क्षितिज(Kshitij-Textbook) (CBSE Class-10 Hindi): Questions 1004 - 1016 of 1777

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Passage

राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

(1)

नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा।।

आयेसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही।।

सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरिकरनी करि करिअ लराई।।

सुनहु राम जेहि सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा।।

सो बिलगाउ बिहाड़ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा।।

सुनि मुनिबचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अवमाने।।

बहु धनही तोरी लरिकाई। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाई।।

येहि धनुपर ममता केहि हेतु। सुनि रिसाइ कह भृगुकलकेतू।।

रे नृपबालक कालबस बोलत तोहि न सँभार।

धनुही सम त्रिपुरारिधनु बिदित सकल संसार।।

(2)

लखन कहा हसि हमरे जाना। सुनहु देव सब धनुष समाना।।

का छति लाभु जून धनु तोरें। देखा राम नयन के भोरें।।

छुअत टूट रघुपतिहु न दोसू। मुनि बिनु काज करिअ कत रोसू।।

बोले चितै परसु की ओरा। रे सठ सुनेहि सुभाउ न मोरा।

बालकु बोलि बधौं नहि तोही। केवल मुनि जड़ जानहि मोही।।

बाल ब्रह्यचारी अति कोही। बिस्वबिदित क्षत्रियकुल द्रोही।।

भुजबल भूमि भूप बिनू कीन्ही। बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही।।

सहसबाहुभुज छेदनिहारा। परसु बिलोकु महीपकुमारा।।

मातु पितहि जनि सोचबस करसि महीसकिसोर।

गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर।।

(3)

बिहसि लखनु बोले मृदु बानी अहो मुनीसु महाभट मानी।।

पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारु। चहत उड़ावन फँूकि पहारू।।

इहाँ कुम्हड़बतिआ कोउ नाहीं। जे तरजनी देखि मरि जाहीं।।

देख कुठारु सरासन बाना। मैं कछु कहा सहित अभिमाना।।

भृगसुत समुझि जनेउ बिलोकी। जो कछु कहहु सहौं रिस रोकी।।

सुर महिसुर हरिजन अरु गाई। हमरे कुल इन्ह पर न सुराई।।

बधें पापु अपकीरति हारें। मारतहू पा परिअ तुम्हारें।।

कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा। ब्यर्थ धरहु धनु बान कुठारा।।

जो बिलोक अनुचित कहेउँ छमहु महामुनि धीर।

सुनि सरोष भृगुबंसमनि बोले गिरा गंभीर।।

(4)

कौसिक सुनहु मंद येहु बालकु। कुटिलु कालबस निज कुल घालकु।।

भानुबंस राकेस कलंकू। निपट निरंकुसु अबुधु असंकू।।

कालकवलु होइहि छन माहीं। कहौं पुकारि खोरि माहि नाहीं।।

तुम्ह हटकहु जौ चहहु उबारा। कहि प्रतापु बलु रोषु हमारा।।

लखन कहेउ मुनि सुजसु तुम्हारा। तुम्हहि अछत को बरनै पारा।।

अपने मुहु तुम्ह आपनि करनी। बार अनेक भाँति बहु बरनी।।

नहि संतोषु त पुनि कछु कहहु। जनि रिस रोकि दुसह दुख सहहु।।

बीरब्रती तुम्ह धीर अछोभा। गारी देत न पावहु सोभा।।

सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु।

बिद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु।।

5

तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा। बार बार मोहि लागि बोलावा।

सुनत लखन के बचन कठोरा। परसु सुधारि धरेउ कर घोरा।।

अब जनि देइ दोसु मोहि लोगू। कटुबादी बालक बधजोगू।।

बाल बिलोकि बहुत मैं बाँचा। अब येहु मरनिहार भा साँचा।।

कौसिक कहा छमिअ अपराधू। बाल दोष गुन गनहिं न साधू।।

खर कुठार मैं अकरुन कोही। आगे अपराधी गुरुद्रोही।।

उतर देत छोड़ौं बिनु मारे। केवल कौसिक सील तुम्हारे।।

न त येहि काटि कुठार कठोरे। गुरहि उरिन होतेउँ श्रम थोरे।।

गाधिसु नु कह हृदय हसि मुनिहि हरियरे सूझ।

अयमय खाँड़ न ऊखमय अजहुँ न बूझ अबूझ।।

(6)

कहेउ लखन मुनि सीलु तुम्हारा। को नहि जान बिदित संसारा।।

माता तिहि उरिन भये नीकें। गुररिनु रहा सोचु बड़ जी कें।।

सो जनु हमरेहि माथें काढ़ा। दिन चलि गये ब्याज बड़ बाढ़ा।।

अब आनिअ ब्यवहरिआ बोली। तुरत देउँ मैं थैली खोली।।

सुनि कटु बचन कुठार सुधारा। हाय हाय सब सभा पुकारा।।

भृगुबर परसु देखाबहु मोही। बिद्र बिचारि बचौं नृप द्रोही।।

मिले न कबहूँ सुभट रन गाढ़े। दव्जदेवता घरहि के बाढ़े।।

अनुचित कहि सबु लोगु पुकारे। रघुपति सयनहि लखनु नेवारे।।

लखन उतर आहुति सरिस भृगुबरकोपु कृसानु।

बढ़त देखि जल सम बचन बोले रघुकुलभानु।।

Question number: 1004 (8 of 12 Based on Passage) Show Passage

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छंद किसे कहते है?

