क्षितिज(Kshitij-Textbook)-Additional Questions (CBSE (Central Board of Secondary Education- Board Exam) Class-10 Hindi): Questions 904 - 917 of 1621

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Passage

(4)

हरि हैं राजनीति पढ़ि आए।

समुझी बात कहत मधुकर के, समाचार सब पाए।

इक अति चतुर हुते पहिलैं ही, अब गुरु ग्रंथ पढ़ाए।

बढ़ी बुद्धि जानी जो उनकी, जोग-सँदेस पठाए।

ऊधौं भले लोग आगे के, पर हित डोलत धाए।

अब अपनै मन फेर पाइहैं, चलत जु हुते चुराए।

ते क्यौं अनीति करैं आपुन, जे और अनीति छुड़ाए।

राज धरम तौ यहै ’सूर’, जो प्रजा न जाहिं सताए।।

Question number: 904 (1 of 4 Based on Passage) Show Passage

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » सूरदास पद

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सूरदास दव्ारा रचित उपर्युक्त पद के शिल्प-सौंदर्य क्या है?

Explanation

उपर्युक्त पद के सूरदास दव्ारा रचित शिल्प-सौंदर्य है कि इस पद में भाषा, शब्द, भाव गायक, संगीत, अलंकार, लोकोक्ति आदि का बहुत ही अच्छे ढंग से प्रयोग किया गया है इसके साथ में इन पदों के बीच-बीच में व्यंग्य का भी बेहतर तरीके से प्रयोग किया हैं।

क्योंकि-ताकि सूरदास दव्ारा

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Question number: 905 (2 of 4 Based on Passage) Show Passage

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » सूरदास पद

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सूरदास दव्ारा रचित उपर्युक्त पद में उद्धव गोपियों को कौनसा ज्ञान देते हैं?

Explanation

उपर्युक्त पद में उद्धव गोपियों को निर्गुण-उपासना का ज्ञान देते हैं।

क्योंकि-ताकि गोपियां कृष्ण के प्रेम को भूल जाए।

प्रसंग- प्रस्तुत पद महाकवि सूरदास द्वारा रचित ’सूरसागर’ के अन्तर्गत ’भ्रमरगीत’ में ’उद्धव संदेश’ नामक खण्ड से उद्धृत है। उद्धृव गोपियों को जब यह योग ज्ञान का संदेश देते है तब

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Question number: 906 (3 of 4 Based on Passage) Show Passage

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » सूरदास पद

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सूरदास दव्ारा रचित उपर्युक्त पद के भाव-सौंदर्य में गोपियों का भाव कैसे प्रकट हो रहा हैं?

Explanation

उपर्युक्त पद सूरदास दव्ारा रचित भाव-सौंदर्य में गोपियों का यह भाव इस प्रकार प्रकट हुआ है कि जब कृष्ण उद्धव के माध्यम से उन्हें योग ज्ञान का संदेश भेजते है तो गोपियाँ बहुत अधिक दुखी हो जाती है वे कहती की इस प्रकार का संदेश भेजने से उनके मन को

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Question number: 907 (4 of 4 Based on Passage) Show Passage

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » सूरदास पद

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उद्धव दव्ारा निर्गुण-उपासना का ज्ञान देने पर गोपियों को कैसा लगता हैं?

Explanation

गोपियों को यह योग-संदेश कृष्ण दृवारा किया गया बहुत बड़ा अत्याचार और अन्याय लगता है। वे कृष्ण को राजनीति में निपूर्ण बताती हैं, जो कृष्ण को इस प्रकार की राजनीति शोभा नहीं देती है गोपियों को ऐसा लगता हैं।

क्योंकि-कोई कोई ज्ञान ऐसा होता है जो हमें अन्दर तक हिलाकर

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Question number: 908

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » गिरिजाकुमार माथुर छाया मत छूना

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माथुर जी दव्ारा रचित रचनाओं में उनके द्वारा किया गया अंलकारों का प्रयोग भी क्या बन पड़ा है?

Question number: 909

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » देव सवैया, कवित्त

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देव ने अपने दव्ारा रचित काव्यों में किन शब्दों का भी प्रचूर मात्रा में प्रयोग किया है?

