क्षितिज(Kshitij-Textbook) (CBSE (Central Board of Secondary Education- Board Exam) Class-10 Hindi): Questions 816 - 828 of 1777

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Passage

(3)

हमारैं हरि हारिल की लकरी।

मन क्रम बचन नंद-नंदन उर, यह दृढ़ करि पकरी।

जागत सोवत स्वप्न दिवस-निसि, कान्ह-कान्ह जक री।

सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यौं करुई ककरी।

सु तौ ब्याधि हमकौं लै आए, देखी सुनी न करी।

यह तौ ’सूर’ तिनहिं लै, सौंपौ, जिनके मन चकरी।।

Question number: 816 (1 of 4 Based on Passage) Show Passage

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सूरदास जी दव्ारा रचित उपर्युक्त पद के शिल्प-सौंदर्य क्या हैं?

Explanation

उपर्युक्त पद के अनुसार सूरदास जी दव्ारा रचित शिल्प-सौंदर्य हैं इस शिल्प -सौंदर्य में उन्होंने विरह की बात स्पष्ट रूप से लिखी है। साथ में अलंकार, भाव, भाषा, गायक, संगीत आदि का मनोरम चित्रण प्रस्तुत किया है।

क्योंकि-ताकि सूरदास जी दव्ारा रचित शिल्प-सौंदर्य में ओर अधिक निखार आ सके।

प्रसंग- प्रस्तुत पद कविवर सूरदास द्वारा रचित ’सूरसागर’ में संकलित ’भ

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Question number: 817 (2 of 4 Based on Passage) Show Passage

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सूरदास द्वारा रचित प्रस्तुत पद ’सूरसागर’ में संकलित ’भ्रमरगीत’ में ’उद्धव संदेश’ नामक कौनसे खण्ड से उद्धृत है?

Explanation

सूरदास द्वारा रचित प्रस्तुत पद ’सूरसागर’ में संकलित ’भ्रमरगीत’ में ’उद्धव संदेश’ नामक खण्ड के ’पाँचवें संवाद’ से उद्धृत है।

क्योंकि-कभी-कभी किसी पद के खंड में संवाद के नम्बर होते हैं। ताकि इन्हें पढ़ने में आसानी हो सके।

प्रसंग- प्रस्तुत पद कविवर सूरदास द्वारा रचित ’सूरसागर’ में संकलित ’भ्रमरगीत’ में ’उद्धव संदेश’ नामक खण्ड के ’पाँचवें संवाद’ से उ

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Question number: 818 (3 of 4 Based on Passage) Show Passage

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सूरदास जी दव्ारा रचित उपर्युक्त पद के भाव-सौंदर्य क्या हैं?

Explanation

उपर्युक्त पद के अनुसार सूरदास जी दव्ारा रचित भाव-सौंदर्य यह है कि गोपियाँ उद्धव से कहती है उनके मन में कृष्ण के प्रति इतना अधिक प्रेम है कि अब उसका स्थान यह योग ज्ञान नहीं ले सकता है। इसे वे लोग ही अपना सकते है जो जिसके मन में प्रेम के प्रति दृढ़ नहीं होते है। हमारा मन में तो कृष्ण के प्रति प्रेम अटूट है।

क्योंकि-गोपियाँ अपने मन में कृष्ण के प्रेम

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Question number: 819 (4 of 4 Based on Passage) Show Passage

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उद्धव द्वारा दिए गए निर्गुण उपासना संबंधी उपदेश को सुनकर गोपियाँ कैसी हो जाती है ं।

Explanation

उद्धव द्वारा दिए गए निर्गुण उपासना संबंधी संदेश को सुनकर गोपियाँ अत्यन्त दु: खी हो जाती है।

क्योंकि-गोपियां कृष्ण से प्रेम करना नहीं छोड़ सकती है एवं कभी-कभी जब हमें कोई दु: खभरी सूचना मिलती है तो हमारा मन बहुत ही अप्रसन्न हो जाता हैं।

प्रसंग- प्रस्तुत पद कविवर सूरदास द्वारा रचित ’सूरसागर’ में संकलित ’भ्रमरगीत’ में ’उद्धव संदेश’ नामक खण्ड के ’पाँच

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Passage

(2)

मन की मन ही मांझ रही।

कहिए जाइ कौ पै ऊधौ, नाहीं परत कही।

अवधि अधार आस आवन की, तन मन बिथा सही।

अब इन जोग सँदेसनि सुनि-सुनि, बिरहिनि बिरह दही।

चाहति हुतीं गुहारि जितहिं तैं, उत तैं धार बही।

’सूरदास’ अब धीर धरहिं क्यौं, मरजादा न लही।।

Question number: 820 (1 of 4 Based on Passage) Show Passage

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सूरदास जी दव्ारा रचित उपर्युक्त पद के शिल्प-सौंदर्य क्या हैं?

Explanation

सूरदास जी दव्ारा रचित उपर्युक्त पद के शिल्प-सौंदर्य है कि इसमें कृष्ण के प्रति गोपियों अपार प्रेम को प्रकट किया गया है साथ में अलंकारों, गायक, संगीत, भाषा व भाव का बहुत अच्छी तरह से प्रयोग कर शिल्प सौंदर्य को रौचक बनाया गया है।

क्योंकि-ताकि सूरदास जी दव्ारा रचित उपर्युक्त पद के शिल्प-सौंदर्य, पाठकों को पढ़ने आनंद आ सके।

प्रसंग- प्रस्तुत पद उस समय

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Question number: 821 (2 of 4 Based on Passage) Show Passage

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गोपियाँ कृष्ण से कैसा प्रेम करती हैं?

