क्षितिज(Kshitij-Textbook)-Additional Questions (CBSE Class-10 Hindi): Questions 512 - 524 of 1621

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Passage

गद्य-खंड

पाठ 10

स्वयं प्रकाश

” स्वयं प्रकाश भारतीय समाज के सजग प्रहरी और सच्चे

प्रतिनिधि साहित्यकार हैं। उनकी रचनाओं में समाज की

तत्कालीन सामाजिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों का

सजीव चित्रण देखने को मिलता है। स्वयं प्रकाश

जी ने अपनी कहानियों और उपन्यासों में यथार्थ और

आदर्श का अद्भुत समन्वय किया है। उनके साहित्य में

सामाजिक बंधनों में छटपटाती हुई नारियों की वेंदना

तथा वर्णव्यवस्था या संप्रदाय व्यवस्था के तहत शोषित

व्यक्तियों की पीड़ा के मर्मस्पर्शी चित्र उपस्थित किये

गये है, जो कि तर्कत: बेजोड़ हैं।”

जीवन-परिचय- प्रसिद्ध गद्यकार स्वयं प्रकाश का जन्म सन्‌ 1947 में मध्यप्रदेश के इंदौर शहर में हुआ था। उनका बचपन राजस्थान में व्यतीत हुआ। वहीं से अध्ययन कार्य पूरा कर मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करके एक औद्योगिक प्रतिष्ठान में नौकरी करने लगे। उनकी नौकरी का भी अधिकांश समय राजस्थान में ही बीता। स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद वे वर्तमान में भोपाल में रह रहे हैं। यहाँ वे ’वसुधा’ पत्रिका के संपादन कार्य से जुड़े हुए हैं। उन्हें अब तक पहल सम्मान, वनमाली पुरस्कार, राजस्थान अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।

प्रमुख रचनाएँ- स्वयं प्रकाश जी अपने समय के प्रसिद्ध कहानीकार हैं। अब तक उनके तेरह कहानी संग्रह और पाँच उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी प्रमुख रचनाएँ निम्न हैं-

कहानी संग्रह- ’सूरज कब निकलेगा’, ’आएँगे अच्छे दिन भी’, आदमी जात का आदमी’, औश्र ’संधान’ उल्लेखनीय हैं।

प्रमुख उपन्यास- ’बीच में विनय’, ईंधन।

साहित्यिक विशेषताएँ- स्वयं प्रकाश मध्यवर्गीय जीवन के कुशल चितेरे हैं। उनकी कहानियों में वर्ग-शोषण के विरुद्ध चेतना का भाव देखने को मिलता है। उन्होंने अपनी रचनाओं के अंतर्गत सामाजिक जीवन में जाति, संप्रदाय और लिंग के आधार पर हो रहे भेदभाव के विरुद्ध प्रतिकार के स्वर को उभारा है।

भाषा-शैली- स्वयं प्रकाश ने अपनी रचनाओं के लिए सरल, सहज एवं भावानुकूल भाषा को अपनाया है। उन्होंने लोक-प्रचलित खड़ी बोली में अपनी रचनाएँ की। तत्सम, तद्भव, देशज, उर्दू, फारसी, अंग्रेजी के शब्दों की बहुलता से प्रयोग है, फिर भी वे शब्द स्वाभाविक बन पड़े हैं। उनके छोटे-छोटे वाक्यों में चुटिलता है। हास्य एवं व्यंग्य उनकी रचनाओं का प्रमुख विषय रहा है। एक वाक्य में विभिन्न भाषाओं के प्रचलित शब्दों का प्रयोग कर एक नई रीति के दम पर पाठक के लिए सहजता से समझने का भाव पैदा कर दिया है।

नेताजी का चश्मा

प्रस्तुत कहानी के माध्यम से लेखक स्वयं प्रकाश ने बताना चाहा है कि वह भू-भाग जो सीमाओं से घिरा हुआ है, देश नहीं कहलाता है। बल्कि इसके अंदर रहने वाले प्राणियों, जीव-जन्तुओं, पेड़-पौधों, नदियों-पहाड़ों, प्राकृतिक सौंदर्य आदि में तारतम्यता स्थापित होने से देश बनता है और इन सबको समृदध करने व इन सबसे प्रेम करने की भावना को ही देश-प्रेम कहते हैं। कैप्टन चश्मे वाले के माध्यम से लेखक ने उन करोड़ों देशवासियों के योगदान को सजीव रूप प्रदान किया है जो किसी न किसी तरीके से इस देश के निर्माण में अपना योगदान देते हैं। ऐसा नहीं है कि केवल बड़े ही देश-निर्माण में सहायक होते हैं, बच्चे भी इस पुण्य-कर्म में अपना योगदान देते हैं।

हालदार साहब को हर पंद्रहवे दिन कंपनी के काम के सिलसिले में उस कस्बे से गुजरना पड़ता था। कस्बा बहुत बड़ा नहीं था। जिसे पक्का मकान कहा जा सके वैसे कुछ ही मकान और जिसे बाज़ार कहा जा सके वैसे एक ही बाज़ार था। कस्बे में एक लड़कों का स्कूल, एक लड़कियों का स्कूल, एक सीमेंट का छोटा-सा कारखाना, दो ओपन एयर सिनेमाघर और एक ठो नगरपालिका भी थी। नगरपालिका थी तो कुछ-न-कुछ करती भी रहती थी। कभी कोई सड़क पक्की करवा दी, कभी कुछ पेशाबघर बनवा दिए, कभी कबूतरों की छतरी बनवा दी तो कभी कवि सम्मेलन करवा दिया। इसी नगरपालिका के किसी उत्साही बोर्ड या प्रशासनिक अधिकारी ने एक बार ’शहर’ के मुख्य बाज़ार के मुख्य चौराहे पर नेताजी सुभाषचंद्र बोस की एक संगमरमर की प्रतिमा लगवा दी। यह कहानी उसी प्रतिमा के बारे में है, बल्कि उसके भी एक छोटे से हिस्से के बारे में।

