कृतिका (Kritika-Textbook)-Prose (CBSE Class-10 Hindi): Questions 350 - 359 of 461

Get 1 year subscription: Access detailed explanations (illustrated with images and videos) to 2295 questions. Access all new questions we will add tracking exam-pattern and syllabus changes. View Sample Explanation or View Features.

Rs. 1650.00 or

Passage

मैंने हैरान होकर देखा- आसमान जैसे उलटा पड़ा था और सारे तारे बिखरकर नीचे टिमटिमा रहे थे। दूर…. ढलान लेती तराई पर सितारों के गुच्छे रोशनियों की एक झालर सी बना रहे थे। क्या था वह? वह रात में जगमगाता हुआ गैंगटाक शहर था-इतिहास और वर्तमान के संधि-स्थल पर खड़ा मेहनतकश बादशाहों का वह एक ऐसा शहर था जिसकी सब कुछ संदर था-सुबह, शाम, रात।

और वह रहस्यमयी सितारों भरी रात मुझमें सम्मोहन जगा रही थी, कुछ इस कदर कि उन जादू भरे क्षणों में मेरा सब कुछ स्थगित था, अर्थहीन था… मैं, मेरी चेतना, मेरा आस-पास। मेेरे भीतर-बाहर सिर्फ़ शून्य ही था और थी अतींद्रियता (इन्द्रियों से परे) में डूबी रोशनी की वह जादुई झालर।

धीरे-धीरे एक उजास (प्रकाश, उजाला) उस शून्य से फूटने लगा… एक प्रार्थना होंठों को छूने लगी…. साना-साना हाथ जोड़ि, गर्दहु प्रार्थना। हाम्रो जीवन तिम्रो कौसेली अर्थात (छोटे-छोटे हाथ जोड़कर प्रार्थना कर रही हूँ कि मेरा सारा जीवन अच्छाइयों को समर्पित हो) । आज सुबह की प्रार्थना के ये बोल मैंने एक नेपाली युवती से सीखे थे।

सुबह हमें यूमथांग के लिए निकल पड़ना था, पर आँख खुलते ही मैं बालकनी की तरफ़ भगी। यहाँ के लोगों ने बताया था कि मौसम साफ़ हो तो बालकनी से भी कंचनजंघा दिखाई देती है। हिमालय की तीसरी सबसे बड़ी चोटी कंचनजंघा है! पर मौसम अच्छा होने के बावजूद आसमान हलके-हलके बादलों से ढका था, पिछले वर्ष की ही तरह इस बार भी बादलों के कपाट ठाकुर जी के कपाट की तरह बंद ही रहे। कंचनजंघा न दिखनी थी, न दिखी। पर सामने ही रकम-रकम (तरह-तरह) के रंग-बिरंगे इतने सारे फूल दिखाई दिये। ऐसा लगा मानों फूलों के बाग में आ गई हूँ।

बहरहाल… गैंगटाक से 149 किलोमीटर दूर पर यूमथांग था। ” यूमथांग यानी घाटियाँ…. . सारे रास्ते हिमालय की गहनतम घाटियाँ और फूलों से लदी वादियाँ मिलेंगी आपको” ड्राइवर-कम-गाइड जितेन नार्गे मुझे बता रहा था। ”क्या वहाँ बर्फ़ मिलेगी? ” मैं बचकाने उत्साह से पूछने लगती हूँ।

चलिए तो…. ।

जगह-जगह गदराए पाईन और धूपी के खूबसूरत नुकीले पेड़ों का जायजा लेते हुए पहाड़ी रास्तों पर आगे बढ़ने लगे कि जगह दिखाई दीं…. एक कतार में लगी सफ़ेद-सफ़ेद बौद्ध पताकाएँ। किसी ध्वज की तरह लहराती…. शांति और अहिंसा की प्रतीक ये पताकाएँ जिन पर मंत्र लिखे हुए थे। नार्गे ने बताया यहां बुद्ध की बड़ी मान्यता है। जब किसी बुद्धिस्ट की मृत्यु होती है, उसकी आत्मा की शांति के लिए शहर से दूर किसी भी पवित्र स्थान पर एक सौ आठ श्वेत पताकाएँ फहरा दी जाती हैं। नहीं, इन्हे उतारा नहीं जाता है, ये धीरे-धीरे अपने आप ही नष्ट हो जाती हैं। कई बार किसी नए कार्य की शुरुआत में भी पताकाएँ लगा दी जाती हैं पर वे रंगीन होती हैं। नार्गे बोलता जा रहा था और मेरी नज़र उसकी की जीप में लगी दलाई लामा की तस्वीर पर टिकी हुई थी। कई दुकानों पर भी मैंने दलाई लामा की ऐसी ही तसवीर देखी थी।

हिचकोले खाती हमारी जीप थोड़ी और आगे बढ़ी। अपनी लुभावनी हँसी बिखरते हुए जितेन बताने लगा…. . इस जगह का नाम कवी-लोंग स्ऑक। यहाँ ’गाइड’ फिल्म की शूटिंग हुई थी। तिब्बत के चीस-खे बम्सन ने लेपचाओं के शोमेन से कुंजतेक के साथ संधि-पत्र पर यहीं हस्ताक्षर किए थे। एक पत्थर यहाँ स्मारक के रुप में भी है। (लेपचा और भुटिया सिकिकम की इन दोनों स्थानीय जातियों के बीच चले सुदीर्घ झगड़ों के बाद शांति वार्ता का शुरुआती स्थल।)

उन्हीं रास्तों पर मैंने देखा-एक कुटियर के भीतर घूमता चक्र। यह क्या? नार्गे कहने लगा…. ”मेडम यह धर्म चक्र है। प्रेयल फिल। इसको घुमाने से सारे पाप धुल जाते हैं।”

”क्या? ” चाहे मैदान हो या पहाड़, तमाम वैज्ञानिक प्रगतियो के बावजूद इस देश की आत्मा एक जैसी। लोगों की आस्थाएँ, विश्वास, अंधविश्वास, पाप-पुण्य की अवधारणाएँ और कल्पनाएँ एक जैसी।

रफ्त़ा-रफ्त़ा (धीरे-धीरे) हम उँचाई की ओर बढ़ने लगे। बाज़ार, लोग और बस्तियाँ पीछे छूटने लगे। अब परिदृश्य से चलते-चलते स्वेटर बुनती नेपाली युवतियाँ और पीठ में भारी भरकम कार्टून ढोते बौने से दिखने बहादुर नेपाली ओझल हो रहे थे। अब नीचे देखने पर घाटियों में ताश के घरों की तरह पेड़-पौधों के बीच छोटे-छोटे घर दिखाई दे रहे थे। हिमालय भी अब छोटी-छोटी पहाड़ियों के रूप में नहीं वरन्‌ अपने विराट रूप एवं वैभव के साथ सामने आने वाला था। न जाने कितने दर्शकों, यात्रियों और तीर्थाटानियों का काम्य हिमालय। पल-पल परिवर्तित हिमालय!