Question number: 910

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » गिरिजाकुमार माथुर छाया मत छूना

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माथुर जी दव्ारा रचित आलोचनाएं कौन-कौनसी है?

Question number: 911

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » देव सवैया, कवित्त

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देव दव्ारा रचित बिम्ब योजना कैसी है?

Question number: 912

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » देव सवैया, कवित्त

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देव किस काल के श्रेष्ठ कवि थे?

Passage

राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

(1)

नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा।।

आयेसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही।।

सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरिकरनी करि करिअ लराई।।

सुनहु राम जेहि सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा।।

सो बिलगाउ बिहाड़ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा।।

सुनि मुनिबचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अवमाने।।

बहु धनही तोरी लरिकाई। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाई।।

येहि धनुपर ममता केहि हेतु। सुनि रिसाइ कह भृगुकलकेतू।।

रे नृपबालक कालबस बोलत तोहि न सँभार।

धनुही सम त्रिपुरारिधनु बिदित सकल संसार।।

(2)

लखन कहा हसि हमरे जाना। सुनहु देव सब धनुष समाना।।

का छति लाभु जून धनु तोरें। देखा राम नयन के भोरें।।

छुअत टूट रघुपतिहु न दोसू। मुनि बिनु काज करिअ कत रोसू।।

बोले चितै परसु की ओरा। रे सठ सुनेहि सुभाउ न मोरा।

बालकु बोलि बधौं नहि तोही। केवल मुनि जड़ जानहि मोही।।

बाल ब्रह्यचारी अति कोही। बिस्वबिदित क्षत्रियकुल द्रोही।।

भुजबल भूमि भूप बिनू कीन्ही। बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही।।

सहसबाहुभुज छेदनिहारा। परसु बिलोकु महीपकुमारा।।

मातु पितहि जनि सोचबस करसि महीसकिसोर।

गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर।।

(3)

बिहसि लखनु बोले मृदु बानी अहो मुनीसु महाभट मानी।।

पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारु। चहत उड़ावन फँूकि पहारू।।

इहाँ कुम्हड़बतिआ कोउ नाहीं। जे तरजनी देखि मरि जाहीं।।

देख कुठारु सरासन बाना। मैं कछु कहा सहित अभिमाना।।

भृगसुत समुझि जनेउ बिलोकी। जो कछु कहहु सहौं रिस रोकी।।

सुर महिसुर हरिजन अरु गाई। हमरे कुल इन्ह पर न सुराई।।

बधें पापु अपकीरति हारें। मारतहू पा परिअ तुम्हारें।।

कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा। ब्यर्थ धरहु धनु बान कुठारा।।

जो बिलोक अनुचित कहेउँ छमहु महामुनि धीर।

सुनि सरोष भृगुबंसमनि बोले गिरा गंभीर।।

(4)

कौसिक सुनहु मंद येहु बालकु। कुटिलु कालबस निज कुल घालकु।।

भानुबंस राकेस कलंकू। निपट निरंकुसु अबुधु असंकू।।

कालकवलु होइहि छन माहीं। कहौं पुकारि खोरि माहि नाहीं।।

तुम्ह हटकहु जौ चहहु उबारा। कहि प्रतापु बलु रोषु हमारा।।

लखन कहेउ मुनि सुजसु तुम्हारा। तुम्हहि अछत को बरनै पारा।।

अपने मुहु तुम्ह आपनि करनी। बार अनेक भाँति बहु बरनी।।

नहि संतोषु त पुनि कछु कहहु। जनि रिस रोकि दुसह दुख सहहु।।

बीरब्रती तुम्ह धीर अछोभा। गारी देत न पावहु सोभा।।

सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु।

बिद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु।।

5

तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा। बार बार मोहि लागि बोलावा।

सुनत लखन के बचन कठोरा। परसु सुधारि धरेउ कर घोरा।।

अब जनि देइ दोसु मोहि लोगू। कटुबादी बालक बधजोगू।।

बाल बिलोकि बहुत मैं बाँचा। अब येहु मरनिहार भा साँचा।।

कौसिक कहा छमिअ अपराधू। बाल दोष गुन गनहिं न साधू।।

खर कुठार मैं अकरुन कोही। आगे अपराधी गुरुद्रोही।।

उतर देत छोड़ौं बिनु मारे। केवल कौसिक सील तुम्हारे।।

न त येहि काटि कुठार कठोरे। गुरहि उरिन होतेउँ श्रम थोरे।।

गाधिसु नु कह हृदय हसि मुनिहि हरियरे सूझ।

अयमय खाँड़ न ऊखमय अजहुँ न बूझ अबूझ।।

(6)

