क्षितिज(Kshitij-Textbook)-Additional Questions (CBSE (Central Board of Secondary Education- Board Exam) Class-10 Hindi): Questions 855 - 867 of 1621

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Question number: 855

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » गिरिजाकुमार माथुर छाया मत छूना

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गिरिजा कुमार माथुर को अति विशिष्ट स्थान क्यों प्राप्त है?

Question number: 856

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » मंगलेश डबराल संगतकार

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मंगलेश डबराल दव्ारा रचित उनकी रचनाओं मेेें किन शब्दों का भी कुशलता से प्रयोग किया है?

Question number: 857

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » ऋतुराज कन्यादान

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कवि ऋतुराज दव्ारा रचित उनकी रचनाओं में भाषा किस प्रकार की है?

Question number: 858

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » मंगलेश डबराल संगतकार

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डबराल जी ने अपना अध्ययन कार्य कहाँ से पूरा किया?

Question number: 859

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » गिरिजाकुमार माथुर छाया मत छूना

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गिरिजा जी अपने अंतिम समय तक किस कार्य में लगे रहे?

Question number: 860

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » सूरदास पद

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हिन्दी साहित्य के कृष्ण-भक्ति काव्य की श्रेष्ठता का श्रेय किसको को जाता है?

Question number: 861

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » देव सवैया, कवित्त

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कवि देव दव्ारा रचित रचनाओं में किसका समन्वय है?

Passage

पद

(1)

ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी।

अपरस रहत सनेह तगा तैं, नाहिन मन अनुरागी।

पुरइनि पात रहत जल भीतर, ता रस देह न दागी।

ज्यौं जल माहं तेल की गागरि, बूंद न ताकौं लागी।

प्रीति-नदी मैं पाउं न बोरयौ, दृष्टि न रूप परागी।

’सूरदास’ अबला हम भोरी, गुर चाँटी ज्यौं पागी।।

(2)

मन की मन ही मांझ रही।

कहिए जाइ कौ पै ऊधौ, नाहीं परत कही।

अवधि अधार आस आवन की, तन मन बिथा सही।

अब इन जोग सँदेसनि सुनि-सुनि, बिरहिनि बिरह दही।

चाहति हुतीं गुहारि जितहिं तैं, उत तैं धार बही।

’सूरदास’ अब धीर धरहिं क्यौं, मरजादा न लही।।

(3)

हमारैं हरि हारिल की लकरी।

मन क्रम बचन नंद-नंदन उर, यह दृढ़ करि पकरी।

जागत सोवत स्वप्न दिवस-निसि, कान्ह-कान्ह जक री।

सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यौं करुई ककरी।

सु तौ ब्याधि हमकौं लै आए, देखी सुनी न करी।

यह तौ ’सूर’ तिनहिं लै, सौंपौ, जिनके मन चकरी।।

(4)

हरि हैं राजनीति पढ़ि आए।

समुझी बात कहत मधुकर के, समाचार सब पाए।

इक अति चतुर हुते पहिलैं ही, अब गुरु ग्रंथ पढ़ाए।

बढ़ी बुद्धि जानी जो उनकी, जोग-सँदेस पठाए।

ऊधौं भले लोग आगे के, पर हित डोलत धाए।

अब अपनै मन फेर पाइहैं, चलत जु हुते चुराए।

ते क्यौं अनीति करैं आपुन, जे और अनीति छुड़ाए।

राज धरम तौ यहै ’सूर’, जो प्रजा न जाहिं सताए।।

Question number: 862 (1 of 3 Based on Passage) Show Passage

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » सूरदास पद

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गोपियों ने अपने वाक्‌चातुर्य के आधार पर ज्ञानी उद्धव को परास्त कर दिया, उनके वाक्‌चातुर्य की विशेषताएँ लिखिए?

Question number: 863 (2 of 3 Based on Passage) Show Passage

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » सूरदास पद

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गोपियों ने उद्धव से योग की शिक्षा कैसे लोगों को देने की बात कही है?

Question number: 864 (3 of 3 Based on Passage) Show Passage

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » सूरदास पद

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गोपियों को कृष्ण में ऐसे कौन-से परिवर्तन दिखाई दिए जिनके कारण वे अपना मन वापस पा लेने की बात कहती हैं?

Question number: 865

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » देव सवैया, कवित्त

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उन आश्रयदाताओं के नाम क्या-क्या हैं?

Passage

(6)

कहेउ लखन मुनि सीलु तुम्हारा। को नहि जान बिदित संसारा।।

माता तिहि उरिन भये नीकें। गुररिनु रहा सोचु बड़ जी कें।।

सो जनु हमरेहि माथें काढ़ा। दिन चलि गये ब्याज बड़ बाढ़ा।।

अब आनिअ ब्यवहरिआ बोली। तुरत देउँ मैं थैली खोली।।

सुनि कटु बचन कुठार सुधारा। हाय हाय सब सभा पुकारा।।

भृगुबर परसु देखाबहु मोही। बिद्र बिचारि बचौं नृप द्रोही।।

मिले न कबहूँ सुभट रन गाढ़े। दव्जदेवता घरहि के बाढ़े।।

अनुचित कहि सबु लोगु पुकारे। रघुपति सयनहि लखनु नेवारे।।

लखन उतर आहुति सरिस भृगुबरकोपु कृसानु।

बढ़त देखि जल सम बचन बोले रघुकुलभानु।।

Question number: 866 (1 of 3 Based on Passage) Show Passage

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » तुलसीदास राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

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तुलसीदास जी दव्ारा रचित उपरोक्त प्रसंग के शिल्प-सौंदर्य क्या हैं?

Explanation

तुलसीदास जी दव्ारा रचित उपरोक्त प्रसंग के शिल्प-सौंदर्य हैं कि इस सवांद में लक्ष्मण जी दव्ारा परशुराम जी पर व्यंग्य करने पर परशुराम जी के क्रोध को ओर बढ़ा दिया अर्थात अग्नि में घी डालने का काम किया है जिसका कवि ने बहुत ही सुंदर ढंग से चित्रण किया है

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Question number: 867 (2 of 3 Based on Passage) Show Passage

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » तुलसीदास राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

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Describe in Detail

तुलसीदास जी दव्ारा रचित उपरोक्त प्रसंग में किस समय का वर्णन किया गया है?

Explanation

तुलसीदास जी दव्ारा रचति प्रस्तुत संवाद में कवि ने यहाँ उस समय का उल्लेख किया है जब शिवजी का धनुष टूटने के बाद परशुराम जी आते हैं और लक्ष्मण-परशुराम के मध्य शब्दो व वाक्यों की बहस होती है। परशुरामजी अपने कुल्हाड़े से लक्ष्मणजी को समाप्त करने की बात कहते हैं

… (203 more words) …

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