और देखते-देखते रास्ते वीरान, सँकरे और जलेबी की तरह घूमावदार होने लगे थे। हिमालय बड़ा होते-होते विशालकाय होने लगा। घटाएँ गहराती-गहराती पाताल नापने लगीं। वादियाँ चौड़ी होने लगीं। बीच-बीच में करिश्मे की तरह रंग-बिरंगे फूल शिद्दत (तीव्रता, प्रबलता, अधिकता) से मुसकराने लगे। उन भीमकाय पर्वतों के बीच और घाटियों के ऊपर बने संकरे कच्चे-पक्के रास्तों से गुज़रते यूँ लग रहा था जैसे हम किसी सघन हरियाली वाली गुफा के बीच हिचकोले खाते निकल रहे हों।

इसी बिखरी असीम सुदंरता का मन पर यह प्रभाव पड़ा कि सभी सैलानी झूम-झूमकर गाने लगे ”सुहाना सफ़र और ये मौसम हँसी…. . ।”

पर मैं मौन थी किसी ऋषि की तरह शांत थीं मैं चाहती थी कि इस सारे परिदृश्य को अपने भीतर भर लूँ। पर मेंरे भीतर कुछ बूँद-बूँद पिघलने लगा था। जीप की खिड़की से मुंडकी (सिर) निकाल-निकाल मैं कभी आसमान को छूते पर्वतों के शिखर को देखती तो कभी ऊपर से दूध की धार की तरह झर-झर गिरते जल प्रपातों को। तो नीचे कभी चिकने-चिकने गुलाबी पत्थरों के बीच इठला-इठला कर बहती, चाँदी की तरह कौंध मारती बनी-ठनी तिस्ता नदी को। सिलीगुड़ी से ही हमारे साथ थी यह तिस्ता नदी। पर यहाँ उसका सौंदर्य पराकाष्ठा पर था। इतनी खूबसूरत नदी मैंने पहली बार देखी थी। मैं रोमाचिंत थी। पुलकित थी। चिड़िया के पंखों की तरह हलकी थी।

”मेरे नगपति मेरे विशाल”-मैंने हिमालय को सलामी देनी चाही कि तभी जीप एक जगह रुकी…. खूब ऊँचाई से पूरे वेग के साथ ऊपर शिखरों के भी शिखर से गिरता फेन उगलता झरना। इसका नाम था-’सेवन सिस्टर्स वॉटर फॉल’। फ्ल़ैश चमकने लगे। सभी सैलानी इन खूबसूरत लम्हों की रंगत को कैमरे में कैद करने में मशगूल (व्यस्त) थे।

आदिम युग की किसी अभिशप्त (शापित, अभियुक्त) राजकुमारी-सी मैं भी नीचे बिखरे भारी भरकम पत्थरों में बैठ झरने के संगीत के साथ ही आत्मा का संगीत सुनने लगी। थोड़ी देर बाद ही बहती जलधारा में पाँव डुबोया तो भीतर तक भीग गई। मन काव्यमय हो उठा। सत्य और सौन्दर्य को छूने लगा।

जीवन की अनंतता का प्रतीक वह झरना…. इन अद्भूत-अनूठे क्षणों में मुसमें जीवन की शक्ति का ऐहसास हो रहा था। इस कदर प्रतीत हुआ कि जैसे मैं स्वयं भी देश और काल की सरहदों (सीमा) से दूर बहती धारा बन बहने लगी हूँ। भीतर ही भीतर सारी तामसिकताएँ (तमोगुण से युक्त, कुटिल) और दुष्ट वासनाएँ (बुरी इच्छाएँ) इस निर्मल धारा में बह गईं। मन हुआ कि अनंत समय तक ऐसी ही बहती रही सुनती रहूँ…. सुनती रहूँ इस झरने की पुकार को। पर जितेन मुझे ठेलने लगा…… आगे इससे भी सुंदर नज़ारे मिलेंगे।

अनमनी-सी मैं उठी। थोड़ी देर बाद फिर वही नज़ारे-आँखों और आत्मा को सुख देने वाले। कहीं चटक हरे रंग का मोटा कालीन ओढ़े तो कहीं हलका पीलापन लिए, तो कहीं पलस्तर उखड़ी दीवार की तरह पथरीला और देखते ही देखते परिदृश्य से सब छू-मंतर…. जैसे किसी ने जादू की छड़ी घूमा दी हो। सब पर बादलों की एक मोटी चादर। सब कुछ बादलमय।

चित्रलिखित-सी मैं ’माया’ और ’छाया’ के इस अनूठे खेल को भर-भर आँखों देखती जा रही थी। प्रकृति जैसे मुझे सयानी (समझदार, चतूर) बनाने के लिए रहस्यों का उद्घाटन करने पर तुली हुई थी।

धीरे-धीरे धंध की चादर थोड़ी छँटी। अब वहाँ पहाड़ नहीं, दो विपरीत दिशाओं से आते छाया-पहाड़ थे और थोड़ी देर बाद ही वे छाया-पहाड़ अपने श्रेष्ठतम रूप में मेरे सामने थे। जीप थोड़ी देर रुकवा दी गई थी। मैंने गर्दन घुमाई… सब ओर जैसे जन्नत (स्वर्ग) बिखरी पड़ी थी। नज़रों के छोर तक खूबसूरती ही खूबसूरती। अपने को निरंतर दे देने की अनुभूति कराते पर्वत, झरने, फूलों, घाटियों और वादियों के दुर्लभ नजारे! वहीं कहीं लिखा था…’थिंक ग्रीन’।