Question number: 1005 (9 of 12 Based on Passage) Show Passage

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साहस और शक्ति के साथ विनम्रता हो तो बेहतर है। इस कथन पर अपने विचार लिखिए।

Question number: 1006 (10 of 12 Based on Passage) Show Passage

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निम्नलिखित पंक्तियों में प्रयुक्त अलंकार पहचान कर लिखिए-

Question number: 1007 (11 of 12 Based on Passage) Show Passage

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परशुराम के क्रोध करने पर राम और लक्ष्मण की जो प्रतिक्रियाएँ हुई उनके आधार पर दोनों के स्वभाव की विशेषताएँ अपने शब्दों में लिखिए।

Question number: 1008 (12 of 12 Based on Passage) Show Passage

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परशुराम ने अपने विषय में सभा में क्या-क्या कहा, इस चौपाई के आधार पर लिखिए।

Question number: 1009

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » सूरदास पद

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सूरदास जी के आराध्य कौन हैं?

Passage

(2)

लखन कहा हसि हमरे जाना। सुनहु देव सब धनुष समाना।।

का छति लाभु जून धनु तोरें। देखा राम नयन के भोरें।।

छुअत टूट रघुपतिहु न दोसू। मुनि बिनु काज करिअ कत रोसू।।

बोले चितै परसु की ओरा। रे सठ सुनेहि सुभाउ न मोरा।

बालकु बोलि बधौं नहि तोही। केवल मुनि जड़ जानहि मोही।।

बाल ब्रह्यचारी अति कोही। बिस्वबिदित क्षत्रियकुल द्रोही।।

भुजबल भूमि भूप बिनू कीन्ही। बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही।।

सहसबाहुभुज छेदनिहारा। परसु बिलोकु महीपकुमारा।।

मातु पितहि जनि सोचबस करसि महीसकिसोर।

गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर।।

Question number: 1010 (1 of 4 Based on Passage) Show Passage

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तुलसीदास जी दव्ारा रचित उपरोक्त प्रद्यांश में लक्ष्मण जी परशुराम जी क्या करते है?

Explanation

तुलसीदास जी दव्ारा रचित उपरोक्त प्रद्यांश में लक्ष्मण जी परशुराम जी का उपहास करते हैं।

क्योंकि-कभी-कभी किसी व्यक्ति का स्वभाव ही इतना चंचल होता है कि वह महान लोगों की हँसी उड़ा देता है जैसे कि इस संवाद में लक्ष्मण ने परशुराम जी के साथ किया है।

प्रसंग- पूर्ववत अर्थात… (268 more words) …

Question number: 1011 (2 of 4 Based on Passage) Show Passage

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तुलसीदास जी दव्ारा रचित उपरोक्त प्रद्यांश का भाव-सौंदर्य क्या हैं?

Explanation

तुलसीदास दव्ारा रचित प्रस्तुत संवाद के भाव सौदर्य में कवि ने राम और परशुराम दोनों के प्रताप अर्थात दोनों की वीरता को बड़ी ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है। परशुराम के यश को व्यक्त किया गया है कि किस तरह पूरे विश्व में परशुराम जी विख्यात हैं।

क्योंकि- तुलसीदास… (288 more words) …

Question number: 1012 (3 of 4 Based on Passage) Show Passage

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तुलसीदास जी दव्ारा रचित उपरोक्त प्रद्यांश के शिल्प-सौंदर्य क्या है?

Explanation

तुलसीदास जी दव्ारा रचित उपरोक्त प्रद्यांश के शिल्प-सौंदर्य यह है कि इस सवांद में लक्ष्मण के वचनों को व परशुराम जी के वीरता व क्रोध को बड़े ही सहजता से प्रस्तुत किया गया है साथ में अलंकारो, शब्दों, रसों, छंदो, एवं भाषा का बहुत अच्छे ढंग से प्रस्तुत किया गया… (293 more words) …

Question number: 1013 (4 of 4 Based on Passage) Show Passage

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तुलसीदास जी दव्ारा रचित प्रस्तुत प्रद्यांश में परशुराम ने राम जी से क्या पूँछते है?

Explanation

प्रस्तुत प्रद्यांश में परशुराम जी ने राम जी से शिव का धनुष तोड़ने वाले के विषय में पूछते हैं।

क्योंकि- तुलसीदास जी दव्ारा रचित उपरोक्त संवाद में परशुराम जानना चाहते है यह धनुष किसने तोड़ा।

प्रसंग- पूर्ववत अर्थात जो पहले वाले संवाद में तुलसीदास जी ने धुनष तोड़े जाने के… (256 more words) …

Question number: 1014

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » मंगलेश डबराल संगतकार

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डबराल जी दव्ारा रचित उन्होंने अपनी नई कविताओं मेें कौनसी पहचान बनाई है?

Question number: 1015

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » सूरदास पद

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सूरदास जी क्या थें?

Question number: 1016

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » तुलसीदास राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

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अब तक तुलसीदास दव्ारा रचित उनकी कितनी रचानाएँ प्राप्त हुई हैं?

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