क्षितिज(Kshitij-Textbook)-Textbook Questions (CBSE Class-10 Hindi): Questions 114 - 123 of 156

Get 1 year subscription: Access detailed explanations (illustrated with images and videos) to 2295 questions. Access all new questions we will add tracking exam-pattern and syllabus changes. View Sample Explanation or View Features.

Rs. 1650.00 or

Passage

पाठ-15

महावीर प्रसाद दव्वेदी

”आधुनिक हिन्दी-साहित्य की परम्परा में नवीन भावनाओं

के अभ्युत्थान का श्रेय यदि भारतेन्दु हरिचन्द्र जी को

प्राप्त है तो नवीन भावनाओं के पारिष्कार का श्रेय

आचार्य महावीर प्रसाद दव्वेदी जी को दिया जाता है।

हिन्दी साहित्य के संस्कार परिष्कार में दव्वेदी जी ने

अपना संपूर्ण जीवन होम कर दिया। साहित्य के क्षेत्र

में वे लौह लेखनी लेकर पधारे थे। नि: सन्देह दव्वेदी

जी ने अपने युग में बहुत सारे उच्च काटि के

साहित्यकार पैदा करने में सफल रहे।”

जीवन-परिचय- महान्‌ युग के प्रवर्तक एवं दव्वेदी युग के नायक महावीर प्रसाद दव्वेदी का जन्म उत्तर-प्रदेश के रायबरेली जिले के दौलतपुर गाँव में सन्‌ 1864 में हुआ था। आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण वे बड़ी कठिनाई से स्कूल तक की शिक्षा प्राप्त कर सके। पढ़ाई छोड़कर उन्होंने रेलवे में नौकरी कर ली। धीरे-धीरे उनकी रुचि हिन्दी साहित्य और कविता लेखन की ओर बढ़ने लगी। दव्वेदी जी ने कवियों को नवीन काव्य चेतना से अनुप्राणित कर उन्हें एक निश्चित दिशा प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने नौकरी से इस्तीफा देकर सन्‌ 1903 में प्रसिद्ध हिन्दी मासिक पत्रिका ’सरस्वती’ का सम्पादन अपने हाथों में संभाला। उन्होंने नए कवियों की रचनाओं को ’सरस्वती’ में स्थान देकर उन्हें काव्य-रचना के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित किया। सन्‌ 1938 में उनका निधन हो गया।

प्रमुख रचनाएँ- महावीर प्रसाद दव्वेदी एक व्यवस्थित संपादक, भाषा वैज्ञानिक, पुरात्ववेता, इतिहासकार, समाजशास्त्री, अर्थशास्त्री, वैज्ञानिक चिंतन व लेखन के स्थापक, अनुवादक और समालोचक थे। उनकी प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं-

1 रसज्ञ रंजन 2 अद्भुत आलाप 3 विचार विमर्श 4 संकलन 5 साहित्य-सीकर 6 कालीदास की निरंकुशता 7 कालीदास और उनकी कविता 8 हिन्दी भाषा की उत्पत्ति 9 अतीत-स्मृति 10 वाग्‌ विलास आदि।

साहित्यिक विशेषताएँ- महावीर प्रसाद दव्वेदी ने साहित्य की प्रत्येक विधा को बड़ा बल दिया। वे सब कुछ थे, किन्तु कवि थोड़े-थोड़े थे। वे सफल अनुवादक, पत्रकार और संपादक थे। उन्होंने अपनी रचनाओं के बल पर तत्कालीन साहित्य में प्रचलित रूढ़ियों का संगठित और जबरदस्त विरोध किया। उन्होंने समाज में व्याप्त कायरता, रूढ़िवादिता, घूसखोरी जैसी बुराइयों पर चोट की उन्होंने भाषा संस्कार का भी आंदोलन छेड़ा। उन्होंने छुआछुत, बाल-विवाह, दहेज-प्रथा, देश-प्रेम जैसे विषयों पर रचनाएँ की। समालोचन को हिन्दी-साहित्य में स्थापित करने का भी श्रेय उन्ही को जाता है।

भाषा शैली- आचार्य महावीर प्रसाद दव्वेदी भाषा के आचार्य थे। इनकी भाषा अत्यंत परिमार्जित, परिष्कृत एवं व्याकरण सम्मत है। जिसमें पर्याप्त गति तथा प्रवाह देखने को मिलता है। इन्होंने हिन्दी शब्द भण्डार की श्री वृद्धि में अदव्तीय सहयोग दिया है। शब्दों के प्रयोग में दव्वेदी जी को रुढ़िवादी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि आवश्यकतानुसार अरबी फारसी तथा अंग्रेजी के शब्दों का भी इन्होंने इस्तेमाल किया है। कठिन से कठिन विषय को बोधगम्य रूप में प्रस्तुत करना इनकी शैली की सबसे बड़ी विशेषता रही है। कुल मिलाकर दव्वेदी जी की भाषा शैली संपूर्ण रूप से व्यास शैली रही है।

स्त्री-शिक्षा के विरोधी कुतर्को का खंडन

प्रस्तुत लेख महावीर प्रसाद दव्वेदी द्वारा रचित विचारात्मक लेख है। इसमें ऐसी सभी पुरानी रूढ़ियों का विरोध किया गया है जो नारी-शिक्षा को व्यर्थ और समाज के विघटन का कारण बताती हैं। यह लेख सितंबर, 1914 में ’सरस्वती’ पत्रिका में पहली बार ’पढ़े लिखों का पांडित्य’ नामक शीर्षक से प्रकाशित हुआ था। बाद में ’महिला मोद’ नामक पुस्तक में शामिल करते समय दव्वेदी जी ने इसका शीर्षक बदलकर ’ स्त्री-शिक्षा के विरोधी कुतर्को का खंडन’ रख दिया। इसमें सड़ी-गली परंपराओं को ज्यों का त्यों न अपनाकर अपने विवेक से ग्रहण करने योग्य बातों को ही लेने के लिए कहा गया है। आज लड़कियाँ किसी भी क्षेत्र में लड़कों से पीछे नहीं हैं, समाज में अपनी पहचान बनाने के लिए बहुत से स्त्री-पुरुषों ने कड़ा संघर्ष भी किया है। वर्तमान जागरण काल में स्त्री-शिक्षा के विकास के साथ-साथ जनतांत्रिक एवं वैचारिक चेतना के भी संपूर्ण विकास पर बल दिया जाना चाहिए।

बढ़े शोक की बात है, आजकल भी ऐसे लोग विद्यमान हैं जो स्त्रियों को पढ़ाना उनके और गृह-सुख के नाश का कारण समझते हें। और, लोग भी ऐसे-वैसे नहीं, सुशिक्षित लोग-ऐसे लोग जिन्होंने बड़े-बड़े स्कूलों और शायद कॉलेजों में भी शिक्षा पाई है, जो धर्म-शास्त्र और संस्कृत के ग्रंथ साहित्य से परिचय रखते हैं, और जिनका पेशा कुशिक्षितों को सुशिक्षित करना, कुमार्गगामियों को सुमार्गगामी बनाना और अधार्मिका को धर्मतत्व समझना है। उनकी दलीलें सुन लीजिए-

1. पुराने संस्कृत-कवियों के नाटकों में कुलीन स्त्रियों से अपढ़ों की भाषा में बातें कराई गई हैं। इससे प्रमाणित है कि इस देश में स्त्रियों को पढ़ाने की चाल न थी। होती तो इतिहास-पुराणादि में उनको पढ़ाने की नियमबद्ध प्रणाली ज़रूर लिखी मिलती।

2. स्त्रियों को पढ़ाने से अनर्थ होते हैं। शकुंतला इतना कम पढ़ी थी कि गंवारों की भाषा में मुश्किल से एक छोटा-सा श्लोक वह लिख सकी थी। तिस पर भी उसकी इस इतनी कम शिक्षा ने भी अनर्थ कर डाला। शकुंतला ने जो कटु वाक्य दुष्यंत को कहे, वह इस पढ़ाई का ही दुष्परिणाम था।