पूरी बात तो अब पता नहीं, लेकिन लगता है कि देश के अच्छे मूर्तिकारों की जानकारी नहीं होने और अच्छी मूर्ति की लागत अनुमान और उपलब्ध बजट से कहीं बहुत ज्य़ादा होने के कारण काफ़ी समय ऊहापोह और चिट्‌ठी-पत्री में बरबाद हुआ होगा और बोर्ड की शासनावधि समाप्त होने की घड़ियों में किसी स्थानीय कलाकार का ही अवसर देने का निर्णय किया होगा, और अंत में कस्बे के इकलौते हाई स्कूल के इकलौते ड्राइंग मास्टर-मान लीजिए मोतीलाल जी-को ही यह काम सौंप दिया गया होगा, जो महीने-भर में मूर्ति बनाकर ’पटक देने’ का विश्वास दिला रहे थे।

कहानी के आरम्भ में बताया गया हे कि कहानी के मुख्य पात्र हालदार साहब को कंपनी के काम से उस कस्बे से गुजरना पड़ता था, जिस कस्बे से यह कहानी जुड़ी हुई है। उस छोटे से कस्बे में कुछ पक्के मकान स्कूल, सीमेंट का छोटा-सा कारखाना, दो खुले सिनेमाघर और नगरपालिका का कार्यालय था। नगरपालिका द्वारा विकास कार्य होते रहते थे। एक योग्य प्रशासनिक अधिकारी ने नगर के चौराहे पर नेताजी सुभाष चंद्रबोस की संगमरमर की प्रतिमा लगवा दी। प्रतिमा बनाने वाले कलाकारों की खोज, अधिक लागत लगने और बोर्ड का शासनकाल कम रहने के कारण किसी स्थानीय कलाकार के रूप में यह कार्य स्कूल के ही ड्राइंग अध्यापक को दिया गया। अध्यापक ने भी महीने भर में मूर्ति बना डालने का आश्वासन दे दिया।

जैसा कि कहा जा चुका है, मूर्ति संगमरमर की थी। टोपी की नाक से कोट के दूसरे बटन तक कोई दो फुट ऊँची। जिसे कहते हैं बस्ट। और सुंदर थी। नेताजी सुंदर लग रहे थे। कुछ-कुछ मासूम और कमसिन। फ़ौजी वर्दी में। मूर्ति को देखते ही ’दिल्ली चलो’ और ’तुम मुझे खून दो…. . ’ वगैरह याद आने लगते थे। इस दृष्टि से यह सफल और सरहानीय प्रयास था। केवल एक चीज़ की कसर थी जो देखते ही खटकती थी। नेताजी की आँखों पर चश्मा नहीं था। यानी चश्मा तो था, लेकिन संगमरमर का नहीं था। एक सामान्य और सचमुच के चश्में का चौड़ा काला फ्रेम मूर्ति को पहना दिया गया था। हालदार साहब जब पहली बार इस कस्बे से गुज़रे और चौराहे पर पान खाने रुके तभी उन्होंने इसे लक्षित किया और उनके चेहरे पर एक कौतुकभरी मुसकान फैल गई। वाह भई! यह आईडिया भी ठीक है। मूर्ति पत्थर की, लेकिन चश्मा रियल।

जीप कस्बा छोड़कर आगे बढ़ गई तब भी हालदार साहब इस मूर्ति के बारे में ही सोचते रहे, और अंत में इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि कुल मिलाकर कस्बे के नागरिकों का यह प्रयास सराहनीय ही कहा जाना चाहिए। महत्त्व मूर्ति के रंग-रूप या कद का नहीं, उस भावना का है, वरना तो देश-भक्ति भी आजकल मज़ाक की चीज़ होती जा रही है।

दूसरी बार जब हालदार साहब उधर से गुज़रे तो उन्हें मूर्ति में कुछ अंतर दिखाई दिया। ध्यान से देखा तो पाया कि चश्मा दूसरा है। पहले मोटे फ्रेमवाला चौकोर चश्मा था, अब तार के फ्रेमवाला गोल चश्मा है। हालदार साहब का कौतुक और बढ़ा वाह भई! क्या आइडिया है। मूर्ति कपड़े नहीं बदल सकती, लेकिन चश्मा तो बदल ही सकती है।

यहाँ बताया गया है कि स्कूल अध्यापक ने नेताजी सुभाष चंद्रबोस की छाती तक की दो फुट की संगमरमर की मूर्ति बनाई। उस मूर्ति में नेताजी सुंदर, भोले व आकर्षक लग रहे थे। वह मूर्ति देश के लिए कुर्बानी देने की प्रेरणा देती प्रतीत हो रही थी। उन्हें सचमुच का चश्मा पहनाया गया था। हालदार साहब ने जब पहली बार उस प्रतिमा को देखा तो वे रोमांचित हो गया कि इतना अच्छा उपाय किया गया है। वे वहाँ से जाने के बाद भी उसी के विषय में सोचते रहे। उन्हें लगा कि आज भी लोग देश भक्ति को अपने हृदय में बसाए हुए हैं जिस कारण वे देश के वीरों का इस तरह से सम्मान करते हैं। दूसरी तरफ आज देश के विषय में बात करने वाले का सर्वत्र उपहास ही उड़ाया जाता है। दूसरी बार हालदार साहब वहाँ गए तो उन्हें चश्मा बदला हुआ मिला। यह देखकर उनके रोमांच का ठिकाना ही न रहा कि मूर्ति कपड़े तो बदल नहीं सकती किंतु चश्मा तो बदला जा सकता है।

तीसरी बार फिर नया चश्मा था।

हालदार साहब की आदत पड़ गई, हर बार कस्बे से गुजरते समय चौराहे पर रुकना, पान खाना और मूर्ति को ध्यान से देखना। एक बार जब कौतूहल दुर्दमनीय हो उठा तो पानवाले से ही पूछ लिया, क्यों भई! क्या बात है? यह तुम्हारे नेताजी का चश्मा हर बार बदल कैसे जाता है?

