कृतिका (Kritika-Textbook) (CBSE Class-10 Hindi): Questions 445 - 461 of 461

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Passage

सुबह हमें यूमथांग के लिए निकल पड़ना था, पर आँख खुलते ही मैं बालकनी की तरफ़ भगी। यहाँ के लोगों ने बताया था कि मौसम साफ़ हो तो बालकनी से भी कंचनजंघा दिखाई देती है। हिमालय की तीसरी सबसे बड़ी चोटी कंचनजंघा है! पर मौसम अच्छा होने के बावजूद आसमान हलके-हलके बादलों से ढका था, पिछले वर्ष की ही तरह इस बार भी बादलों के कपाट ठाकुर जी के कपाट की तरह बंद ही रहे। कंचनजंघा न दिखनी थी, न दिखी। पर सामने ही रकम-रकम (तरह-तरह) के रंग-बिरंगे इतने सारे फूल दिखाई दिये। ऐसा लगा मानों फूलों के बाग में आ गई हूँ।

Question number: 445 (3 of 5 Based on Passage) Show Passage

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लेखिका के अनुसार कंचनजंघा कहाँं से दिखाई पड़ती है?

Question number: 446 (4 of 5 Based on Passage) Show Passage

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लेखिका को सामने क्या दिखाई दिया व लेखिका को कैसा लगा?

Question number: 447 (5 of 5 Based on Passage) Show Passage

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सुबह लेखिका को कहांँ जाना था?

Passage

करीब आधे रास्ते बाद धुंध छँटी और साथ ही सृष्टि और हमारे बीच फैला सन्नाटा भी हटा। नार्गे उत्साहित होकर कहने लगा, ”कटाओ हिंदुस्तान का स्विट्‌जरलैंड है।” मेरी सहेली मणि स्विट्‌जरलैंड घूम आई थी, उसने तुरंत प्रतिवाद किया- ”नहीं स्विट्‌जरलैंड भी इतनी ऊँचाई पर नहीं है और न ही इतना सुंदर।”

हम कटाओ के करीब आ रहे थे क्योंकि दूर ही बर्फ़ से ढके पहाड़ दिखने लगे थे। पास में जो पर्वत थे वे आधे हरे-काले दिख रहे थे। लग रहा था जैसे किसी ने इन पहाड़ों पर पाउडर छिड़क दिया हो। कहीं पाउडर बची रह गई हो और कहीं वह धूप में बह गई हो। नार्गे ने उत्तेजित होकर कहा-”देखिए एकदम ताज़ा बर्फ़ है, लगता है रात में गिरी है यह बर्फ़।” थोड़ा और आगे बढ़ने पर अब हमें पूरी तरह बर्फ़ से ढके पहाड़ दिख रहे थे। साबुन के झाग की तरह सब ओर गिरी हुई बर्फ़। मैं जीप की खिड़की से मुंडी निकाल-निकाल दूर-दूर तक देख रही थी…. . चाँदी से चमकते पहाड़!

एकाएक जितेन ने पूछा, ”कैसा लग रहा है? ”

मैंने जवाब दिया-”राम रोछो” (अच्छा है)

Question number: 448 (1 of 4 Based on Passage) Show Passage

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नार्गे के उत्साहित पूर्वक कहने पर लेखिका की मित्र मणि ने क्या कहा?

Question number: 449 (2 of 4 Based on Passage) Show Passage

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कटाओ नामक स्थान में सेलानियों को क्या दिख रहा था?

Question number: 450 (3 of 4 Based on Passage) Show Passage

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लेखिका को पर्वत पर क्या दिख रहा था?

Question number: 451 (4 of 4 Based on Passage) Show Passage

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लेखिका क्या देख रही थी?

