क्षितिज(Kshitij-Textbook) (CBSE (Central Board of Secondary Education- Board Exam) Class-10 Hindi): Questions 1731 - 1742 of 1777

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Passage

आत्मकथ्य

(1)

मधुप गुन-गुना कर कह जाता कौन कहानी यह अपनी,

मुरझाकर गिर रहीं पत्तियाँ देखो कितनी आज घनी।

इस गंभीर अनंत-नीलिमा में असंख्य जीवन-इतिहास

यह लो, करते ही रहते हैं अपना व्यंग्य-मिलन उपहास

तब भी कहते हो-कह डालूँ दूर्बलता अपनी बीती।

तुम सुनकर सुख पाओगे, देखोगे-यह गागर रीती।

किंतु कहीं ऐसा न हो कि तुम ही खाली करने वाले

अपने को समझो, मेरा रस ले अपनी भरने वाले।

(2)

यह विडंबना! अरी सरलते तेरी हँसी उड़ाऊँ मैं।

भूले अपनी या प्रवंचना औरों की दिखलाऊँ मैं।

उज्ज्वल गाथा कैसे गाऊँ, मधुर चाँदनी रातों की।

और खिल-खिला कर हँसते होने वाली उन बातों की।

(3)

मिला कहाँ वह सुख जिसका मैं स्वप्न देखकर जाग गया।

आलिंगन में आते-आते मुसक्या कर जो भाग गया।

जिसके अरूण-कपोलों की मतवाली सुदंर छाया में।

अनुरागिनी उषा लेती थी निज सुहाग मधुमाया में।

(4)

उसकी स्मृति पाथेय बनी है थके पथिक की पंथा की।

सीवन को उधेड़ कर देखोगे क्यों मेरी कंथा की?

छोटे से जीवन की कैसे बड़ी कथाएँ आज कहूँ?

क्या यह अच्छा नहीं कि औरों की सुनता मैं मौन रहूँ?

सुनकर क्या तुम भला करोगे मेरी भोली आत्म-कथा?

अभी समय भी नहीं, थकी सोई है मेरी मौन व्यथा।

Question number: 1731 (8 of 10 Based on Passage) Show Passage

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’उज्ज्वल गाथा कैसे गाऊँ, चाँदनी रातों की’-कथन के माध्यम से कवि क्या कहना चाहता है?

Question number: 1732 (9 of 10 Based on Passage) Show Passage

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Write in Short

आत्मकथा सुनाने के संदर्भ में ’अभी समय भी नहीं’ ऐसा कवि क्यों कहता है?

Question number: 1733 (10 of 10 Based on Passage) Show Passage

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Write in Short

भाव स्पष्ट कीजिए-

(क) मिला कहाँ वह सुख जिसका मैं स्वप्न देखकर जाग गया।

आलिंगन में आते-आते मुसक्या कर जो भाग गया।

Passage

अट नहीं रही है

(1)

अट नहीं रही है

आभा फागुन की तन

सट नहीं रही है।

Question number: 1734 (1 of 5 Based on Passage) Show Passage

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प्रस्तुत पद्यांश किस महाकवि के द्वारा रचित कविता से उद्धत है?

Explanation

प्रस्तुत पद्यांश महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ’निराला’ द्वारा रचित कविता ’अट नहीं रही है’ से उद्धत है।

क्योंकि-हर कविता किसी महाकवि के द्वारा ही लिखी होती है जिससे लोग पढ़कर प्रेरित होते है।

प्रसंग- प्रस्तुत पद्यांश महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ’निराला’ द्वारा रचित कविता ’अट नहीं रही है’ से उद्धत है। यहाँ

… (98 more words) …

Question number: 1735 (2 of 5 Based on Passage) Show Passage

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कवि निराला जी दव्ारा रचित प्रस्तुत पद्यांश के भाव-सौंदर्य क्या है?

Explanation

कवि निराला जी दव्ारा रचित प्रस्तुत पद्यांश के भाव-सौंदर्य है कि फागुन का महीना आने पर मन को प्रभावित करने वाले सभी जगह सौदंर्य फैल जाता हैं। अर्थात इसमें कवि मनुष्य के खुश होने की बात कह रहा है क्योंकि जब व्यक्ति का मन प्रसन्न होता है तो उसे हर

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Question number: 1736 (3 of 5 Based on Passage) Show Passage

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Describe in Detail

कवि निराला जी दव्ारा रचित प्रस्तुत पद्यांश में किसकी मादकता को प्रकट किया गया है?

Explanation

प्रस्तुत पद्यांश में फागुन महीने की मादकता को प्रकट किया गया है।

क्योंकि-कवि को फागुन का महीना बहुत अच्छा लगता हैं।

प्रसंग- प्रस्तुत पद्यांश महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ’निराला’ द्वारा रचित कविता ’अट नहीं रही है’ से उद्धत है। यहाँ फागुन (मार्च) महीने की मदहोशी को प्रकट किया गया है।

व्याख्या-

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Question number: 1737 (4 of 5 Based on Passage) Show Passage

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Describe in Detail

कवि निराला जी दव्ारा रचित प्रस्तुत पद्यांश में कवि फागुन के लिए क्या कहता है?