पाने वाले के खुद के मुँह में पान ठुँसा हुआ था। वह एक काला मोटा और खुशमिज़ाज आदमी था। हालदार साहब का प्रश्न सुनकर वह आँखों-ही-आँखों में हँसा। उसकी तोंद थिरकी। पीछे घूमकर उसने दुकान के नीचे पान थूका और अपनी लाल-काली बत्तीसी दिखाकर बोला, कैप्टन चश्मेवाला करता है।

क्या करता है? हालदार साहब कुछ समझ नहीं पाए।

चश्मा चेंज कर देता है। पानवाले ने समझाया।

क्या मतलब? क्यों चेंज कर देता है? हालदार साहब अब भी नहीं समझ पाए।

कोई गिराक आ गया समझो। उसको चौड़े चौखट चाहिए। ताेे कैप्टन किदर से लाएगा? तो उसको मूर्तिवाला दे दिया। उदर दूसरा बिठा दिया।

अब हालदार साहब को बात कुछ-कुछ समझ में आई। एक चश्मेवाला है जिसका नाम कैप्टन है। उसे नेताजी की बगैर चश्मेवाली मूर्ति बुरी लगती है। बल्कि आहत करती है, मानो चश्मे के बगैर नेताजी को असुविधा हो रही हो। इसलिए वह अपनी छोटी-सी दुकान में उपलब्ध गिने-चुने फ्रेमों में से एक नेताजी की मूर्ति पर फिट कर देता है। लेकिन जब कोई ग्राहक है और उसे वैसे ही फ्रेम की दरकार होती है जैसे मूर्ति पर लगा है, तो कैप्टन चश्मेवाला मूर्ति पर लगा फ्रेम-संभवत: नेताजी से क्षमा माँगते हुए-लाकर ग्राहक को देता है और बाद में नेताजी को दूसरा फ्रेम लौटा देता है। वाह! भई खूब! क्या आइडिया है।

लेकिन भाई! एक बात अभी भी समझ में नहीं आई। हालदार साहब ने पानवाले से फिर पूछा, नेताजी का आरिजिनल चश्मा कहाँ गया? पानवाला दूसरा पान मुँह में ठूँस चुका था। दोपहर का समय था, ’दुकान’ पर भीड़-भाड़ अधिक नहीं थी। वह फिर आँखों-ही आँखों में हँसा। उसकी तोंद थिरकी। कत्थे की डंडी फेंक, पीछे मुड़कर उसने नीचे पीक थूकी और मुसकराता हुआ बोला, मास्टर बनाना भूल गया। पानवाले के लिए यह एक मज़ेदार बात थी, लेकिन हालदार साहब के लिए चकित और द्रवित करने वाली। यानी वह ठीक ही सोच रहे थे। मूर्ति के नीचे लिखा ’मूर्तिकार मास्टर मोतीलाल’ वाकई कस्बे का अध्यापक था। बेचारे ने महीने-भर में मूर्ति बनाकर पटक देने का वादा कर दिया होगा। बना भी ली होगी, लेकिन पत्थर में पारदर्शी चश्मा कैसे बनाया जाए- काँचवाला-यह तय नहीं कर पाया होगा। या कोशिश की होगी और असफल रहा होगा। या बनाते -बनाते ’कुछ और बारीकी’ के चक्कर में चश्मा टूट गया होगा। या पत्थर का चश्मा अलग से बनाकार फिट किया होगा और वह निकल गया होगा। उफ़…।

हालदार साहब जब भी कस्बे में आते नेताजी की प्रतिमा को अवश्य देखते। हर बार उन्हें नेताजी का चश्मा बदला हुआ मिलता। एक दिन पानवाले से पूछने पर उन्हें पता चला कि कैप्टन नाम का चश्में बेचने वाला व्यक्ति मूर्ति पर चश्मा लगाता है और किसी ग्राहक को वैसा-चश्मा चाहिए तो वह उस चश्में को उतार लेता है और दूसरा पहना देता है। असली चश्में के विषय में पूछने पर पता चलता है ड्राइंग मास्टर चश्मा बनाना भूल गया। फिर हालदार साहब ने मास्टर की मानसिक स्थिति के विषय में कई तरह से सोचा।

हालदार साहब को यह सब कुछ बड़ा विचित्र और कौतुकभरा लग रहा था। इन्हीं खयालों में खोए-खोएपान के पैस चुकाकर, चश्मेवाले की देश-भक्ति के समक्ष नतमस्तक होते हुए वह जीप की तरफ़ चले, फिर रुके, पीछे मुड़े और पानवालों के पास जाकर पूछा, क्या कैप्टन चश्मेवाला नेताजी का साथी है? या आज़ाद हिंद फ़ौज का भूतपूर्व सिपाही?