कहेउ लखन मुनि सीलु तुम्हारा। को नहि जान बिदित संसारा।।

माता तिहि उरिन भये नीकें। गुररिनु रहा सोचु बड़ जी कें।।

सो जनु हमरेहि माथें काढ़ा। दिन चलि गये ब्याज बड़ बाढ़ा।।

अब आनिअ ब्यवहरिआ बोली। तुरत देउँ मैं थैली खोली।।

सुनि कटु बचन कुठार सुधारा। हाय हाय सब सभा पुकारा।।

भृगुबर परसु देखाबहु मोही। बिद्र बिचारि बचौं नृप द्रोही।।

मिले न कबहूँ सुभट रन गाढ़े। दव्जदेवता घरहि के बाढ़े।।

अनुचित कहि सबु लोगु पुकारे। रघुपति सयनहि लखनु नेवारे।।

लखन उतर आहुति सरिस भृगुबरकोपु कृसानु।

बढ़त देखि जल सम बचन बोले रघुकुलभानु।।

Question number: 913 (1 of 2 Based on Passage) Show Passage

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » तुलसीदास राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

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लक्ष्मण ने वीर योद्धा की क्या-क्या विशेषताएँ बताईं?

Question number: 914 (2 of 2 Based on Passage) Show Passage

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » तुलसीदास राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

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पाठ के आधार पर तुलसी के भाषा सौंदर्य पर दस पंक्तियाँ लिखिए।

Question number: 915

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » सूरदास पद

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सूरदास जी के आराध्य कौन हैं?

Passage

(2)

लखन कहा हसि हमरे जाना। सुनहु देव सब धनुष समाना।।

का छति लाभु जून धनु तोरें। देखा राम नयन के भोरें।।

छुअत टूट रघुपतिहु न दोसू। मुनि बिनु काज करिअ कत रोसू।।

बोले चितै परसु की ओरा। रे सठ सुनेहि सुभाउ न मोरा।

बालकु बोलि बधौं नहि तोही। केवल मुनि जड़ जानहि मोही।।

बाल ब्रह्यचारी अति कोही। बिस्वबिदित क्षत्रियकुल द्रोही।।

भुजबल भूमि भूप बिनू कीन्ही। बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही।।

सहसबाहुभुज छेदनिहारा। परसु बिलोकु महीपकुमारा।।

मातु पितहि जनि सोचबस करसि महीसकिसोर।

गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर।।

Question number: 916 (1 of 4 Based on Passage) Show Passage

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » तुलसीदास राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

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तुलसीदास जी दव्ारा रचित उपरोक्त प्रद्यांश के शिल्प-सौंदर्य क्या है?

Explanation

तुलसीदास जी दव्ारा रचित उपरोक्त प्रद्यांश के शिल्प-सौंदर्य यह है कि इस सवांद में लक्ष्मण के वचनों को व परशुराम जी के वीरता व क्रोध को बड़े ही सहजता से प्रस्तुत किया गया है साथ में अलंकारो, शब्दों, रसों, छंदो, एवं भाषा का बहुत अच्छे ढंग से प्रस्तुत किया गया

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Question number: 917 (2 of 4 Based on Passage) Show Passage

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तुलसीदास जी दव्ारा रचित उपरोक्त प्रद्यांश में लक्ष्मण जी परशुराम जी क्या करते है?

Explanation

तुलसीदास जी दव्ारा रचित उपरोक्त प्रद्यांश में लक्ष्मण जी परशुराम जी का उपहास करते हैं।

क्योंकि-कभी-कभी किसी व्यक्ति का स्वभाव ही इतना चंचल होता है कि वह महान लोगों की हँसी उड़ा देता है जैसे कि इस संवाद में लक्ष्मण ने परशुराम जी के साथ किया है।

प्रसंग- पूर्ववत अर्थात

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