कृतिका (Kritika-Textbook)-Prose (CBSE Class-10 Hindi): Questions 144 - 158 of 461

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Passage

मैं क्यों लिखता हूँ? यह प्रश्न बड़ा सरल जान पड़ता है। पर बड़ा कठिन भी है। क्योंकि इसका सच्चा उत्तर लेखक के आंतरिक जीवन के स्तरों से संबंध रखता है। उन सबको संक्षेप में कुछ वाक्यों को बाँध देना आसान तो नहीं ही हैं, न जाने संभव भी है या नहीं? इतना ही किया जा सकता है कि उनमें से कुछ का स्पर्श किया जाए-विशेष रूप से ऐसों का जिन्हें जानना दूसरों के लिए उपयोगी हो सकता है। एक उत्तर तो यह है कि मैं इसलिए लिखता हूँ कि वह स्वयं जानना चाहता है कि क्यों लिखता हूँ- लिखे बिना इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिल सकता है। वास्तव में सच्चा उत्तर यही है। लिखकर ही लेखक उस आभ्यंतर (भीतरी का, अंदरुनी) विवशता को पहचानता है जिसके कारण उसने लिखा-और लिखकर ही वह उससे मुक्त हो जाता है। मैं भी आंतरिक विवशता से मुक्ति पाने के लिए, तटस्थ होकर उसे देखने और पहचान लेने के लिए लिखता हूँ। मेरा विश्वास है कि सभी कृतिकार-क्योंकि सभी लेखक कृतिकार नहीं होते; न उनका सब लेखन ही कृति होता है-सभी कृतिकार इसलिए लिखते हैं। यह ठीक है कि कुछ ख्याति मिल जाने के बाद कुछ बाहर की विवशता से भी लिखा जाता है- संपादकों के आग्रह से, प्रकाशक के तकाजे से, आर्थिक आवश्यकता से। पर एक तो कृतिकार हमेशा अपने सम्मुख ईमानदारी से यह भेद बनाए रखता है कि कौन-सी कृति भीतरी प्रेरणा का फल है, कौन-सा लेखन बाहरी दबाव का, दूसरे यह भी होता है कि बाहर का दबाव वास्तव में दबाव नहीं रहता, वह मानो भीतरी उन्मेष (प्रकाश, दीप्ि त) का निमित्ति (कारण) बन जाता है।

यहाँ पर कृतिकार के स्वभाव और आत्मानुशासन का महत्व बहुत होता हे। कुछ आलसी जीव होते हैं कि बिना इस बाहरी दबाव के लिख ही नहीं पाते-इसी के सहारे उनके भीतर की विवशता स्पष्ट होती है- यह कुछ वैसा ही है जैसे प्रात: काल की नींद खुल जाने पर कोई बिछौने पर तब तक पड़ा रहे जब तक घड़ी का एलार्म न बज जाए। इस प्रकार वास्तव में कृतिकार बाहर के दबाव के प्रति समर्पित नहीं हो जाता है, उसे केवल एक सहायक यंत्र (एलार्म घड़ी) की तरह काम मे लाता है जिससे भौतिक यथार्थ के साथ उसका संबंध बना रहे। मुझे इस सहारे की ज़रूरत नहीं पड़ती लेकिन कभी उससे बाधा भी नहीं होती। उठने वाली तुलना को बनाए रखूँ तो कहूँ कि सबेरे उठ जाता हूँ अपने आप ही, पर अलार्म भी बज जाए तो कोई हानि नहीं मानता।

यह भीतरी विवशता क्या होती है? इसे बखानना बड़ा कठिन है। क्या वह नहीं होती यह बताना शायद कम कठिन होता है। या उसका उदाहरण दिया जा सकता है-कदाचित्‌ वही अधिक उपयोगी होगा। अपनी एक कविता की कुछ चर्चा करूँ जिससे मेरी बात स्पष्ट हो जाएगी।

