क्षितिज(Kshitij-Textbook) (CBSE Class-10 Hindi): Questions 1224 - 1235 of 1777

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Passage

पाठ-15

महावीर प्रसाद दव्वेदी

”आधुनिक हिन्दी-साहित्य की परम्परा में नवीन भावनाओं

के अभ्युत्थान का श्रेय यदि भारतेन्दु हरिचन्द्र जी को

प्राप्त है तो नवीन भावनाओं के पारिष्कार का श्रेय

आचार्य महावीर प्रसाद दव्वेदी जी को दिया जाता है।

हिन्दी साहित्य के संस्कार परिष्कार में दव्वेदी जी ने

अपना संपूर्ण जीवन होम कर दिया। साहित्य के क्षेत्र

में वे लौह लेखनी लेकर पधारे थे। नि: सन्देह दव्वेदी

जी ने अपने युग में बहुत सारे उच्च काटि के

साहित्यकार पैदा करने में सफल रहे।”

जीवन-परिचय- महान्‌ युग के प्रवर्तक एवं दव्वेदी युग के नायक महावीर प्रसाद दव्वेदी का जन्म उत्तर-प्रदेश के रायबरेली जिले के दौलतपुर गाँव में सन्‌ 1864 में हुआ था। आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण वे बड़ी कठिनाई से स्कूल तक की शिक्षा प्राप्त कर सके। पढ़ाई छोड़कर उन्होंने रेलवे में नौकरी कर ली। धीरे-धीरे उनकी रुचि हिन्दी साहित्य और कविता लेखन की ओर बढ़ने लगी। दव्वेदी जी ने कवियों को नवीन काव्य चेतना से अनुप्राणित कर उन्हें एक निश्चित दिशा प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने नौकरी से इस्तीफा देकर सन्‌ 1903 में प्रसिद्ध हिन्दी मासिक पत्रिका ’सरस्वती’ का सम्पादन अपने हाथों में संभाला। उन्होंने नए कवियों की रचनाओं को ’सरस्वती’ में स्थान देकर उन्हें काव्य-रचना के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित किया। सन्‌ 1938 में उनका निधन हो गया।

प्रमुख रचनाएँ- महावीर प्रसाद दव्वेदी एक व्यवस्थित संपादक, भाषा वैज्ञानिक, पुरात्ववेता, इतिहासकार, समाजशास्त्री, अर्थशास्त्री, वैज्ञानिक चिंतन व लेखन के स्थापक, अनुवादक और समालोचक थे। उनकी प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं-

1 रसज्ञ रंजन 2 अद्भुत आलाप 3 विचार विमर्श 4 संकलन 5 साहित्य-सीकर 6 कालीदास की निरंकुशता 7 कालीदास और उनकी कविता 8 हिन्दी भाषा की उत्पत्ति 9 अतीत-स्मृति 10 वाग्‌ विलास आदि।

साहित्यिक विशेषताएँ- महावीर प्रसाद दव्वेदी ने साहित्य की प्रत्येक विधा को बड़ा बल दिया। वे सब कुछ थे, किन्तु कवि थोड़े-थोड़े थे। वे सफल अनुवादक, पत्रकार और संपादक थे। उन्होंने अपनी रचनाओं के बल पर तत्कालीन साहित्य में प्रचलित रूढ़ियों का संगठित और जबरदस्त विरोध किया। उन्होंने समाज में व्याप्त कायरता, रूढ़िवादिता, घूसखोरी जैसी बुराइयों पर चोट की उन्होंने भाषा संस्कार का भी आंदोलन छेड़ा। उन्होंने छुआछुत, बाल-विवाह, दहेज-प्रथा, देश-प्रेम जैसे विषयों पर रचनाएँ की। समालोचन को हिन्दी-साहित्य में स्थापित करने का भी श्रेय उन्ही को जाता है।

भाषा शैली- आचार्य महावीर प्रसाद दव्वेदी भाषा के आचार्य थे। इनकी भाषा अत्यंत परिमार्जित, परिष्कृत एवं व्याकरण सम्मत है। जिसमें पर्याप्त गति तथा प्रवाह देखने को मिलता है। इन्होंने हिन्दी शब्द भण्डार की श्री वृद्धि में अदव्तीय सहयोग दिया है। शब्दों के प्रयोग में दव्वेदी जी को रुढ़िवादी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि आवश्यकतानुसार अरबी फारसी तथा अंग्रेजी के शब्दों का भी इन्होंने इस्तेमाल किया है। कठिन से कठिन विषय को बोधगम्य रूप में प्रस्तुत करना इनकी शैली की सबसे बड़ी विशेषता रही है। कुल मिलाकर दव्वेदी जी की भाषा शैली संपूर्ण रूप से व्यास शैली रही है।