पानवाला नया पान खा रहा था। पान पकड़े अपने हाथ को मुँह से डेढ़ इंच दूर रोककर उसने हालदार साहब

को ध्यान से देखा, फिर अपनी लाल-काली बत्तीसी दिखाई और मुसकराकर बोला-नई साब! वे लंगड़ा क्या जाएगा फ़ौज में। पागल है पागल! वे आ रहा है। आप उसी से बात कर लो। फोटो छपवा दो उसका कहीं।

हालदार साहब को पान वाले द्धारा एक देशभक्त का इस तरह मज़ाक उड़ाया जाना अच्छा नहीं लगा। मुड़कर देखा तो अवाक्‌ रह गए। एक बेहद बूढ़ा मरियल-सा लंगड़ा आदमी सिर गांधी टोपी और आँखों पर काला चश्मा लगाए एक हाथ में एक छोटी सी संदूकची और दूसरे हाथ में एक बाँस पर टंगे बहुत-से चश्में लिए अभी-अभी एक गली से निकला था और अब एक बंद दुकान के सहारे अपना बाँस टिका रहा था। तो इस बेचारे की दुकान भी नहीं! फेरी लगाता है! हालदार साहब चक्कर में पड़ गए। पूछना चाहते थे, इसे कैप्टन क्यों कहते है? क्या यही इसका वास्तविक नाम हैं? लेकिन पानवाले ने साफ़ बता दिया था कि अब वह इस बारे में और बात करने को तैयार नहीं। ड्राइवर भी बेचैन हो रहा था। काम भी था। हालदार साहब में बैठकर चले गए।

हालदार साहब पान वाले से यह भी पूछते हैं कि क्या चश्में वाला कैप्टन नेताजी का कोई साथी है या आजाद हिंद फ़ौज का कोई भूतपूर्व सैनिक है? पान वाला उपहास के भाव में बताता है कि वह लंगड़ा और पागल है। वह कैसे फ़ौज में जा सकता है। उसे सामने से चश्मा वाला भी आता दिखाई देता है। जिसे पान वाला हालदार साहब को भी दिखाता है। हालदार साहब को देशभक्तों का ऐसा मज़ाक अच्छा नहीं लगा। उन्होंने देखा कि एक कमजोर लगड़ा आदमी गांधी टोपी और काला चश्मा लगाए एक छोटी-सी लोहे की पेटी और बाँस पर चश्मे लटकाए आ रहा था। वह फेरी लगा कर चश्में बेचता था। हालदार साहब उसे कैप्टन बताने की वृत्ति में नहीं है और न ही वहाँ ज्यादा रुकने का उनके पास समय था।

दो साल तक हालदार साहब अपने काम के सिलसिले में उसके कस्बे से गुजरते रहे और नेताजी की मूर्ति में बदलते हुए चश्मों को देखते रहें। कभी गोल चश्मा होता, तो कभी चौकोर, कभी लाल, कभी काला, कभी धूप का चश्मा, कभी बड़े काँचों वाला गोगो चश्मा…. पर कोई-न-कोई चश्मा होता ज़रूर……उस धूलभरी यात्रा में हालदार साहब को कौतुक और प्रफुल्लता के कुछ क्षण देने के लिए।

फिर एक बार ऐसा हुआ कि मूर्ति के चेहरे पर कोई भी, कैसा भी चश्मा नहीं था। उस दिन पान की दुकान भी बंद थी। चौराहे की अधिकांश दुकानें बंद थीं।

अगली बार भी मूर्ति की आँखों पर चश्मा नहीं था। हालदार साहब ने पान खाया और धीरे से पानवाले से पूछा-क्यों भई, क्या बात है? आज तुम्हारे नेताजी की आँखों पर चश्मा नहीं हैं? पानवाला उदास हो गया। उसने पीछे मुड़कर मुँह का पान नीचे थूका और सिर झुकाकर अपनी धोती के सिरे से आँखे पोछता हुआ बोला-साहब। कैप्टन मर गया।

और कुछ नहीं पूछ पाए हालदार साहब। कुछ पल चुपचाप खड़े रहे, फिर पान के पैसे चुकाकर जीप आ बैठे और रवाना हो गए।

बार-बार सोचते, क्या होगा उस कौम का जो अपने देश की खातिर घर-गृहस्थी-जवानी-ज़िंदगी सब कुछ होम देनेवालों पर भी हँसती है और अपने लिए बिकने के मौके ढूँढती है। दुखी हो गए।

पंद्रह दिन बाद फिर उसी कस्बे से गुज़रे। कस्बे में घुसने से पहले ही खयाल आया कि कस्बे की हृदयस्थली में सुभाष की प्रतिमा अवश्य ही प्रतिष्ठापित होगी, लेकिन सुभाष की आँखों पर चश्मा नहीं होगा।…. . क्योंकि मास्टर बनाना भूल गया।…. . और कैप्टन मर गया। सोचा, आत वहाँ रुकेंगे नहीं, पान भी नहीं खाएंगे, मूर्ति की तरफ़ देखेंगे भी नहीं, सीधे निकल जाएंगे। ड्राइवर से कह दिया, चौराहे पर रुकना नहीं, आज बहुत काम है, पान आगे कहीं खा लेंगे।

लेकिन आदत से मज़बूर आँखें चौराहा आते ही मूर्ति की तरफ़ उठ गईं। कुछ ऐसा देखा कि चीखे रोको! जीप स्पीड में थी, ड्राइवर ने ज़ोर से ब्रेक मारे। रास्ता चलते लोग देखने लगे। जीप रुकते-न- रुकते हालदार साहब जीप से कूदकर तेज़-तेज़ कदमों से मूर्ति की तरफ़ लपके और उसके ठीक सामने जाकर अटेंशन में खड़े हो गए। मूर्ति की आँखों पर सरकंडे से बना छोटा-सा चश्मा रखा हुआ था, जैसा बच्चे बना लेते हैं। हालदार साहब भावुक हैं। इतनी-सी बात पर उनकी आँखे भर आईं।