3. जिस भाषा में शकुंतला ने श्लोक रचा था वह अपढ़ों की भाषा थी। अतएव नागरिकों की भाषा की बात तो दूर रही, अपढ़ गंवारों की भी भाषा पढ़ाना स्त्रियों को बरबाद करना है।

इस तरह की दलीलों का सबसे अधिक प्रभावशाली उत्तर उपेक्षा ही है। तथापि हम-दो चार बातें लिखें देते हैं।

लेखक इस बात पर दुख व्यक्त करता है कि वर्तमान समय में भी बहुत से ऐसे सभ्य और सुशिक्षित व्यक्ति हैं जो स्त्री-शिक्षा को अवनति का कारण मानते हैं। ऐसे शिक्षित लोग जो शिक्षक हैं, विद्वान हैं, साहित्यकार हैं, अपने विचार प्रकट करते हुए कहते हैं कि पुराने संस्कृत नाटकों से भी यही सिद्ध होता है। कि स्त्री-शिक्षा नहीं है। स्त्रियों को पढ़ाने से अनर्थ होता है, यदि शकुंतला अनपढ़ होती तो अपने पति के विषय में कटुवचन कदापि नहीं कहती। शकुंतला ने अपढ़ों की भाषा का प्रयोग किया था। अत: अपढ़ों की भाषा सिखाना भी विनाश की ओर जाना है।

नाटकों में स्त्रियों का प्राकृत बोलना उनके अपढ़ होने का प्रमाण नहीं। अधिक से अधिक इतना ही कहा जा सकता है कि वे संस्कृत न बोल सकती थीं। संस्कृत न बोल सकना न अपढ़ होने का सबूत है और न गंवार होने का। वाल्मीकि-रामायण के तो बंदर तक संस्कृत बोलते हैं। बंदर संस्कृत बोलते हैं। बंदर संस्कृत बोल सकते थे, स्त्रियाँ न बोल सकती थीं! अच्छा तो उत्तररामचरित में ऋषियों की वेदांतवादिनी पत्नियाँ कौन-सी भाषा बोलती थीं? उनकी संस्कृत क्या कोई गंवारी संस्कृत थी? भवभूति और कालिदास आदि के नाटक जिस जमाने के हैं उस ज़माने में शिक्षितों का समस्त समुदाय संस्कृत ही बोलता था, इसका प्रमाण पहले कोई दे ले तब प्राकृत बोलने वाली स्त्रियों को अपढ़ बताने का साहस करे। इसका क्या सबूत कि उस ज़माने में बोलचाल की भाषा प्राकृत न थी? सबूत तो प्राकृत के चलन के ही मिलते हैं। प्राकृत यदि उस समय की प्रचलित भाषा न होती तो बौद्धों तथा जैनों के हज़ारों ग्रंथ उसमें क्यों लिखे जाते, और भगवान शाक्य मुनि तथा उनके चेले प्राकृत ही में क्यों धर्मोपदेश देते? बौद्धों का त्रिपिटक गंथ हमारे महाभारत से भी बड़ा है। उसकी रचना प्राकृत में की जाने का एक मात्र कारण यही है कि उस ज़माने में प्राकृत ही सर्वसाधारण की भाषा थी। अतएव प्राकृत बोलना और लिखना अपढ़ और अशिक्षित होने का चिहृ नहीं। जिन पंडितों ने गाथा-सप्तशती, सेतुबंध-महाकाव्य और कुमारपालचरित आदि ग्रंथ प्राकृत में बनाए है, वे यदि अपढ़ और गंवार थे तो हिंदी के प्रसिद्ध से भी प्रसिद्ध अखबार का संपादक इस ज़माने में अपढ़ और गंवार कहा जा सकता है; क्योंकि वह अपने ज़माने की प्रचलित भाषा मेंं अखबार लिखता है। हिंदी, बांग्ला आदि भाषाएँ आजकल की प्राकृत हैं, शौरसेनी, मागधी, महाराष्ट्री और पाली आदि भाषाएं उस ज़माने की थीं। प्राकृत पढ़कर भी उस ज़माने में लोग उसी तरह सभ्य, शिक्षित और पंडित हो सकते थे जिस तरह कि हिंदी, बांग्ला, मराठी आदि भाषाएँ पढ़कर इस ज़माने में हम हो सकते हैं। फिर प्राकृत बोलना अपढ़ होने का सबूत है, यह बात कैसे मानी जा सकती हैं?

नाटकों में स्त्रियाँ संस्कृत न बोलकर प्राकृत भाषा का प्रयोग करती थीं जो अनपढ़ और गंवार होने का प्रमाण नहीं है। कई जगह तो वन्य प्राणियों से भी संस्कृत बुलवाई गई हैं। भवभूति और कालिदास के समय में सभी शिक्षित संस्कृत बोलते थे। लेखक यह भी पूछता है कि इसका क्या प्रमाण है कि पहले समय में प्राकृत बोलचाल की भाषा नहीं थी। बौद्धों, जैनों के लिखित ग्रंथ तथा भगवान शाक्य द्वारा उपदेश प्राकृत भाषा में दिये जाने से तो यह सिद्ध होता है कि प्राकृत भाषा उस समय बोली जाती थी। प्राकृत उस समय सर्वसाधारण की भाषा थी। उस समय शौरसेनी, मागधी, महाराष्ट्री, पाली आदि आदि भाषाएँ प्राकृत थीं, आज हिन्दी, बांग्ला आदि हैं। जिस प्रकार आज हम हिंदी, मराठी आदि पढ़कर शिक्षित और विद्वान होते है ठीक उसी तरह उस जमाने में लोग प्राकृत पढ़कर होते थे।

जिस समय आचार्यों ने नाट्‌यशास्त्र-संबंधी नियम बनाए थे उस समय सर्व-साधारण की भाषा संस्कृत न थी। चुने हुए लोग ही संस्कृत बोलते या बोल सकते थे। इसी से उन्होंने उनकी भाषा संस्कृत और दूसरे लोगों तथा स्त्रियों की भाषा प्राकृत रखने का नियम कर दिया।

पुराने ज़माने में स्त्रियों के लिए कोई विश्वविद्यालय न था। फिर नियमबद्ध प्रणाली का उल्लेख आदि पुराणों में न मिले तो क्या आश्चर्य। और, उल्लेख उसका कहीं रहा हो, पर नष्ट हो गया हो तो? पुराने ज़माने में विमान उड़ते थे। बताइए उनके बनाने की विद्या सिखाने वाला कोई शास्त्र! बड़े-बड़े जहाज़ों पर सवार होकर लोग दव्ीपांतरों को जाते थे। दिखाइए, जहाज बनाने की नियमबद्ध प्रणाली के दर्शक ग्रंथ! पुराणादि में विमानों और जहाज़ों दव्ारा की गई यात्राओं के हवाले देखकर उनका अस्तित्व तो हम बड़े गर्व से स्वीकार करते हैं, परंतु पुराने ग्रंथों में अनके प्रगल्भ पंडिताओं के नामोल्लेख देखकर भी कुछ लोग भारत की तत्कालीन स्त्रियों को मूर्ख, अपढ़ और गंवार बताते हैं। इस तर्कशास्त्रज्ञता और इस न्यायशीलता की बलिहारी! वेदों को प्राय: सभी हिंदू ईश्वर-कृत मानते हैं। सो ईश्वर तो वेद-मंत्रों की रचना अथवा उनका दर्शन विश्ववरा आदि स्त्रियों से करावे और उन्हें ककहरा पढ़ाना भी पाप समझें। शीला और विज्जा आदि कौन थीं? वे स्त्री थीं या नहीं? बड़े-बड़े पुरुष-कवियों से आदृत हुई हैं या नहीं? शार्ड. गधर- पद्धति में उनकी कविता के नमूने हैं या नहीं? बौद्ध-ग्रंथ त्रिपिटक के अंतर्गत थेरीगाथा में जिन सैकड़ों स्त्रियों की पद्य-रचना उद्धत है वे क्या अपढ़ थीं? जिस भारत में कुमारिकाओं को चित्र बनाने, नाचने, गाने, बजाने, फूल चुनने, हार गूंथने, पैर मलने तक की कला सीखने की आज्ञा थी उनको लिखने-पढ़ने की आज्ञा न थी। कौन विज्ञ ऐसी बात मुख से निकालेगा? और, कोई निकाले भी तो मानेगा कौन?

