कृतिका (Kritika-Textbook)-Prose (CBSE (Central Board of Secondary Education- Board Exam) Class-10 Hindi): Questions 80 - 97 of 461

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Passage

लेकिन बरखा न रुकी; और भी मुसलाधार पानी होने लगा। हम लोग पेड़ों की जड़ से धड़ से सट गए, जैसे कुत्ते के कान में अँठई (कुत्ते के शरीर में चिपके रहने वाले छोटे कीड़े, किलनी) चिपक जाती है। मगर बरखा जीम नहीं, थम गई। बरखा बंद होते ही बाग में बहुत-से-बिच्छु नज़र आए। हम लोग डरकर भाग चले। हम लोगों में बैजू बड़ा ढीठ था। संयोग की बात, बीच में मूसन तिवार मिल गए। बेचारे बूढ़े आदमी को सूझता कम था। बैजू उनको चिढ़कार बोला- बुढ़वा बेईमान माँगे करैला का चोखा।

Question number: 80 (2 of 6 Based on Passage) Show Passage

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बच्चों ने मूसलाधार पानी आने पर क्या किया?

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Question number: 81 (3 of 6 Based on Passage) Show Passage

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मूसन तिवारी कैसे थे?

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Question number: 82 (4 of 6 Based on Passage) Show Passage

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बच्चों में सबसे अधिक ढीठ कौन था?

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Question number: 83 (5 of 6 Based on Passage) Show Passage

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बैजू ने तिवारी जी को चिढ़ाकर क्या बोला?

Question number: 84 (6 of 6 Based on Passage) Show Passage

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बरखा बंद होते ही बाग में क्या नजर आया थे?

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इंग्लैंड के अखबारों की कतरने हिंदुस्तान अखबारों में दूसरे दिन चिपकी नज़र आती थीं, कि रानी ने एक ऐसा हलके नीले रंग का सूट बनवाया है जिसका रेशमी कपड़ा हिंदुस्तान से मँगाया गया है…… कि करीब चार सौ पौंड खरचा उस सूट पर आया है।

Question number: 85 (1 of 4 Based on Passage) Show Passage

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इस सूट का कपड़ा कहाँं से मंगवाया गया था?

Question number: 86 (2 of 4 Based on Passage) Show Passage

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इस सूट के कपड़े का नाम क्या था?

Question number: 87 (3 of 4 Based on Passage) Show Passage

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इस सूट पर कितना खर्च आया था?

Question number: 88 (4 of 4 Based on Passage) Show Passage

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रानी ने कौनसे रंग का सूट बनवाया था?

Passage

बस, हम उठकर उछलने-कूदने लगते थे। फिर रस्सी में बँधा हुआ काठ का घोड़ा लेकर नंग-धड़ंग बाहर गली में निकल जाते थे।

Question number: 89 (1 of 1 Based on Passage) Show Passage

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बच्चे गली में कैसे निकलते थें?

Passage

थोड़ी देर बाद फिर लड़कों की मंडली जुट जाती थी। इकट्‌ठा होते ही राय जमती कि खेती की जाए। बस, चबूतरे के छोर पर घिरनी गड़ जाती और नीचे की गली कुआँ बन जाती थी। मूँज की बटी हुई पतली रस्सी में एक चुक्कड़ बाँध गराड़ी पर चढ़ाकर लटका दिया जाता औा दो लड़के बैल बनकर ‘मोट’ खींचने लग जाते। चबूतरा खेत बनता, कंकड़ बीज और ठेंगा हल-जुआठा। बड़ी मेहनत से खेत जोते-बोए और पटाए जाते। फसल तैयार होते देर न लगती और हम हाथोंहाथ फसल काट लेते थे। काटते समय गाते थे

ऊँच नीच में बई कियार, जो उपजी सो भई हमारी।

फसल को एक जगह रखकर उसे पैरों से रौंद डालते थे। कसोरे (मिट्टी का बना छिछला कटोरा) का सूप बनाकर ओसाते और मिट्टी की दीए के तराजू पर तौलकर राशि तैयार कर देते थे। इसी बीच बाबू जी आकर पूछ बैठते थे-इस साल की खेती कैसी रही भोलानाथ?

बस, फिर क्या, हम लोग ज्यों-का त्यों खेत-खलिहान छोड़कर हँसते हुए भाग जाते थे। कैसी मौज की खेती थी।

ऐसे-ऐसे नाटक हम लोग बराबर खेला करते थे। बटोही भी कुछ देर ठिठककर हम लोगों के तमाशे देख लेते थे।

Question number: 90 (1 of 7 Based on Passage) Show Passage

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खेत के नाटक में बाबूजी आकर बच्चों से क्या पूछंते है?

Question number: 91 (2 of 7 Based on Passage) Show Passage

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बच्चों की यह खेती कैसी थी?

Question number: 92 (3 of 7 Based on Passage) Show Passage

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नाटक में फसल काटते समय बच्चे कौनसा गाना गाते थे?

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Question number: 93 (4 of 7 Based on Passage) Show Passage

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बाबू जी के पूछने पर बच्चे क्या करते थे?

Question number: 94 (5 of 7 Based on Passage) Show Passage

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बच्चे नाटक में खेत कैसे तैयार करते थे?

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Question number: 95 (6 of 7 Based on Passage) Show Passage

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बटोही क्या करते थे?

Question number: 96 (7 of 7 Based on Passage) Show Passage

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बच्चे राशि कैसे तैयार करते थे?

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… (170 more words) …

Passage

हम लोगों ने भी, बैजू के सुर-में सुर मिलाकर यही चिल्लाना शुरु किया। मूसन तिवारी ने बेतहाशा खदेड़ा हम लोग तो बस अपने-अपने घर की ओर आँधी हो चले।

जब हम लोग न मिल सके तब तिवारी जी सीधे पाठशाला में चले गए। वहाँ से हमको और बैजू को पकड़ लाने के लिए चार लड़के ’गिरफ्तारी वारंट’ लेकर छूटे। इधर ज्यों ही हम लोग घर पहुँचे, त्यों ही गुरु जी के सिपाही हम लोगों पर टूट पड़े। बैजू तो नौ-दो ग्यारह हो गया; हम पकड़ गए। फिर तो गुरु जी ने हमारी खूब खबर ली।

बाबू जी ने यह हाल सुना। वह दौड़े हुए पाठशाला में आए। गोद में उठाकर हमें पुचकारने और फुसलाने लगे। पर हम दुलारने से चुप होनेवाले लड़के नहीं थे। रोते-रोते उनका कंधा आँसुओं से तर कर दिया। वह गुरु जी की चिरौरी (दीनतापूर्वक की जाने वाली प्रार्थना, विनती) करके हमें घर ले चले। रास्ते में फिर हमारे साथी लड़कों का झुंड मिला। वे ज़ोर से नाचते और गाते थे-

माई पकाई गरर गरर पूआ, हम खाइब पूआ, ना खेलब जुआ।

Question number: 97 (1 of 5 Based on Passage) Show Passage

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बाबू जी ने यह सब सुनकर क्या किया?

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