कृतिका (Kritika-Textbook) (CBSE Class-10 Hindi): Questions 218 - 235 of 461

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Passage

अखबारों में सिर्फ़ इतना छपा कि नाक का मसला हल हो गया है और राजपथ पर इंडिया गेट के पास वाली जॉर्ज पंचम की लाट पर नाक लग रही है।

नाक लगने से पहले फिर हथियारबंद पहरेदारों को तैनाती हुई। मूर्ति के आस-पास का तालाब सुखाकर साफ़ किया गया। उसकी रबाव निकाली गई और ताजा पानी डाला गया ताकि जो ज़िंदा नाक लगाई जाने वाली थी, वह सुख न पाए। इस बात की खबर जनता को पता नहीं थी। यह सब तैयारियाँ भीतर-भीतर चल रही थीं। रानी के आने का दिन नज़दीक आता जा रहा था मूर्तिकार खुद अपने बताए हल से परेशान था। ज़िंदा नाक लाने के लिए उसने कमेटी वालों से कुछ और मदद माँगी। वह उसे दी गई। लेकिन इस हिदायत के साथ कि एक खास दिन हर हालत में नाक लग जानी चाहिए।

और वह दिन आया।

जॉर्ज पंचम की नाक लग गई।

Question number: 218 (3 of 3 Based on Passage) Show Passage

» कृतिका (Kritika-Textbook) » Prose » जॉर्ज पंचम की नाक

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अखबारों में क्या छपा था?

Passage

टुन्नू ने जवाब नहीं दिया। उसकी आँखों से कज्जल-मलिन आँसुओं की बूंदे नीचे सामने पड़ी धोती पर टप-टप टपक रही थीं। दुलारी कहती गई…।

टुन्नू पाषाण-प्रतिमा बना हुआ दलारी का भाषण सुनता जा रहा था। उसने इतना ही कहा, ”मन पर किसी का बस नहीं, वह रूप या उमर का कायल नहीं होता।” और कोठरी से बाहर निकल वह धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतरने लगा। दुलारी भी खड़ी-खड़ी उसे देखती रही। उसकी भौं अब भी वक्र थी, परंतु नेत्रों ने कौतुक और कठोरता का स्थान करुणा की कोमलता ने ग्रहण कर लिया था। उसने भूमि पर पड़ी धोती उठाई, उस पर काजल से सने आँसुओं के धब्बे पड़ गए थे। उसने एक बार गली में जाते हुए टुन्नू की ओर देखा और फिर स्वच्छ धोती पर पड़े धब्बों को वह बार-बार चूमने लगी।

Question number: 219 (1 of 2 Based on Passage) Show Passage

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टुन्नू क्या कर रहा था?

Question number: 220 (2 of 2 Based on Passage) Show Passage

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धोती पर क्या टपक रहा था?

Passage

दनादन फ़ोटो खिंचलाने की बजाय मैं उस सारे परिदृश्य को अपने भीतर लगातार खींच रही थी जिससे महानगर के डार्क रूम में इसे फिर-फिर देख सकूँ। संपूर्णता के उन क्षणों में यह हिमशिखर मुझे मेरे आध्यात्मिक अतीत से जोड़ रहे थे। शायद ऐसी ही विभोर कर देने वाली दिव्यता के बीच हमारे ऋषि-मुनियों ने वेदों की रचना की होगी। जीवन सत्यों को खोजा होगा।’सर्वे भवंतु सुखिन: ’ का महामंत्र पाया होगा। अंतिम संपूर्णता का प्रतीक वह सौंदर्य ऐसा कि बड़ा से बड़ा अपराधी भी इसे देख ले तो क्षणों के लिए ही सही ’करुणा का अवतार’ बुद्ध बन जाए।

Question number: 221 (1 of 3 Based on Passage) Show Passage

» कृतिका (Kritika-Textbook) » Prose » साना-साना हाथ जोड़ि

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हिमशिखरों के बीच ऋषि-मुनियों ने क्या किया था?

Question number: 222 (2 of 3 Based on Passage) Show Passage

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फोटा खिंचवाने की बजाय लेखिका क्या रही थी?