आश्चर्य! पलभर में ब्रह्यांड में कितना कुछ घटित हो रहा था सतत प्रवाहमान झरने, नीचे वेग से बहती तिस्ता नदी। सामने उठती धुंध, ऊपर मँडराते आवारा बादल। मद्धिम-मद्धिम हवा में हिलोरे लेते प्रियुता और रूडोडेंड्रो के फूल। सब अपनी अपनी लय तान और प्रवाह में बहते हुए। चैरवेति-चैरवेति (चलते रहो, चलते रहो) । और समय के इसी सतत प्रवाह में तिनके-सा बहता हमारा वज़ूद (अस्तित्व) ।

पहली बार अहसास हुआ ’जीवन का आनंद है यही चलायमान सौंदर्य।

संपूर्णता के उन क्षणों में मन इस बिखरे सौंदर्य से इस कदर एकात्म हो रहा था कि भीतर-बाहर की रेखा मिट गई थी, आत्मा की सारी खिड़कियाँ खुलने लगी थीं…. . मैं सचमुच ईश्वर के निकट थी। सुबह सीखी प्रार्थना फिर होंठों को छूने लगी थी…… साना साना हाथ जोड़ि…. कि तभी अतींद्रिय संसार खंड-खंड हो गया! वह महाभाव सूखी टहनी-सा टूट गया।

दरअसल मंत्रमुग्ध-सी मैं तंद्रिल अवस्था में ही थोड़ी दूर तक निकल आई थी कि अचानक पाँवों पर ब्रेक सी लगी…. जैसे समाधिस्थ भाव में नृत्य करती किसी आत्मलीन नृत्यांगना के नुपूर अचानक टूट गए हों। मैंने देखा इस अदव्तीय सौंदर्य से निरपेक्ष कुछ पहाड़ी औरतें पत्थरों पर बैठीं पत्थर तोड़ रही थीं। गुँथे आटे-सी कोमल काया पर हाथों में कुदाल और हथौड़े! कईयों की पीठ पर बँधी डोको (बड़ी टोकरी) में उनके बच्चे भी बँधे हुए थे। कुछ कुदाल को भरपूर ताकत के साथ ज़मीन पर मार रही थीं।

इतने स्वर्गीय सौंदर्य, नदी, फूलों, वादियों और झरनों के बीच भूख, मौत, दैन्य और ज़िंदा रहने की यह जंग! मातृत्व व श्रम साधना साथ-साथ। वहीं पर खड़े बी. आर. ओ. (बोर्ड रोड आर्गेनाइजेशन) के एक कर्मचारी से पूछा मैने, ”यह क्या हो रहा है? उसने चुहलबाजी के अंदाज में बताया कि जिन रास्तों से गुजरते हुए आप हिम-शिखरों से टक्कर लेने जा रही हैं उन्हीं रास्तों को ये पहाड़िने चौड़ा बना रही है।”

”बड़ा खतरनाक कार्य होगा यह” मेरे मूँह से अकस्मात यह निकला। वह संजीदा हो गया। कहने लगा, पिछले महिने तो एक की जान चली गई थी। बड़ा दुसाध्य कार्य है पहाड़ों पर रास्ता बनाना। डाइनामाइट से चट्टानों को उड़ा दिया जाता है। फिर बड़े-बड़ेे पत्थरों को तोड़-मोड़कर एक आकार के छोटे-छोटे पत्थरों में बदला जाता है फिर बड़े-से जाले में उन्हें लंबी पट्टी की तरह बिठाकर कटे रास्तों पर बाड़े की तरह लगाया जाता है। ज़रा-सी चूक और सीधा पाताल प्रवेश!

और तभी मुझे ध्यान आया…. इन्हीं रास्तों पर एक जगह सिक्किम सरकार के बोर्ड लगा था जिस पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था, ”एवर वंडर्ड हू डिफाइड डेथ टू बिल्ड दीज रोड्‌स” (आप ताज्जुब करेंगे पर इन रास्तों को बनाने में लोगों ने मौत को झुठलाया है।)

एकाएक मेरा मानसिक चैनल बदला। मन पीछे घूम गया। इसी प्रकार एक बार पलामू और गुमला के जंगलों में देखा था… पीठ पर बच्चों को कपड़े से बाँधकर पत्तों की तलाश वन-वन डोलती आदिवासी युवतियाँ। उन युवतियों के फूले हुए पांव और पत्थर तोड़ती पहाड़िनों के हाथों में पड़े ठाठे (हाथ में पड़ने वाली गांठे या निशान), एक ही कहानी कह रहे थे कि आम ज़िंदगियों की कहानी हर जगह एक-सी है कि सारी मलाई एक तरफ़; सारे आँसू, अभाव, यातना और वंचना एक तरफ़!

और तभी सहयात्री मणि और जितेन मुझे खोजते-खोजते वहाँ तक आ गए थे। मुझे गमगीन देख जितेन कहने लगा, ”मैडम, ये मेरे देश की आम जनता है, इन्हें तो आप कहीं भी देख लेंगी…आप इन्हें नहीं, पहाड़ों की सुंदरता को देखिए…. जिसके लिए आप इतने पैसे खर्च करके आई हैं।”

’ये देश की आम जनता ही नहीं, जीवन का प्रति संतुलन भी हैं। ये ’वेस्ट एट रिपेईंग’ (कम लेना और ज्यादा देना) हैं। कितना कम लेकर ये समाज को कितना अधिक वापस लौटा देती है’, मन ही मन सोचा मैंने। हम वापस जीप की ओर मुड़ने लगे कि तभी मैने देखा-वे श्रम-सुंदरियाँ किसी बात पर इस कदर खिलखिलाकर हँस पड़ी थीं कि जीवन लहरा उठा था और वह सारा खंडहर ताजमहल बन गया था।