स्त्री-शिक्षा के विरोधी कुतर्को का खंडन

प्रस्तुत लेख महावीर प्रसाद दव्वेदी द्वारा रचित विचारात्मक लेख है। इसमें ऐसी सभी पुरानी रूढ़ियों का विरोध किया गया है जो नारी-शिक्षा को व्यर्थ और समाज के विघटन का कारण बताती हैं। यह लेख सितंबर, 1914 में ’सरस्वती’ पत्रिका में पहली बार ’पढ़े लिखों का पांडित्य’ नामक शीर्षक से प्रकाशित हुआ था। बाद में ’महिला मोद’ नामक पुस्तक में शामिल करते समय दव्वेदी जी ने इसका शीर्षक बदलकर ’ स्त्री-शिक्षा के विरोधी कुतर्को का खंडन’ रख दिया। इसमें सड़ी-गली परंपराओं को ज्यों का त्यों न अपनाकर अपने विवेक से ग्रहण करने योग्य बातों को ही लेने के लिए कहा गया है। आज लड़कियाँ किसी भी क्षेत्र में लड़कों से पीछे नहीं हैं, समाज में अपनी पहचान बनाने के लिए बहुत से स्त्री-पुरुषों ने कड़ा संघर्ष भी किया है। वर्तमान जागरण काल में स्त्री-शिक्षा के विकास के साथ-साथ जनतांत्रिक एवं वैचारिक चेतना के भी संपूर्ण विकास पर बल दिया जाना चाहिए।

बढ़े शोक की बात है, आजकल भी ऐसे लोग विद्यमान हैं जो स्त्रियों को पढ़ाना उनके और गृह-सुख के नाश का कारण समझते हें। और, लोग भी ऐसे-वैसे नहीं, सुशिक्षित लोग-ऐसे लोग जिन्होंने बड़े-बड़े स्कूलों और शायद कॉलेजों में भी शिक्षा पाई है, जो धर्म-शास्त्र और संस्कृत के ग्रंथ साहित्य से परिचय रखते हैं, और जिनका पेशा कुशिक्षितों को सुशिक्षित करना, कुमार्गगामियों को सुमार्गगामी बनाना और अधार्मिका को धर्मतत्व समझना है। उनकी दलीलें सुन लीजिए-

1. पुराने संस्कृत-कवियों के नाटकों में कुलीन स्त्रियों से अपढ़ों की भाषा में बातें कराई गई हैं। इससे प्रमाणित है कि इस देश में स्त्रियों को पढ़ाने की चाल न थी। होती तो इतिहास-पुराणादि में उनको पढ़ाने की नियमबद्ध प्रणाली ज़रूर लिखी मिलती।

2. स्त्रियों को पढ़ाने से अनर्थ होते हैं। शकुंतला इतना कम पढ़ी थी कि गंवारों की भाषा में मुश्किल से एक छोटा-सा श्लोक वह लिख सकी थी। तिस पर भी उसकी इस इतनी कम शिक्षा ने भी अनर्थ कर डाला। शकुंतला ने जो कटु वाक्य दुष्यंत को कहे, वह इस पढ़ाई का ही दुष्परिणाम था।

3. जिस भाषा में शकुंतला ने श्लोक रचा था वह अपढ़ों की भाषा थी। अतएव नागरिकों की भाषा की बात तो दूर रही, अपढ़ गंवारों की भी भाषा पढ़ाना स्त्रियों को बरबाद करना है।

इस तरह की दलीलों का सबसे अधिक प्रभावशाली उत्तर उपेक्षा ही है। तथापि हम-दो चार बातें लिखें देते हैं।

लेखक इस बात पर दुख व्यक्त करता है कि वर्तमान समय में भी बहुत से ऐसे सभ्य और सुशिक्षित व्यक्ति हैं जो स्त्री-शिक्षा को अवनति का कारण मानते हैं। ऐसे शिक्षित लोग जो शिक्षक हैं, विद्वान हैं, साहित्यकार हैं, अपने विचार प्रकट करते हुए कहते हैं कि पुराने संस्कृत नाटकों से भी यही सिद्ध होता है। कि स्त्री-शिक्षा नहीं है। स्त्रियों को पढ़ाने से अनर्थ होता है, यदि शकुंतला अनपढ़ होती तो अपने पति के विषय में कटुवचन कदापि नहीं कहती। शकुंतला ने अपढ़ों की भाषा का प्रयोग किया था। अत: अपढ़ों की भाषा सिखाना भी विनाश की ओर जाना है।

