कृतिका (Kritika-Textbook)-Prose (CBSE Class-10 Hindi): Questions 289 - 306 of 461

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Passage

जापान जाने का अवसर मिला, तब हिरोशिमा गया और वहाँ के अस्पताल भी देखा जहाँ रेडियम-पदार्थ से आहत लोग वर्षों से कष्ट पा रहे थे। इस प्रकार प्रत्यक्ष अनुभव भी हुआ-पर अनुभव से अनुभूति गहरी चीज़ है, कम-से-कम कृतिकार के लिए। अनुभव तो घटित का होता है, पर अनुभूति संवदेना और कल्पना के सहारे उस सत्य को आत्मसात्‌ कर लेती है जो वास्तव में कृतिकार के साथ घटित नहीं हुआ है। जो आँखों के सामने नहीं आया, जो घटित के अनुभव में नहीं आया, वही आत्मा के सामने ज्वलं प्रकाश में आ जाता है, तब वह अनुभूति-प्रत्यक्ष हो जाता है।

Question number: 289 (5 of 5 Based on Passage) Show Passage

» कृतिका (Kritika-Textbook) » Prose » मैं क्यों लिखता हूँ?

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लेखक ने अनुभव व अनुभूति से ज्यादा किसे अधिक महत्व दिया है?

Passage

सब अखबारों ने खबरें छापी कि जॉर्ज पंचम की नाक लगाई गई है…. यानी ऐसी नाक जो कतई पत्थर की नहीं लगती।

लेकिन उस दिन के अखबारों में एक बात गौर करने की थी। उस दिन देश में कहीं भी किसी उद्घाटन की खबर नहीं थी। किसी ने कोई फीता नहीं काटा था। कोई सार्वजनिक सभा नहीं हुई थी। कहीं भी किसी का अभिनंदन नहीं हुआ था, कोई मानपत्र भेंट करने की नौबत नहीं आई थी। किसी हवाई अडडे या स्टेशन पर स्वागत-समारोह नहीं हुआ था। किसी का ताज़ा चित्र नहीं छपा गया था। सब अखबार खाली थे। पता नहीं ऐसा क्यों हुआ था? नाक तो सिर्फ़ एक चाहिए थी वह भी बुत के लिए।

Question number: 290 (1 of 2 Based on Passage) Show Passage

» कृतिका (Kritika-Textbook) » Prose » जॉर्ज पंचम की नाक

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Describe in Detail

अखबार में ऐसी क्या बात थी जो गौर करने लायक थी?

Explanation

अखबार में गौर करने वाली बात यह थी कि उस उस दिन देश में कहीं भी किसी उद्घाटन, फीता काटना, कोई सार्वजनिक सभा, किसी का अभिनंदन, कोई मानपत्र भेंट करने की नौबत, हवाई अडडे या स्टेशन पर स्वागत समारोह या फिर किसी का ताज़ा चित्र नहीं छपा गया था। सब… (28 more words) …

Question number: 291 (2 of 2 Based on Passage) Show Passage

» कृतिका (Kritika-Textbook) » Prose » जॉर्ज पंचम की नाक

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अंत में अखबार वालों ने क्या खबर छापी थी?

Passage

उसका चणक-चर्वण-पर्व अभी समाप्त न हो पाया था कि किसी ने बाहर बंद दरवाजे की कुंडी खटखटाई। दुलारी ने जल्दी-जल्दी कच्छ खोलकर बाकायदे धोती पहनी, केश समेटकर करीने से बाँध लिए और दरवाजे की खिड़की खोल दी।

बगल में बंडल-सी कोई चीज़ दबाए दरवाजे के बाहर की टुन्नू खड़ा था। उसकी दृष्टि शर्मीली थी और उसके पतले होठों पर झेंप-भरी फीकी मुसकराहट थी। विलोल (चंचल, अस्थिर) आँखे टुन्नू की आँखों से मिलाती हुई दुलारी बोली, ”तुम फिर यहाँ, टुन्नू? मैंने तुम्हें यहाँ आने के लिए मना किया था न? ”

Question number: 292 (1 of 7 Based on Passage) Show Passage

» कृतिका (Kritika-Textbook) » Prose » एही ठैयाँ झुलती हेरानी हो रामा!

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बंडल में क्या था?

Question number: 293 (2 of 7 Based on Passage) Show Passage

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ख द्दर की एक साड़ी कहाँं की बनी हुई थी?

Question number: 294 (3 of 7 Based on Passage) Show Passage

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दरवाजे में कौन खड़ा था?

Question number: 295 (4 of 7 Based on Passage) Show Passage

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दुलारी की दृष्टि कैसी थी?

Question number: 296 (5 of 7 Based on Passage) Show Passage

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टुन्नू ने क्या उत्तर दिया?

Question number: 297 (6 of 7 Based on Passage) Show Passage

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दुलारी टुन्नू से क्या बोली?

