CBSE (Central Board of Secondary Education- Board Exam) Class-10 Hindi: Questions 1335 - 1347 of 2295

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Passage

(3)

हमारैं हरि हारिल की लकरी।

मन क्रम बचन नंद-नंदन उर, यह दृढ़ करि पकरी।

जागत सोवत स्वप्न दिवस-निसि, कान्ह-कान्ह जक री।

सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यौं करुई ककरी।

सु तौ ब्याधि हमकौं लै आए, देखी सुनी न करी।

यह तौ ’सूर’ तिनहिं लै, सौंपौ, जिनके मन चकरी।।

Question number: 1335 (2 of 4 Based on Passage) Show Passage

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उद्धव द्वारा दिए गए निर्गुण उपासना संबंधी उपदेश को सुनकर गोपियाँ कैसी हो जाती है ं।

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Question number: 1336 (3 of 4 Based on Passage) Show Passage

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सूरदास जी दव्ारा रचित उपर्युक्त पद के शिल्प-सौंदर्य क्या हैं?

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Question number: 1337 (4 of 4 Based on Passage) Show Passage

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सूरदास जी दव्ारा रचित उपर्युक्त पद के भाव-सौंदर्य क्या हैं?

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Passage

(2)

मन की मन ही मांझ रही।

कहिए जाइ कौ पै ऊधौ, नाहीं परत कही।

अवधि अधार आस आवन की, तन मन बिथा सही।

अब इन जोग सँदेसनि सुनि-सुनि, बिरहिनि बिरह दही।

चाहति हुतीं गुहारि जितहिं तैं, उत तैं धार बही।

’सूरदास’ अब धीर धरहिं क्यौं, मरजादा न लही।।

Question number: 1338 (1 of 4 Based on Passage) Show Passage

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गोपियाँ कृष्ण से कैसा प्रेम करती हैं?

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Question number: 1339 (2 of 4 Based on Passage) Show Passage

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सूरदास दव्ारा रचित प्रस्तुत पद में गोपियों के पास योग-ज्ञान का संदेश लेकर कौन पहुँचते हैं?

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Question number: 1340 (3 of 4 Based on Passage) Show Passage

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सूरदास जी दव्ारा रचित उपर्युक्त पद के शिल्प-सौंदर्य क्या हैं?

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Question number: 1341 (4 of 4 Based on Passage) Show Passage

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सूरदास जी दव्ारा रचित उपर्युक्त पद के भाव-सौंदर्य क्या है?

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Question number: 1342

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » देव सवैया, कवित्त

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देव दव्ारा रचित रचनाओं में ओर किसका निर्वाह किया है?

Question number: 1343

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » ऋतुराज कन्यादान

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कवि ऋतुराज दव्ारा रचित रचनाओं में उनकी भाषा किससे जुड़ी हुई है?

Question number: 1344

» क्षितिज(Kshitij-Textbook) » Additional Questions » मंगलेश डबराल संगतकार

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कवि मंगलेंश डबराल दव्ारा रचित उनकी रचनाओं मेें कौनसी योजना देखते ही बनती है?

Passage

5

तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा। बार बार मोहि लागि बोलावा।

सुनत लखन के बचन कठोरा। परसु सुधारि धरेउ कर घोरा।।

अब जनि देइ दोसु मोहि लोगू। कटुबादी बालक बधजोगू।।

बाल बिलोकि बहुत मैं बाँचा। अब येहु मरनिहार भा साँचा।।

कौसिक कहा छमिअ अपराधू। बाल दोष गुन गनहिं न साधू।।

खर कुठार मैं अकरुन कोही। आगे अपराधी गुरुद्रोही।।

उतर देत छोड़ौं बिनु मारे। केवल कौसिक सील तुम्हारे।।

न त येहि काटि कुठार कठोरे। गुरहि उरिन होतेउँ श्रम थोरे।।

गाधिसु नु कह हृदय हसि मुनिहि हरियरे सूझ।

अयमय खाँड़ न ऊखमय अजहुँ न बूझ अबूझ।।

Question number: 1345 (1 of 8 Based on Passage) Show Passage

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तुलसीदास जी दव्ारा रचित उपरोक्त प्रसंग का शिल्प-सौंदर्य क्या है?

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Question number: 1346 (2 of 8 Based on Passage) Show Passage

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तुलसीदास जी दव्ारा रचित उपरोक्त प्रसंग में लक्ष्मण जी के कठोर वचन सुनकर परशुराम जी ने क्या किया?

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Question number: 1347 (3 of 8 Based on Passage) Show Passage

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तुलसीदास जी दव्ारा रचित उपरोक्त प्रसंग की व्याख्या में लक्ष्मण ने परशुराम जी से क्या कहा?

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