अत्रि की पत्नी-धर्म पर व्याख्यान देते समय घंटो पांडित्य प्रकृट करे, गार्गी बड़े-बड़े ब्रह्यवादियों को हरा दे, मंडन मिश्र की सहधर्मचारिणी शंकराचार्य के छक्के छुड़ा दे! गज़ब! इससे अधिक भयंकर बात और क्या हो सकेगी! यह सब पापी पढ़ने का अपराध है। न वे पढ़तीं, न वे पूजनीय पुरुषों का मुकाबला करतीं। यह सारा दुराचार स्त्रियों को पढ़ाने ही का कुफल है। समझे। एम. ए. , बी. ए. , शास्त्री और आचार्य होकर पुरुष जो स्त्रियों पर हंटर फटकारते हैं और डंडों से उनकी खबर लेते हैं वह सारा सदाचार पुरुषों की पढ़ाई की पढ़ाई का सुफल है! स्त्रियों के लिए पढ़ना कालकूट और पुरुषों के लिए पीयूष का घूँट! ऐसी ही दलीलों और दृष्टांतों के आधार पर कुछ लोग स्त्रियों को अपढ़ रखकर भारतवर्ष का गौरव बढ़ाना चाहते हैं।

लेखक बताता है कि जिस समय नाट्‌यशास्त्र संबंधी नियम बनाए गए थे तब संस्कृत बोलने वालों की संख्या बहुत कम थी। इसी कारण आचार्यो ने सामान्य लोगों और स्त्रियों को प्राकृत भाषा को अपनाने के लिए कहा। पहले समय में स्त्रियों के लिए विश्वविद्यालय न होने के कारण उन्हें नियमानुसार शिक्षा नहीं मिल पाती थी। नए-नए आविष्कारों और खोज संबंधी ग्रंथों के अस्तित्व को तो हम स्वीकार करते हैं किंतु उस समय की स्त्रियों को अनपढ़ एवं गंवार बताते हैं। प्राय: हिन्दू मानते हैं कि वेदों की रचना ईश्वर ने वेद-मंत्रों का उच्चारण स्त्रियों से करवाया है और मनुष्य है कि स्त्री को पढ़ाना पाप मानता है। जहाँ स्त्रियों को सभी प्रकार के कार्य करने की अनुमति हो, वहाँ स्त्री को पढ़ने की अनुमति न हो, इस पर विश्वास नहीं होता। ऋषि-पत्नियाँ व्याख्यान में बड़े-बड़े विद्वानों को परास्त कर देती थीं। व्यंग्यात्मक रूप में लेखक कहता है कि वे स्त्रियाँ पढ़ती नहीं तो महान पुरुषों से मुकाबला करने का पाप न होता। पढ़ाई का सदुपयोग तो पुरुष स्त्री पर अत्याचार करके करता है। स्त्री के लिए शिक्षा ज़हर और पुरुष के लिए शिक्षा अमृत बताई गई है। ऐसे लोग इस प्रकार के तर्क देकर स्त्री को अनपढ़ रखकर भारत का गौरव बढ़ाने में लगे रहते हैं।

मान लीजिए कि पुराने ज़माने में भारत की एक भी स्त्री पढ़ी-लिखी न थी। न सही। उस समय स्त्रियों को पढ़ाने की जरूरत न समझी गई होगी। पर अब तो है। अतएव पढ़ाना चाहिए। हमने सैकड़ों पुराने नियमों, आदेशों और प्रणालियों को तोड़ दिया है या नहीं? तो, चलिए, स्त्रियों को अपढ़ रखने की इस पुरानी चाल को भी तोड़ दें। हमारी प्रार्थना तो यह है कि स्त्री-शिक्षा के विपक्षियों को क्षणभर के लिए भी इस कल्पना को अपने मन में स्थान न देना चाहिए कि पुराने ज़माने में यहाँ की सारी स्त्रियाँ अपढ़ थीं अथवा उन्हें पढ़ने की आज्ञा न थी। जो लोग पुराणों में पढ़ी-लिखी स्त्रियों के हवाले माँगते हैं। उन्हें श्रीमद्भागवत, दशमस्कंध, के उत्तरार्द्ध का त्रेपनवां अध्याय पढ़ना चाहिए। उसमें रुक्मिणी-हरण की कथा है। रुक्मिणी ने जो एक लंबा-चौड़ा पत्र एकांत में लिखकर, एक ब्राह्यण के हाथ, श्रीकृष्ण को भेजा था वह तो प्राकृत में न था। उसके प्राकृत में होने का उल्लेख भागवत में तो नहीं। उसमें रुक्मिणी ने जो पांडित्य दिखाया है वह उसके अपढ़ और अल्पज्ञ होने अथवा गँवारपन का सूचक नहीं। पुराने ढंग के पक्के सनातन-धर्मवलंबियों की दृष्टि में तो नाटकों की अपेक्षा भागवत का महत्व बहुत ही अधिक होना चाहिए। इस दिशा में यदि उनमें से कोई यह कहे कि सभी प्राक्कालीन स्त्रियाँ अनपढ़ होती थीं तो उसकी बात पर विश्वास करने की ज़रूरत नहीं। भागवत की बात यदि पुराणकार या कवि की कल्पना मानी जाए तो नाटकों की बात उससे भी गई-बीती समझी जानी चाहिए।

लेखक अपना विचार प्रकट करते हुए कहता है कि माना पहले स्त्रियाँ पढ़ी-लिखी नहीं थीं किंतु आज समय बदल गया है इसलिए स्त्रियों को पढ़ाने पर बल दिया जाना चाहिए। रुक्मिणी ने जिस भाषा में श्रीकृष्ण को प्रेम-पत्र लिखा था वह प्राकृत में नहीं था और न ही उससे उनके अनपढ़ या गंवार होने को प्रमाण मिलता है। सनातन-धर्मावलंबयाेिं की दृष्टि में नाटकों की अपेक्षा भागवत का महत्व अधिक होना चाहिए और इस आधार पर स्त्रियों की अनपढ़ता पर विश्वास नहीं किया जा सकता। यदि भागवान को कल्पना मानेंगे तो अन्य नाटकों को तो काई अस्तित्व ही नहीं है।

स्त्रियों का किया हुआ अनर्थ यदि पढ़ाने ही का परिणाम है तो पुरुषों का किया हुआ अनर्थ भी उनकी विद्या और शिक्षा ही का परिणाम समझना चाहिए। बम के गोले फेंकना, नरहत्या करना, डाके डालना, चोरियाँ करना, घूस लेना, व्यभिचार करना-यह सब यदि पढ़ने-लिखने ही का परिणाम हो तो सारे महाविद्यालय, विद्यालय और पाठशालाएँ बंद हो जानी चाहिए। परंतु विक्षिप्तों, बातव्यथितों और ग्रहग्रस्तों के सिवा ऐसी दलीलें पेश करने वाले बहुत ही कम मिलेंगे। शकुंतला ने दुष्यंत को कटु वाक्य कहकर कौन-सी अस्वाभाविकता दिखाई? क्या वह यह कहती कि-”आर्य पुत्र, शाबाश! बड़ा अच्छा काम किया जो मेरे साथ गांधर्व-विवाह करके मुकर गए। नीति, न्याय, सदाचार और धर्म की आप प्रत्यक्ष मूर्ति हैं! ” पत्नी पर घोर से घोर अत्याचार करके जो उससे ऐसी आशा रखते हैं वे मनुष्य-स्वभाव का किंचित्‌ भी ज्ञान नहीं रखते। सीता से अधिक साध्वी स्त्री नहीं सुनी गई। जिस कवि ने, शकुंतला नाटक में, अपमानित हुई शकुंलता से दुष्यंत के विषय में दुर्वाक्य कहाया है उसी ने परित्यक्त होने पर सीता से रामचंद्र के विषय में क्या कहाया है, सुनिए-

वाच्यस्त्वया मदव्चनात्‌ स राजा-

वहृाै विशुद्धामति यत्समक्षम्‌।

मां लोकवाद श्रवणादहासी:

श्रुतसय तंत्क्वं सदृशं कुलस्य?