नाटकों में स्त्रियों का प्राकृत बोलना उनके अपढ़ होने का प्रमाण नहीं। अधिक से अधिक इतना ही कहा जा सकता है कि वे संस्कृत न बोल सकती थीं। संस्कृत न बोल सकना न अपढ़ होने का सबूत है और न गंवार होने का। वाल्मीकि-रामायण के तो बंदर तक संस्कृत बोलते हैं। बंदर संस्कृत बोलते हैं। बंदर संस्कृत बोल सकते थे, स्त्रियाँ न बोल सकती थीं! अच्छा तो उत्तररामचरित में ऋषियों की वेदांतवादिनी पत्नियाँ कौन-सी भाषा बोलती थीं? उनकी संस्कृत क्या कोई गंवारी संस्कृत थी? भवभूति और कालिदास आदि के नाटक जिस जमाने के हैं उस ज़माने में शिक्षितों का समस्त समुदाय संस्कृत ही बोलता था, इसका प्रमाण पहले कोई दे ले तब प्राकृत बोलने वाली स्त्रियों को अपढ़ बताने का साहस करे। इसका क्या सबूत कि उस ज़माने में बोलचाल की भाषा प्राकृत न थी? सबूत तो प्राकृत के चलन के ही मिलते हैं। प्राकृत यदि उस समय की प्रचलित भाषा न होती तो बौद्धों तथा जैनों के हज़ारों ग्रंथ उसमें क्यों लिखे जाते, और भगवान शाक्य मुनि तथा उनके चेले प्राकृत ही में क्यों धर्मोपदेश देते? बौद्धों का त्रिपिटक गंथ हमारे महाभारत से भी बड़ा है। उसकी रचना प्राकृत में की जाने का एक मात्र कारण यही है कि उस ज़माने में प्राकृत ही सर्वसाधारण की भाषा थी। अतएव प्राकृत बोलना और लिखना अपढ़ और अशिक्षित होने का चिहृ नहीं। जिन पंडितों ने गाथा-सप्तशती, सेतुबंध-महाकाव्य और कुमारपालचरित आदि ग्रंथ प्राकृत में बनाए है, वे यदि अपढ़ और गंवार थे तो हिंदी के प्रसिद्ध से भी प्रसिद्ध अखबार का संपादक इस ज़माने में अपढ़ और गंवार कहा जा सकता है; क्योंकि वह अपने ज़माने की प्रचलित भाषा मेंं अखबार लिखता है। हिंदी, बांग्ला आदि भाषाएँ आजकल की प्राकृत हैं, शौरसेनी, मागधी, महाराष्ट्री और पाली आदि भाषाएं उस ज़माने की थीं। प्राकृत पढ़कर भी उस ज़माने में लोग उसी तरह सभ्य, शिक्षित और पंडित हो सकते थे जिस तरह कि हिंदी, बांग्ला, मराठी आदि भाषाएँ पढ़कर इस ज़माने में हम हो सकते हैं। फिर प्राकृत बोलना अपढ़ होने का सबूत है, यह बात कैसे मानी जा सकती हैं?

नाटकों में स्त्रियाँ संस्कृत न बोलकर प्राकृत भाषा का प्रयोग करती थीं जो अनपढ़ और गंवार होने का प्रमाण नहीं है। कई जगह तो वन्य प्राणियों से भी संस्कृत बुलवाई गई हैं। भवभूति और कालिदास के समय में सभी शिक्षित संस्कृत बोलते थे। लेखक यह भी पूछता है कि इसका क्या प्रमाण है कि पहले समय में प्राकृत बोलचाल की भाषा नहीं थी। बौद्धों, जैनों के लिखित ग्रंथ तथा भगवान शाक्य द्वारा उपदेश प्राकृत भाषा में दिये जाने से तो यह सिद्ध होता है कि प्राकृत भाषा उस समय बोली जाती थी। प्राकृत उस समय सर्वसाधारण की भाषा थी। उस समय शौरसेनी, मागधी, महाराष्ट्री, पाली आदि आदि भाषाएँ प्राकृत थीं, आज हिन्दी, बांग्ला आदि हैं। जिस प्रकार आज हम हिंदी, मराठी आदि पढ़कर शिक्षित और विद्वान होते है ठीक उसी तरह उस जमाने में लोग प्राकृत पढ़कर होते थे।

जिस समय आचार्यों ने नाट्‌यशास्त्र-संबंधी नियम बनाए थे उस समय सर्व-साधारण की भाषा संस्कृत न थी। चुने हुए लोग ही संस्कृत बोलते या बोल सकते थे। इसी से उन्होंने उनकी भाषा संस्कृत और दूसरे लोगों तथा स्त्रियों की भाषा प्राकृत रखने का नियम कर दिया।

पुराने ज़माने में स्त्रियों के लिए कोई विश्वविद्यालय न था। फिर नियमबद्ध प्रणाली का उल्लेख आदि पुराणों में न मिले तो क्या आश्चर्य। और, उल्लेख उसका कहीं रहा हो, पर नष्ट हो गया हो तो? पुराने ज़माने में विमान उड़ते थे। बताइए उनके बनाने की विद्या सिखाने वाला कोई शास्त्र! बड़े-बड़े जहाज़ों पर सवार होकर लोग दव्ीपांतरों को जाते थे। दिखाइए, जहाज बनाने की नियमबद्ध प्रणाली के दर्शक ग्रंथ! पुराणादि में विमानों और जहाज़ों दव्ारा की गई यात्राओं के हवाले देखकर उनका अस्तित्व तो हम बड़े गर्व से स्वीकार करते हैं, परंतु पुराने ग्रंथों में अनके प्रगल्भ पंडिताओं के नामोल्लेख देखकर भी कुछ लोग भारत की तत्कालीन स्त्रियों को मूर्ख, अपढ़ और गंवार बताते हैं। इस तर्कशास्त्रज्ञता और इस न्यायशीलता की बलिहारी! वेदों को प्राय: सभी हिंदू ईश्वर-कृत मानते हैं। सो ईश्वर तो वेद-मंत्रों की रचना अथवा उनका दर्शन विश्ववरा आदि स्त्रियों से करावे और उन्हें ककहरा पढ़ाना भी पाप समझें। शीला और विज्जा आदि कौन थीं? वे स्त्री थीं या नहीं? बड़े-बड़े पुरुष-कवियों से आदृत हुई हैं या नहीं? शार्ड. गधर- पद्धति में उनकी कविता के नमूने हैं या नहीं? बौद्ध-ग्रंथ त्रिपिटक के अंतर्गत थेरीगाथा में जिन सैकड़ों स्त्रियों की पद्य-रचना उद्धत है वे क्या अपढ़ थीं? जिस भारत में कुमारिकाओं को चित्र बनाने, नाचने, गाने, बजाने, फूल चुनने, हार गूंथने, पैर मलने तक की कला सीखने की आज्ञा थी उनको लिखने-पढ़ने की आज्ञा न थी। कौन विज्ञ ऐसी बात मुख से निकालेगा? और, कोई निकाले भी तो मानेगा कौन?