लगभग दो वर्ष तक हालदार साहब उस कस्बे से गुजरते रहे और चश्में का बदलना देखते रहे। लेकिन चश्मा रहता अवश्य था। एक दिन नेताजी की मूर्ति पर कैसा भी चश्मा नहीं था और दुकाने भी बंद थीं। अगली बार जब हालदार साहब आए तो पान वाले से चश्मा न होने कारण पूछने पर पता चला कि कैप्टन मर गया था। वे चुपचाप वहाँ से वापस आ गए। वे इस बात को सोचकर दुखी हो गए कि अपना सब कुछ बलिदान करने वालों पर लोग हँसते हैं और अपने क्षुद्र स्वार्थ निकालने के लिए बिकने तक को तैयार रहते हैं। कुछ दिन हालदार साहब जब फिर उधर से गुजरे तो यह निश्चय कर रखा था कि वे न तो वहाँ रूकेंगे, न पान खाएंगे और न ही मूर्ति की तरफ़ देखेंगे। लेकिन जैसे मूर्ति के पास पहुँचे वे जीप को रूकवाने के लिए चिल्लाए और चलती जीप से कूदकर मूर्ति के सामने सीधे खड़े हो गए। मूर्ति पर किसी छोटे बच्चे ने सरकंडे का चश्मा बनाकर लगा रखा था। बच्चों की देश पर कुर्बान वीरों और देश के प्रति भक्ति की इस भावना पर हालदार साहब भावुक हो उठे।

शब्दार्थ

खुशम़िजाज़-अच्छा स्वभाव। आइडिया-उपाय। आरिजिनल-वास्तविक। कौतुकभरी-उत्तेजना भरी। तोंद-पेट। पारदर्शी-आर-पार दिखाई देने वाला। समक्ष-सामने। संदूकची-लोहे की छोटी पेटी। प्रतिमा-मूर्ति। इकलौता-एकमात्र। बत्तीसी-बत्तीस दाँतों की पंक्ति। चेंज-बदलाव। प्रफुल्ल-प्रसन्न।

इस पाठ को कंठस्थ कर निम्न प्रशनो के उत्तर दीजिए

Question number: 512 (119 of 120 Based on Passage) Show Passage

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » स्वयंप्रकाश नेताजी का चश्मा

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नेताजी की मूर्ति कैसी लग रही है?

Question number: 513 (120 of 120 Based on Passage) Show Passage

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » स्वयंप्रकाश नेताजी का चश्मा

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स्वयं प्रकाश ने अपनी रचनाओं में कौनसी भाषा को अपनाया है?

Question number: 514

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » गिरिजाकुमार माथुर छाया मत छूना

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माथुर जी ने किस सन्‌ में व कॉलेज से बी. एस. सी. की परीक्षा पास की थी?

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राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

(1)

नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा।।

आयेसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही।।

सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरिकरनी करि करिअ लराई।।

सुनहु राम जेहि सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा।।

सो बिलगाउ बिहाड़ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा।।

सुनि मुनिबचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अवमाने।।

बहु धनही तोरी लरिकाई। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाई।।

येहि धनुपर ममता केहि हेतु। सुनि रिसाइ कह भृगुकलकेतू।।

रे नृपबालक कालबस बोलत तोहि न सँभार।

धनुही सम त्रिपुरारिधनु बिदित सकल संसार।।

Question number: 515 (1 of 6 Based on Passage) Show Passage

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » तुलसीदास राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

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तुलसीदास द्वारा रचित उपरोक्त संवाद के भाव-सौंदर्य क्या है?

Explanation

प्रस्तुत पद के भाव सौदर्य में तुलसीदास जी न यह बताया है जब शिवजी का धनुष टूटता है तो धनुष टूटने पर परशुराम जी अत्यधिक कोध्रित होते हैं, तब राम जी बड़े ही सहज व विनम्र भाव से परशुराम जी के गुस्से को शांत करते हैं। इसके साथ में तुलसीदास… (444 more words) …

Question number: 516 (2 of 6 Based on Passage) Show Passage

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प्रस्तुत पद महाकवि गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित महाकाव्य ’रामचरितमानस’ के ’बालकाण्ड’ के अन्तर्गत कौनसे संवाद’ खंड से उद्धव है।

Question number: 517 (3 of 6 Based on Passage) Show Passage

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Describe in Detail

तुलसीदास द्वारा रचित उपरोक्त संवाद में राम जी की बातें सुनकर परशुराम जी ने क्या उत्तर दिया?

Explanation

क्रोधी मुनि को राम के मुंह से सेवक सुनकर और अधिक गुस्सा आ गया और फिर परशुराम राम जी बोले-सेवक वही होता है जो सेवा का कार्य करता है। दुश्मन के कार्य करने वाले के साथ तो लड़ाई ही करनी चाहिए। हे राम! सुनो जिस किसी ने भी यह धनुष… (486 more words) …

Question number: 518 (4 of 6 Based on Passage) Show Passage

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महाकवि गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित उपरोक्त संवाद में किस समय का वर्णन है?

Question number: 519 (5 of 6 Based on Passage) Show Passage

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Describe in Detail

तुलसीदास द्वारा रचित उपरोक्त संवाद में श्री रामजी ने बड़े सरल एवं सहज स्वभाव से परशुराम जी से क्या कहा?

Explanation

श्री रामजी ने बड़े सरल एवं सहज स्वभाव से परशुराम जी से कहा कि हे नाथ! शिवजी के धनुष को तोड़ने वाला आपका कोई एक सेवक ही होगा। आप आदेश दीजिए कि आप किस कारण से इस उत्सव पर आए हैं?

क्योंकि-किसी-किसी इंसान का व्यवहार इतना निर्मल होता है कि… (426 more words) …

Question number: 520 (6 of 6 Based on Passage) Show Passage

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Describe in Detail

तुलसीदास द्वारा रचित उपरोक्त संवाद के शिल्प-सौंदर्य क्या हैं?