हम लगातार ऊँचाइयों पर चढ़ते जा रहे थे। जितेन बता रहा था, अब हम हर मोड़ पर हेयर पिन बेंट लेंगे और तेज़ी से ऊँचाई पर चढ़ते जाएँगे। हेयर पिन बेंट के ठीक पहले एक पड़ाव पर देखा सात-आठ वर्ष की उम्र के ढेर सारे पहाड़ी बच्चे स्कूल से लौट रहे थे और हमसे लिफ्ट माँग रहे थे। जितेन ने बताया हर दिन तीन-साढ़े तीन किलोमीटर की पहाड़ी चढ़ाई चढ़कर स्कूल जाते हैं।

”क्या स्कूली बस नहीं? ”

मणि के पूछने पर जितेन हँस पड़ा, ”मैडम यह मैदानी नहीं पहाड़ी इलाका है। मैदान की तरह यहाँ कोई भी आपको चिकना वर्बीला (बढ़े हुए पेट वाला) नहीं मिलेगा। यहाँ जीवन कठोर है। नीचे तराई में ले देकर एक ही स्कूल है। दूर-दूर से बच्चे उसी स्कूल मेें जाते हैं। और सिर्फ़ पढ़ते ही नहीं हैं, इनमें से अधिकांश बच्चे शाम के समय अपनी माँओं के साथ मवेशियों को चराते हैं, पानी भरते हैं, जंगल से लकड़ियों के भारी-भारी गट्ठर ढोते हैं। खुद मैंने भी ढोए थे।”

खतरा अब धीरे-धीरे बढ़ने लगा था। रास्ते और भी सँकरे होते जा रहे थे। कई बार लगता जैसे रास्तों को इंच टेप से नापकर एक जीप जितना ही चौड़ा बनाया गया है कि ज़रा भी संतुलन बिगड़े, इंच भर भी जीप इधर-उधर खिसके तो हम सीधे घाटियों में! इन रास्तों पर जगह-जगह लिखी चेतावनियाँ भी हमें खतरों के प्रति सजग कर रही थींं सामने ही लिखा था-’धीरे चलाएँ, घर में बच्चे आपका इंतज़ार कर रहे हैं।

थोड़ और आगे बढ़े कि फिर एक चेतावनी-’वी केयर, मैन इटर अराउंड।’ पर हमें नरभक्षी वाले जानवर नहीं, दूध देने वाले याक दिखे जो काले-काले ढेर सारे याक थे। पहाड़ों पर गिरती बर्फ़ से प्राकृतिक ढंग से रक्षा करने वाले घने-घने बालों वाले याक।

सूरज ढलने लगा था। हमने देखा कुछ पहाड़ी औरतें गायों को चराकर वापस लौट रही थीं। कुछ के सिर पर लकड़ियों के भारी-भरकम गठ्ठर थे। ऊपर आसमान फिर धुंध और बादलों से घिरा हुआ था। उतरती संध्या में जीप चाय के बगानों से गुज़र रही थीं कि फिर एक दृश्य ने मुझे खींचा…. नीचे चाय के हरे-भरे बगानों में कई युवतियाँ बोकू पहने (सिक्किमी परिधान) चाय की पत्तियाँ तोड़ रही थीं। नदी की तरह उफ़ान लेता उनका यौवन और श्रम से दमकता गुलाबी चेहरा। एक युवती ने चटक लाल रंग का बोकु पहन रखा था। सघन हरियाली के बीच चटक लाल रंग डूबते सूरज की स्वर्णिम और सात्विक आभा में कुछ इस कदर इंद्रधनुषी छटा बिखेर रहा था कि मंत्रमुग्ध-सी मैं चीख पड़ी थी! …. इतना अधिक सौंदर्य मेंरे लिए असह्‌य था।

यूमथांग पहुँचने के लिए हमें लायुंग में पड़ाव लेना था। गगनचुंबी पहाड़ों के तल में साँस लेती एक नन्हीं-सी शांत बस्ती लायुंग। सारी दौड़धूप से दूर ज़िंदगी जहाँ निश्चित सो रही थी।

उसी लायुंग में हम ठहरे थे। तिस्ता नदी के तीर पर बसे लकड़ी के एक छोटे-से घर में। मुँह हाथ धोकर मैं तुरंत ही तिस्ता नदी के किनारे बिखरे पत्थरों पर बैठ गई थी। सामने बहुत ऊपर से बहता झरना नीचे कल-कल बहती तिस्ता में मिल रहा था। मदव्म-मदव्म (धीमी, हलकी) हवा बह रही थी। पेड़-पौधे झूम रहे थे। गहरे बालों की परत ने चाँद को ढक रखा था…. बाहर परिंदे और लोग अपने घरों को लौट रहे थे। वातावरण में अद्भुत शांति थी। मंदिर की घंटियों-सी…. . घुँघरुओं की रुनझुनाहट-सी। आँखे अनायास भर आई। ज्ञान का नन्हा-सा बोधिसत्व जैसे भीतर उगने लगा…. वहीं सुख शांति और सुकून है जहाँ अखंडित संपूर्णता है-पेड़, पौधे, पशु और आदमी-सब अपनी-अपनी लय, ताल और गति में हैं। हमारी पीढ़ी ने प्रकृति की इस लय, ताल और गति से खिलवाड़ कर अक्षम्य अपराध किया है। हिमालय अब मेरे लिए कविता ही नहीं, दर्शन बन गया था।