अत्रि की पत्नी-धर्म पर व्याख्यान देते समय घंटो पांडित्य प्रकृट करे, गार्गी बड़े-बड़े ब्रह्यवादियों को हरा दे, मंडन मिश्र की सहधर्मचारिणी शंकराचार्य के छक्के छुड़ा दे! गज़ब! इससे अधिक भयंकर बात और क्या हो सकेगी! यह सब पापी पढ़ने का अपराध है। न वे पढ़तीं, न वे पूजनीय पुरुषों का मुकाबला करतीं। यह सारा दुराचार स्त्रियों को पढ़ाने ही का कुफल है। समझे। एम. ए. , बी. ए. , शास्त्री और आचार्य होकर पुरुष जो स्त्रियों पर हंटर फटकारते हैं और डंडों से उनकी खबर लेते हैं वह सारा सदाचार पुरुषों की पढ़ाई की पढ़ाई का सुफल है! स्त्रियों के लिए पढ़ना कालकूट और पुरुषों के लिए पीयूष का घूँट! ऐसी ही दलीलों और दृष्टांतों के आधार पर कुछ लोग स्त्रियों को अपढ़ रखकर भारतवर्ष का गौरव बढ़ाना चाहते हैं।

लेखक बताता है कि जिस समय नाट्‌यशास्त्र संबंधी नियम बनाए गए थे तब संस्कृत बोलने वालों की संख्या बहुत कम थी। इसी कारण आचार्यो ने सामान्य लोगों और स्त्रियों को प्राकृत भाषा को अपनाने के लिए कहा। पहले समय में स्त्रियों के लिए विश्वविद्यालय न होने के कारण उन्हें नियमानुसार शिक्षा नहीं मिल पाती थी। नए-नए आविष्कारों और खोज संबंधी ग्रंथों के अस्तित्व को तो हम स्वीकार करते हैं किंतु उस समय की स्त्रियों को अनपढ़ एवं गंवार बताते हैं। प्राय: हिन्दू मानते हैं कि वेदों की रचना ईश्वर ने वेद-मंत्रों का उच्चारण स्त्रियों से करवाया है और मनुष्य है कि स्त्री को पढ़ाना पाप मानता है। जहाँ स्त्रियों को सभी प्रकार के कार्य करने की अनुमति हो, वहाँ स्त्री को पढ़ने की अनुमति न हो, इस पर विश्वास नहीं होता। ऋषि-पत्नियाँ व्याख्यान में बड़े-बड़े विद्वानों को परास्त कर देती थीं। व्यंग्यात्मक रूप में लेखक कहता है कि वे स्त्रियाँ पढ़ती नहीं तो महान पुरुषों से मुकाबला करने का पाप न होता। पढ़ाई का सदुपयोग तो पुरुष स्त्री पर अत्याचार करके करता है। स्त्री के लिए शिक्षा ज़हर और पुरुष के लिए शिक्षा अमृत बताई गई है। ऐसे लोग इस प्रकार के तर्क देकर स्त्री को अनपढ़ रखकर भारत का गौरव बढ़ाने में लगे रहते हैं।

मान लीजिए कि पुराने ज़माने में भारत की एक भी स्त्री पढ़ी-लिखी न थी। न सही। उस समय स्त्रियों को पढ़ाने की जरूरत न समझी गई होगी। पर अब तो है। अतएव पढ़ाना चाहिए। हमने सैकड़ों पुराने नियमों, आदेशों और प्रणालियों को तोड़ दिया है या नहीं? तो, चलिए, स्त्रियों को अपढ़ रखने की इस पुरानी चाल को भी तोड़ दें। हमारी प्रार्थना तो यह है कि स्त्री-शिक्षा के विपक्षियों को क्षणभर के लिए भी इस कल्पना को अपने मन में स्थान न देना चाहिए कि पुराने ज़माने में यहाँ की सारी स्त्रियाँ अपढ़ थीं अथवा उन्हें पढ़ने की आज्ञा न थी। जो लोग पुराणों में पढ़ी-लिखी स्त्रियों के हवाले माँगते हैं। उन्हें श्रीमद्भागवत, दशमस्कंध, के उत्तरार्द्ध का त्रेपनवां अध्याय पढ़ना चाहिए। उसमें रुक्मिणी-हरण की कथा है। रुक्मिणी ने जो एक लंबा-चौड़ा पत्र एकांत में लिखकर, एक ब्राह्यण के हाथ, श्रीकृष्ण को भेजा था वह तो प्राकृत में न था। उसके प्राकृत में होने का उल्लेख भागवत में तो नहीं। उसमें रुक्मिणी ने जो पांडित्य दिखाया है वह उसके अपढ़ और अल्पज्ञ होने अथवा गँवारपन का सूचक नहीं। पुराने ढंग के पक्के सनातन-धर्मवलंबियों की दृष्टि में तो नाटकों की अपेक्षा भागवत का महत्व बहुत ही अधिक होना चाहिए। इस दिशा में यदि उनमें से कोई यह कहे कि सभी प्राक्कालीन स्त्रियाँ अनपढ़ होती थीं तो उसकी बात पर विश्वास करने की ज़रूरत नहीं। भागवत की बात यदि पुराणकार या कवि की कल्पना मानी जाए तो नाटकों की बात उससे भी गई-बीती समझी जानी चाहिए।