Explanation

तुलसीदास द्वारा रचित उपरोक्त संवाद के शिल्प-सौंदर्य है कि तुलसीदास ने इस संवाद का चित्रण इस प्रकार किया मानों यह घटना हमारे सामने ही हो रही हो। इसके साथ ही इस संवाद में अलंकारों, भाव, छंद, संगीत, भाषा व शैली का प्रयोग कर बहुत ही सुंदर तरीके से प्रस्तुत किया… (438 more words) …

Question number: 521

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » ऋतुराज कन्यादान

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Write in Short

ऋतुराज जी दव्ारा रचित उनकी प्रमुख रचनाएं कौन -कौन सी है?

Question number: 522

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » गिरिजाकुमार माथुर छाया मत छूना

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माथुर जी दव्ारा रचित काव्यों में क्या होता है?

Passage

पाठ 12

यशपाल

”यशपाल हिन्दी साहित्य के सर्वश्रेष्ठ कहानीकारों

में से एक हैं। अब तक इनके अनेकानेक कहानी

संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। जो कि भाव पक्ष व

शिल्प पक्ष की दृष्टिकोण से काफ़ी उच्चकाटि

के हैं। यशपाल मार्क्सवादी दर्शन से प्रभावित

कहानीकार हैं। इनकी कहानियों में यथार्थवादी

परम्परा का अनुकरण किया गया हैं। उन्होंने

समाज में व्याप्त कुरीतियों पर जमकर प्रहार

किया है, जो कि सराहनीय है।”

जीवन-परिचय- हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध साहित्यकार यशपाल का जन्म 3 दिसम्बर, 1903 को पंजाब के फिरोज़पुर छावनी में हुआ। उनके पूर्वज हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के निवासी थे। उनके पिता का नाम हीरालाल और माता का नाम प्रेम देवी था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा कांगड़ा के गुरुकुल में हुई। उन्होंने सन्‌ 1921 में फिरोज़पुर से मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। उन्होंने लाहौर के नेशनल कॉलेज से बी. ए. तक शिक्षा ग्रहण की। कॉलेज में ही उनकी भेंट सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी भगत सिंह और सुखदेव से हुई। उन्होंने अपने सहपाठी लाला लाजपत राय के साथ स्वदेशी आंंदोलन में जमकर भाग लिया। उनका झुकाव मार्क्सवाद की और बढ़ता गया। उन्हें दिल्ली में बम बनाते हुए गिरफ्तार कर लिया गया तथा 7 अगस्त, 1936 को बरेली जेल में ही उनका विवाह प्रकाशवती कपूर से हुआ। वे कई बार विदेश यात्रा पर गए। उन्होंने साहित्यकार और प्रकाशक दोनों रूपों में हिन्दी साहित्य की सेवा की। 26 दिसम्बर, 1976 को उनका स्वर्गवास हो गया।

प्रमुख रचनाएँ-यशपाल की प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं-

उपन्यास-दादा कामरेड, देशद्रोही, पार्टी कामरेड, दिव्या, मनुष्य के रूप, अमिता, क्यों फँसे, मेरी तेरी उसकी बात, बारह घण्टे, अप्सरा का श्राप, झूठा-सच।

कहानी-संग्रह-पिंजरे की उड़ान, तर्क का तूफान, ज्ञानदान, वो दुनिया, अभिशप्त, फूलों का कुर्ता, धर्मयुद्ध, चित्र का शीर्षक, उत्तराधिकारी, उत्तमी की माँ, सच बोलने की भूल।

नाटक-नशे नशे की बात, रूप की परख, गुडबाई दर्देदिल।

व्यंग्य लेख-चक्कर क्लब।

संस्मरण-सिंहावलोकन।

विचारात्मक निबंध-न्याय का संघर्ष, मार्क्सवाद, रामराज्य की कथा।

साहित्यिक विशेषताएँ- यशपाल जी की रचनाओं पर मार्क्सवाद का प्रभाव स्पष्ट झलकता है। उनकी रचनाओं में सामाजिक, ऐतिहासिक और पौराणिक तथ्यों के दर्शन होते हैं। उन्होंने जीवन की वास्तविकता को महसुस कर यथार्थ का वर्णन किया है। उनकी अधिकांश कहानियाँ चिन्तन प्रधान हैं।

भाषा-शैली-यशपाल की भाषा शैली में स्वाभाविकता एवं व्यवहारिकता का गुण विद्यमान है। उनकी भाषा अत्यंत सहज, सरल और पात्रानुकूल है। उन्होंने वर्णनात्मक, संवाद प्रधान प्रभावशाली शैली को अपनाया है। उन्होंने विषयानुसार उर्दू और अंग्रेजी के शब्दों का भी प्रयोग किया है। आम आदमी की भाषा का प्रयोग करने के कारण यशपाल का साहित्य जनसाधारण में अत्यंत लोकप्रिय है।

लखनवी अंदाज

प्रस्तुत कहानी के माध्यम से लेखक यशपाल ने यह सिद्ध करना चाहा है कि बिना विचार, कथ्य और पात्रों के भी कहानी लिखी जा सकती है। यहाँ उन्होंने एक लखनवी नवाब के माध्यम से उस सामन्ती वर्ग पर कटाक्ष किया है जो वास्तविकता से अनभिज्ञ रहते हुए बनावटी जीवन शैली का आदी है। वर्तमान में भी परजीवी संस्कृति को देखा जा सकता है।

मुफ़स्सिल की पैसेंजर ट्रेन चल पड़ने की उतावली में फूँकार रही थी। आराम से सेंकड क्लास में जाने के लिए दाम अधिक लगते हैं। दूर तो जाना नहीं था। भीड़ से बचकर, एकांत में नई कहानी के सबंध में सोच सकने और खिड़की से प्राकृतिक दृश्य देख सकने के लिए टिकट सेकंड क्लास का ही ले लिया।