मैं विज्ञान का विद्यार्थी रहा हूँ, मेरी नियमित शिक्षा उसी विषय में हुई। अणु क्या होता है, कैसे हम रेडियम-धर्मी तत्त्वों का अध्ययन करते हुए विज्ञान की उस सीढ़ी तक पहुँचे जहाँ अणु का भेदन संभव हुआ, रेडियम-धर्मिता के क्या प्रभाव होते हैं- इन सबका पुस्तकीय या सैद्धांतिक ज्ञान तो मुझेे था। फिर जब अणु-बम हिरोशिमा में गिरा, तब उसके समाचार मैंने पढ़े; और उसके परवर्ती प्रभावों का भी विवरण पढ़ता रहा। इस प्रकार उसके प्रभावों का ऐतिहासिक, प्रमाण भी सामने आ गया। विज्ञान के इस दुरुप्रयोग के प्रति बुद्धि का विद्रोह स्वाभाविक था, मैंने लेख आदि में कुछ लिखा भी पर अनुभूति के स्तर पर जो विवशता होती है वह बौद्धिक पकड़ से आगे की बात है उसकी तर्क संगति भी अपनी अलग होती है। इसलिए कविता मैंने इस विषय में नहीं लिखी। यों युद्धकाल में भारत की पूर्वीय सामा पर देखा था कि कैसे सैनिक ब्रह्यपुत्र में बम फेंक कर हजारों मछलियाँ मार देते थे। जबकि उन्हें आवश्यकता थोड़ी-सी होती थी, जीव के इस अपव्यय से जो व्यथा भीतर उमड़ी थी, उससे एक सीमा तक अणु-बम दव्ारा व्यर्थ जीव-नाश का अनुभव तो कर ही सका था।

जापान जाने का अवसर मिला, तब हिरोशिमा गया और वहाँ के अस्पताल भी देखा जहाँ रेडियम-पदार्थ से आहत लोग वर्षों से कष्ट पा रहे थे। इस प्रकार प्रत्यक्ष अनुभव भी हुआ-पर अनुभव से अनुभूति गहरी चीज़ है, कम-से-कम कृतिकार के लिए। अनुभव तो घटित का होता है, पर अनुभूति संवदेना और कल्पना के सहारे उस सत्य को आत्मसात्‌ कर लेती है जो वास्तव में कृतिकार के साथ घटित नहीं हुआ है। जो आँखों के सामने नहीं आया, जो घटित के अनुभव में नहीं आया, वही आत्मा के सामने ज्वलं प्रकाश में आ जाता है, तब वह अनुभूति-प्रत्यक्ष हो जाता है।

तो हिरोशिमा में सब देखकर भी तत्काल कुछ लिखा नहीं, क्योंकि इसी प्रत्यक्ष अनुभूति की कसर थी। फिर एक दिन वहीं सड़क पर घूमते हुए देखा कि एक जले हुए पत्थर पर एक लंबी उजली छाया है-विस्फोट के समय वहाँ कोई खड़ा रहा होगा और विस्फोट से बिखरे हुए रेडियम-धर्मी पदार्थ की किरणें उसमें रुद्ध (बंद हो गई, फँस गई) हो गई होंगी। जो आस-पास से आगे बढ़ गई उन्होंने पत्थर को झुलसा दिया, जो उस व्यक्ति पर अटकीं उन्होंने उसे भाप बनाकर उड़ा दिया होगा। इस प्रकार सूमूची ट्रेजडी जैसे पत्थर पर लिखी गई।

उस छाया को देखकर जैसे एक थप्पड़-सा लगा। अवाक्‌ इतिहास जैसे भीतर कहीं सहसा एक जलते हुए सूर्य-सा उग आया और डूब गया। मैं कहूँ कि उस क्षण में अणु-विस्फोट मेरे अनुभूति-प्रत्यक्ष में आ गया- एक अर्थ में मैं स्वयं हिरोशिमा के विस्फोट का भोक्ता बन गया।

इसी में से वह विवशता जागी। भीतर की आकुलता बुद्धि के क्षेत्र से बढ़कर संवेदना के क्षेत्र में आ गई…. फिर धीरे-धीरे मैं उससे अपने को अलग कर सका और अचानक एक दिन मैंने हिरोशिमा पर कविता लिखी-जापान में नहीं, भारत लौटकर, रेलगाड़ी में बैठे-बैठे।

यह कविता अच्छी है या बुरी; इससे मुझे मतलब नहीं है। मेरे निकट वह सच है, क्योंकि वह अनुभूति-प्रसूत (उत्पन्न) है, यही मेरे निकट महत्त्व की बात है।

सन्‌ 1959 में प्रकाशित अरी ओ करुणा प्रभामय काव्य-संग्रह में संकलित अज्ञेय की हिरोशिमा कविता यहाँ दी जा रही है-

हिरोशिमा

एक दिन सहसा

सूरज निकला

अरे क्षितिज पर नहीं,

नगर के चौक:

धूप बरसी

पर अंतरिक्ष से नहीं,

फटी मिट्‌टी से।

छायाएँ मानव-जन की

दिशाहीन

सब ओर पड़ीं-वह सूरज

नहीं उगा था पूरब में, वह

बरसा सहसा

बीचों-बीच नगर के:

काल-सूर्य के रथ के

पहियों के ज्यों अरे टूट कर

बिखर गए हों

दसों दिशा में।

कुछ क्षण का वह उदय-अस्त!