लेखक अपना विचार प्रकट करते हुए कहता है कि माना पहले स्त्रियाँ पढ़ी-लिखी नहीं थीं किंतु आज समय बदल गया है इसलिए स्त्रियों को पढ़ाने पर बल दिया जाना चाहिए। रुक्मिणी ने जिस भाषा में श्रीकृष्ण को प्रेम-पत्र लिखा था वह प्राकृत में नहीं था और न ही उससे उनके अनपढ़ या गंवार होने को प्रमाण मिलता है। सनातन-धर्मावलंबयाेिं की दृष्टि में नाटकों की अपेक्षा भागवत का महत्व अधिक होना चाहिए और इस आधार पर स्त्रियों की अनपढ़ता पर विश्वास नहीं किया जा सकता। यदि भागवान को कल्पना मानेंगे तो अन्य नाटकों को तो काई अस्तित्व ही नहीं है।

स्त्रियों का किया हुआ अनर्थ यदि पढ़ाने ही का परिणाम है तो पुरुषों का किया हुआ अनर्थ भी उनकी विद्या और शिक्षा ही का परिणाम समझना चाहिए। बम के गोले फेंकना, नरहत्या करना, डाके डालना, चोरियाँ करना, घूस लेना, व्यभिचार करना-यह सब यदि पढ़ने-लिखने ही का परिणाम हो तो सारे महाविद्यालय, विद्यालय और पाठशालाएँ बंद हो जानी चाहिए। परंतु विक्षिप्तों, बातव्यथितों और ग्रहग्रस्तों के सिवा ऐसी दलीलें पेश करने वाले बहुत ही कम मिलेंगे। शकुंतला ने दुष्यंत को कटु वाक्य कहकर कौन-सी अस्वाभाविकता दिखाई? क्या वह यह कहती कि-”आर्य पुत्र, शाबाश! बड़ा अच्छा काम किया जो मेरे साथ गांधर्व-विवाह करके मुकर गए। नीति, न्याय, सदाचार और धर्म की आप प्रत्यक्ष मूर्ति हैं! ” पत्नी पर घोर से घोर अत्याचार करके जो उससे ऐसी आशा रखते हैं वे मनुष्य-स्वभाव का किंचित्‌ भी ज्ञान नहीं रखते। सीता से अधिक साध्वी स्त्री नहीं सुनी गई। जिस कवि ने, शकुंतला नाटक में, अपमानित हुई शकुंलता से दुष्यंत के विषय में दुर्वाक्य कहाया है उसी ने परित्यक्त होने पर सीता से रामचंद्र के विषय में क्या कहाया है, सुनिए-

वाच्यस्त्वया मदव्चनात्‌ स राजा-

वहृाै विशुद्धामति यत्समक्षम्‌।

मां लोकवाद श्रवणादहासी:

श्रुतसय तंत्क्वं सदृशं कुलस्य?

अर्थ: -लक्ष्मण! ज़रा उस राजा से कह देना कि मैंनें तों तुम्हारी आँख के सामने ही आग में कूदकर अपनी विशुद्धता साबित कर दी थी। तिस पर भी, लोगों के मुख से निकला मिथ्यावाद सुनकर ही तुमने मुझे छोड़ दिया। क्या यह बात तुम्हारे कुल के अनुरूप है? अथवा क्या यह तुम्हारी विदव्ता या महत्ता को शोभा देनेवाली है? अर्थात्‌ तुम्हारा यह अन्याय तुम्हारे कुल, शील, पांडित्य सभी पर बट्टा लगाने वाला है।

यदि स्त्रियों को पढ़ाकर अनर्थ किया जा रहा है तो पुरुषों द्वारा किए जाने वाले अनर्थ को भी उनकी शिक्षा का फल समझा जाना चाहिए। उसके द्वारा किए जाने वाले असामाजिक कार्यों के आधार पर शिक्षण संस्थाएँ बंद कर देनी चाहिएँ। लेकिन इस तरह के तर्क देने वाले बहुत कम हैं। शकुंतला का दुष्यंत को फटकार लगाना स्वाभाविक था। पत्नी पर अत्याचार कर उससे अनुकूल व्यवहार की आशा करने वाले अज्ञानी हैं। इसी प्रकार की दशा राम द्वारा त्यागी गई सीता की थी। उसने भी लक्ष्मण के माध्यम से राम को भला-बुरा कहा है। इस प्रकार उनका त्याग करके राम ने अपने कुल, मर्यादा पर कलंक लगाया है।

सीता का यह संदेश कटु नहीं तो क्या मीठा है? रामचंद्र के कुल पर भी कलंकारोपण करना छोटी निर्भर्त्सना नहीं। सीता ने तो रामचंद्र को नाथ, देव, आर्यपुत्र आदि कहे जाने योग्य भी नहीं समझा। ’राजा’ मात्र कहकर उनके पास अपना संदेसा भेजा। यह उक्ति/न किसी वेश्या पुत्री की है, न किसी गंवार स्त्री की: किंतु महाब्रह्यज्ञानी राजा जनक की लड़की और मन्वादि महर्षियों के धर्मशास्त्रों का ज्ञान रखने वाली रानी की-