Explanation

कवि कहता है फागुन में प्राकृतिक वस्तुओं या तत्वों की सुंदरता इतनी अनुपम, अद्भूत, विचित्र और मनोहारी हो गई है कि वह पूरी तरह से शरीर के अन्दर नहीं समा पा रही है। सभी ही जगह सुंदर एवं हृदय को प्रभावित करने वाले नज़ारे फैले हुए हैं, उन सभी को

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Question number: 1738 (5 of 5 Based on Passage) Show Passage

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कवि निराला जी दव्ारा रचित प्रस्तुत पद्यांश के शिल्प-सौंदर्य क्या है?

Explanation

प्रस्तुत पद्यांश के शिल्प-सौंदर्य यह है कि इसमें कवि ने फागुन महिने का कर बहुत ही सुंदर दृश्य प्रस्तुत कर लय, संगीत, अलंकारों, भाषा व बिम्ब का बहुत ही अच्छे से प्रयोग किया है।

क्योंकि-ताकि इस प्रसंग के शिल्प-सौंदर्य पाठक आनंद के साथ पढ़ सके।

प्रसंग- प्रस्तुत पद्यांश महाकवि सूर्यकांत

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Passage

यह दंतुरित मुसकान

(1)

तुम्हारी यह दंतुरित मुसकान

मृतक में भी डाल देगी जान

धूलि-धूसर तुम्हारे ये गात……

छोड़कर तालाब मेरी झोंपड़ी में खिल रहे जलजात

परस पाकर तुम्हारा ही प्राण,

पिघलकर जल बन गया होगा कठिन पाषाण

छू गया तुमसे कि झरने लग पड़े शेफालिका के फूल

बांस था कि बबूल?

तुम मुझे पाए नहीं पहचान?

देखते ही रहोंगे अनिमेष!

थक गए हो?

आँख लूँ मैं फेर?

क्या हुआ यदि हो सके परिचित न पहली बार?

यदि तुम्हारी माँ न माध्यम बनी होती आज

मैं न सकता देख

मै न पाता जान

तुम्हारी यह दंतुरित मुसकान

Question number: 1739 (1 of 13 Based on Passage) Show Passage

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कवि नागार्जुन दव्ारा रचित प्रस्तुत प्रसंग के भाव-सौंदर्य में बच्चे के मुँह में जब नये दाँत आते तो उसकी मुसकान कैसी लगती है?

Explanation

बच्चे के मुँह में जब नये दाँत आते हैं तो उसकी मुसकान अत्यंत मनमोहक लगती है।

क्योंकि-ऐसी मुसकान पूरे विश्व में अनोखी होती है।

प्रसंग: - प्रस्तुत पद्यांश कवि नागार्जुन द्वारा रचित कविता ’यह दंतुरित मुसकान’ से अवतरित है। कवि ने छोटे बच्चे की दंतस्वरूप सुंदर मुसकान को देखकर हृदय

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Question number: 1740 (2 of 13 Based on Passage) Show Passage

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कवि नागार्जुन द्वारा रचित प्रस्तुत प्रसंग में कवि ने कोनसा भाव प्रकट किया है?

Explanation

प्रस्तुत पद्यांश कवि नागार्जुन द्वारा रचित कविता ’यह दंतुरित मुसकान’ से अवतरित है। कवि ने छोटे बच्चे की दंतस्वरूप सुंदर मुसकान को देखकर हृदय में उत्पन्न होने वाले भावों को अनेक बिम्बों अर्थात उपमा के माध्यम से प्रकट किया है।

क्योंकि- छोटे से बच्चे की मुस्काराहट देखकर हर व्यक्ति के

… (376 more words) …

Question number: 1741 (3 of 13 Based on Passage) Show Passage

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प्रस्तुत पद्यांश कवि नागार्जुन द्वारा रचित कोनसी कविता से उद्धृत है?

Explanation

प्रस्तुत पद्यांश कवि नागार्जुन द्वारा रचित कविता ’यह दंतुरित मुसकान’ से उद्धृत है।

क्योंकि- प्रस्तुत कविता कवि को बहुत प्रिय है।

प्रसंग: - प्रस्तुत पद्यांश कवि नागार्जुन द्वारा रचित कविता ’यह दंतुरित मुसकान’ से अवतरित है। कवि ने छोटे बच्चे की दंतस्वरूप सुंदर मुसकान को देखकर हृदय में उत्पन्न होने

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Question number: 1742 (4 of 13 Based on Passage) Show Passage

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नागार्जुन द्वारा रचित प्रस्तुत प्रसंग में कवि ने बच्चों के नये-नये दाँतों की मधुर मुसकान को देखकर क्या कहा हैं?

Explanation

नागार्जुन द्वारा रचित प्रस्तुत प्रसंग में कवि ने बच्चों के नये-नये दाँतों के स्वरूप उनकी मीठी मुसकान को देखकर एक मरे हुए व्यक्ति के शरीर में भी प्राणों का संचार हो जाता है अर्थात उस छोटे बच्चे की दंतरूप हँसी इतनी मनमोहक है कि उस हँसी को देखकर एक पल

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