केवल एक प्रज्वलित क्षण की

दृश्य सोख लेने वाली दोपहरी।

फिर?

छायाएँ मानव-जन की

नहीं मिटीं लंबी हो-हो कर:

मानव ही सब भाप होए।

छायाएँ तो अभी लिखी हैं

झलसे हुए पत्थरों पर

उजड़ी सड़कों की गच पर।

मानव का रचा हुआ सूरज

मानव को भाप बनाकर सोख गया।

पत्थर पर लिखी हुई यह

जली हुई छाया

मानव की साखी है।

Question number: 144 (8 of 11 Based on Passage) Show Passage

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एक संवेदनशील युवा नागरिक की हैसियत से विज्ञान का दुरुपयोग रोकने में आपकी क्या भुमिका है?

Explanation

इस विज्ञान के दुरुपयोग को रोकने हमारी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होनी चाहिए। हम मानते है कि आज विज्ञान से ही हर कार्य संभव हो पाया है इसी के माध्यम से लोग अंतरिक्ष तक पहुँच गए है। आज हर व्यक्ति की जरूरत का सामान विज्ञान की देन से ही आया है।… (110 more words) …

Question number: 145 (9 of 11 Based on Passage) Show Passage

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कुछ रचनाकारों के लिए आत्मानुभूति/स्वंय के अनुभव के साथ-साथ बाह्य दबाव भी महत्तवपूर्ण होता है। ये बाह्य दबाव कौन-कौन से हो सकते हैं?

Explanation

एक तो कृतिकार हमेशा अपने सम्मुख ईमानदारी से यह भेद बनाए रखता है कि कौ-सी कृति भीतरी प्रेरणा का फल है, कौन-सा लेखन बाहरी दबाव का, दूसरे यह भी होता है कि बाहर का दबाव वास्तव में नहीं रहता है, वह मानो भीतरी उन्मेष (प्रकाश, दीप्ति) का निमित्ति (कारण) बन… (96 more words) …

Question number: 146 (10 of 11 Based on Passage) Show Passage

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हिरोशिमा पर लिखी कविता के अंत: व बाह्य दोनों दबाव का परिणाम है यह आप कैसे कह सकते हैं?

Explanation

यह दोनों दबाव का परिणाम इस प्रकार है कि लेखक ने स्वयं हिरोशिमा जाकर उन दृश्यों को पहले बाहर से देखा कि किस तरह बम विस्फोट से एक व्यक्ति की छाया पत्थर पर झुलस गई। अर्थात यह बम मानव का रचा हुआ सूरज ही था जो मानव को भाप बनाकर… (58 more words) …

Question number: 147 (11 of 11 Based on Passage) Show Passage

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हिरोशिमा की घटना विज्ञान का भयानकतम दुरुप्रयोग है। आपकी दृष्टि में विज्ञान का दुरुप्रयोग कहाँ-कहाँ और किस तरह से हो रहा है।

Explanation

आज के युग में विज्ञान का प्रयोग कम दुरुप्रयोग अधिक हो रहा है क्योंकि एक तरफ जहां विज्ञान वरदान बनकर आई वहीं इसके गलत उपयोग से हर जगह लोगों का नुकसान ही हुआ है। उदाहरण के तौर अब हर जगह कारखाने लगने लगे है लेकिन जो उनसे निकलने वाला खतरनाक… (95 more words) …