अँधेरा होने के पहले ही किसी प्रकार डगमगाती शिलाओं और पत्थरों से होकर तिस्ता नदी की धार तक पहुँची। बहते पानी को अपनी अंजुलि में भरा तो अतीत भीतर धड़कने लगा… स्मृति में कौंधा…. हमारे यहाँं जल को हाथ में लेकर संकल्प किया जाता हैं…. . क्या संकल्प करूँ? पर मैं संकल्प की स्थिति में नहीं थी…भीतर थी एक प्रार्थना…. . एक कमजोर व्यक्ति की प्रार्थना…. . भीतर का सारा हलाहल (विष, ज़हर) सारी तामसिकताएँ बह जाएँ…. इसी बहती धारा मे! रात धीरे-धीरे गहराने लगी। हिमालय ने काला कंबल ओढ़ लिया था। जितेन ने लकड़ी के बने खिलौने से उस छोटे से गेस्ट हाऊस में गाने की तेज़ धुन पर जब अपने संगी-साथियों के साथ नाचना शुरू किया तो देखते-देखते एक आदिम रात्रि की महक से परियों की कहानी-सी मोहक वह रात महक उठी। मस्ती और मादकता का ऐसा संक्रमण (मिलन, संयोग) हुआ कि एक-एक कर हम सभी सैलानी गोल-गोल घेरा बनाकर नाचने लगे। मेरी पचास वर्षीय सहेली मणि ने कुमारियों को भी मात करते हुए वो जानदार नृत्य प्रस्तुत किया कि हम सब अवाक्‌ उसे ही देखते रह गए। कितना आनंद भरा था उसके भीतर! कहाँ से आता था इतना आनंद?

लायुंग की सुबह! बेहद शांत और सुरम्य। तिस्ता नदी की धारा के समान ही कल-कल कर बहती हुई। अधिकतर लोगों की जीविका का साधन पहाड़ी आलू, धान की खेती और दारू का व्यापार। सुबह मैं अकेले ही टहलने निकल गई थी। मैंने उम्मीद की थी कि यहाँ मुझे बर्फ़ मिलेगी पर अप्रैल के शुरुआती महीने में यहाँ बर्फ़ का एक कतरा भी नहीं था। यद्यपि हम सी लेवल (तल, स्तर) से 14000 फीट की ऊँचाई पर थे। मैं बर्फ़ देखने के लिए बैचेन थी…हम मैदानों से आए लोगों के लिए बर्फ़ से ढके पहाड़ किसी जन्नत से कम नहीं होते।

वहीं पर घूमते हुए एक सिक्किमी नवयुवक ने मुझे बताया कि प्रदूषण के चलते स्नो-फॉल लगातार कम होती जा रही है पर यदि मैं ’कटाओ’ चली जाऊँ तो मुझे वहाँ शर्तिया बर्फ़ मिल जाएगी…. कटाओ यानी भारत का स्विट्‌जरलैंड! कटाओ जो कि अभी तक टूरिस्ट स्पॉट नहीं बनने के कारण सुर्खियों (चर्चा में आना) में नहीं आया था, और अपने प्राकृतिक स्वरूप में था। कटाओ जो लायुंग से 500 फीट ऊँचाई पर था और करीब दो घंटे का सफ़र था। वह नवयुवक मुझसे बतिया रहा था और उसकी घरवाली अपने छोटे से लकड़ी के घर के बाहर हमें उत्सुकमापूर्वक देख रही थी कि तभी गाय ने आकर थैले में रखा उसका महुआ गुडुप (निगल लिया) कर लिया था। मीठी झिड़कियाँ देकर उसने गाय को भगा दिया था।

उम्मीद, आवेश, उत्तेजना के साथ अब हमारा सफ़र कटाओ की ओर। कटाओ का रास्ता और खतरनाक था और उस पर धुंध और बारिश। जितेन लगभग अंदाज से गाड़ी चला रहा था। पहाड़, पेड़, आकाश, घाटियाँ सब पर बादलों की परत। सब कुछ बादलमय। बादल को चीरकर निकलती हमारी जीप। खतरनाक रास्तों के अहसास ने हमें मौन कर दिया था। और उस बारिश। एक चूक और सब खलास…. साँस रोके हम धुंध और फिसलन भरे रास्ते पर सँभल-सँभलकर आगे बढ़ती जीप को देख रहे थे। हमारी साँस लेने की आवाजों के सिवाय आस-पास जीवन का कोई पता नही ंथा। फिर नज़र पड़ी बड़े-बड़े शब्दों में लिखी एक चेतावनी पर…. ’इफ यू आर मैरिड, डाइवोर्स स्पीड’। थोड़ी ही दूर आगे बढ़े कि फिर एक चेतावनी-’दुर्घटना से देर भली, सावधानी से मौत टली’।

करीब आधे रास्ते बाद धुंध छँटी और साथ ही सृष्टि और हमारे बीच फैला सन्नाटा भी हटा। नार्गे उत्साहित होकर कहने लगा, ”कटाओ हिंदुस्तान का स्विट्‌जरलैंड है।” मेरी सहेली मणि स्विट्‌जरलैंड घूम आई थी, उसने तुरंत प्रतिवाद किया- ”नहीं स्विट्‌जरलैंड भी इतनी ऊँचाई पर नहीं है और न ही इतना सुंदर।”

हम कटाओ के करीब आ रहे थे क्योंकि दूर ही बर्फ़ से ढके पहाड़ दिखने लगे थे। पास में जो पर्वत थे वे आधे हरे-काले दिख रहे थे। लग रहा था जैसे किसी ने इन पहाड़ों पर पाउडर छिड़क दिया हो। कहीं पाउडर बची रह गई हो और कहीं वह धूप में बह गई हो। नार्गे ने उत्तेजित होकर कहा-”देखिए एकदम ताज़ा बर्फ़ है, लगता है रात में गिरी है यह बर्फ़।” थोड़ा और आगे बढ़ने पर अब हमें पूरी तरह बर्फ़ से ढके पहाड़ दिख रहे थे। साबुन के झाग की तरह सब ओर गिरी हुई बर्फ़। मैं जीप की खिड़की से मुंडी निकाल-निकाल दूर-दूर तक देख रही थी…. . चाँदी से चमकते पहाड़!

एकाएक जितेन ने पूछा, ”कैसा लग रहा है? ”

मैंने जवाब दिया-”राम रोछो” (अच्छा है)

वह उछल पड़ा-”अरे, यह नेपाली बोली कहाँ से सीखी? ” अपनी भाषा के गर्व से उसकी आँखें चमक उठी, चेहरा इतराने लगा। और तभी चमत्कार की तरह हलकी-हलकी बर्फ़ एकदम महीन-महीन मोती की तरह गिरने लगी!