अर्थ: -लक्ष्मण! ज़रा उस राजा से कह देना कि मैंनें तों तुम्हारी आँख के सामने ही आग में कूदकर अपनी विशुद्धता साबित कर दी थी। तिस पर भी, लोगों के मुख से निकला मिथ्यावाद सुनकर ही तुमने मुझे छोड़ दिया। क्या यह बात तुम्हारे कुल के अनुरूप है? अथवा क्या यह तुम्हारी विदव्ता या महत्ता को शोभा देनेवाली है? अर्थात्‌ तुम्हारा यह अन्याय तुम्हारे कुल, शील, पांडित्य सभी पर बट्टा लगाने वाला है।

यदि स्त्रियों को पढ़ाकर अनर्थ किया जा रहा है तो पुरुषों द्वारा किए जाने वाले अनर्थ को भी उनकी शिक्षा का फल समझा जाना चाहिए। उसके द्वारा किए जाने वाले असामाजिक कार्यों के आधार पर शिक्षण संस्थाएँ बंद कर देनी चाहिएँ। लेकिन इस तरह के तर्क देने वाले बहुत कम हैं। शकुंतला का दुष्यंत को फटकार लगाना स्वाभाविक था। पत्नी पर अत्याचार कर उससे अनुकूल व्यवहार की आशा करने वाले अज्ञानी हैं। इसी प्रकार की दशा राम द्वारा त्यागी गई सीता की थी। उसने भी लक्ष्मण के माध्यम से राम को भला-बुरा कहा है। इस प्रकार उनका त्याग करके राम ने अपने कुल, मर्यादा पर कलंक लगाया है।

सीता का यह संदेश कटु नहीं तो क्या मीठा है? रामचंद्र के कुल पर भी कलंकारोपण करना छोटी निर्भर्त्सना नहीं। सीता ने तो रामचंद्र को नाथ, देव, आर्यपुत्र आदि कहे जाने योग्य भी नहीं समझा। ’राजा’ मात्र कहकर उनके पास अपना संदेसा भेजा। यह उक्ति/न किसी वेश्या पुत्री की है, न किसी गंवार स्त्री की: किंतु महाब्रह्यज्ञानी राजा जनक की लड़की और मन्वादि महर्षियों के धर्मशास्त्रों का ज्ञान रखने वाली रानी की-

नृपस्य वर्णाश्रमपालनं यत्‌

स एव धर्मों मनुना प्रणीत:

सीता की धर्मशास्त्रज्ञता का यह प्रमाण, वहीं, आगे चलकर, कुछ ही दूर पर, कवि ने दिया है। सीता-परित्याग के कारण वाल्मीकि के समान शांत, नीतिज्ञ और क्षमाशील तपस्वी तक ने-”अस्त्येव मन्युर्भरताग्रजे में”- कहकर रामचंद्र पर क्रोध प्रकट किया है। अतएव, शकुंतला की तरह, अपने परित्याग को अन्याय समझने वाली सीता का रामचंद्र के विषय में कटुवाक्य कहना सर्वथा स्वाभाविक है। न यह पढ़ने-लिखने का परिणाम है न गंवारपन का, न अकुलीनता का।

सीता ने कटु वचन कहते हुए राम को नाथ या आर्यपुत्र आदि न कहकर ’राजा’ शब्द से संबोधित किया। वह कोई गंवार या पतीत नारी नहीं थी, वह तो परमज्ञानी राजा जनक की धर्मशास्त्रों का ज्ञान रखने वाली बेटी थी। सीता के त्याग से शांत, क्षमाशील स्वभाव वाले तपस्वी वाल्मीकि भी दुखी होकर राम पर अपना क्रोध व्यक्त करते हैं। अपने पर हुए अत्याचार के विरोध में सीता द्वारा कहे गए कटु वचन किसी अनपढ़, गंवार या कुलहीन नारी के नहीं हैं।

पढ़ने-लिखने में स्वयं कोई बात ऐसी नहीं जिससे अनर्थ हो सके। अनर्थ का बीज उसमें हरगिज नहीं। अनर्थ पुरुषों से भी होते हैं। अपढ़ों और पढ़े-लिखों, दोनों से। अनर्थ, दुराचार और पापाचार के कारण और ही होते हैं और वे व्यक्ति-विशेष का चाल-चलन देखकर जाने भी जा सकते हैं। अतएव स्त्रियों को अवश्य पढ़ाना चाहिए।

जो लोग यह कहते हैं कि पुराने ज़माने में यहाँ स्त्रियाँ न पढ़ती थीं अथवा उन्हें पढ़ने की मुमानियत थी वे या तो इतिहास से अभिज्ञता नहीं रखते या जान-बूझकर लोगों को धोखा देते हैं। समाज की दृष्टि में ऐसे लोग दंडनीय हैं। क्योंकि स्त्रियों को निरक्षर रखने का उपदेश देना समाज का अपकार और अपराध करना है- समाज की उन्नति में बाधा डालना है।

पढ़ाई करने से अनर्थ नहीं होता और न ही स्त्री को शिक्षा देने पर ही अनर्थ होता है। अनर्थ होना हो तो पुरुष से भी हो सकता है। समाज में होने वाले अत्याचार, दुराचार व्यक्ति विशेष के चरित्र और स्वभाव पर निर्भर हैं और उन्हें जाना भी जा सकता है। अत: स्त्री को अवश्य ही शिक्षित करना चाहिए। जो लोग पुराने समय में स्त्री-शिक्षा को आवश्यक नहीं बताते थे वे या तो इतिहास नहीं जानते या फिर लोगों को धोखा देने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे लोगों को दण्ड देना चाहिए। जो लोग स्त्रियों को शिक्षा दिलाने के पक्ष में नहीं है वे समाज का बुरा करने के साथ-साथ अपराध भी कर रहे हैं। और समाज के विकास में बाधक हैं।

’शिक्षा’ बहुत व्यापक शब्द है। उसमें सीखने योग्य अनेक विषयों का समावेश हो सकता है। पढ़ना-लिखना भी उसी के अंतर्गत है। इस देश की वर्तमान शिक्षा-प्रणाली अच्छी नहीं। इस कारण यदि कोई स्त्रियों को पढ़ाना अनर्थकारी समझे तो उसे उस प्रणाली का संशोधन करना या कराना चाहिए, खुद पढ़ने-लिखने को दोष न देना चाहिए। लड़कों ही की शिक्षा-प्रणाली कौन-सी बड़ी अच्छी है। प्रणाली बुरी होने के कारण क्या किसी ने यह राय दी है कि सारे विद्यालय और महाविद्यालय बंद कर दिए जाएँ? आप खुशी से लड़कियों और स्त्रियों की शिक्षा की प्रणाली का संशोधन कीजिए। उन्हें क्या पढ़ाना चाहिए, कितना पढ़ाना चाहिए, किस तरह की शिक्षा देना चाहिए और कहाँ पर देना चाहिए-घर में या विद्यालय में- इन सब बातों पर बहस कीजिए, विचार कीजिए, जी में आवे सो कीजिए; पर परमेश्वर के लिए यह न कहिए कि स्वयं पढ़ने-लिखने में कोई दोष है- वह अनर्थकर है, वह अभिमान का उत्पादक है, वह गृह-सुख का नाश करने वाला हैं। ऐसा कहना सोलहों आने मिथ्या है।