Passage

मैं विज्ञान का विद्यार्थी रहा हूँ, मेरी नियमित शिक्षा उसी विषय में हुई। अणु क्या होता है, कैसे हम रेडियम-धर्मी तत्त्वों का अध्ययन करते हुए विज्ञान की उस सीढ़ी तक पहुँचे जहाँ अणु का भेदन संभव हुआ, रेडियम-धर्मिता के क्या प्रभाव होते हैं- इन सबका पुस्तकीय या सैद्धांतिक ज्ञान तो मुझेे था। फिर जब अणु-बम हिरोशिमा में गिरा, तब उसके समाचार मैंने पढ़े; और उसके परवर्ती प्रभावों का भी विवरण पढ़ता रहा। इस प्रकार उसके प्रभावों का ऐतिहासिक, प्रमाण भी सामने आ गया। विज्ञान के इस दुरुप्रयोग के प्रति बुद्धि का विद्रोह स्वाभाविक था, मैंने लेख आदि में कुछ लिखा भी पर अनुभूति के स्तर पर जो विवशता होती है वह बौद्धिक पकड़ से आगे की बात है उसकी तर्क संगति भी अपनी अलग होती है। इसलिए कविता मैंने इस विषय में नहीं लिखी। यों युद्धकाल में भारत की पूर्वीय सामा पर देखा था कि कैसे सैनिक ब्रह्यपुत्र में बम फेंक कर हजारों मछलियाँ मार देते थे। जबकि उन्हें आवश्यकता थोड़ी-सी होती थी, जीव के इस अपव्यय से जो व्यथा भीतर उमड़ी थी, उससे एक सीमा तक अणु-बम दव्ारा व्यर्थ जीव-नाश का अनुभव तो कर ही सका था।

Question number: 148 (1 of 5 Based on Passage) Show Passage

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अणु-बम कहाँ गिरा था?

Question number: 149 (2 of 5 Based on Passage) Show Passage

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सैनिकों ने बम कहाँ फेंके थे?

Question number: 150 (3 of 5 Based on Passage) Show Passage

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ब्रह्यपुत्र में कौन मारा गया था?

Question number: 151 (4 of 5 Based on Passage) Show Passage

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किसका पुस्तकीय या सैद्धांतिक ज्ञान लेखक को था?

Question number: 152 (5 of 5 Based on Passage) Show Passage

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लेखक किस विषय का विद्यार्थी है?

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रानी आए और नाक न हो! एकाएक परेशानी बढ़ी। बड़ी सरगरमी शुरु हुई। देश के खैरख्वाहों (भलाई चाहने वाले) की एक मीटिंग बुलाई गई और मसला पेश किया गया कि क्या किया जाए? वहाँ सभी सहमत थे अगर यह नाक नहीं है तो हमारी भी नाक नहीं रह जाएगी…….

Question number: 153 (1 of 4 Based on Passage) Show Passage

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मीटिंग में सब किस बात से सहमत थे?

Question number: 154 (2 of 4 Based on Passage) Show Passage

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मीटिंग में क्या तय किया गया था?

Question number: 155 (3 of 4 Based on Passage) Show Passage

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देश में किसकी मीटिंग बुलाई गई थी?

Question number: 156 (4 of 4 Based on Passage) Show Passage

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परेशानी क्या बढ़ गई थी?

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सूरज ढलने लगा था। हमने देखा कुछ पहाड़ी औरतें गायों को चराकर वापस लौट रही थीं। कुछ के सिर पर लकड़ियों के भारी-भरकम गठ्ठर थे। ऊपर आसमान फिर धुंध और बादलों से घिरा हुआ था। उतरती संध्या में जीप चाय के बगानों से गुज़र रही थीं कि फिर एक दृश्य ने मुझे खींचा…. नीचे चाय के हरे-भरे बगानों में कई युवतियाँ बोकू पहने (सिक्किमी परिधान) चाय की पत्तियाँ तोड़ रही थीं। नदी की तरह उफ़ान लेता उनका यौवन और श्रम से दमकता गुलाबी चेहरा। एक युवती ने चटक लाल रंग का बोकु पहन रखा था। सघन हरियाली के बीच चटक लाल रंग डूबते सूरज की स्वर्णिम और सात्विक आभा में कुछ इस कदर इंद्रधनुषी छटा बिखेर रहा था कि मंत्रमुग्ध-सी मैं चीख पड़ी थी! …. इतना अधिक सौंदर्य मेंरे लिए असह्‌य था।

यूमथांग पहुँचने के लिए हमें लायुंग में पड़ाव लेना था। गगनचुंबी पहाड़ों के तल में साँस लेती एक नन्हीं-सी शांत बस्ती लायुंग। सारी दौड़धूप से दूर ज़िंदगी जहाँ निश्चित सो रही थी।

Question number: 157 (1 of 5 Based on Passage) Show Passage

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बोकू क्या होता है?

Question number: 158 (2 of 5 Based on Passage) Show Passage

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संध्या में जीप कहाँं से गुजर रही थी?

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