गाड़ी छूट रही थी। सेकंड क्लास के एक छोटे डिब्बे को खाली समझकर, जरा दौड़कर उसमें चढ़ गए। अनुमान के प्रतिकूल डिब्बा निर्जन नहीं था। एक बर्थ पर लखनऊ की नवाबी नस्ल के एक सफ़ेदपोश सज्जन बहुत सुविधा से पालथी मारे बैठे थे। सामने दो ताज़े-चिकने खीरे तौलिए पर रखे थे। डिब्बे में हमारे सहसा कूद जाने से सज्जन की आँखों में एकांत चिंतन में विघ्न का असंतोष दिखाई दिया। सोचा, हो सकता है, यह भी कहानी के लिए सुझा की चिंता में हो या खीरे-जैसी अपदार्थ वस्तु का शौक करते देखे जाने के संकोच में हो।

नवाब साहब ने संगति के लिए उत्साह नहीं दिखाया। हमने भी उनके सामने की बर्थ पर बैठकर आत्म-सम्मान में आँखे चुरा लीं।

ठाली बैठे, कल्पना करते रहने की पुरानी आदत है। नवाब साहब की असुविधा और संकोच के कारण का अनुमान करने लगे। संभव है, नवाब साहब ने बिलकुल अकेले यात्रा कर सकने के अनुमान में किफ़ायत के विचार से सेंकड क्लास का टिकट खरीद लिया हो और अब गवारा न हो कि शहर को कोई सफ़ेदपोश उन्हें मँझले दर्जे में सफ़र करता देखे।……. . अकेले सफ़र का वक्त काटने के लिए ही खीरे खरीदे होंगे और अब किसी सफ़ेदपोश के सामने खीरा कैसे खाएँ?

लेखक बताता है कि वह भीड़ से बचने के लिए दूसरे दर्जे की टिकट लेकर रेलगाड़ी के एक डिब्बे में सवार हुआ। डिब्बे में उन्होंने देखा कि एक लखनऊ के नवाबों जैसा भद्र व्यक्ति पहले से ही बैठा था और उसने अपने पास दो खीरे रखे हुए थे। उस भद्र पुरुष के चेहरे पर लेखक को चिंता और संकोच का भाव दिखाई देता है। नवाब साहब में सहयात्री मिलने की उत्सुकता ने देख लेखक सामने की बर्थ पर बैठ गया। खाली समय में वे कल्पना करने का काम करते हैं इसलिए नवाब साहब के संकोच और असुविधा के विषय में सोचने लगे। उन्होंने अनुमान लगाया कि नवाब साहब ने अकेले ही यात्रा करने के उद्देश्य से दूसरे दूर्जे का टिकट खरीदा होगा और सफ़र काटने के लिए खीरे खरीदे होगें। लेकिन लेखक को देखकर शायद वह संकोच में पड़ गया।

हम कनखियों से नवाब साहब की ओर देख रहे थे। नवाब साहब कुछ देर गाड़ी की खिड़की से बाहर देखकर स्थिति पर गौर करते रहे।

’ओह’ नवाब साहब ने सहसा हमें संबोधन किया, ’आदाब-अर्ज’, जनाब, खीरे का शौक फ़रमाएँगे?

नवाब साहब का सहसा भाव-परिवर्तन अच्छा नहीं लगा। भाँप लिया, आप शराफ़त का गुमान बनाए रखने के लिए हमें भी मामूली लोगों की हरकत में लथेड़ लेना चाहते हैं। जवाब दिया, ’शुक्रिया, किबला शौक फरमाएँ।’

नवाब साहब ने फिर एक पल खिड़की से बाहर देखकर गौर किया और दृढ़ निश्चय से खीरों के नीचे रखा तौलिया झाढ़कर सामने बिछा लिया। सीट के नीचे से लोटा उठाकर दोनों खीरों को खिड़की से बाहर धोया और तौलिए से पोंछ लिया। जेब से चाकू निकाला। दोनों खीरों के सिर काटे और उन्हें गोदकर झाग निकाला। फिर खीरों को बहुत एहतियात से छीलकर फाँकों को करीने से तौलिए पर सजाते गए।

लखनऊ स्टेशन पर खीरा बेचने वाले खीरे के इस्तेमाल का तरीका जानते हैं। ग्राहक के लिए जीरा-मिला नमक और मिर्ची पिसी हुई लाल मिर्च की पुड़िया भी हाज़िर कर देते हैं।

नवाब साहब ने बहुत करीने से खीरे की फाको पर जीरा-मिला नमक और लाल मिर्च की सुखी बुरक दी। प्रत्येक भाव-भंगिमा और जबड़ों के स्फुरण से स्पष्ट था कि उस प्रक्रिया में उनका मुख खीरे के रसास्वादन की कल्पना से प्लावित हो रहा था।

नवाब साहब ने स्थिति को भाँपते हुए लेखक से नमस्कार करके खीरे खाने के विषय में पूछा। नवाब के बदले हुए स्वभाव को देखकर लेखक ने समझ लिया कि वह उन्हें सामान्य लोगों की तरह समझ रहा है और उसे मना कर दिया। नवाब साहब ने खीरों को धोया और ऊपरी हिस्सा काटकर उनको रगड़ा। फिर चाकू से छीलकर उन्हें फांकों में काट लिया। उन पर जीरा-मिला नमक और लाल मिर्च डाली। खीरों के रसास्वादन की कल्पना से नवाब साहब के मुँह में पानी आ रहा था।

हम कनखियों से देखकर सोच रहे थे, मियाँ रईस बनते हैं, लेकिन लोगों की नज़रों से बच सकने के खयाल में अपनी असलियत पर उतर आए हैं।

नवाब साहब ने फिर एक बार हमारी ओर देख लिया, ’ वल्लाह, शौक कीजिए, लखनऊ का बालम खीरा है! ’

