कृतिका (Kritika-Textbook)-Prose (CBSE (Central Board of Secondary Education- Board Exam) Class-10 Hindi): Questions 378 - 395 of 461

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Passage

इसी बिखरी असीम सुदंरता का मन पर यह प्रभाव पड़ा कि सभी सैलानी झूम-झूमकर गाने लगे ”सुहाना सफ़र और ये मौसम हँसी…. . ।”

पर मैं मौन थी किसी ऋषि की तरह शांत थीं मैं चाहती थी कि इस सारे परिदृश्य को अपने भीतर भर लूँ। पर मेंरे भीतर कुछ बूँद-बूँद पिघलने लगा था। जीप की खिड़की से मुंडकी (सिर) निकाल-निकाल मैं कभी आसमान को छूते पर्वतों के शिखर को देखती तो कभी ऊपर से दूध की धार की तरह झर-झर गिरते जल प्रपातों को। तो नीचे कभी चिकने-चिकने गुलाबी पत्थरों के बीच इठला-इठला कर बहती, चाँदी की तरह कौंध मारती बनी-ठनी तिस्ता नदी को। सिलीगुड़ी से ही हमारे साथ थी यह तिस्ता नदी। पर यहाँ उसका सौंदर्य पराकाष्ठा पर था। इतनी खूबसूरत नदी मैंने पहली बार देखी थी। मैं रोमाचिंत थी। पुलकित थी। चिड़िया के पंखों की तरह हलकी थी।

Question number: 378 (4 of 4 Based on Passage) Show Passage

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सभी सैलानी असीम सुदंरता को देखकर कौनसा गाना गा रहे थे?

Passage

पुन: दुक्कड़ पर चोट पड़ी। शहनाई का मधुर स्वर गूँजा। अब दुलारी की बारी आई। उसने अपनी दृष्टि मद-विहृल बनाते हुए टुन्नू के दुबले-पतले परंतु गोरे-गोरे चेहरे को भर-आँख देखा और उसके कंठ से छल-छल करता स्वर का सोता फूट निकला-

’कोढ़ियल मुँहवैं लेब वकोट (मुँह नोच लेंना)

तोर बाप तड घाट अगोरलन (रखवाली कराना)

कौड़ी-कौड़ी जोर बटोरलन

तैं सरबउला बोल (बढ़-चढ़कर बोलना) जिन्नगी में

कब देखले लोट? कोढ़ियल…. ’।

अब बजरहीडा वालों के चेहरे हरे हो चले, वे वाहवाही देते हुए सुनने लगे। दुलारी गा रही थी-

’तुझे लोग आदमी व्यर्थ समझते हैं। तू तो वास्तव में बगुला है। बगुले के पर-जैसा ही तेरे शरीर का अंग है। वैसे तू बगुला भगत भी है। उसी की तरह तुझे भी हंस की चाल चलने का हौसला हुआ है। परंतु कभी-न-कभी तेरे गले में मछली का काँटा जरूर अटकेगा और उसी दिन तेरी कलई खुल जाएगी।’

इसके जवाब में टुन्नू ने गाया था-

”जेतना मन मानै गरिआव

अइने (और, इस प्रकार) दिलकर

तपन बुझाव अपने मनकड

बिथा (व्यथा) सुनाइव हम

डंके के चोट। रनियाँ…. . ! ”

इस पर सुंदर के ’मालिक’ फेंकू सरदार लाठी लेकर टुन्नू को मारने दौड़े। दुलारी ने टुन्नू की रक्षा की।यही दोनों का प्रथम परिचय था। उस दिन लोगों के बहुत कहने पर भी दोनों में से किसी ने भी गाना स्वीकार नहीं किया। मजलिस बदमज़ा हो गई।

Question number: 379 (1 of 6 Based on Passage) Show Passage

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टुन्नू की रक्षा किसने की?

Question number: 380 (2 of 6 Based on Passage) Show Passage

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दुलारी की बारी आने उसने क्या गाया?

Question number: 381 (3 of 6 Based on Passage) Show Passage

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बजरहीडा वालों का रंग कैसा हो गया था?

Question number: 382 (4 of 6 Based on Passage) Show Passage

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आगे दुलारी क्या गा रही थी?

Question number: 383 (5 of 6 Based on Passage) Show Passage

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टुन्नू को मारने कौन दौड़े?

Question number: 384 (6 of 6 Based on Passage) Show Passage

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दुलारी के जवाब में टुन्नू ने क्या गाया?

Passage

मन उदास हो गया। भीतर कुछ पिघलने लगा। महानगर में रहते हुए कभी ध्यान ही नहीं आया कि जिन बर्फ़ीले इलाकों में वैसाख के महीन में भी पाँच मिनिट में ही हम ठिठुरने लगे थे, हमारे ये जवान पौष और माघ में भी जबकि सिवाय पेट्रोल के सब कुछ जम जाता है, तैनात रहते हैं। और जिन सँकरे घुमावदार और खतरनाक रास्तों से गुज़रने भर में हमारे प्राण काँप उठते हैं उन रास्तों को बनाने में जाने कितनों के जीवन अपनी मीआद के पूर्व ही खत्म हो गए हैं। मेरे लिए यह यात्रा सचमुच एक खोज यात्रा थी। पूरा सफ़र चेतना और अंतरात्मा में हलचल मचाने वाला था। बहरहाल… अब हम लायुंग वापस लौटकर फिर यूमथांग की ओर। जितेन कुछ दिन पूर्व में ही नेपाल से ताज़ा ताज़ा आया था।

Question number: 385 (1 of 1 Based on Passage) Show Passage

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लेखिका के लिए यह यात्रा कैसी थी?