लेखक ने शिक्षा का विस्तृत क्षेत्र बताते हुए कहा है कि शिक्षा पढ़ने-लिखने के अतिरिक्त अनेक विषयों को सिखाने में सहायक है। देश की शिक्षा प्रणाली स्त्रियों के संदर्भ में अच्छी नहीं है तो स्वयं पढ़ने-लिखने को दोष न देकर शिक्षा प्रणाली लाने या संशोधन करवाने चाहिएँ। यह भी निर्धारित करना चाहिए कि स्त्रियों का क्या, कितना, किस प्रकार और कहाँ पढ़ाना चाहिए। इस विषय में लेखक ने अपनी मन-मानी करने को कहा है किंतु यह कहना एकदम गलत है कि स्त्री को पढ़ाना अनर्थ है, उसमें अभिमान उत्पन्न करने वाला है, घर के सुख का नाश करने वाला है।

शब्दार्थ

विद्यमान-उपस्थित। कुमार्गगामी-बुरी राह पर चलने वाले। सुमार्गगामी- अच्छी राह पर चलने वाला। अधार्मिक-धर्म से संबंध न रखने वाला। धर्मत्व- धर्म का सार। दलीलें-तर्क। अनर्थ-बुरा, अर्थहीन। अपढ़ों-अनपढ़ों। उपेक्षा- ध्यान न देना। प्राकृत-एक प्राचीन भाषा। वेदांतवादिनी-वेदांत दर्शन पर बोलने वाली। दर्शक ग्रंथ- जानकारी देने वाली या दिखाने वाली पुस्तकें। तत्कालीन-उस समय का। तर्कशास्त्रज्ञता- तर्कशास्त्र को जानने वाला। न्यायशीलता- न्याय के अनुसार आचरण करना। कुतर्क- अनुचित तर्क। खंडन- दूसरे के मत का युक्तिपूर्वक निराकरण। प्रगल्भ-प्रतिभावान। नामोल्लेख-नाम का उल्लेख करना। आदृत- सम्मानित। विज्ञ-विदव्ान। ब्रह्यवादी-वेद पढ़ने-पढ़ाने वाला। दुराचार-निंदनीय आचरण। सहध र्मचारिणी- पत्नी। कालकूट-ज़हर। पीयूष-अमृत। दृष्टांत-उदाहरण, मिसाल। अल्पज्ञ-थोड़ा जानने वाला। प्राक्कालीन-पुरानी। व्यभिचार-पाप। विक्षिप्त-पागल। बात व्यथित-बातों से दुखी होने वाले। ग्रह ग्रस्त- पाक ग्रह से प्रभावित। किंचित्‌-थोड़ा। दुर्वाक्य-निंदा करने वाला वाक्य या बात। परित्यक्त-पूरे तौर पर छोड़ा हुआ। मिथ्यावाद-झूठी बात। कलंकारोपण- दोष मढ़ना, दोषी ठहराना। निर्भतर्सना-तिरस्कार, निंदा। नीतिज्ञ-नीति जानने वाला। हरगिज-किसी गलत में। मुमानियत-रोक, मनाही। अभिज्ञता- जानकारी, ज्ञान। अपकार-अहित।

Question number: 114 (4 of 8 Based on Passage) Show Passage

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Textbook Questions » महावीर प्रसाद द्धिवेदी स्त्री- शिक्षा के विरोधकुतर्को

Essay Question▾

Describe in Detail

लेखक दव्वेदी दव्ारा रचित प्रस्तुत लेख में परंपरा के उन्हीं पक्षों को स्वीकार किया जाना चाहिए जो स्त्री-पुरुष समानता को बढ़ाते हों-तर्क सहित उत्तर दीजिए।

Explanation

हमारा समाज पहले से ही पुरुष प्रधान है। समाज में जो भी परंपराएँ व नियम है वे सब पुरुषों के माध्यम से ही निर्धारित होते हैं। इसलिए नारी के विकास व पतन के पीछे भी पुरुषों का ही हाथ हैं। नारी और नर दोनों एक दूसरे के पूरक है इसलिए… (97 more words) …

Question number: 115 (5 of 8 Based on Passage) Show Passage

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Textbook Questions » महावीर प्रसाद द्धिवेदी स्त्री- शिक्षा के विरोधकुतर्को

Essay Question▾

Describe in Detail

लेखक दव्वेदी दव्ारा रचित प्रस्तुत लेख में तब की शिक्षा प्रणाली और अब की शिक्षा प्रणाली में क्या अंतर है? स्पष्ट करें।

Explanation

तब की शिक्षा प्रणाली में नारी को बिलकुल शिक्षित नहीं किया जाता है एवं हर व्यक्ति नारी को पढ़ाने के पक्ष में नहीं था। पर आज के समय में एक नारी को हर जगह शिक्षित किया जाता है उसे हर क्षेत्र में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी जाती हैं। आज… (46 more words) …

Question number: 116 (6 of 8 Based on Passage) Show Passage

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Textbook Questions » महावीर प्रसाद द्धिवेदी स्त्री- शिक्षा के विरोधकुतर्को

Essay Question▾

Describe in Detail

लेखक दव्वेदी दव्ारा रचित प्रस्तुत लेख में कुछ पुरातन पंथी लोग स्त्रियों की शिक्षा के विरोधी थे। दव्वेदी जी ने क्या-क्या तर्क देकर स्त्री-शिक्षा का समर्थन किया?

Explanation

कुछ पुरातन पंथी लोग स्त्रियों की शिक्षा के विरोधी थे। दव्वेदी जी ने स्त्री शिक्षा के विरोध के पक्ष में समर्थन देते हुए कहा है कि माना कि भारत में पुराने ज़माने में स्त्रीयों को नहीं पढ़ाया जाता था शायद उमय नारी को पढ़ा कर आगे बढ़ाना आवश्यक नहीं था… (85 more words) …

Question number: 117 (7 of 8 Based on Passage) Show Passage

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Textbook Questions » महावीर प्रसाद द्धिवेदी स्त्री- शिक्षा के विरोधकुतर्को

Essay Question▾

Describe in Detail

लेखक दव्वेदी दव्ारा रचित प्रस्तुत लेख में दव्वेदी जी की भाषा-शैली पर एक अनुच्छेद लिखिए।

Explanation

दव्वेदी जी की भाषा-शैली में स्पष्टता का भाव झलकलता है दव्वेदी दव्ारा रचित निबंध में कई जगह ऐसे शब्दों व वाक्यों का प्रयोग किया है जिनके कारण समाज के लोगों पर कटाक्ष प्रहार हुआ है। लेखक ने अपने तीखे व्यंग्यों के द्वारा समाज के लोंगों की सत्यता को प्रस्तुत किया… (46 more words) …

Question number: 118 (8 of 8 Based on Passage) Show Passage

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Textbook Questions » महावीर प्रसाद द्धिवेदी स्त्री- शिक्षा के विरोधकुतर्को

Essay Question▾

Describe in Detail

लेखक दव्वेदी दव्ारा रचित प्रस्तुत लेख में पुराने समय में स्त्रियों दव्ारा प्राकृतभाषा में बोलना क्या उनके अपढ़ होने का सबूत है? - पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।

Explanation

पुराने समय में स्त्रियों दव्ारा प्राकृतभाषा में बोलना उनके अपढ़ होने का सबूत नहीं हैं। नारी का संस्कृत भाषा बोलना यह साबित नहीं करता है कि वह अनपढ़ व गंवार हैं। ऐसे बहुत से सबुत मिले हैं जिनके आधार पर प्राकृत को उस समय की बोलचाल की भाषा कहा सकता… (92 more words) …

Passage

उत्साह

(1)

बादल, गरजो! -

घेर घेर घोर गगन, धाराधर ओ!