”तिम्रो माया सैंधै मलाई सताऊँछ” (तुम्हारा प्यार मुझे सदैव रूलाता है।) चहुँ ओर बिखरी यह बर्फ़ीली सुंदरता जितेन के मन पर भी थाप लगाने लगी थी। प्रेम की झील में तैरते हुए झूम-झूम गाने लगा था वह।

हम सभी सैलानी अब जीप से उतर कर बर्फ़ पर कूदने लगे थे। यहाँ बर्फ़ सर्वाधिक थी। घुटनों तक नरम-नरम बर्फ़। ऊपर आसमान और बर्फ़ से ढके पहाड़ एक हो रहे थे। कई सैलानी बर्फ़ पर लेटकर हर लम्हे की रंगत को कैमरे में कैद करने लगे थे।

मेरे पाँव झन-झान करने लगे थे। पर मन वृंदावन हो रहा था। भीतर जैसे देवता जाग गए थे। ख्वाहिश हुई कि मैं भी बर्फ़ पर लेटकर इस बर्फ़ीली जन्नत को जी भर देखूँ। पर मेरे पास बर्फ़ पर पहनने वाले लंबे-लंबे जूते नहीं थे। मैंने चाहा कि किराए पर ले लूँ पर कटाओ, यूमथांग और झांगू लेक की तरह टूरिस्ट स्पॉट (भ्रमण -स्थल) नहीं था, इस कारण यहाँ झांगू की तरह दुनिया भर की क्या एक भी दुकान नहीं थी। खैर….

दनादन फ़ोटो खिंचलाने की बजाय मैं उस सारे परिदृश्य को अपने भीतर लगातार खींच रही थी जिससे महानगर के डार्क रूम में इसे फिर-फिर देख सकूँ। संपूर्णता के उन क्षणों में यह हिमशिखर मुझे मेरे आध्यात्मिक अतीत से जोड़ रहे थे। शायद ऐसी ही विभोर कर देने वाली दिव्यता के बीच हमारे ऋषि-मुनियों ने वेदों की रचना की होगी। जीवन सत्यों को खोजा होगा।’सर्वे भवंतु सुखिन/’ का महामंत्र पाया होगा। अंतिम संपूर्णता का प्रतीक वह सौंदर्य ऐसा कि बड़ा से बड़ा अपराधी भी इसे देख ले तो क्षणों के लिए ही सही ’करुणा का अवतार’ बुद्ध बन जाए।

और तभी दिमाग में कौंधा कि मिल्टन ने ईव की सुंदरता का वर्णन करते हुए लिखा था कि शैतान भी उसे देखकर ठगा-सा रह जाता था और दूसरों का अमंगल करने की वृत्ति भूल जाता था। मैंने मणि से पूछा- ”क्या उसने पढ़ी है मिल्टन की वह कविता? ”

पर मणि उस समय किसी दूसरे ही सवाल से जूझ रही थी। वह एकाएक दाशैनिको की तरह कहने लगी, ”ये हिमशिखर जल स्तंभ हैं, पूरे एशिया के। देखों, प्रकृति भी किस नायाब ढेग से सारा इंतजाम करती है। सर्दियों में बर्फ़ के रूप में जल संग्रह कर लेती है और गर्मियों में पानी के लिए जब त्राहि-त्राहि मचती है तो ये ही बर्फ़ शिलाएँ पिघल-पिघल जलधारा बन हमारे सूखे कंठो को तरावट पहुँचाती हैं। कितनी अद्भुत व्यवस्था है जल संचय की! ”

मणि ने अभिभूत हो माथ नवाया-” जाने कितना ऋण है हम पर इन नदियों का, हिम शिखरों का।” ’संसार कितना सुंदर।’ स्वप्न जगाते दन लम्हों में मैने सोचा। पर तभी उदासी की एक झीनी-सी परत मुझ पर छा गई। उड़ते बादलों की तरह पत्थर तोड़ती उन पहाड़िनों का खयाल आ गया।

आत्मा की अनंत परतों को छीलता हुआ हमारा यह सफ़र थोड़ा और आगे बढ़ा कि तभी देखा-इक्की-दुक्की फ़ौजी से छावनियाँ। ध्यान आया यह बोर्डर एरिया है। थोड़ी दूरी पर चीन की सीमा है। एक फ़ौजी से मैंने कहा-”इतनी कड़कड़ाती ठंड में (उस समय तापमान माइनस 15 डिग्री सेल्यिसय था) आप लोगों को बहुत तकलीफ़ होती होगी।” वह हँस दिया- एक उदास हँसी, ”आप चैन की नींद सो सकें, इसीलिए तो हम यहाँ पहरा दे रहे हैं।”

’फेरी भेटुला’ (फिर मिलेंगे) कहते हुए जितेन ने जीप चालू कर दी। थोड़ी देर बाद ही फिर दिखी एक फ़ौज छावनी जिस पर लिखा था- ’वी गिव अवर टुडे फॉर योर टुमारो।’

मन उदास हो गया। भीतर कुछ पिघलने लगा। महानगर में रहते हुए कभी ध्यान ही नहीं आया कि जिन बर्फ़ीले इलाकों में वैसाख के महीन में भी पाँच मिनिट में ही हम ठिठुरने लगे थे, हमारे ये जवान पौष और माघ में भी जबकि सिवाय पेट्रोल के सब कुछ जम जाता है, तैनात रहते हैं। और जिन सँकरे घुमावदार और खतरनाक रास्तों से गुज़रने भर में हमारे प्राण काँप उठते हैं उन रास्तों को बनाने में जाने कितनों के जीवन अपनी मीआद के पूर्व ही खत्म हो गए हैं। मेरे लिए यह यात्रा सचमुच एक खोज यात्रा थी। पूरा सफ़र चेतना और अंतरात्मा में हलचल मचाने वाला था। बहरहाल… अब हम लायुंग वापस लौटकर फिर यूमथांग की ओर। जितेन कुछ दिन पूर्व में ही नेपाल से ताज़ा ताज़ा आया था।