नमक-मिर्च छिड़क दिये जाने से ताज़े खीरे की पनियाती फाँके देखकर पानी मुँह में जरूर आ रहा था, लेकिन इंकार कर चूके थे। आत्म-सम्मान निबाहना ही उचित समझा, उत्तर दिया, ’ शुक्रिया, इस वक्त तलब महसूस नहीं हो रही, मेदा भी ज़रा कमजोर है, किबला शौक फरमाएँ।’

नवाब साहब ने सतृष्ण आँखों से नमक-मिर्च के संयोग से चमकती खीरे की फाँकों की ओर देखा। खिड़की के बाहर देखकर दीर्घ निश्वास लिया। खीरे की एक फाँक उठाकर होंठो तक ले गए। फाँक को सूँघा। स्वाद के आनंद में पलकें मुँद गईं। मुँह में भर आए पानी का घूँट गले उतर गया। तब नवाब साहब ने फाँक को खिड़की से बाहर छोड़ दिया। नवाब साहब खीरे की फाँकों को नाक के पास ले जाकर, वासना से रसास्वादन कर खिड़की के बाहर फेंकते गए।

लेखक सोच रहा था कि वैसे तो रईस बनने का ढ़ोंग कर रहा है और लोगों से नज़रे बचाकर खीरे खा रहा है। नवाब साहब ने फिर लेखक से खीरे खाने के विषय में पूछा। नमक मिर्च लगे ताजे खीरें देखकर लेखक के मुँह में पानी तो आ रहा था किंतु स्वाभीमान को बचाए रखने के लिए यह कहते हुए मना कर दिया कि इच्छा नहीं है और मेरा अमाशय भी कमज़ोर है। फिर नवाब साहब ने प्यासी आँखों से खीरें की फाँकों को देखा और एक लंबी साँस लेकर खीरे की एक फाँक को नाक तक ले जाकर सूँघा। स्वाद का आनंद लेकर और मुँह में आए पानी को पी कर फाँक को खिड़की से बाहर फेंक दिया। इस तरह उन्होंने सभी फाँके सूँघकर बाहर फेंक दी।

नवाब साहब ने खीरे की सब फाँकों को खिड़की के बाहर फेंककर तौलिए से हाथ और होंठ पोंछ लिए और गर्व से गुलाबी आँखों से हमारी ओर देख लिया, मानो कह रहे हों- यह है खानदानी रईसो का तरीका!

नवाब साहब खीरे की तैयारी और इस्तेमाल से थककर लेट गए। हमें तसलीम में सिर खम कर लेना पड़ा-यह है खानदानी तहज़ीब, नफ़ासत और नज़ाकत!

खीरे की सारी फाँके सूँघकर बाहर फेंकने के बाद नवाब साहब ने तौलिए से हाथ-मुँह पोंछते हुए गर्व के साथ लेखक की ओर ऐसे देखा जैसे वह स्वयं को खानदानी रईस बता रहा हो। नवाब साहब लेट गए और लेखक ने, यह सोचते हुए कि यही है खानदानी शिष्टता, स्वच्छता और कोमलता, अपना सिर उसके सम्मान में झुका लिया।

हम गौर कर रहे थे, खीरा इस्तेमाल करने के इस तरीके को खीरे की सुगंध और स्वाद की कल्पना से संतुष्ट होने का सूक्ष्म, नफ़ीस या एब्स्ट्रैक्ट तरीका ज़रूर कहा जा सकता है परंतु क्या ऐसे तरीके से उदर की तृप्ति भी हो सकती है?

नवाब साहब की ओर से भरे पेट के ऊँचे डकार का शब्द सुनाई दिया और नवाब साहब ने हमारी ओर देखकर कह दिया, ’खीरा लज़ीज होता है लेकिन होता है सकील, नामुराद मेदे पर बोझ डाल देता है।’

ज्ञान-चक्षु खुल गए! पहचाना -ये हैं नई कहानी के लेखक!

खीरे की सुगंध और स्वाद की कल्पना से पेट भर जाने का डकार आ सकता है तो बिना विचार, घटना और पात्रों के, लेखक की इच्छा मात्र से ’नई कहानी’ क्यों नहीं बन सकती?

लेखक यह सोच रहा था के क्या इस सुगंध और स्वाद के सूक्ष्म, बढ़िया और अमूर्त तरीके से पेट की तृप्ति हो सकती है? तभी नवाब साहब ने भरे पेट जैसी डकार ली और लेखक से कहा कि खीरा स्वादिष्ट तो होता है किंतु अमाशय के लिए भारी होता है। लेखक की सोचने की शक्ति जागृत हो गई, उसे नवाब साहब एक नई कहानी का लेखक प्रतीत हुआ। उन्होंने सोचा कि खीरे खाए बिना ही पेट भर सकता है और डकार आ सकती है तो फिर बिना विचार, घटना और पात्रों के एक नई तरह की कहानी भी लिखी जा सकती है।

शब्दार्थ

मुफ़स्सिल-केंद्रस्थ नगर के इर्द-गिर्द के स्थान। सफ़ेदपोश-भद्र व्यक्ति। किफायत-मितव्यता, समझदारी से उपयोग करना। आदाब अर्ज- अभिवादन का एक ढंग। गुमान-भ्रम। एहतियात- सावधानी। बुरक देना- छिड़क देना। स्फुरण- फड़कना, हिलना। प्लावित-पानी भर जाना। पनियाती-रसीली। मेदा-अमाशय। तसलीम-सम्मान में। तहज़ीब-शिष्टता। नफासत- स्वच्छता। नज़ाकत- कोमलता। नफीस- बढ़िया। एब्स्ट्रैक्ट-सूक्ष्म, जिसका भौतिक अस्तित्व न हो, अमूर्त।

सकील- आसानी से न पचने वाला।

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लेखक ने प्रस्तुत कहानी में सेंकड क्लास का टिकट क्यों लिया?

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