ल्लित ललित, काले घुँघराले,

बाल कल्पना के से पाले,

विद्युत-छबि उर में, कवि, नवजीवन वाले!

वज्र, छिपा, नूतन कविता

फिर भर दो-

बादल, गरजो!

(2)

विकल विकल, उन्मन थे उन्मन

विश्व के निदाघ के सकल जन,

आए अज्ञात दिशा से अनंत के घन!

तप्त धरा, जल से फिर

शीतल कर दो-

बादल, गरजो!

Question number: 119 (1 of 3 Based on Passage) Show Passage

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Textbook Questions » सूर्यकांत त्रिपाठी ’निराला’ उत्साह, अट नहीं रही है

Short Answer Question▾

Write in Short

कविता का शीर्षक ’उत्साह’ क्यों रखा गया है?

Question number: 120 (2 of 3 Based on Passage) Show Passage

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Textbook Questions » सूर्यकांत त्रिपाठी ’निराला’ उत्साह, अट नहीं रही है

Short Answer Question▾

Write in Short

कवि बादल से फुहार, रिमझिम या बरसने के स्थान पर ’गरजने’ के लिए क्यों कहता है?

Question number: 121 (3 of 3 Based on Passage) Show Passage

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Textbook Questions » सूर्यकांत त्रिपाठी ’निराला’ उत्साह, अट नहीं रही है

Short Answer Question▾

Write in Short

कविता में बादल किन-किन अर्थों की ओर संकेत करता है?

Passage

पाठ 17

भदंत आनंद कौसल्यायन

”हिन्दी साहित्य को समृद्ध करने और उसको

गौरव के उच्च शिखर तक पहुँचाने की दिशा

में साधनारत साहित्यकारों में भदंत आनंद

कौसल्याय का स्थान अग्रणी हैं, इन्होंने अपनी

रचनाओं दव्ारा पाठक के अंतर्मन में, सत्य और

अहिंसा की अग्नि प्रज्जवलित करने में समर्थ

सिद्ध रहे। इनके दव्ारा रचित ग्रन्थ भारतीय

साहित्य की अमूल्य निधि है।”

जीवन-परिचय- हिंदी के प्रसिद्ध संस्मरणकार श्री भदंत आनंद कौसल्यायन का जन्म पंजाब के अम्बाला जिले के सोहाना गाँव में सन्‌ 1905 में हुआ था। उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त कर बौद्ध धर्म अपना लिया और बौद्ध भिक्षु बन गए। बौद्ध भिक्षु होने के कारण उन्होंने विश्व-भ्रमण किया। उन्होंने हिंदी भाषा और साहित्य के विकास पर अधिक ध्यान दिया। इसके लिए उन्होंने पहले हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग के माध्यम से हिंदी का प्रचार-प्रसार किया। वे काफ़ी समय तक राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के सचिव पद पर भी नियुक्त रहे। कौसाल्यायन जी गाँधी जी से विशेष रूप से प्रभावित थे। उन्होंने गाँधी जी के साथ वर्धा में एक लंबा समय बिताया। सन्‌ 1988 में उनका स्वर्गवास हो गया।

प्रमुख रचनाएँ-श्री कौसाल्यायन जी ने बीस, पुस्तकें लिखी हैं। जिनमें मुख्य रूप से संस्मरण और रेखाचित्र रहे हैं। उनकी कुछ प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित है-

भिक्षु के पत्र, जो भूल ना सका, आह! ऐसी दरिद्रता बहानेबाजी, यदि बाबा ना होते, रेल का टिकट, कहाँ क्या देखा।

साहित्यिक विशेषताएँ-गाँधी जी के सहकर्मी होने के कारण श्री भदंत आनंद कौसल्यायन के साहित्य पर गाँधी की जीवन शैली की छाप को स्पष्ट देखा जा सकता है। उनके साहित्य पर पर्यटन और संगठन के कार्यों की छाप भी देखी जाती है। वे लेखक के साथ-साथ अनुवादक के रूप में भी विख्यात हैं। उनके यात्रा वृतांतों में विभिन्न स्थानों और दृश्य का आकर्षक चित्र है।

भाषा-शैली-श्री कौसल्यायन जी की भाषा सरल सपाट एवं रोचक है। कहीं-कहीं तत्सम, तद्भव के साथ-साथ देशी और उर्दू के शब्दों का भी सुंदर प्रयोग किया है। उनके द्वारा प्रस्तुत हुए भाव आसानी से समझ में आज जाते हैंं। उन्होंने वर्णनात्मक शैली के साथ-साथ संवादात्मक और आत्मकथात्मक शैली का आकर्षक प्रयोग किया है।

संस्कृति

प्रस्तुत निबंध में भदंत आनंद कौसल्यायन ने अनेक उदाहरण देकर सभ्यता और संस्कृति के विषय में समझाया है। उन्हाेेंने यह भी बताया कि दोनों एक ही वस्तु हैं या अलग-अलग हैं। सभ्यता और संस्कृति अनेक जटिल प्रश्नों से सीखने के लिए प्रेरित किया है। उन्होंने मानव संस्कृति को अविभाज्य मानते हुए, सभ्यता को संस्कृति का ही अंग माना है। उन्हें इस बात का आश्चर्य और दुख होता है कि लोग संस्कृति का बँटवारा कर रहे हैं। उस सभ्यता और संस्कृति का भी कोई महत्व नहीं जो मनुष्य के लिए कल्याणकारी न हो।

जो शब्द सब से कम समझ में आते हैं और जिनका उपयोग होता है सब से अधिक; ऐसे दो शब्द है सभ्यता और संस्कृति।

इन दो शब्दों के साथ जब अनेक विशेषण लग जाते हैं, उदाहरण के लिए जैसे भौतिक-सभ्यता और आध्यात्मिक-सभ्यता, तब दोनों शब्दों का जो थोड़ा बहुत अर्थ समझ में आया रहता है, वह भी गलत-सलत हो जाता है। क्या ये एक ही चीज़ हैं अथवा दो वस्तुएँ? यदि दो हैं तो दोनों में क्या अंतर है? हम इसे अपने तरीके पर समझने की कोशिश करें।

कल्पना कीजिए उस समय की जब मानव समाज का अंग्नि देवता से साक्षात्‌ नहीं हुआ था। आज तो घर-घर चूल्हा जलता है। जिस आदमी ने पहले पहल आग का आविष्कार किया होगा, वह कितना बड़ा आविष्कर्ता होगा।

अथवा कल्पना कीजिए उस समय की जब मानव को सुई-धागे का परिचय न था, जिस मनुष्य के दिमाग में पहले-पहल बात आई होगी कि लोहे के एक टुकड़े को घिसकर उसके एक सिरे को छेदकर और छेद में धागा पिरोकर कपड़े के दो टुकड़े एक साथ जोड़े जा सकते हैं, वह भी कितना बड़ा आविष्कर्ता रहा होगा।

लेखक बताता है कि सभ्यता और संस्कृति दो ऐसे शब्द है जिनका प्रयोग तो सबसे अधिक होता है लेकिन समझ में बहुत कम आते हैं और इनके साथ विशेषण लगने के बाद तो ये बिलकुल भी समझ में नहीं आते। प्रश्न उठता है कि सभ्यता और संस्कृति एक ही हैं या अलग-अलग और यदि अलग हैं तो इनमें क्या अंतर है? लेखक कहता है कि आग का आविष्कार करने वाला कोई महान आविष्कारक ही था। जिसके कारण आज घर-घर चूल्हा जल रहा है। या फिर सुई-धागे के विषय में कल्पना करें तो वह भी कितना बड़ा आविष्कारक होगा जिसने लोहे की पतली सूई बनाकर उसके एक सिरे में छेद करके कपड़े के दो टुकड़ों को जोड़ा।

