज रही है और वे गा रहे हैं- गोदी में पियवा, चमक उठे सखिया, चिहुँक उठे ना! ” हाँ, पिया तो गोद में ही है, ंकंतु वह समझती है, वह अकेली है, चमक उठती है, चिहुँक उठती है। उसी भरे-बादलोंवाले भादों की आधी रात में उनका यह गाना अँधेरे में अकस्मात कौंध उठनेवाली बिजली की तरह किसे न चौंका देता? अरे, अब सारा संसार निस्तब्धता में सोया है, बालगोबिन भगत का संगीत जाग रहा है, जगा रहा है! - तेरी गठरी में लागा चोर मुसाफ़िर जाग ज़रा!

कातिक आया नहीं कि बालगोबिन भगत की प्रभातियाँ शुरू हुईं, जो फागुन तक चला करती। इन दिनों वह सबेरे ही उठते। न जाने किस वक्त जगकर वह नदी-स्नान को जाते-गाँव से दो मील दूर! वहाँ से नहा-धोकर लौटते और गाँव के बाहर ही, पोखरे के ऊँचे भिंडे पर, अपनी खँजड़ी लेकर जा बैठते और अपने गाने टेरने लगते। मैं शुरू से ही देर तक सोनेवाला हूँ, किंतु, एक दिन, माघ की उस दाँता-किट-किटवाली भोर में भी, उनका संगीत मुझे पोखरे पर ले गया था। अभी आसमान के तारों की दीपक बुझे नहीं थे। हाँ, पूरब में लोही लग गई थी, जिसकी लालिमा को शुक्र तारा और बढ़ा रहा था। खेत, बगीचा, घर-सब पर कुहासा छा रहा था। सारा वातावरण अजीब रहस्य से आवृत मालूम पड़ता था। उस रहस्यमय वातावरण में एक कुश की चटाई पर पूरब मुँह, काली कमली ओढ़े, बालगोबिन भगत अपनी खँजड़ी लिए बैठे थे। उनके मुँह से शब्दों का ताँता लगा था, उनकी अँगुलियाँ खँजड़ी पर लगातार चल रही थीं। गाते-गाते इतने मस्त हो जाते, इतने सुरूर में आते, उत्तेजित हो उठते कि मालूम होता, अब खड़े हो जाएँगे। कमली तो बार-बार सिर से नीचे सरक जाती। मैं जाड़े से कँपकँपा रहा था, किंतु, तारे की छाँव में भी उनके मस्तक के श्रमबिंदु, जब तब, चमक ही पड़ते।

भाद्रपद महीने की अंधेरी व आधी रात में मूसलाधार वर्षा के बाद होने वाली बादलों की गर्जन, बिजली की कड़क टिड्‌डों और मेंढकों की आवाज़ का शोर भी बालगोबिन की मधुर आवाज़ को नहीं दबा पाते। अंधेरी रात में उनके द्वारा गाये जाने वाला एक गाना सबको चौंका देता है। जब सारा संसार सो जाता है तो बालगोबिन सबको सचेत करता हुआ गाना गाता है। कार्तिक के महीने में बालगोबिन शीघ्र ही नदी-स्नान करके प्रभात-फेरी पर निकल पड़ते थे। माघ महीने की रक्त को जमाने वाली ठंड में वे पूर्व की ओर मुँह करके एक चटाई पर अपनी खंजड़ी बजाकर गाने बैठ जाते। गाते-गाते वे इतने रोमांचित हो जाते कि कँपकँपा देने वाले उस जाड़े में भी उनके माथे पर पसीना आ जाता था।

गर्मियों में उनकी संझा कितनी उमसभरी शाम को न शीतल करती! अपने घर के आँगन में आसन जमा बैठते। गाँव के उनके कुछ प्रेमी भी जुट जाते। खँजड़ियों और करतालों की भरमार हो जाती। एक पद बालगोबिन भगत कह जाते, उनकी प्रेमी-मंडली उसे दुहराती, तिहराती। धीरे-धीरे स्वर ऊँचा होने लगता-एक निश्चित ताल, एक निश्चित गति से। उस ताल-स्वर के चढ़ाव के साथ श्रोताओं के मन भी ऊपर उठने लगते। धीरे-धीरे मन तन पर हावी हो जाता। होते -होते, एक क्षण ऐसा आता कि बीच में खँजड़ी लिए बालगोबिन भगत नाच रहे हैं और उनके साथ ही सबके तन और मन नृत्यशील हो उठे हैं। सारा आँगन नृत्य और संगीत से ओतप्रोत है!