Question number: 223 (3 of 3 Based on Passage) Show Passage

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लेखिका को ये हिमशिखर किस अतीत से जोड़ रहे थे?

Passage

उच्च स्तर पर मशवरे हुए, दिमाग खरोंचे गए और यह तय किया गया कि हर हालत में इस नाक का होना बहुत ज़रूरी है। यह तय होते ही एक मूर्तिकार को हुक्म दिया गया कि वह फ़ौरन दिल्ली में हाज़िर हो।

मूर्तिकार यों तो कलाकार था पर ज़रा पैसे से लाचार था। आते ही, उसने हुक्कामों के चेहरे देखे, अजीब परेशानी थी उन चेहरों पर, कुछ लटके, कुछ उदास और कुछ बदहवास थे। उनकी हालत देखकर लाचार कलाकार की आँखों में आसूँ आ गए तभी एक आवाज़ सुनाई दी, ”मूर्तिकार! जॉर्ज पंचम की नाक लगानी है! ”

Question number: 224 (1 of 5 Based on Passage) Show Passage

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हुक्कामों की हालात देखकर मूर्तिकार को क्या हुआ?

Question number: 225 (2 of 5 Based on Passage) Show Passage

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मूर्तिकार ने आते ही क्या देखा?

Question number: 226 (3 of 5 Based on Passage) Show Passage

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मूर्तिकार को आवाज में क्या सुनाई दिया था?

Question number: 227 (4 of 5 Based on Passage) Show Passage

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मीटिंग में तय होते ही किसको हुक्म दिया गया?

Question number: 228 (5 of 5 Based on Passage) Show Passage

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मूर्तिकार किससे लाचार था?

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शहनाई वालों ने टुन्नू के गीत को बंद बाजे में दोहराया। लोग यह देखकर चकित थे कि बात-बात में तीरकमान हो जाने (हमले की लिए या लड़ने के लिए तैयार रहना) वाली दुलारी आज अपने स्वभाव के प्रतिकूल खड़ी-खड़ी मुसकरा रही थी। कंठ-स्वर की मधुरता में टुन्नू दुलारी से होड़ कर रहा था और दुलारी मुग्ध खड़ी सुन रही थी।

टुन्नू के इस सार्वजनिक आविर्भाव का यह तीसरा या चौथा अवसर था। उसके पिता जी घाट पर बैठकर और कच्चे महाल के दस-पाँच घर यजमानी में सत्यनारायण की कथा से लेकर श्राद्ध और विवाह तक कराकर कठिनाई से गृहस्थी की नौका खे रहे थे। परंतु पुत्र को आवारों की संगति में शायरी का चस्का लगा। उसने भैरोहेला को अपना उस्ताद बनाया और शीघ्र ही सुंदर कजली-रचना करने लगा। वह पद्यात्मक प्रश्नोत्तरी में कुशल था और अपनी इसी विशेषता के बल पर वह बजरडीहा वालों की ओर से बलाया गया था। उसकी ’शायरी’ पर बजरहीडा वालों ने ’वाह-वाह’ का शोर मचाकर सिर पर आकाश उठा लिया। खोजवाँ वालों का रंग उतर (शोभा या रौनक घटना) गया। टुन्नू का गीत भी समाप्त हो गया।

Question number: 229 (1 of 10 Based on Passage) Show Passage

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किसका रंग उतर गया था?

Question number: 230 (2 of 10 Based on Passage) Show Passage

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टुन्नू के पिता जी क्या करते थे?

Question number: 231 (3 of 10 Based on Passage) Show Passage

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टुन्नू शीघ्र किसकी रचना करने लगा?

Question number: 232 (4 of 10 Based on Passage) Show Passage

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टुन्नू ने किसको अपना उस्ताद बनाया?

Question number: 233 (5 of 10 Based on Passage) Show Passage

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टुन्नू किसमें कुशल था?

Question number: 234 (6 of 10 Based on Passage) Show Passage

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टुन्नू के इस सार्वजनिक आविर्भाव का यह कौनसा अवसर था?

Question number: 235 (7 of 10 Based on Passage) Show Passage

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किसकी ’शायरी’पर बजरहीडा वालों ने ’वाह-वाह’ का शोर मचाकर सिर पर आकाश उठा लिया था?

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