नृपस्य वर्णाश्रमपालनं यत्‌

स एव धर्मों मनुना प्रणीत:

सीता की धर्मशास्त्रज्ञता का यह प्रमाण, वहीं, आगे चलकर, कुछ ही दूर पर, कवि ने दिया है। सीता-परित्याग के कारण वाल्मीकि के समान शांत, नीतिज्ञ और क्षमाशील तपस्वी तक ने-”अस्त्येव मन्युर्भरताग्रजे में”- कहकर रामचंद्र पर क्रोध प्रकट किया है। अतएव, शकुंतला की तरह, अपने परित्याग को अन्याय समझने वाली सीता का रामचंद्र के विषय में कटुवाक्य कहना सर्वथा स्वाभाविक है। न यह पढ़ने-लिखने का परिणाम है न गंवारपन का, न अकुलीनता का।

सीता ने कटु वचन कहते हुए राम को नाथ या आर्यपुत्र आदि न कहकर ’राजा’ शब्द से संबोधित किया। वह कोई गंवार या पतीत नारी नहीं थी, वह तो परमज्ञानी राजा जनक की धर्मशास्त्रों का ज्ञान रखने वाली बेटी थी। सीता के त्याग से शांत, क्षमाशील स्वभाव वाले तपस्वी वाल्मीकि भी दुखी होकर राम पर अपना क्रोध व्यक्त करते हैं। अपने पर हुए अत्याचार के विरोध में सीता द्वारा कहे गए कटु वचन किसी अनपढ़, गंवार या कुलहीन नारी के नहीं हैं।

पढ़ने-लिखने में स्वयं कोई बात ऐसी नहीं जिससे अनर्थ हो सके। अनर्थ का बीज उसमें हरगिज नहीं। अनर्थ पुरुषों से भी होते हैं। अपढ़ों और पढ़े-लिखों, दोनों से। अनर्थ, दुराचार और पापाचार के कारण और ही होते हैं और वे व्यक्ति-विशेष का चाल-चलन देखकर जाने भी जा सकते हैं। अतएव स्त्रियों को अवश्य पढ़ाना चाहिए।

जो लोग यह कहते हैं कि पुराने ज़माने में यहाँ स्त्रियाँ न पढ़ती थीं अथवा उन्हें पढ़ने की मुमानियत थी वे या तो इतिहास से अभिज्ञता नहीं रखते या जान-बूझकर लोगों को धोखा देते हैं। समाज की दृष्टि में ऐसे लोग दंडनीय हैं। क्योंकि स्त्रियों को निरक्षर रखने का उपदेश देना समाज का अपकार और अपराध करना है- समाज की उन्नति में बाधा डालना है।

पढ़ाई करने से अनर्थ नहीं होता और न ही स्त्री को शिक्षा देने पर ही अनर्थ होता है। अनर्थ होना हो तो पुरुष से भी हो सकता है। समाज में होने वाले अत्याचार, दुराचार व्यक्ति विशेष के चरित्र और स्वभाव पर निर्भर हैं और उन्हें जाना भी जा सकता है। अत: स्त्री को अवश्य ही शिक्षित करना चाहिए। जो लोग पुराने समय में स्त्री-शिक्षा को आवश्यक नहीं बताते थे वे या तो इतिहास नहीं जानते या फिर लोगों को धोखा देने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे लोगों को दण्ड देना चाहिए। जो लोग स्त्रियों को शिक्षा दिलाने के पक्ष में नहीं है वे समाज का बुरा करने के साथ-साथ अपराध भी कर रहे हैं। और समाज के विकास में बाधक हैं।

’शिक्षा’ बहुत व्यापक शब्द है। उसमें सीखने योग्य अनेक विषयों का समावेश हो सकता है। पढ़ना-लिखना भी उसी के अंतर्गत है। इस देश की वर्तमान शिक्षा-प्रणाली अच्छी नहीं। इस कारण यदि कोई स्त्रियों को पढ़ाना अनर्थकारी समझे तो उसे उस प्रणाली का संशोधन करना या कराना चाहिए, खुद पढ़ने-लिखने को दोष न देना चाहिए। लड़कों ही की शिक्षा-प्रणाली कौन-सी बड़ी अच्छी है। प्रणाली बुरी होने के कारण क्या किसी ने यह राय दी है कि सारे विद्यालय और महाविद्यालय बंद कर दिए जाएँ? आप खुशी से लड़कियों और स्त्रियों की शिक्षा की प्रणाली का संशोधन कीजिए। उन्हें क्या पढ़ाना चाहिए, कितना पढ़ाना चाहिए, किस तरह की शिक्षा देना चाहिए और कहाँ पर देना चाहिए-घर में या विद्यालय में- इन सब बातों पर बहस कीजिए, विचार कीजिए, जी में आवे सो कीजिए; पर परमेश्वर के लिए यह न कहिए कि स्वयं पढ़ने-लिखने में कोई दोष है- वह अनर्थकर है, वह अभिमान का उत्पादक है, वह गृह-सुख का नाश करने वाला हैं। ऐसा कहना सोलहों आने मिथ्या है।