यूमथांग की घाटियों में एक नया आकर्षण और जुड़ गया था… ढेरों-ढेर प्रियुता और रूडोडेंड्रों के फूल। जितेन बताने लगा, ”बस प्रदंह दिनों में ही देखिएगा पूरी घाटी फूलों से इस कदर भर जाएगी कि लगेगा फूलों की सेज रखी हो”

यहाँ रास्ते अपेक्षाकृत चौड़े थे, इस कारण खतरो का अहसास कम था। इन घाटियों में कई बंदर भी दिखें। कुछ अकेले कुछ अपने बाल-बच्चों के साथ।

बहराहाल…. घाटियों, वादियों, पहाड़ों और बादलों की आँख-मिचौली दिखाती, पहाड़ी कबूतरों को उड़ाती हमारी जीप जब यूमथांग पहुँची तो हम थोड़े निराश हुए। बर्फ़ से ढके कटाओ के हिमशिखरों को देखने के बाद यूमथांग थोड़ा फीका लगा और यह भी अहसास हुआ कि मंजिल से कहीं ज्य़ादा रोमाचंक होता है मंजिल तक का सफ़र।

बहराहाल. यूमथांग में चिप्स बेचती एक सिक्किमी युवती से मैंने पूछा-” क्या तुम सिक्किमी हो? ”

”नहीं मैं इंडियन हूँ, ” उसने जवाब दिया।

सुनकर बहुत अच्छा लगा। सिक्किम के लोग भारत में मिलकर बहुत खुश हैं। जब सिक्किम स्वतंत्र रजवाड़ा था तब टूरिस्ट उद्योग इतना नहीं फला-फूला था। हर एक सिक्किमी भारतीय आबोहवा में इस कदर घुलमिल गया है कि लगता ही नहीं, कभी सिक्किम भारत में नहीं था।

जीप में बैठने को हुए कि एक पहाड़ी कुत्ते ने रास्ता काट दिया। मणि ने बताया, ”ये पहाड़ी कुत्ते हैं। ये भौंकते नहीं हैं। ये स़िर्फ चाँदनी रात में ही भौंकते है।”

”क्या? ” विस्मय और अविश्वास से मैं उसे सुनती रही। क्या समुद्र की तरह कुत्तों पर भी पूर्णिमा की चाँदनी कामनाओं का ज्वार-भाटा जगाती है! खैर…।

लौटती यात्रा मे जीप में भी जितेन हमें रकम-रकम की जानकारियाँ देता रहा ” मैंडम, यहाँ एक पत्थर है जिस पर गुरूनानक के फुट प्रिंट हैं। कहते हैं यहाँ गुरूनानक की थाली से थोड़े से चावल छिटक कर बाहर गिरे थें। जिस जगह चावल छिटक कर गिरे थे, वहाँ चावल की खेती होती है।”

करीब तीन-चार किलोमीटर बाद ही उसने फिर उँगली दिखाई, ”मैडम इसे खेदूम कहते हैं। यह पूरा लगभग एक किलोमीटर का एरिया है। यहाँ देवी-देवताओं का निवास है, यहाँ जो गंदगी फैलाएगा, वह मर जाएगा।”

”तुम लोग वहाड़ों पर गंदगी नहीं फेलाते…. ? ”

उसने जीप निकालते हुए कहा-”नहीं मैडम, पहाड़, नदी, झरने…. . हम इनकी पूजा करते हैं, इन्हें गंदा करेंगे तो हम मर जाएँगे।”

”तभी गैंगटॉक इतना सुंदर है”, मैंन कहा।

”गैंगटॉक नहीं मैडम गंतोक कहिए। इसका असली नाम गंतोक है। गंतोक का मतलब पहाड़…. ।”

मैं कुछ पूछती कि वह फिर चाले हो गया, ”मैडम यूमथांग भी पहले टूरिस्ट स्पॉट नहीं था। यह तो सिक्किम जब भारत में मिला उसके भी कई वर्षो बाद भारतीय आर्मी के कप्तान शेखर दत्ता के दिमाग में आया कि यहाँ सिर्फ़ फ़ौजियों को रखकर क्या होगा, घाटियों के बीच रास्ते निकालकर इसे टूरिस्ट स्पॉट बनाया जा सकता है। आप देखिए, अभी भी रास्ते बन रहे हैं।”

’हाँ, रास्ते अभी भी बन रहे हैं। नए-नए स्थानों की खोज अभी भी जारी है। शायद मनुष्य की इसी असमाप्त खोज का नाम सौंदर्य है’…. मन-ही-मन मैं कहती हूँ।

जीप आगे बढ़ने लगती है।

Question number: 350 (1 of 15 Based on Passage) Show Passage

» कृतिका (Kritika-Textbook) » Prose » साना-साना हाथ जोड़ि

Essay Question▾

Describe in Detail

इस यात्रा-वृतांत में लेखिका ने हिमालय के जिन-जिन रूपों का चित्र खींचा है, उन्हें अपने शब्दों में लिखिए।

Explanation

इस यात्रा-वृतवांत में लेखिका ने हिमालय को फूलों के बाग के रूप में, उसके विराट रूप में, दर्शको, यात्रियों और तीर्थटानियों का काम्य के रूप में, नगपति के रूप में, गगनचुंबी के रूप में, जन्नत के रूप, काला कंबल के रूप में इतना सब कुछ होने के बाद अब लेखिका… (31 more words) …

Question number: 351 (2 of 15 Based on Passage) Show Passage

» कृतिका (Kritika-Textbook) » Prose » साना-साना हाथ जोड़ि

Essay Question▾

Describe in Detail

प्रकृति ने जल संचय की व्यवस्था किस प्रकार की है?