बालगोबिन भगत की संगीत-साधना का चरम उत्कर्ष उस दिन देखा गया, जिस दिन उनका बेटा मरा। इकलौता बेटा था वह! कुछ सुस्त और बोदा-सा था, किंतु इसी कारण बालगोबिन भगत उसे और भी मानते। उनकी समझ में ऐसे आदमियों पर ही ज्य़ादा नज़र रखनी चाहिए या प्यार करना चाहिए, क्योंकि ये निगरानी और मुहब्बत के ज्य़ादा हकदार होते हैं। बड़ी साध से उसकी शादी कराई थी, पतोहू बड़ी ही सुभग और सुशील मिली थी। घर की पूरी प्रबंधिका बनकर भगत को बहुत कुछ दुनियादारी से निवृत्त कर दिया था उसने। उनका बेटा बीमार है, इसकी खबर रखने की लोगों को कहाँ फुर्सत! किंतु मौत तो अपनी ओर सबका ध्यान खींचकर ही रहती है। हमने सुना, बालगोबिन भगत का बेटा मर गया। कुतूहलवश उनके घर गया। देखकर दंग रह गया। बेटे को आँगन में एक चटाई पर लिटाकर एक सफ़ेद कपड़े से ढाँक रखा है। वह कुछ फूल तो हमेशा ही रोप रहते, उन फूलों में से कुछ तोड़कर उस पर बिखरा दिए हैं; फूल और तुलसीदल भी। सिरहाने एक चिराग जला रखा है। और, उसके सामने ज़मीन पर ही आसन जमाए गीत गाए चले जा रहे हैं! वही पुरान स्वर, वही पुरानी तल्लीनता। घर में पतोहू रो रही है, जिसे गाँव की स्त्रियाँ चुप कराने की कोशिश कर रही हैं। किंतु, बालगोबिन भगत गाए जा रहे हैं! हाँ, गाते-गाते कभी-कभी पतोहू के नज़दीक भी जाते और उसे रोने के बदले उत्सव मनाने को कहते! आत्मा परमात्मा के पास चली गई, विरहनी अपने प्रेमी से जा मिली, भला इससे बढ़कर आनंद की कौन बात? मैं कभी-कभी सोचता, यह पागल तो नहीं हो गए। किंतु नहीं, वह जो कुछ कह रहे थे, उसमें उनका विश्वास बोल रहा था-वह चरम विश्वास, जो हमेशा ही मृत्यु पर विजयी होता आया है।

गर्मियों में घर के आँगन में ही उसके कुछ प्रेमी आ बैठते और खंजड़ी और तालियों की लय बालगोबिन आगे-आगे गाते पीछे प्रेमी मंडल दोहरात। धीरे-धीरे उनका स्वर ऊँचा होता जाता और मन शरीर पर हावी हो जाता देखते-देखते बालगोबिन नाचने लगते। बालगोबिन भगत की संगीत की उत्कर्षता उसके इकलौते बेटे की मृत्यु पर देखने को मिला। बालगोबिन का मानना था कि बीमार और कमजोर लोगों को प्रेम की अधिक आवश्यकता होती है। बेटे की लाश को आँगन में लिटाकर फूल और तुलसी उस पर बिखेर रखी थी। बालगोबिन जमीन पर बैठे अपने पुराने स्वर और तल्लीन भाव से गा रहे थे। गाने के बीच में वे अपनी पुत्रवधु को रोने के बदले उत्सव मनाने को कह रहे थे। वे कहते आत्मा और परमात्मा के मिलन से बढ़कर कोई आनंद नहीं है। लेखक को वह कभी पागल लग रहा था, तो कभी उसमें उनका मृत्यु पर विजय प्राप्त करने का दृढ़ विश्वास बोलता दिखाई दे रहा था।

बेटे के क्रिया-कर्म में तूल नहीं किया; पतोहू से ही आग दिलाई उसकी। किंतु ज्योंही श्राद की अवधि पूरी हो गई, पतोहू के भाई को बुलाकर उसके साथ कर दिया, यह आदेश देते हुए कि इसकी दूसरी शादी कर देना। उनकी जाति में पुनर्विवाह कोई नई बात नहीं, किंतु पतोहू का आग्रह था कि वह यहीं रहकर भगत जी की सेवा-बंदगी में अपने वैधव्य के दिन गुज़ार देगी। लेकिन, भगत जी का कहना था-नहीं, यह अभी जवान है, वासनाओं पर बरबस काबू रखने की उम्र नहीं है इसकी। मन मतंग है, कहीं इसने गलती से नीच-ऊँच में पैर रख दिए तो। नहीं-नहीं, तू जा। इधर पतोहू रो-रोकर कहती। मैं चली जाऊँगी तो बुढ़ापे में कौन आपके लिए भोजन बनाएगा, बीमार पड़े, तो कौन एक चुल्लू पानी भी देगा? मैं पैर पड़ती हूँ, मुझे अपने चरणों से अलग नहीं कीजिए। लेकिन भगत का निर्णय अटल था। तू जा, नहीं तो, मैं ही इस घर को छोड़कर चल दूँगा-यह थी उनकी आखिरी दलील और इस दलील के आगे बेचारी की क्या चलती?