इन्हीं दो उदाहरणों पर विचार कीजिए; पहले उदाहरण में एक चीज़ है किसी व्यक्ति विशेष की आग का आविष्कार कर सकने की शक्ति और दूसरी चीज़ है आग का आविष्कार। इसी प्रकार दूसरे सूई-धागे के उदाहरण में एक चीज़ है सूई-धागे का आविष्कार कर सकने की शक्ति और दूसरी चीज़ है सूई-धागे का आविष्कार।

जिस योग्यता, प्रवृति अथवा प्रेरणा के बल पर आग का व सूई-धागे का आविष्कार हुआ, वह है व्यक्ति विशेष की संस्कृति; और उस संस्कृति दव्ारा जो आविष्कार हुआ, जो चीज़ उसने अपने तथा दूसरों के लिए आविष्कृत की, उसका नाम सभ्यता।

जिस व्यक्ति में पहली चीज़ जितनी अधिक व जैसी परिष्कतृ मात्रा में होगी, वह व्यक्ति उतना ही अधिक व वैसा ही परिष्कृत आविष्कर्ता होगा।

एक संस्कृत व्यक्ति किसी नई चीज़ की खोज करता है; किंतु उसकी संतान को वह अपने पूर्वज से अनायास ही प्राप्त हो जाती है। जिस व्यक्ति की बुद्धि ने अथवा उसके विवेक ने किसी भी नये तथ्य का दर्शन किया, वह व्यक्ति ही वास्तविक संस्कृत व्यक्ति है और उसकी संतान जिसे अपने पूर्वज से वह वस्तु अनायास ही प्राप्त हो गई, वह अपने पूर्वज की भाँति सभ्य भले ही बन जाए, संस्कृत नहीं कहला सकता। एक आधुनिक उदाहरण लें। न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत का आविष्कार किया। वह संस्कृत मानव था। आज के युग का भौतिक विज्ञान का विद्यार्थी न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण से तो परिचित है ही; लेकिन उसके साथ और भी अनेक बातों का ज्ञान प्राप्त है, जिनसे शायद न्यूटन अपरिचित ही रहा। ऐसा होने पर भी हम आज के भौतिक विज्ञान के विद्यार्थी को न्यूटन की अपेक्षा अधिक सभ्य भले ही कह सके; पर न्यूटन जितना संस्कृत नहीं कह सकते।

यहाँ लेखक आग और सूई-धागे के आविष्कार पर ही विचार करने के लिए कहता है। एक तरफ व्यक्ति विशेष की आविष्कार करने की शक्ति और दूसरी तरफ आग है। जिस सामर्थ्य और प्रेरणा से मनुष्य ने आविष्कार किया वह उसकी संस्कृति है और उस संस्कृति के आधार पर आविष्कार करके लोगों तक पहँचाया जाना उसकी सभ्यता है। जिस व्यक्ति की जितनी शुद्ध संस्कृति होगी, वह उतना ही शुद्ध आविष्कारक होगा। जो व्यक्ति अपनी बुद्धि या धैर्य के बल पर नई वस्तु की खोज करता है, वह सच्चा संस्कृत व्यक्ति है, जबकि वह जब संतान को उसके पूर्वज में मिलती है तो संतान संस्कृत नहीं कहला सकते। यदि हम न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत का उदाहरण लें तो वह संस्कृत व्यक्ति है लेकिन इस सिद्धांत से ज्ञान प्राप्त करने वाले अधिक सभ्य विद्यार्थी संस्कृत नहीं कहला सकते।

आग के आविष्कार में कदाचित पेट की ज्वाला की प्रेरणा एक कारण रही। सुई-धागे के आविष्कार में शायद शीतोष्ण से बचने तथा शरीर को सजाने की प्रवृति का विशेष हाथ रहा। अब कल्पना कीजिए उस आदमी की जिसका पेट भरा है, जिसका तन ढँका है, लेकिन जब वह खुले आकाश के नीचे सोया हुआ राते के जगमगाते तारों को देखता है, तो उसको केवल इसलिए नींद नहीं आती क्योंकि वह यह जानने के लिए परेशान है कि आखिर यह मोती भरा थाल क्या है? पेट भरने और तन ढँकने की इच्छा मनुष्य की संस्कृति की जननी नहीं है। पेट भरा और तन भरा ढँका होने पर भी ऐसा मानव जो वास्तव में संस्कृत है, निठल्ला नहीं बैठ सकता। हमारी सभ्यता का एक बड़ा अंश हमें ऐसे संस्कृत आदमियों से ही मिला है, जिनकी चेतना पर स्थूल भौतिक कारणों का प्रभाव प्रधान रहा है, ंकंतु उसका कुछ हिस्सा हमें मनीषियों से भी मिला है, जिन्होंने तथ्य- विशेष को किसी भौतिक प्रेरणा के वशीभूत होकर नहीं, बल्कि उनके अपने अंदर की सहज संस्कृति के ही कारण प्राप्त किया है। रात के तारों को देखकर न सो सकने वाला मनीषी हमारे आज के ज्ञान का ऐसा ही प्रथम पुरस्कर्ता था।

भौतिक प्रेरणा, ज्ञानेप्सा-क्या ये दो मानव संस्कृति के माता-पिता हैं? दूसरे के मुँह में कौर डालने के लिए जो अपने मुँह का कौर छोड़ देता है, उसको यह बात क्यों और कैसे सूझती है? रोगी बच्चे को सारी रात गोद में लिए जो माता बैठी रहती है, वह आखिर ऐसा क्यो करती है? सुनते हैं कि रूस का भाग्य विधाता लेनिन अपने डैस्क में रखे हुए डबल रोटी के सुखे टुकड़े स्वयं न खाकर दूसरों को खिला दिया करता था। वह आखिर ऐसे क्यों करता था? संसार के मजदूरों को सुखी देखने का स्वप्न देखते हुए कार्लमार्क्स ने अपना सारा जीवन दुख में बिता दिया। और इन सब से बढ़कर आज नहीं, आज से ढाई हज़ार वर्ष पूर्व सिद्धार्थ ने अपना घर केवल इसलिए त्याग दिया कि किसी तरह तृष्णा के वशीभूत लड़ती-कटती मानवता सुख से रह सके।

लेखक बताता है कि आग के आविष्कार का कारण शायद भूख मिटाना रहा होगा और सूई-धागे का सरदी-गरमी से बचने और शरीर को सजाने के लिए हुआ होगा। लेखक अब इस आदमी को कल्पना करने को कहता है जो सभी तरह से तृप्त होकर अंतरिक्ष के विषय में जिज्ञासु है। लेखक उस व्यक्ति को सच्चा संस्कृत मानता है जिसका पेट भरा है और शरीर पर वस्त्र हैं फिर भी बेकार नहीं बैठा है। हमें संस्कृति का कुछ हिस्सा महान विचारकों से भी मिला है। अंदर की सहज संस्कृति के कारण ही ग्रह-नक्षत्रों का ज्ञान प्राप्त हुआ है। लेखक पूछता है कि संस्कृति क्या भौतिक प्रेरणा और ज्ञान प्राप्ति की इच्छा से ही उत्पन्न होती है और यदि ऐसा है तो फिर स्वयं दुख झेलकर दूसरों को सुख पहुँचाना, स्वयं अभावों में रहकर दूसरों को सुविधा देना क्या कहलाएगा? सिद्धार्थ ने भी घर इसी लिए छोड़ा था ताकि लोभ के वशीभूत व्यक्ति उनसे कुछ सीख लें।

हमारी समझ में मानव संस्कृति की जो योग्यता आग व सूई-धागे का आविष्कार कराती है; वह भी संस्कृति है; जो योग्यता तारों की जानकारी कराती है, वह भी है; और जो योग्यता किसी महामानव से सर्वस्व त्याग कराती है, वह भी संस्कृति है।

और सभ्यता? सभ्यता है संस्कृति का परिणाम। हमारे खाने-पीने के तरीके, हमारे ओढ़ने पहनने के तरीके, हमारे गमनागमन के साधन, हमारे परस्पर कट मरने के तरीके; सब हमारी सभ्यता है। मानव की जो योग्यता उससे आत्म-विनाश के साधनों का आविष्कार कराती है, हम उसे उसकी संस्कृति कहें या असंस्कृति? और जिन साधनों के बल पर वह दिन-रात आत्म-विनाश में जुटा हुआ है, उन्हें हम उसकी सभ्यता समझें या असभ्यता? संस्कृति का यदि कल्याण की भावना से नाता टूट जाएगा तो वह असंस्कृति होकर ही रहेगी और ऐसी संस्कृति का अवश्यभावी परिणाम असभ्यता के अतिरिक्त दूसरा क्या होगा?

