क्षितिज(Kshitij-Textbook) (CBSE Class-10 Hindi): Questions 915 - 927 of 1777

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Question number: 915

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » गिरिजाकुमार माथुर छाया मत छूना

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गिरिजा कुमार माथुर को अति विशिष्ट स्थान क्यों प्राप्त है?

Question number: 916

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » मंगलेश डबराल संगतकार

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मंगलेश डबराल दव्ारा रचित उनकी रचनाओं मेेें किन शब्दों का भी कुशलता से प्रयोग किया है?

Question number: 917

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » ऋतुराज कन्यादान

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कवि ऋतुराज दव्ारा रचित उनकी रचनाओं में भाषा किस प्रकार की है?

Question number: 918

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » मंगलेश डबराल संगतकार

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डबराल जी ने अपना अध्ययन कार्य कहाँ से पूरा किया?

Question number: 919

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » गिरिजाकुमार माथुर छाया मत छूना

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गिरिजा जी अपने अंतिम समय तक किस कार्य में लगे रहे?

Question number: 920

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » सूरदास पद

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हिन्दी साहित्य के कृष्ण-भक्ति काव्य की श्रेष्ठता का श्रेय किसको को जाता है?

Question number: 921

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » देव सवैया, कवित्त

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कवि देव दव्ारा रचित रचनाओं में किसका समन्वय है?

Passage

पद

(1)

ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी।

अपरस रहत सनेह तगा तैं, नाहिन मन अनुरागी।

पुरइनि पात रहत जल भीतर, ता रस देह न दागी।

ज्यौं जल माहं तेल की गागरि, बूंद न ताकौं लागी।

प्रीति-नदी मैं पाउं न बोरयौ, दृष्टि न रूप परागी।

’सूरदास’ अबला हम भोरी, गुर चाँटी ज्यौं पागी।।

(2)

मन की मन ही मांझ रही।

कहिए जाइ कौ पै ऊधौ, नाहीं परत कही।

अवधि अधार आस आवन की, तन मन बिथा सही।

अब इन जोग सँदेसनि सुनि-सुनि, बिरहिनि बिरह दही।

चाहति हुतीं गुहारि जितहिं तैं, उत तैं धार बही।

’सूरदास’ अब धीर धरहिं क्यौं, मरजादा न लही।।

(3)

हमारैं हरि हारिल की लकरी।

मन क्रम बचन नंद-नंदन उर, यह दृढ़ करि पकरी।

जागत सोवत स्वप्न दिवस-निसि, कान्ह-कान्ह जक री।

सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यौं करुई ककरी।

सु तौ ब्याधि हमकौं लै आए, देखी सुनी न करी।

यह तौ ’सूर’ तिनहिं लै, सौंपौ, जिनके मन चकरी।।

(4)

हरि हैं राजनीति पढ़ि आए।

समुझी बात कहत मधुकर के, समाचार सब पाए।

इक अति चतुर हुते पहिलैं ही, अब गुरु ग्रंथ पढ़ाए।

बढ़ी बुद्धि जानी जो उनकी, जोग-सँदेस पठाए।

ऊधौं भले लोग आगे के, पर हित डोलत धाए।

अब अपनै मन फेर पाइहैं, चलत जु हुते चुराए।

ते क्यौं अनीति करैं आपुन, जे और अनीति छुड़ाए।

राज धरम तौ यहै ’सूर’, जो प्रजा न जाहिं सताए।।

Question number: 922 (1 of 15 Based on Passage) Show Passage

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Textbook Questions » सूरदास पद

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गोपियों दव्ारा उद्धव को भाग्यवान कहने में क्या व्यंग्य निहित है?

Question number: 923 (2 of 15 Based on Passage) Show Passage

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Textbook Questions » सूरदास पद

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गोपियों के अनुसार राजा का धर्म क्या होना चाहिए?

Question number: 924 (3 of 15 Based on Passage) Show Passage

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Textbook Questions » सूरदास पद

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उद्धव ज्ञानी थे, नीति की बातें जानते थे, गोपियों के पास ऐसी कौन-सी शक्ति थी जो उनके वाक्‌चातुर्य में मुखरित हो उठी?

Question number: 925 (4 of 15 Based on Passage) Show Passage

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Textbook Questions » सूरदास पद

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उद्धव के व्यवहार की तुलना किस-किससे की गई हैं?

Question number: 926 (5 of 15 Based on Passage) Show Passage

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » सूरदास पद

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गोपियों ने अपने वाक्‌चातुर्य के आधार पर ज्ञानी उद्धव को परास्त कर दिया, उनके वाक्‌चातुर्य की विशेषताएँ लिखिए?

Question number: 927 (6 of 15 Based on Passage) Show Passage

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » सूरदास पद

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गोपियों को कृष्ण में ऐसे कौन-से परिवर्तन दिखाई दिए जिनके कारण वे अपना मन वापस पा लेने की बात कहती हैं?

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