Explanation

रकृति ने जल संचय की व्यवस्था इस प्रकार की है कि सर्दियों में बर्फ़ के रूप में जल संग्रह कर लेती है और गर्मियों में पानी के लिए जब त्राहि-त्राहि मचती है तो ये ही बर्फ़ शिलाएँ पिघल-पिघल जलधारा बन हमारे सूखे कंठो को तरावट पहुँचाती हैं।

क्योंकि-इस यात्रा-वृतांत में… (19 more words) …

Question number: 352 (3 of 15 Based on Passage) Show Passage

» कृतिका (Kritika-Textbook) » Prose » साना-साना हाथ जोड़ि

Essay Question▾

Describe in Detail

प्रदूषण के कारण स्नोफॉल में कमी का जिक्र किया गया है? प्रदूषण के और कौन-कौन से दुष्परिणाम सामने आए हैं, लिखें।

Explanation

प्रदूषण के कारण पल-पल भर में ब्रह्यांड में कितना कुछ परिवतर्तित हो रहा है। इसके साथ हमारी पीढ़ी ने पेड़, पौधे पशु और आदमियों सब को नुकसान पहुंचाया है।

क्योंकि - लोगों दव्ारा प्रकृति को नुकसान पहुँचने से बहुत सारे दुष्परिणा सामने आए हैं जैसे छायादार पेड़ न होना, हयािली… (3 more words) …

Question number: 353 (4 of 15 Based on Passage) Show Passage

» कृतिका (Kritika-Textbook) » Prose » साना-साना हाथ जोड़ि

Essay Question▾

Describe in Detail

सैलानियों को प्रकृति की अलौकिक छटा का अनुभव करवाने में किन-किन लोगों का योगदान होता है, उल्लेख करें।

Explanation

सैलानियों को प्रकृति की अलौकिक छटा का अनुभव करवाने में वहां के गाइड जतिन, वहां की जनता, वहां की प्रकति सौंद्रर्य, वहां की फौज छावनियां के लोगों का योगदान होता है।

क्योंकि-ऐसे अनोखे दृश्य देखने में काफी लोगों का योगदान होता हैं।

Question number: 354 (5 of 15 Based on Passage) Show Passage

» कृतिका (Kritika-Textbook) » Prose » साना-साना हाथ जोड़ि

Short Answer Question▾

Write in Short

झिलमिलाते सितारों की रोशनी में नहाया गंतोक लेखिका को किस तरह सम्मोहित कर रहा था?

Question number: 355 (6 of 15 Based on Passage) Show Passage

» कृतिका (Kritika-Textbook) » Prose » साना-साना हाथ जोड़ि

Essay Question▾

Describe in Detail

’कटाओ’ पर किसी भी दुकान का न होना उसके लिए वरदान है। इस कथन के पक्ष में अपनी राय व्यक्त कीजिए?

Explanation

कटाओ’ पर किसी भी दुकान का न होना उसके लिए वरदान है। क्योंकि यह टूरिस्ट स्पॉट नहीं बनने के कारण सुर्खियों में नहीं आया था और इससे वह अपने प्राकृतिक स्वरूप में था। इससे वहां किसी प्रकार का कोई प्रदूषण भी नहीं था। यहां प्रकृति का स्वरूप अच्छा होने से… (25 more words) …

Question number: 356 (7 of 15 Based on Passage) Show Passage

» कृतिका (Kritika-Textbook) » Prose » साना-साना हाथ जोड़ि

Essay Question▾

Describe in Detail

जितेन नार्गे ने लेखिका को सिक्किम की प्रकृति, वहाँ की भौगोलिक स्थिति एवं जनजीवन के बारे में क्या महत्वपूर्ण जानकारियाँ दीं, लिखिए।

Explanation

जितेन ने पूर्वोत्तर भारत के सिक्किम राज्य की राजधानी गंतोक और उसके आगे हिमालय की यात्रा में बताया है कि हिमालय के अनंत सौंदर्य का ऐसा अद्भुत और काव्यात्मक की जानकारी दी। सिक्किम की प्रकृति में जेतन ने बातया कि ये घाटियां फूलों से इस कदर भर जाएगी कि लगेगा… (193 more words) …

Question number: 357 (8 of 15 Based on Passage) Show Passage

» कृतिका (Kritika-Textbook) » Prose » साना-साना हाथ जोड़ि

Essay Question▾

Describe in Detail

कभी श्वेत तो कभी रंगीन पताकाओं का फहराना किन अलग-अलग अवसरों की ओर संकेत करता है?

Explanation

श्वेत पताकाएं किसी बुद्धिस्ट की मृत्यु होने पर उसके आत्मा की शांति के लिए फहराई जाती है। एवं रंगीन पताकाएं किसी नए कार्य की शुरूआत के लिए फहराई जाती है। इसलिए यह अलग-अलग अवसरों की ओर संकेत करता है।

क्योंकि-कभी कोई वस्तु किसी का प्रतीक होती हैं। जैसे भारत का… (8 more words) …

Question number: 358 (9 of 15 Based on Passage) Show Passage

» कृतिका (Kritika-Textbook) » Prose » साना-साना हाथ जोड़ि

Essay Question▾

Describe in Detail

आज की पीढ़ी दव्ारा प्रकृति के साथ किस तरह का खिलवाड़ किया जा रहा है। इसे रोकने में आपकी क्या भूमिका होनी चाहिए?

Explanation

आज की पीढ़ी दव्ारा प्रकृति के साथ इस तरह का खिलवाड़ किया जा रहा है।कि हमने प्रकृति की इस लय, ताल, और गति से खिलवाड़ कर अक्षम्य किया है लेकिन अभी भी समय है हम कुछ करके अपनी इस प्रकृति को बचा सकते है। क्योंकि यह प्रकृति हमारी धरोहर है… (70 more words) …

Question number: 359 (10 of 15 Based on Passage) Show Passage

» कृतिका (Kritika-Textbook) » Prose » साना-साना हाथ जोड़ि

Essay Question▾

Describe in Detail

लोंग स्टॉक में घूमते हुए चक्र को देखकर लेखिका को पूरे भारत की आत्मा एक-सी क्यों दिखाई दी?

Explanation

लोंग स्टॉक में घूमते हुए चक्र को देखकर लेखिका को पूरे भारत की आत्मा एक-सी इसलिए दिखाई दी क्योंकि यह एक धर्म चक्र था प्रेयर व्हील इसको घुमाने से सारे पाप धुल जाते है। साथ ही मैदान हो या पहाड़ हो, तमाम वैज्ञानिक प्रगतियों के बावजूद इस देश में लोगो… (41 more words) …

Sign In