Explanation

गोपियाँ कृष्ण से अनन्य प्रेम करती हैं।

क्योंकि- गोपियाँ का कृष्ण के प्रति प्रेम अटूट हैं अर्थात जब हमें किसी से अधिक लगाव होता है तो हम उससे बहुत ज्यादा प्रेम करते हैं।

प्रसंग- प्रस्तुत पद उस समय का है जब उद्धव गोपियों के पास योग-ज्ञान का संदेश लेकर जाते हैं तब कृष्ण के संदेश को सुनकर गोपियों के मन में कृष्ण के प्रति जो अत्यधिक प्रेम है उस प्रेम

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Question number: 822 (3 of 4 Based on Passage) Show Passage

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सूरदास दव्ारा रचित प्रस्तुत पद में गोपियों के पास योग-ज्ञान का संदेश लेकर कौन पहुँचते हैं?

Explanation

उद्धव गोपियों के पास योग-ज्ञान का संदेश लेकर पहुँचते हैं।

क्योंकि-ताकि गोपियां कृष्ण जी के प्रेम को भूलकर योगज्ञान को स्वीकार लें एवं जब हमें कोई सूचना सीधे नहीं देनी होती है तो हम उसे किसी के माध्यम से पहुँचाते हैं।

प्रसंग- प्रस्तुत पद उस समय का है जब उद्धव गोपियों के पास योग-ज्ञान का संदेश लेकर जाते हैं तब कृष्ण के संदेश को सुनकर गोपियों के मन

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Question number: 823 (4 of 4 Based on Passage) Show Passage

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सूरदास जी दव्ारा रचित उपर्युक्त पद के भाव-सौंदर्य क्या है?

Explanation

सूरदास जी दव्ारा रचित उपर्युक्त पद के भाव-सौंदर्य यह है कि इसमें गोपियाँ कहती है कि कृष्ण हमें उद्धव के माध्यम से कहते है कि हम उनसे प्रेम करना भूल जाए व योग रूपी ज्ञान को अपना लें इस कारण हमारा जो धैर्ये है वह अब समाप्त हो गया है। अर्थात जब कृष्ण स्वयं ही अपनी बात का मान नहीं रख पा रहे हैं तो हम क्यों धैर्य रखें।

क्योंकि-सूरदास जी दव्ारा रचित प्

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Question number: 824

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देव दव्ारा रचित रचनाओं में ओर किसका निर्वाह किया है?

Question number: 825

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » ऋतुराज कन्यादान

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कवि ऋतुराज दव्ारा रचित रचनाओं में उनकी भाषा किससे जुड़ी हुई है?

Question number: 826

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » मंगलेश डबराल संगतकार

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कवि मंगलेंश डबराल दव्ारा रचित उनकी रचनाओं मेें कौनसी योजना देखते ही बनती है?

Passage

5

तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा। बार बार मोहि लागि बोलावा।

सुनत लखन के बचन कठोरा। परसु सुधारि धरेउ कर घोरा।।

अब जनि देइ दोसु मोहि लोगू। कटुबादी बालक बधजोगू।।

बाल बिलोकि बहुत मैं बाँचा। अब येहु मरनिहार भा साँचा।।

कौसिक कहा छमिअ अपराधू। बाल दोष गुन गनहिं न साधू।।

खर कुठार मैं अकरुन कोही। आगे अपराधी गुरुद्रोही।।

उतर देत छोड़ौं बिनु मारे। केवल कौसिक सील तुम्हारे।।

न त येहि काटि कुठार कठोरे। गुरहि उरिन होतेउँ श्रम थोरे।।

गाधिसु नु कह हृदय हसि मुनिहि हरियरे सूझ।

अयमय खाँड़ न ऊखमय अजहुँ न बूझ अबूझ।।

Question number: 827 (1 of 8 Based on Passage) Show Passage

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » तुलसीदास राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

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तुलसीदास जी दव्ारा रचित उपरोक्त प्रसंग में विश्वामित्र मन ही मन क्या सोचकर मुस्करा रहे थे?

Explanation

परशुराम जी के मुख से यह सब बातें सुनकर विश्वामित्र जी मन में मंद-मंद मुस्कारने लगे और मन में सोचने लगे कि मुनि को सारी जगह हरा-ही-हरा (अपनी वीरता ही) दिखाई दे रहा है। वे सब में विजयी होने के कारण राम-लक्ष्मण को भी एक सामान्य क्षत्रिय ही समझ रहे हैंं परन्तु यह लोहे से बनी हुई खाँड (मजबूत लकड़ी/लोहे का पिलर) है, ईख की खाँड नहीं है, जो मुँह में लेते

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Question number: 828 (2 of 8 Based on Passage) Show Passage

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तुलसीदास जी दव्ारा रचित उपरोक्त प्रसंग में लक्ष्मण जी के कठोर वचन सुनकर परशुराम जी ने क्या किया?

Explanation

लक्ष्मण जी के इस प्रकार के कठोर शब्दों को सुन कर परशुराम जी ने अपने भयंकर अर्थात खतरनाक फरसे को सही करके अपने हाथों में पकड़ लिया ।

क्योंकि- उपरोक्त प्रसंग में लक्ष्मण ने अपने वचनों दव्ारा परशुराम जी को बहुत अधिक क्राेधत कर दिया था जिससे परशुराम जी लक्ष्मण को मारने में उतारू हो गए थे।

प्रसंग- तुलसीदास जी दव्ारा रचित प्रस्तुत प्रसंग में कवि ने उस

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