बालगोबिन भगत की मौत उन्हीं के अनुरूप हुई। वह हर वर्ष गंगा-स्नान जाते। स्नान पर उतनी आस्था नहीं रखते, जितना संत-समागम और लोक-दर्शन पर। पैदल ही जाते। करीब तीस कोस पर गंगा थी। साधु को संबल लेने का क्या हक? और, गृहस्थ किसी से भिक्षा क्यों माँगे? अत: घर से खाकर चलते, तो फिर घर पर ही लौटकर खाते। रास्ते भर खँजड़ी बजाते, गाते जहाँ प्यास लगती, पानी पी लेते। चार-पाँच दिन आने-जाने में लगते; किंतु इस लंबे उपवास में भी वही मस्ती! अब बुढ़ापा आ गया था, किंतु टेक वही जवानीवाली। इस बार लौटे, तो तबीयत कुछ सुस्त थी। खाने-पीने के बाद भी तबीयत नहीं सुधरी, थोड़ा बुखार आने लगा। किंतु नेम-वृत तो छोड़नेवाले नहीं थे। वहीं दोनों जून गीत, स्नानध्यान, खेतीबारी देखना। दिन-दिन छीजने लगे। लोगों ने नहाने-धोने से मना किया, आराम करने को कहा। किंतु, हँसकर टाल देते रहे। उस दिन भी संध्या में गीत गाए, किंतु, मालूम होता, जैसे तागा टूट गया हो, माला का एक-एक दाना बिखरा हुआ। भोर में लोगों ने गीत नहीं सुना, जाकर देखा तो बालगोबिन भगत नहीं रहे, सिर्फ़ उनका पंजर पड़ा हैं!

बालगोबिन भगत ने क्रिया-कर्म संबंधी रीति एवं परंपराओं की चिंता न करते हुए अपनी पुत्रवधु से ही बेटे को आग दिलाई। श्राद्ध आदि के बाद उन्होंने पुत्रवधू को उसके भाई के साथ भेजते हुए कहा कि इसकी दूसरी शादी करा देना। किंतु बहू भगत जी की सेवा में ही अपने बाकी दिन बिताना चाहती थी। भगत जी ने समय और समाज एवं बहू की उम्र को देखते हुए उसे वहाँ रखने से मना कर दिया। बहू वहीं रहने की बात करती है तो भगत जी घर छोड़ कर जाने की बात कह देते हैं। बेचारी चली गई।

बालगोबिन भगत हर वर्ष गंगा-स्नान के लिए 30 कोस पैदल जाते और आते। वे रास्ते में किसी का सहारा लेते और न ही किसी का कुछ खाते। बुढ़ापे में भी जवानी जैसा जोश था। अंतिम बार जब नहाकर आए तो बीमार रहने लगे किंतु अपने नियम नहीं छोड़े। अंतिम संध्या के समय जब उन्होंने गाया तो आवाज में बिखराव आया हुआ था। सुबह के समय जब लोगों ने गीत नहीं सुना तो आकर देखा कि बालगोबिन भगत इस दुनिया से प्रस्थान कर चुके थे।

शब्दार्थ

मँझोला-न बहुत बड़ा न बहुत छोटा। कमली-कंबल। पतोहू-पुत्रवधू। रोपनी धान की रोपाई। कलेवा-सवेरे का जलपान। पुरवाई-पूरब की ओर से बहने वाली हवा। अधरतिया-आधी रात। खँजड़ी-ढफली के ढंग का आकार में उससे छोटा एक वाद्य यंत्र। निस्तब्धता-सन्नाटा। प्रभाती-प्रात: काल गाया जाने वाला गीत। लोही-प्रात: काल की लालिमा। कुहासा-काहरा। आवृत-ढका हुआ। कुश-एक प्रकार की नुकीली घास। बोदा- कम बुद्धि वाला। मतंग-बादल। संबल-सहारा।

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धान की रोपाई के समय समूचे माहौल को भगत की स्वर लहरियाँ किस प्रकार चमत्कृत कर देती थीं? उस माहौल का शब्द चित्र-प्रस्तुत कीजिए।

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