लेखक ने शिक्षा का विस्तृत क्षेत्र बताते हुए कहा है कि शिक्षा पढ़ने-लिखने के अतिरिक्त अनेक विषयों को सिखाने में सहायक है। देश की शिक्षा प्रणाली स्त्रियों के संदर्भ में अच्छी नहीं है तो स्वयं पढ़ने-लिखने को दोष न देकर शिक्षा प्रणाली लाने या संशोधन करवाने चाहिएँ। यह भी निर्धारित करना चाहिए कि स्त्रियों का क्या, कितना, किस प्रकार और कहाँ पढ़ाना चाहिए। इस विषय में लेखक ने अपनी मन-मानी करने को कहा है किंतु यह कहना एकदम गलत है कि स्त्री को पढ़ाना अनर्थ है, उसमें अभिमान उत्पन्न करने वाला है, घर के सुख का नाश करने वाला है।

शब्दार्थ

विद्यमान-उपस्थित। कुमार्गगामी-बुरी राह पर चलने वाले। सुमार्गगामी- अच्छी राह पर चलने वाला। अधार्मिक-धर्म से संबंध न रखने वाला। धर्मत्व- धर्म का सार। दलीलें-तर्क। अनर्थ-बुरा, अर्थहीन। अपढ़ों-अनपढ़ों। उपेक्षा- ध्यान न देना। प्राकृत-एक प्राचीन भाषा। वेदांतवादिनी-वेदांत दर्शन पर बोलने वाली। दर्शक ग्रंथ- जानकारी देने वाली या दिखाने वाली पुस्तकें। तत्कालीन-उस समय का। तर्कशास्त्रज्ञता- तर्कशास्त्र को जानने वाला। न्यायशीलता- न्याय के अनुसार आचरण करना। कुतर्क- अनुचित तर्क। खंडन- दूसरे के मत का युक्तिपूर्वक निराकरण। प्रगल्भ-प्रतिभावान। नामोल्लेख-नाम का उल्लेख करना। आदृत- सम्मानित। विज्ञ-विदव्ान। ब्रह्यवादी-वेद पढ़ने-पढ़ाने वाला। दुराचार-निंदनीय आचरण। सहध र्मचारिणी- पत्नी। कालकूट-ज़हर। पीयूष-अमृत। दृष्टांत-उदाहरण, मिसाल। अल्पज्ञ-थोड़ा जानने वाला। प्राक्कालीन-पुरानी। व्यभिचार-पाप। विक्षिप्त-पागल। बात व्यथित-बातों से दुखी होने वाले। ग्रह ग्रस्त- पाक ग्रह से प्रभावित। किंचित्‌-थोड़ा। दुर्वाक्य-निंदा करने वाला वाक्य या बात। परित्यक्त-पूरे तौर पर छोड़ा हुआ। मिथ्यावाद-झूठी बात। कलंकारोपण- दोष मढ़ना, दोषी ठहराना। निर्भतर्सना-तिरस्कार, निंदा। नीतिज्ञ-नीति जानने वाला। हरगिज-किसी गलत में। मुमानियत-रोक, मनाही। अभिज्ञता- जानकारी, ज्ञान। अपकार-अहित।

Question number: 1224 (127 of 162 Based on Passage) Show Passage

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Describe in Detail

लेखक प्रसाद जी दव्ारा रचित लेख में सीता ने राम को क्या कहने योग्य भी नहीं समझा है?

Explanation

लेखक प्रसाद जी दव्ारा रचित लेख में सीता ने तो रामचंद्र को नाथ, देव, आर्यपुत्र आदि कहे जाने योग्य भी नहीं समझा।

क्योंकि-सीता के अनुसार राम ने उन्हें त्याग कर अनुचित कार्य किया था। अर्थात राम जी ने बुरा कार्य किया था। सीता का त्याग कर राम जी ने अपने… (180 more words) …

Question number: 1225 (128 of 162 Based on Passage) Show Passage

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Essay Question▾

Describe in Detail

लेखक दव्ारा रचित प्रस्तुत लेख में प्राकृत बोलना और लिखना क्या होने का चिहृ नहीं।

Explanation

प्राकृत बोलना और लिखना अपढ़ और अशिक्षित होने का चिहृ नहीं।

क्योंकि- उस ज़माने में प्राकृत एक सर्वसाधारण भाषा के रूप में विद्यमान थी अर्थात प्राकृत एक भाषा या विषय है अक्षर ज्ञान नहीं है।

यह प्रश्न पाठ्या के निम्न खंड से लिया गया है

नाटकों में स्त्रियों का प्राकृत… (332 more words) …

Question number: 1226 (129 of 162 Based on Passage) Show Passage

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MCQ▾

Question

लेखक दव्वेदी दव्ारा रचित प्रस्तुत लेख में ’मुमानियत’ का क्या अभिप्राय हैं?

Choices

Choice (4) Response

a.

मनाही

b.

मनाना

c.

नियत

d.

अभिमानी

Question number: 1227 (130 of 162 Based on Passage) Show Passage

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Essay Question▾

Describe in Detail

लेखक प्रसाद जी दव्ारा रचित लेख में तपस्वी वाल्मीकि का स्वभाव कैसा था?