हम अनेक बार संस्कृति और सभ्यता के खतरे में होने की बात सुनते हैं। हिटलर के आक्रमण के कारण मानव संस्कृति तो खतरे में पड़ी कही ही जाती है, लेकिन उसमें ज्य़ादा ज़ोर से हम अपने देश में ”हिंदू-संस्कृति” अथवा ”मुस्लिम-संस्कृति” के लिए खतरे की बात सुनते हैं। ताजिये को निकालने के लिए पीपल का तना कट गया, तो ”हिंदू-संस्कृति” खतरे में पड़ जाती है और मस्जिद के सामने बाजा बज गया तो ”मुस्लिम-संस्कृति” कहीं की नहीं रहती? हम न तो ”हिंदू-संस्कृति” को ही समझते हैं, न ”मुस्लिम-संस्कृति” को। ”हिंदुओं की संस्कृति” या ”मुसलमानों-संस्कृति” कुछ समझ में भी आती है, लेकिन यह ”हिंदू-संस्कृति” और ”मुस्लिम-संस्कृति” क्या बला है? लेकिन जिस देश में पानी और रोटी का भी हिंदू -मुस्लिम बँटवारा मौजूद हो, उसमें संस्कृति के बँटवारें पर क्या आश्चर्य है?

लेखक के अनुसार आग व सूई-धागे के आविष्कार से लेकर तारों का ज्ञान लेने वाला, महापुरुषों द्वारा सर्वस्य त्याग कराने की योग्यता संस्कृति है। संस्कृति से ही सभ्यता मिलती है। हमारा जीने का तरीका, आने -जाने के साधन, आपसी व्यवहार यह सब हमारी सभ्यता है। मानव की क्षमता जब विनाश के आविष्कार कर अमंगल की भावना से संलिप्त हो जाएगी तब वह असंस्कृति हो जाएगी और उसके द्वारा विनाश के साधनों पर बल दिया जाना निश्चित ही असभ्यता होगी। कई बार हम यह सुनते हैं कि हमारी सभ्यता और संस्कृति खतरे में है। लेकिन आज देश में धर्म के नाम पर अलग-अलग संस्कृति बनी हुई हैं। कहीं हिंदू संस्कृति खतरें है तो कही मुस्लिम संस्कृति। यह हिंदू संस्कृति और मुस्लिम संस्कृति आखिर हैं क्या, कुछ समझ में नहीं आता। लेखक का कहना है कि जिस प्रकार हिंदू और मुस्लिम के आधार पर रोटी-पानी बँटे हुए हैं उसी तरह संस्कृति के बँटने में कोई हैरानी नहीं है।

”हिंदू-संस्कृति” में भी फिर ”प्राचीन-संस्कृत” और ”नवीन-संस्कृति” का बँटवारा मौजूद है। वर्ण-व्यवस्था के नाम पर समाज के बड़े कर्मठ हिस्से को पददलित रखना ही कुछ लोगों की दुष्टि में प्राचीन ”हिंदू-संस्कृति” है। वे उसी की रक्षा के लिए स्वराज की स्थापना मानते हैं।

इस प्रकार हम देखते हैं कि संस्कृति की छीछालेदर की हद नहीं। संस्कृति के नाम से जिस कूड़े-करकट के ढेर का बोध होता है, वह न संस्कृति है न रक्षणीय वस्तु। क्षण-क्षण परिवर्तन होने वाले संसार में किसी भी चीज़ को पकड़कर बैठा नहीं जा सकता। मानव ने जब-जब प्रज्ञा और मैत्री भाव से किसी नए तथ्य का दर्शन किया है तो उसने कोई वस्तु नहीं देखी है, जिसकी रक्षा के लिए दलबंदियों की ज़रूरत है।

मानव संस्कृति एक अविभाज्य वस्तु है और उसमें जितना अंश कल्याण का है, वह अकल्याणकार की अपेक्षा श्रेष्ठ ही नहीं स्थायी भी है।

लेखक बताता है कि मानव संस्कृति में हिंदू संस्कृति है और उसमें भी नवीन संस्कृति और प्राचीन संस्कृति है। प्रचीन हिंदू संस्कृति में वे लोग आते हैं जो जाति-भेद के आधार पर मेहनतशील वर्ग को अपने अधीन रखते थे। लेखक कहता है कि आज संस्कृति की दुर्दशा की कोई सीमा नहीं है और वह उस कूड़े के ढेर के समान होती जा रही है जिसकी देख-रेख करनी अनिवार्य नहीं है। इस संसार में प्रतिपल परिवर्तन होते रहते हैं। मानव द्वारा बुद्धि और मित्रता के भाव से ऐसी कोई वस्तु नहीं बनाई जिसकी रक्षा के लिए किसी दल विशेष की आवश्यकता पड़े। मानव संस्कृति एक ऐसी वस्तु है जिसे बाँटा नहीं जा सकता। यह मंगलकारी, श्रेष्ठ और स्थायी है।

शब्दार्थ

आध्यात्कि-परमात्मा। साक्षात-आँखों के सामने। अविष्कर्ता-आविष्कार करने वाला। परिष्कृत-सजाया हुआ, शुद्ध किया हुआ। अनायास-बिना प्रयास के। कदाचित-कभी, शायद। शीतोष्ण-ठंडा और गरम। निठल्ला-बेकार, अकर्मण्य। मनीषियों -विदव्ानों, विचारशीलों। वशीभूत-अधीन, पराधीन। तृष्णा-प्यास, लोभ। अवश्यभावी-जिसका होना निश्चित हो। वर्ण-व्यवस्था-वर्ण-विभाग। छीछालेदर-दुर्दशा, फ़जीहत। अविभाज्य-जो बाँटा न जा सके।

Question number: 122 (1 of 6 Based on Passage) Show Passage

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Textbook Questions » भ्दंत आनंद कौसल्यायन संस्कृति

Essay Question▾

Describe in Detail

लेखक दव्ारा रचित प्रस्तुत निबंध में वास्तविक अर्थों में ’संस्कृत व्यक्ति’ किसे कहा जा सकता है?

Explanation

सही मायने में संस्कृत व्यक्ति उसे कहते हैं जो हर प्रकार से तृप्त हो जाता है अर्थात जिसका पेट भरा हुआ हो व उसका तन कपड़ों से ढका हो, फिर भी वह व्यक्ति बेकार न बैठकर कुछ नया करने की सोचता रहता हैं। ऐेसे जिज्ञासा व्यक्ति या संस्कृत मानव से… (45 more words) …

Question number: 123 (2 of 6 Based on Passage) Show Passage

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Textbook Questions » भ्दंत आनंद कौसल्यायन संस्कृति

Essay Question▾

Describe in Detail

लेखक दव्ारा रचित प्रस्तुत निबंध में किन महत्त्वपूर्ण आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सूई-धागे का आविष्कार हुआ होगा?

Explanation

व्यक्ति ने अपने शरीर को हर मौसम से बचाने के लिए एवं शरीर को कई तरह से कपड़ों से सुन्दर बनाने के लिए सूई धागे का आविष्कार किया होगा।

क्योंकि-सही ढंग से कपड़ों को पहनने से भी व्यक्ति की सभ्यता की पहचान होती है। व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकताएं है रोटी,… (19 more words) …

Sign In