Passage

उस छाया को देखकर जैसे एक थप्पड़-सा लगा। अवाक्‌ इतिहास जैसे भीतर कहीं सहसा एक जलते हुए सूर्य-सा उग आया और डूब गया। मैं कहूँ कि उस क्षण में अणु-विस्फोट मेरे अनुभूति-प्रत्यक्ष में आ गया- एक अर्थ में मैं स्वयं हिरोशिमा के विस्फोट का भोक्ता बन गया।

इसी में से वह विवशता जागी। भीतर की आकुलता बुद्धि के क्षेत्र से बढ़कर संवेदना के क्षेत्र में आ गई…. फिर धीरे-धीरे मैं उससे अपने को अलग कर सका और अचानक एक दिन मैंने हिरोशिमा पर कविता लिखी-जापान में नहीं, भारत लौटकर, रेलगाड़ी में बैठे-बैठे।

यह कविता अच्छी है या बुरी; इससे मुझे मतलब नहीं है। मेरे निकट वह सच है, क्योंकि वह अनुभूति-प्रसूत (उत्पन्न) है, यही मेरे निकट महत्त्व की बात है।

Question number: 386 (1 of 4 Based on Passage) Show Passage

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एक क्षण के लिए लेखक क्या बन गया था?

Question number: 387 (2 of 4 Based on Passage) Show Passage

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लेखक ने अचानक क्या किया?

Question number: 388 (3 of 4 Based on Passage) Show Passage

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लेखक के निकट की महत्व की बात क्या हैं?

Question number: 389 (4 of 4 Based on Passage) Show Passage

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इतिहास क्या हो रहा था?

Passage

मूर्तिकार हिंदुस्तान के पहाड़ी प्रदेशों और पत्थरों की खानों के दौरे पर निकल पड़ा। कुछ दिनों बाद वह हताश लौटा, उसके चेहरे पर लानत बरस रही थी, उसने सिर लटकाकर खबर दी, ”हिंदुस्तान का चप्पा-चप्पा खोज डाला पर इस किस्म का पत्थर कहीं नहीं मिला। यह पत्थर विदेशी है।”

सभापति ने तैश में आकर कहा, ”लानत है आपकी अक्ल पर! विदेशों की सारी चीज़ेें हम अपना चुके हैं-दिल-दिमाग, तौर तरीके और रहन -सहन, जब हिंदुस्तान में बाल डांस तक मिल जाता है तो पत्थर क्यों नहीं मिल सकता? ”

Question number: 390 (1 of 3 Based on Passage) Show Passage

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मूर्तिकार ने लौटकर क्या खबर दी?

Question number: 391 (2 of 3 Based on Passage) Show Passage

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मूर्तिकार कहांँ चला गया?

Question number: 392 (3 of 3 Based on Passage) Show Passage

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सभापति ने मूर्तिकार से क्या कहा?

Passage

मूर्तिकार ने सुना और जवाब दिया, ”नाक लग जाएगी। पर मुझे यह मालूम होना चाहिए कि यह लाट कब और कहाँ बनी थी। इस लाट के लिए पत्थर कहाँ से लाया गया था? ”

सब हुक्कामों ने एक दूसरे की तरफ़ ताका…. एक की नज़र ने दूसरे से कहा कि यह बताने की जिम्मेदारी तुम्हारी है। खैर मसला हल हुआ। एक र्क्लक को फोन किया गया और इस बात की पूरी छानबीन करने का काम सौंपा गया।… पुरातत्व विभाग की फाइलों के पेट चीरे गए पर कुछ पता नहीं चला। र्क्लक ने लौटकर कमेटी के सामने काँपते हुए बयान किया, ”सर मेरी खता माफ़ हो, फाइलें सब कुछ हज़म कर चुकी हैं।”

Question number: 393 (1 of 2 Based on Passage) Show Passage

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मूर्तिकार की बात सुनकर हुक्कामों ने क्या किया?

Question number: 394 (2 of 2 Based on Passage) Show Passage

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मूर्तिकार ने आवाज सुनकर क्या जबाव दिया?

Passage

लेकिन मूर्तिकार पैसे से लाचार था…. यानी हार मानने वाला कलाकार नहीं था। एक हैरतअंगेज खयाल उसके दिमाग में कौंधा और उसने पहली शर्त दोहराई। जिस कमरे में कमेटी बैठी हुई थी उसके दरवाजे फिर बंद हुए और मूर्तिकार ने अपनी नयी योजना पेश की, ”चूँकि नाक लगना एकदम ज़रूरी है, इसलिए मेरी राय है कि चालीस करोड़ में से कोई एक जिंदा नाक काटकर लगा दी जाए…. ”

बात के साथ ही सन्नाटा छा गया। कुछ मिनटों की खामोशी के बाद सभापति ने सबकी तरफ़ देखा। सबको परेशान देखकर मूर्तिकार कुछ अचकचाया (चौंक उठना, भौंचक्का होना) और धीरे से बोला, ”आप लोग क्यों घबराते हैं! यह काम मेरे ऊपर छोड़ दीजिए…. . नाक चुनना मेरा काम है, आपकी सिर्फ़ इजाज़त चाहिए।”

कानाफूसी हुई और मूर्तिकार को इजाज़त दे दी गई।

Question number: 395 (1 of 1 Based on Passage) Show Passage

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अंत में मूर्तिकार के दिमाग में क्या हैरतअंगेज खयाल आया?

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