Explanation

लेखक प्रसाद जी दव्ारा रचित लेख में तपस्वी वाल्मीकि का स्वभाव शांत, क्षमाशील था।

क्योंकि-हर व्यक्ति का स्वभाव अपने स्वयं के विचार के अनुरूप अलग-अलग होता हैं। किसी का स्वभाव शांत तो किसी का उत्तेजनापूर्ण होता हैं।

यह प्रश्न पाठ्या के निम्न खंड से लिया गया है

सीता ने कटु… (79 more words) …

Question number: 1228 (131 of 162 Based on Passage) Show Passage

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One Liner Question▾

Write in Brief

लेखक दव्वेदी दव्ारा रचित प्रस्तुत लेख में शीला कौन है?

Question number: 1229 (132 of 162 Based on Passage) Show Passage

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Describe in Detail

लेखक दव्ारा रचित प्रस्तुत लेख में लेखक के अनुसार क्या बदल गया हैं?

Explanation

लेखक के अनुसार आज समय बदल गया है अर्थात स्त्रियों को पढ़ाने पर बल दिया जाना चाहिए।

क्योंकि-आज नारी शिक्षा हर महिला का अधिकार हो गया है, उसे इस अधिकार से वंचित नहीं कर सकते हैं। एवं नारी शिक्षा से देश उत्थान होना बताया हैं। इसलिए स्त्रियों को पढ़ाने पर… (114 more words) …

Question number: 1230 (133 of 162 Based on Passage) Show Passage

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Describe in Detail

लेखक दव्ारा रचित प्रस्तुत लेख में ऋषि-पत्नियाँ व्याख्यान में किन को परास्त कर देती थीं।

Explanation

लेखक दव्ारा रचित प्रस्तुत लेख में ऋषि-पत्नियाँ व्याख्यान में बड़े-बड़े विद्वानों को परास्त कर देती थीं।

क्योंकि- लेखक दव्ारा रचित प्रस्तुत लेख में ऋषि-पत्नियाँ उस समय की शिक्षित महिलाएं है जो शिक्षा के कारण वाद विवाद करती हैं। इसी कारण से बड़े-बड़े विद्वानों को परास्त कर देती थीं।

यह प्रश्न… (214 more words) …

Question number: 1231 (134 of 162 Based on Passage) Show Passage

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लेखक दव्वेदी दव्ारा रचित प्रस्तुत लेख में लेखक के अनुसार भारत देश की वर्तमान शिक्षा-प्रणाली कैसी हैं?

Explanation

लेखक दव्वेदी दव्ारा रचित प्रस्तुत लेख में लेखक के अनुसार भारत देश की वर्तमान शिक्षा-प्रणाली अच्छी नहीं।

क्योंकि-आज भी हमारे देश नारी शिक्षा के विरोध कई लोग खड़े हो जाते जिससे नारी के शिक्षित होने पर काफी प्रभाव पड़ता हैं।

यह प्रश्न पाठ्या के निम्न खंड से लिया गया है… (166 more words) …

Question number: 1232 (135 of 162 Based on Passage) Show Passage

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Describe in Detail

लेखक दव्ारा रचित प्रस्तुत लेख में शकुंतला का कौनसा कार्य करना स्वाभाविक था?

Explanation

लेखक दव्ारा रचित प्रस्तुत लेख में शकुंतला का दुष्यंत को फटकार लगाने का कार्य स्वाभाविक था।

क्योंकि-शकुंतला उस ज़माने की कम शिक्षित महिला थीं। फिर भी उसे उतना तो ज्ञान था कि क्या सही एवं क्या गलत। इसलिए शकुंतला के लिए दुष्यंत को फटकार लगाने का कार्य सही था।

यह… (117 more words) …

Question number: 1233 (136 of 162 Based on Passage) Show Passage

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Write in Short

लेखक दव्वेदी जी दव्ारा रचित प्रस्तुत लेख में कौन लड़कों से पीछे नहीं हैं?

Question number: 1234 (137 of 162 Based on Passage) Show Passage

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लेखक दव्ारा रचित प्रस्तुत लेख में रुक्मिणी ने किस तरह का पत्र लिखा था?

Explanation

लेखक दव्ारा रचित प्रस्तुत लेख में रुक्मिणी ने प्रेम-पत्र लिखा था।

क्योंकि-एक पत्र कई प्रकार के होते है जैसे पार्थना पत्र, शिकायत पत्र कार्यालय पत्र आदि । इसलिए रुक्मिणी ने कृष्ण के लिए प्रेम-पत्र लिखा था।

यह प्रश्न पाठ्या के निम्न खंड से लिया गया है

लेखक अपना विचार प्रकट… (95 more words) …

Question number: 1235 (138 of 162 Based on Passage) Show Passage

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लेखक दव्वेदी दव्ारा रचित प्रस्तुत लेख में कुछ पुरातन पंथी लोग स्त्रियों की शिक्षा के विरोधी थे। दव्वेदी जी ने क्या-क्या तर्क देकर स्त्री-शिक्षा का समर्थन किया?

Explanation

कुछ पुरातन पंथी लोग स्त्रियों की शिक्षा के विरोधी थे। दव्वेदी जी ने स्त्री शिक्षा के विरोध के पक्ष में समर्थन देते हुए कहा है कि माना कि भारत में पुराने ज़माने में स्त्रीयों को नहीं पढ़ाया जाता था शायद उमय नारी को पढ़ा कर आगे बढ़ाना आवश्यक नहीं था… (85 more words) …

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