क्षितिज(Kshitij-Textbook)-Additional Questions (CBSE Class-10 Hindi): Questions 748 - 760 of 1621

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Question number: 748

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » देव सवैया, कवित्त

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देव जी पूरा नाम क्या था?

Question number: 749

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » सूरदास पद

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विद्वानों में क्या मतभेद है?

Question number: 750

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » मंगलेश डबराल संगतकार

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मंगलेश डबराल के दव्ारा रचित मुख्य रूप से कितने कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं?

Question number: 751

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » तुलसीदास राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

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तुलसीदास जी की मृत्यु के संबंध में कौनसा दोहा प्रचलित है?

Question number: 752

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » तुलसीदास राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

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तुलसीदास जी दव्ारा रचित उनकी 12 रचनाएँ कौन-कौन सी है?

Question number: 753

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » सूरदास पद

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किसका ”सूरसागर” तो मानो वात्सल्य और श्रृंगार का महासागर हैं?

Question number: 754

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » ऋतुराज कन्यादान

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ऋतुराज जी दव्ारा रचित संकलित किन पदों में कवि की श्रेष्ठता सिद्ध करने में समर्थ है?

Question number: 755

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » ऋतुराज कन्यादान

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ऋतुराज हिंदी साहित्य के किन कवियों में से एक है?

Passage

(3)

हमारैं हरि हारिल की लकरी।

मन क्रम बचन नंद-नंदन उर, यह दृढ़ करि पकरी।

जागत सोवत स्वप्न दिवस-निसि, कान्ह-कान्ह जक री।

सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यौं करुई ककरी।

सु तौ ब्याधि हमकौं लै आए, देखी सुनी न करी।

यह तौ ’सूर’ तिनहिं लै, सौंपौ, जिनके मन चकरी।।

Question number: 756 (1 of 4 Based on Passage) Show Passage

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » सूरदास पद

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सूरदास जी दव्ारा रचित उपर्युक्त पद के भाव-सौंदर्य क्या हैं?

Explanation

उपर्युक्त पद के अनुसार सूरदास जी दव्ारा रचित भाव-सौंदर्य यह है कि गोपियाँ उद्धव से कहती है उनके मन में कृष्ण के प्रति इतना अधिक प्रेम है कि अब उसका स्थान यह योग ज्ञान नहीं ले सकता है। इसे वे लोग ही अपना सकते है जो जिसके मन में प्रेम… (340 more words) …

Question number: 757 (2 of 4 Based on Passage) Show Passage

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » सूरदास पद

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सूरदास द्वारा रचित प्रस्तुत पद ’सूरसागर’ में संकलित ’भ्रमरगीत’ में ’उद्धव संदेश’ नामक कौनसे खण्ड से उद्धृत है?

Explanation

सूरदास द्वारा रचित प्रस्तुत पद ’सूरसागर’ में संकलित ’भ्रमरगीत’ में ’उद्धव संदेश’ नामक खण्ड के ’पाँचवें संवाद’ से उद्धृत है।

क्योंकि-कभी-कभी किसी पद के खंड में संवाद के नम्बर होते हैं। ताकि इन्हें पढ़ने में आसानी हो सके।

प्रसंग- प्रस्तुत पद कविवर सूरदास द्वारा रचित ’सूरसागर’ में संकलित ’भ्रमरगीत’ में… (297 more words) …

Question number: 758 (3 of 4 Based on Passage) Show Passage

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » सूरदास पद

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उद्धव द्वारा दिए गए निर्गुण उपासना संबंधी उपदेश को सुनकर गोपियाँ कैसी हो जाती है ं।

Explanation

उद्धव द्वारा दिए गए निर्गुण उपासना संबंधी संदेश को सुनकर गोपियाँ अत्यन्त दु: खी हो जाती है।

क्योंकि-गोपियां कृष्ण से प्रेम करना नहीं छोड़ सकती है एवं कभी-कभी जब हमें कोई दु: खभरी सूचना मिलती है तो हमारा मन बहुत ही अप्रसन्न हो जाता हैं।

प्रसंग- प्रस्तुत पद कविवर सूरदास… (304 more words) …

Question number: 759 (4 of 4 Based on Passage) Show Passage

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » सूरदास पद

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सूरदास जी दव्ारा रचित उपर्युक्त पद के शिल्प-सौंदर्य क्या हैं?

Explanation

उपर्युक्त पद के अनुसार सूरदास जी दव्ारा रचित शिल्प-सौंदर्य हैं इस शिल्प -सौंदर्य में उन्होंने विरह की बात स्पष्ट रूप से लिखी है। साथ में अलंकार, भाव, भाषा, गायक, संगीत आदि का मनोरम चित्रण प्रस्तुत किया है।

क्योंकि-ताकि सूरदास जी दव्ारा रचित शिल्प-सौंदर्य में ओर अधिक निखार आ सके।

प्रसंग-… (308 more words) …

Passage

(2)

मन की मन ही मांझ रही।

कहिए जाइ कौ पै ऊधौ, नाहीं परत कही।

अवधि अधार आस आवन की, तन मन बिथा सही।

अब इन जोग सँदेसनि सुनि-सुनि, बिरहिनि बिरह दही।

चाहति हुतीं गुहारि जितहिं तैं, उत तैं धार बही।

’सूरदास’ अब धीर धरहिं क्यौं, मरजादा न लही।।

Question number: 760 (1 of 4 Based on Passage) Show Passage

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » सूरदास पद

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सूरदास जी दव्ारा रचित उपर्युक्त पद के शिल्प-सौंदर्य क्या हैं?

Explanation

सूरदास जी दव्ारा रचित उपर्युक्त पद के शिल्प-सौंदर्य है कि इसमें कृष्ण के प्रति गोपियों अपार प्रेम को प्रकट किया गया है साथ में अलंकारों, गायक, संगीत, भाषा व भाव का बहुत अच्छी तरह से प्रयोग कर शिल्प सौंदर्य को रौचक बनाया गया है।

क्योंकि-ताकि सूरदास जी दव्ारा रचित उपर्युक्त… (360 more words) …

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