Passage

”मेरे नगपति मेरे विशाल”-मैंने हिमालय को सलामी देनी चाही कि तभी जीप एक जगह रुकी…. खूब ऊँचाई से पूरे वेग के साथ ऊपर शिखरों के भी शिखर से गिरता फेन उगलता झरना। इसका नाम था-’सेवन सिस्टर्स वॉटर फॉल’। फ्ल़ैश चमकने लगे। सभी सैलानी इन खूबसूरत लम्हों की रंगत को कैमरे में कैद करने में मशगूल (व्यस्त) थे।

आदिम युग की किसी अभिशप्त (शापित, अभियुक्त) राजकुमारी-सी मैं भी नीचे बिखरे भारी भरकम पत्थरों में बैठ झरने के संगीत के साथ ही आत्मा का संगीत सुनने लगी। थोड़ी देर बाद ही बहती जलधारा में पाँव डुबोया तो भीतर तक भीग गई। मन काव्यमय हो उठा। सत्य और सौन्दर्य को छूने लगा।

Question number: 452 (1 of 2 Based on Passage) Show Passage

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शिखरों के भी शिखर से गिरता फेन उगलता झरना इसका नाम क्या था?

Question number: 453 (2 of 2 Based on Passage) Show Passage

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लेखिका कौनसा संगीत सुनने लगी?

Passage

”लेकिन इसे तुम मेरे पास क्यों लाए हो? ” दुलारी ने कड़े स्वर से पूछा। टुन्नू की शीर्ण वदन (कुम्हलाया हुआ मुख या उदास मुख) और भी सुख गया। उसने सुखे गले से कहा, ”मैंने बताया न कि होली का त्योहार था।…. . ” टुन्नू की बात काटते हुए दुलारी चिल्लाई, ”होली का त्योहार था तो तुम यहाँ क्यों आए? जलने के लिए क्या तुम्हें कहीं और चिता नहीं मिली जो मेरे पास दौड़े चले आए? तुम मेरे मालिक हो या बेटे हो या भाई हो? कौन हो? खैरियत चाहते हो तो अपना यह कफ़न लेकर यहाँ से सीधे चले जाओ! ” और उसने उपेक्षापूर्वक धोती टुन्नू के पैरो के पास फेंक दी। टुन्नू की काजल-लगी बड़ी-बड़ी आँखों में अपमान के कारण आँसू भर आए। उसने सिर झुकाए हुए आर्द्र कंठ से कहा, ” मैं तुमझे कुछ माँगता तो हूँ नहीं। देखो, पत्थर की देवी तक अपने भक्त दव्ारा दी गई भेंट नहीं ठुकराती, तुम तो हाड़-माँस की बनी हो”।

Question number: 454 (1 of 4 Based on Passage) Show Passage

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दुलारी के कड़े स्वर से पूछने पर टुन्नू का मुख कैसा हो गया था?

Question number: 455 (2 of 4 Based on Passage) Show Passage

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दुलारी ने टुन्नू को डांटते हुए क्या कहा?

Question number: 456 (3 of 4 Based on Passage) Show Passage

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टुन्नू ने दुलारी से क्या कहा?

Question number: 457 (4 of 4 Based on Passage) Show Passage

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दुलारी ने धोती कहाँं फेंक दी?

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जीप में बैठने को हुए कि एक पहाड़ी कुत्ते ने रास्ता काट दिया। मणि ने बताया, ”ये पहाड़ी कुत्ते हैं। ये भौंकते नहीं हैं। ये स़िर्फ चाँदनी रात में ही भौंकते है।”

”क्या? ” विस्मय और अविश्वास से मैं उसे सुनती रही। क्या समुद्र की तरह कुत्तों पर भी पूर्णिमा की चाँदनी कामनाओं का ज्वार-भाटा जगाती है! खैर…।

लौटती यात्रा मे जीप में भी जितेन हमें रकम-रकम की जानकारियाँ देता रहा ” मैंडम, यहाँ एक पत्थर है जिस पर गुरूनानक के फुट प्रिंट हैं। कहते हैं यहाँ गुरूनानक की थाली से थोड़े से चावल छिटक कर बाहर गिरे थें। जिस जगह चावल छिटक कर गिरे थे, वहाँ चावल की खेती होती है।”

Question number: 458 (1 of 4 Based on Passage) Show Passage

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विस्मय और अविश्वास से क्या सुनती रही?

Question number: 459 (2 of 4 Based on Passage) Show Passage

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पहाड़ी कुत्ते कब भौंकते हैं?

Question number: 460 (3 of 4 Based on Passage) Show Passage

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चावल की खेती कहाँं होती है?

Question number: 461 (4 of 4 Based on Passage) Show Passage

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आगे पत्थर में क्या था?

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