Question number: 298 (7 of 7 Based on Passage) Show Passage

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बगल सें टुन्नू ने क्या निकाला था?

Passage

जीवन की अनंतता का प्रतीक वह झरना…. इन अद्भूत-अनूठे क्षणों में मुसमें जीवन की शक्ति का ऐहसास हो रहा था। इस कदर प्रतीत हुआ कि जैसे मैं स्वयं भी देश और काल की सरहदों (सीमा) से दूर बहती धारा बन बहने लगी हूँ। भीतर ही भीतर सारी तामसिकताएँ (तमोगुण से युक्त, कुटिल) और दुष्ट वासनाएँ (बुरी इच्छाएँ) इस निर्मल धारा में बह गईं। मन हुआ कि अनंत समय तक ऐसी ही बहती रही सुनती रहूँ…. सुनती रहूँ इस झरने की पुकार को। पर जितेन मुझे ठेलने लगा…… आगे इससे भी सुंदर नज़ारे मिलेंगे।

अनमनी-सी मैं उठी। थोड़ी देर बाद फिर वही नज़ारे-आँखों और आत्मा को सुख देने वाले। कहीं चटक हरे रंग का मोटा कालीन ओढ़े तो कहीं हलका पीलापन लिए, तो कहीं पलस्तर उखड़ी दीवार की तरह पथरीला और देखते ही देखते परिदृश्य से सब छू-मंतर…. जैसे किसी ने जादू की छड़ी घूमा दी हो। सब पर बादलों की एक मोटी चादर। सब कुछ बादलमय।

Question number: 299 (1 of 2 Based on Passage) Show Passage

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झरने को छू कर लेखिका को क्या ऐहसास हो रहा था?

Question number: 300 (2 of 2 Based on Passage) Show Passage

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लेखिका को सब कुछ जादू सा क्या लग रहा था?

Passage

हम सभी सैलानी अब जीप से उतर कर बर्फ़ पर कूदने लगे थे। यहाँ बर्फ़ सर्वाधिक थी। घुटनों तक नरम-नरम बर्फ़। ऊपर आसमान और बर्फ़ से ढके पहाड़ एक हो रहे थे। कई सैलानी बर्फ़ पर लेटकर हर लम्हे की रंगत को कैमरे में कैद करने लगे थे।

मेरे पाँव झन-झान करने लगे थे। पर मन वृंदावन हो रहा था। भीतर जैसे देवता जाग गए थे। ख्वाहिश हुई कि मैं भी बर्फ़ पर लेटकर इस बर्फ़ीली जन्नत को जी भर देखूँ। पर मेरे पास बर्फ़ पर पहनने वाले लंबे-लंबे जूते नहीं थे। मैंने चाहा कि किराए पर ले लूँ पर कटाओ, यूमथांग और झांगू लेक की तरह टूरिस्ट स्पॉट (भ्रमण -स्थल) नहीं था, इस कारण यहाँ झांगू की तरह दुनिया भर की क्या एक भी दुकान नहीं थी। खैर….

Question number: 301 (1 of 3 Based on Passage) Show Passage

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सैलानी बर्फ़ पर क्या कर रहे थे?

Question number: 302 (2 of 3 Based on Passage) Show Passage

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ऐसे दृश्य देखकर लेखिका का मन क्या करने को हो रहा था?

Question number: 303 (3 of 3 Based on Passage) Show Passage

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लेखिका की बर्फ़ में न जाने की परेशानी क्या थी?

Passage

उम्मीद, आवेश, उत्तेजना के साथ अब हमारा सफ़र कटाओ की ओर। कटाओ का रास्ता और खतरनाक था और उस पर धुंध और बारिश। जितेन लगभग अंदाज से गाड़ी चला रहा था। पहाड़, पेड़, आकाश, घाटियाँ सब पर बादलों की परत। सब कुछ बादलमय। बादल को चीरकर निकलती हमारी जीप। खतरनाक रास्तों के अहसास ने हमें मौन कर दिया था। और उस बारिश। एक चूक और सब खलास…. साँस रोके हम धुंध और फिसलन भरे रास्ते पर सँभल-सँभलकर आगे बढ़ती जीप को देख रहे थे। हमारी साँस लेने की आवाजों के सिवाय आस-पास जीवन का कोई पता नही ंथा। फिर नज़र पड़ी बड़े-बड़े शब्दों में लिखी एक चेतावनी पर…. ’इफ यू आर मैरिड, डाइवोर्स स्पीड’। थोड़ी ही दूर आगे बढ़े कि फिर एक चेतावनी-’दुर्घटना से देर भली, सावधानी से मौत टली’।

Question number: 304 (1 of 3 Based on Passage) Show Passage

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फिर आगे कौनसी चेतावनी लिखी हुई थी?

Question number: 305 (2 of 3 Based on Passage) Show Passage

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कटाओं का सफर कैसे शुरू हुआ?

Question number: 306 (3 of 3 Based on Passage) Show Passage

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कटाओं का रास्ता कैसा था?

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